Arya bhattacharya mathematician biography in hindi
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ऐसा माना जाता हैं कि आर्यभट का जन्म भी ई.स.
आर्यभट की जीवनी, जीवन परिचय, जन्म कब हुआ, कौन थे, जयंती, उपग्रह, खोज (Aryabhatt biography and inventions in hindi, Aryabhatt History hindi) (Date of Birth, Jayanti, Foundation, Books, Inventions)
भारत का प्राचीन एवं पौराणिक इतिहास दोनों ही विज्ञान तथा तकनीकी से संपन्न है। प्राचीन काल में ही भारत में ऐसी भव्य वैज्ञानिक खोजें तथा तकनीकी विकसित हुई थी जिनका पता पूरी दुनिया को नहीं था।
लेकिन फिर भी आज जब विज्ञान और तकनीकी की बात होती है तो उन विदेशी वैज्ञानिकों को खोज अनुसंधान का श्रेय दिया जाता है जिनके जन्म के कई वर्षों पूर्व ही भारतीय वैज्ञानिक महर्षियों ने ऐसे सिद्धांतों की नींव रख दी थी।
भारत के इन्हीं प्राचीन वैज्ञानिकों में गणित के जनक कहे जाने वाले आर्यभट्ट जी का नाम भी शामिल है। भारत के महान गणितज्ञ खगोलविद एवं ज्योतिषविद् आर्यभट्ट को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान विद्वानों में से एक है।
पृथ्वी गोल है एवं अपनी धुरी पर घूमती है जिस कारण दिन और रात होते हैं , मध्यकाल में निकोलस कॉपरनिकस ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया था लेकिन वास्तविकता यह है कि हजारों साल पहले आर्यभट्ट ने इसकी खोज कर ली थी।
आर्यभट्ट पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने बीजगणित का प्रयोग किया था।
आर्यभट्ट से जुड़ी कई ऐसी महत्वपूर्ण बातें हैं जो हम सभी को जानने की आवश्यकता है । इसीलिए आज किस आर्टिकल में हम महान गणितज्ञ आर्यभट्ट से जुड़े हुए सभी महत्वपूर्ण बातें आर्यभट्ट की जीवनी, गणित एवं सौरमंडल के क्षेत्र में उनका योगदान के विषय में विस्तार से जानकारी देंगे।
आर्यभट्ट का जीवन परिचय (Aryabhatt biography and inventions in hindi)
| नाम | आर्यभट्ट |
| जन्म | 476 ईस्वी |
| जन्म स्थान | अस्मक (महाराष्ट्र) |
| रचनाएं | अर्यभट्टीय, आर्यभट्ट सिद्धांत |
| कार्यक्षेत्र | गणितज्ञ, खगोल शास्त्री, ज्योतिषविद् |
| योगदान | शून्य की खोज, पाई की खोज |
| काल | गुप्त काल |
| मृत्यु | 550 ईस्वी |
आर्यभट्ट का नाम प्राचीन भारत के महान विद्वानों वराह मिहिर भास्कर आचार्य एवं ब्रह्म गुप्त आदि में शामिल था। 1975 में भारत ने पहला उपग्रह लॉन्च किया, जिसका नाम ‘आर्यभट्ट’ भी महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर ही रखा था।
आर्यभट्ट का गणित के साथ साथ सौरमंडल के क्षेत्र में भी अहम योगदान रहा है। आर्यभट्ट के बाद 875 ईस्वी में आर्यभट्ट द्वितीय हुए, इन्होंने ज्योतिष पर महासिद्धांत नामक ग्रंथ लिखा।
आर्यभट्ट द्वितीय ज्योतिष और गणित दोनों के ज्ञाता थे। आर्यभट्ट द्वितीय को ‘लघु आर्यभट्ट’ में कहा जाता था।
आर्यभट्ट का प्रारंभिक जीवन (Earlier life of Aryabhatt)
आर्यभट्ट के जन्म के संबंध में कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि उनका जन्म 476 ईसवी में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट गुप्त साम्राज्य के राजा चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में थे जिन्हें विक्रमादित्य की उपाधि मिली थी।
आर्यभटीय में उनका जन्म स्थान कुसुमपुर एवं जन्म शक संवत 398(476 ईस्वी) लिखा गया है। कहा जाता है कि
आर्यभट्ट के जन्म स्थान को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म महाराष्ट्र के अस्मक प्रदेश में हुआ था।
ऐसा भी माना जाता है कि आर्यभट्ट का जन्म पटना (पाटलिपुत्र) में कुसुमपुर में हुआ था।
आर्यभट्ट की शिक्षा (Education of Arybhatt)
माना जाता है कि आर्यभट्ट ने अपनी शिक्षा पाटलिपुत्र में रहकर ही पूरी की। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि बाद में आर्यभट्ट पाटलिपुत्र में एक शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष के पद पर भी रहे।। यह भी माना जाता है कि आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के भी अध्यक्ष रहे।
आर्यभट्ट ने मात्र 23 साल की आयु में आर्यभटिया नामक ग्रंथ लिखा था इस ग्रंथ को राजा बुद्ध गुप्त ने स्वीकृति देते हुए उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बनाया दिया था।
आर्यभट्ट के शिष्यों में एक नाम प्रसिद्ध खगोल शास्त्री वराहमिहिर का भी आता है।
आर्यभट्ट के सिद्धांत
आर्यभट्ट ने कई सिद्धांत दिए जिनमें ‘बॉलिस सिद्धांत’ ‘रोमाक सिद्धांत’ एवं ‘सूर्य सिद्धांत’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। आर्यभट्ट के प्रयासों के फलस्वरूप ही खगोल विज्ञान को गणित से अलग किया गया।
आर्य सिद्धांत:
आर्य सिद्धांत खगोलीय घटनाओं पर आधारित है। यह ग्रंथ अब लुप्त हो चुका है। इनकी रचनाओं के अवशेषों में अनेक खगोलीय उपकरणों के विषय में जानकारी मिलती है जिसमें की शंकु यंत्र (Gnomon),छाया यंत्र (shadow Instrument), बेलनाकार यस्ती यंत्र (Cylindrical Stick),छत्र यंत्र (Umbrella Shaped Device),जल घड़ी ( Water clock) और कोण मापी उपकरण ( Angle measuring device) और धनुर यंत्र (semi circular instrument) आदि शामिल हैं।
आर्यभट्ट ने इस रचना में सूर्य सिद्धांत का भी प्रयोग किया।
आर्यभट्ट के कार्य एवं योगदान
आश्चर्य की बात है कि आज से 1600 साल पहले जिस समय नाही कोई वैज्ञानिक उपकरण था और ना ही कोई गणना का साधन था,
आर्यभट्ट ने बिना गणित के उपयोग किए ही गणित के सूत्र एवं खगोलीय पिंडों की गतिशीलता की जानकारी दे डाली थी।
और यह सारी गणनाए उन्होंने एल्फाबेट के माध्यम से की, जिसमें गणितीय सूत्रों का कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया गया था।
आर्यभट्ट के कार्यों की जानकारी उनके द्वारा रचित उनके ग्रंथों से प्राप्त होती है। आर्यभट्ट जब 23 साल के थे तो कलयुग के 36 100 साल निकल चुके थे इस बात से यह पता चलता है कि वह समय 449 ईसवी था।
आर्यभट्ट ने मुख्य तौर पर गणित एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में कार्य किए।
आर्यभट्ट के प्रसिद्ध ग्रंथ आर्यभटिया में उनकी कई खोजों के विषय में जानकारी मिलती है।
आर्यभट्ट की प्रमुख रचनाएं
- आर्यभटीय
- दशगीतिका
- तंत्र
- आर्यभट्ट सिद्धांत
आर्यभट्ट का ग्रंथ (आर्यभटीय)
आर्यभट्ट जब केवल 23 साल के थे, तब उन्होंने आर्यभटीय ग्रंथ की रचना की थी । जिसमें उनकी अनेक खोजों की पूरी जानकारी है।हालांकि माना जाता है कि इस ग्रंथ का नाम आर्यभट्ट ने नहीं रखा था बल्कि यह अन्य विद्वानों या उनके शिष्यों द्वारा रखा गया था।
आर्यभट्ट किस ग्रंथ को आर्य शत अष्ट नाम से भी जाना जाता है। अर्थात (आर्यभट्ट के 108 – छंदों की संख्या) आर्यभट्ट ने अपने इस ग्रंथ के विषय में कहीं भी वर्णन नहीं किया था। आर्यभटिया में वर्गमूल घनमूल समांतर श्रेणी विभिन्न समीकरणों का वर्णन है । इस ग्रंथ में पतंजलि घात समीकरण घाट श्रृंखला के योग ज्या (sin)एवं कोज्या (cos) के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है।
आर्यभट्ट का यह ग्रंथ 4 पदों या अध्यायों में विभाजित है जिसमें 108 छंद है ।
आर्यभटीय में स्थित 4 पद :
- गीतिकापद (13 छंद)
- गणितपद (33 छंद)
- कालक्रियापद (25 छंद)
- गोलपद (50 छंद)
गीतिकापद: गीतिका पद में 13 छंद है। गीतिका पद में समय की बड़ी-बड़ी इकाइयों का वर्णन मिलता है जिसमें त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलयुग की पूर्ण रूप से जानकारी दी गई है।
दीपिका पद में आर्यभट्ट ने ब्लैक होल (black hole) का भी वर्णन किया है।
गणित पद: गणित पद में कुल 33 छंद है। जिसमें कि आर्यभट्ट ने गणित की पूरी जानकारी विस्तार पूर्वक दी है। इसमें आर्यभट्ट ने simple equation, quadratic equation, simultaneous equation aur intermediate equation का भी विस्तार से वर्णन किया है।
इसमें अंकगणित एवं बीजगणित को भी समझाया गया है। वर्गमूल घनमूल समांतर श्रेणी एवं अन्य समीकरणों के विषय में भी बताया गया है।
कॉल क्रियापद: कॉल क्रियापद में 25 छंद है । इसमें समय की विभिन्न इकाइयों के विषय में बताया गया है तथा ग्रहों की स्थिति पृथ्वी कर रिवोल्यूशन और रोटेशन के विषय में गणना की गई है।
इसी आधार पर पंचांग भी बनाए गए हैं जिनमें शुभ और अशुभ मुहूर्त की गणना की गई है।
गोला पद: गोला पद में 50 छंद है इसमें त्रिकोणमिति और ज्यामिति के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है तथा साथ ही पृथ्वी के आकार दिन-रात होने का कारण आकाशीय भूमध्य रेखा के विषय में बताया गया है।
आर्यभट्ट का गणितज्ञ के रूप में योगदान
पाई की खोज:
सबसे पहले आर्यभट्ट ने हीं पाई कि मान की खोज की थी। इसका वर्णन आर्यभटीय के गणितपाद 10 में मिलता है। आर्यभट्ट ने पाई का आर्कमिडीज से भी अधिक सटीक मान निरूपित किया था। आर्यभट्ट ने गणितपद में बताया कि , 100 में 4 जोड़कर, फिर 8 से गुणा करें, फिर 62,000 जोड़ें और 20,000 से भागफल निकाले । इससे प्राप्त मान पाई का मान होगा।
[(4+100)*8+62000]/20000=,62, 832/20,000= 3.1416
कुछ विद्वानों का मानना है कि आर्यभट्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या बताया था लेकिन उनके किसी उनके ग्रंथ में इसका कहीं भी साक्ष्य नहीं मिलता। इसीलिए इसका श्रेय आर्यभट्ट को नहीं मिला।
1761 में लैंबर्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या बताया और इसका श्रेय लैंबर्ट को ही दिया गया।
शून्य की खोज:
आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम गणित की सर्वश्रेष्ठ खोज की जो ज्योति उनके द्वारा की गई शून्य की खोज। आर्यभट्ट ने संख्याओं को आगे बढ़ाने के लिए एवं घटनाओं को पूर्ण करने के लिए दशमलव का उपयोग किया और इस दशमलव को उन्होंने शून्य नाम दिया।
बीजगणित व समीकरण
- आर्यभट्ट ने ही सबसे पहले बीजगणित में संख्याओं के वर्ग एवं घन श्रेणी के लिए सूत्र का प्रतिपादन किया।
- आर्यभट्ट द्वारा कुटुक सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया जिससे चर समीकरणों का हल निकाला जाता है।
- उन्होंने कुटुक सिद्धांतों से ax+by=c, जैसी समीकरण का हल प्राप्त किया।
- आर्यभट्ट नहीं सबसे पहले वर्गो एवं घरों की श्रृंखला को जोड़ने का सूत्र निकाला।
- 1^2+2^2+………..+n^2=n (n+1) (2n+1)/6
त्रिकोणमिति
- आर्यभट्ट द्वारा रचित गणितपद 6 में त्रिभुज के क्षेत्रफल का के विषय में बताया गया है।
- आर्यभट्ट ने ही त्रिकोणमिति में सर्वप्रथम ज्या (sine) एवं कोज्या (cosine) फलनों की रचना की।
- जब उनके ग्रंथ को अरब भाषा में अनुवादित किया गया तो इन्हीं शब्दों को जैया (jaiya) तथा कौज्या (kojaiya) कहा गया।
- फिर इन्हीं अरब किताबों को जब लैटिन भाषा में अनुवादित किया गया तो इन्हें साइन एवं कोसाइन नाम दिया गया।
आर्यभट्ट का खगोल शास्त्री के रूप में योगदान (Aryabhatt as an Astronomer)
ग्रहों के गति के विषय में जानकारी
- सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही परिकल्पना की यह सिद्ध किया था कि पृथ्वी गोल है एवं अपनी धुरी पर घूमती है।
- आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी के लोगों को तारे चलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन सारे स्थित है तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। जिसकी वजह से हमें तारे पश्चिम दिशा की ओर जाते हुए दिखते हैं।
- आर्यभट्ट ने सभी ग्रहों को पृथ्वी से दूरी के आधार पर व्यवस्थित क्रम में लगाया, जिसका क्रम है- चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शनि व तारे
आर्यभट्ट ने सूर्य से अन्य ग्रहों की दूरी की माप भी बताई, जो इस प्रकार है-
- बुद्ध: .
1.538 AU
- गुरु: 4.16 AU
- शनि: 9.41 AU
दिन-रात का होना
- आर्यभट्ट ने यह बताया था कि पृथ्वी की परिधि लगभग 24,835 मील है और इसकी अपनी दूरी में घूमने के कारण ही दिन और रात होते हैं।
- आर्यभट्ट ने ही बताया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिसमें उसे 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड का समय लगता है। और वर्तमान में वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार यह समय है 23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकंड। अर्थात आर्यभट्ट की गणना में मात्र .01 का ही अंतर था।
- आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी को तारों की परिक्रमा करने में 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट तथा 30 सेकंड लगते हैं। वर्तमान में वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार आर्यभट्ट द्वारा बताए गया समय केवल 3 मिनट ज्यादा है।
ग्रहण (Eclipse)के विषय में जानकारी दी
आर्यभट्ट ने इस बात की पुष्टि की कि पृथ्वी की तरह अन्य ग्रह भी अपनी धुरी पर घूमते हैं और इसी का कारण है चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण। हिंदू मान्यता के अनुसार राहु ग्रह द्वारा सूर्य और चंद्रमा को निकल जाने पर सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण होता है आर्यभट्ट ने इस सिद्धांत को गलत साबित किया ।
आर्यभट्ट ने वैज्ञानिक ढंग से ग्रहण की व्याख्या की।
- पृथ्वी की तरह है अन्य ग्रह भी अपनी दूरी पर घूमते हैं जिसके कारण सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होता है।
- आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता वास्तव में वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशमान होता है।
चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse)
चंद्रमा जब अपने अक्ष पर घूमता है तो वह पृथ्वी की परिक्रमा के साथ-साथ सूर्य की परिक्रमा भी करता है । और इसी दौरान सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं ।
सूर्य और चंद्रमा के बीच में जब पृथ्वी आती है, तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और वह सूर्य का प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुँच पाता, इस घटना को चंद्रग्रहण कहते हैं ।
सूर्य ग्रहण
पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और अपने उस पर घूमते हुए वह सूर्य की परिक्रमा करती है।
इसी प्रकार चंद्रमा भी अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी की और सूर्य की परिक्रमा करता है और इसी दौरान जब पृथ्वी और सूर्य के मध्य में चंद्रमा आ जाता है। चंद्रमा के बीच में आने से हमें सूर्य का कुछ हिस्सा दिखाई नहीं देता रोहित काला दिखाई पड़ता है और इसी घटना को सूर्यग्रहण कहते हैं।
आर्यभट्ट की मृत्यु
आर्यभट्ट की मृत्यु 550 ईसवी में हुई थी । माना जाता है कि उनके मृत्यु का स्थान पाटलिपुत्र ही था।
लेकिन बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि आज हमारे शिक्षा प्रणाली में आर्यभट्ट एवं उनके जैसे महान विद्वान वराहमिहर भास्करचार्य रामानुज आदि के विषय में कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता।
आर्यभट्ट द्वारा की गई अन्य खोज :
- आर्यभट्ट ने पृथ्वी की परिधि की लंबाई 3996 8.0 5 किलोमीटर बताई। वास्तव में यह लंबाई 400 75 पॉइंट ज़ीरो 1 किलोमीटर है जोकि आर्यभट्ट की बताई गई लंबाई से केवल .2% कम है।
- आर्यभट्ट ने वायु मंडल की ऊंचाई 80 किलोमीटर बताई थी वास्तव में वायुमंडल की ऊंचाई 16 किलोमीटर से भी ज्यादा है लेकिन वायुमंडल का 99% हिस्सा केवल 80 किलोमीटर तक ही सीमित है।
- आर्यभट्ट ने सूर्य से अन्य ग्रहों की बीच की दूरी के विषय में बताया था जैसे कि Astronomical Unit (AU) कहा जाता है।
सम्मान (Work for the Prestige of Aryabhatt)
गणित एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट के अभूतपूर्व योगदान को हमेशा स्मरण किया जाएगा। आर्यभट्ट प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं एक महान खगोल शास्त्री थे।
आर्यभट्ट को सम्मानित करने के लिए निम्न कार्य किए गए हैं।
भारत का पहला सेटेलाइट ‘आर्यभट्ट’ के नाम पर ही रखा गया।
भारत सरकार द्वारा आर्यभट्ट की प्रतिष्ठा में 1975 में लांच किया गया पहले सेटेलाइट का नाम ‘आर्यभट्ट’ रखा गया।
चांद की पूर्वी दिशा की ओर जो गड्ढे हैं उनको आर्यभट्ट नाम दिया गया है। आर्यभट्ट की प्रतिष्ठा में बिहार सरकार ने आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी की स्थापना की जो पटना से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
भारत सरकार द्वारा 2 रुपए के नोट के पीछे आर्यभट्ट सेटेलाइट की फोटो लगाई गई है।
FAQ
आर्यभट्ट का जन्म कब हुआ था??
उनका जन्म 476ई-वी- में पटना के पाटलिपुत्र में हुआ था।
आर्यभट्ट ने किसकी खोज की थी
आर्यभट्ट एक महान गणितज्ञ और अविष्कारक थे उन्होंने शून्य, पाई के मान की खोज, पृथ्वी की गति, त्रिकोणमिति, बीज गणित के समीकरण, वर्ग व घन श्रेणी के सूत्र का प्रतिपादन, ग्रहों की स्थिति, ग्रहण के बारे में पूरी जानकारी जैसे अनेकों अविष्कार किये थे।
आर्यभट्ट की प्रमुख रचनाएं कौन सी थी?
आर्यभटीय, दशगीतिका, तंत्र, आर्यभट्ट सिद्धांत प्रमुख रचनाएं हैं।
आर्यभट्ट की मृत्यु कब हुई?
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आर्यभट्ट (Aryabhatta, 476-550) प्राचीन भारत के महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे, जिन्होंने ‘आर्यभटीय‘ ग्रंथ की रचना की। इसमें ज्योतिषशास्त्र के कई सिद्धांतों का वर्णन मिलता है। उन्होंने अपने जन्मस्थान को कुसुमपुर (वर्तमान पटना) और जन्मकाल शक संवत 398 बताया, लेकिन कुछ शोधों के अनुसार कुसुमपुर दक्षिण में स्थित था। एक अन्य मत के अनुसार, उनका जन्म महाराष्ट्र के अश्मक देश में हुआ था। वे भट्ट ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण समुदाय से माने जाते हैं और उन्होंने अपनी रचनाएँ राजकीय संरक्षण में पूर्ण कीं।
आर्यभट्ट का संक्षिप्त परिचय, Aryabhatta Biography in Hindi, Aryabhatta Jeevan Parichay / Aryabhatta Jivan Parichay / आर्यभट्ट :
| पूरा नाम | आर्यभट (Aryabhatta) |
|---|---|
| जन्म | 476 ईस्वी, कुम्भी (वर्तमान बिहार, भारत) |
| जन्म स्थान | कुम्भी, बिहार, भारत |
| प्रमुख कार्य | गणित, खगोलशास्त्र, त्रिकोणमिति, बीजगणित, सौर और चंद्रग्रहण का अध्ययन |
| प्रमुख ग्रंथ | आर्यभटीय (Aryabhatiya) |
| गणित में योगदान | π (पाई) का अनुमान, त्रिकोणमिति की परिभाषा, बीजगणितीय समीकरणों का हल |
| खगोल विज्ञान में योगदान | पृथ्वी की धुरी पर घूर्णन की व्याख्या, ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या, ग्रहों की गति |
| समय की गणना | पृथ्वी का आयु और वर्ष के बारे में सटीक गणना, सौर वर्ष का मान निर्धारित |
| महत्वपूर्ण शोध | शून्य की अवधारणा का परोक्ष योगदान, गणित में दशमलव प्रणाली का उपयोग |
| मृत्यु | 550 ईस्वी (अनुमानित) |
| प्रभाव | भारतीय गणितज्ञों और खगोलज्ञों पर गहरा प्रभाव, अरबी और यूरोपीय खगोलशास्त्र पर प्रभाव |
आर्यभट्ट का जीवन परिचय | Aryabhatta Ka Jivan Parichay
आर्यभट्ट का जन्म 476 ईस्वी में कुसुमपुर (पटना) में हुआ था। वे सम्राट विक्रमादित्य द्वितीय के समय के विद्वान थे और उनके शिष्य वराहमिहिर एक प्रसिद्ध खगोलविद थे। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर 23 वर्ष की उम्र में आर्यभटीय ग्रंथ लिखा, जिसकी ख्याति के कारण राजा बुद्धगुप्त ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बनाया। लगभग 875 ईस्वी में आर्यभट्ट द्वितीय हुए, जिन्होंने महासिद्धांत ग्रंथ की रचना की। वे गणित और ज्योतिष के आचार्य थे और ‘लघु आर्यभट्ट’ के नाम से भी प्रसिद्ध थे।
प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा
हालाँकि आर्यभटीय में आर्यभट्ट के जन्म वर्ष का स्पष्ट उल्लेख है, उनके वास्तविक जन्मस्थान को लेकर मतभेद हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि उनका जन्म नर्मदा और गोदावरी के बीच स्थित अश्मक क्षेत्र में हुआ था, जिसे वे मध्य भारत (महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश) से जोड़ते हैं। प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथ अश्मक को दक्षिणापथ या दक्खन में दर्शाते हैं, जबकि अन्य स्रोत इसे सिकंदर के प्रतिरोधी क्षेत्र के रूप में उत्तर में स्थित मानते हैं।
हालिया अध्ययन के अनुसार, आर्यभट्ट केरल के चाम्रवत्तम (10°51′ उत्तर, 75°45′ पूर्व) के निवासी थे। शोध के अनुसार, अश्मक एक जैन प्रदेश था, जो श्रवणबेलगोल के आसपास विस्तृत था, और पत्थर के स्तंभों के कारण इसका नाम “अश्मक” पड़ा। चाम्रवत्तम इस जैन क्षेत्र का अंग था, जिसका प्रमाण भारतापुझा नदी है, जिसका नाम जैन परंपरा के राजा भरत के नाम पर रखा गया। दशगीतिका के पाँचवें श्लोक में भी राजा भरत का उल्लेख है, जिससे संकेत मिलता है कि आर्यभट्ट की विद्या कुसुमपुरा तक पहुँची और सराही गई।
यह सुनिश्चित है कि आर्यभट्ट उच्च शिक्षा के लिए कुसुमपुरा (आधुनिक पटना) आए और कुछ समय वहाँ रहे। भास्कर I (629 ई.) ने कुसुमपुरा को पाटलिपुत्र से जोड़ा है। गुप्त साम्राज्य के अंतिम दिनों में, जब बुद्धगुप्त और अन्य शासकों के शासनकाल में हूणों के आक्रमण शुरू हुए, वे वहीं निवास कर रहे थे।
आर्यभट्ट अपनी खगोलीय गणनाओं में श्रीलंका को संदर्भ बिंदु के रूप में उपयोग करते थे, और उन्होंने आर्यभटीय में कई स्थानों पर श्रीलंका का उल्लेख किया है।
आर्यभट्ट की कृतियाँ
आर्यभट्ट द्वारा रचित तीन प्रमुख ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है—दशगीतिका, आर्यभटीय और तंत्र। विद्वानों के अनुसार, उन्होंने आर्यभट्ट सिद्धांत नामक एक और ग्रंथ भी लिखा था, लेकिन वर्तमान में इसके केवल 34 श्लोक ही मिलते हैं। सातवीं शताब्दी में इस ग्रंथ का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था, लेकिन इसका लुप्त हो जाना रहस्य बना हुआ है।
उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति आर्यभटीय है, जिसमें वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी और विभिन्न समीकरणों का उल्लेख है। इसमें गणितीय सिद्धांतों को 33 श्लोकों में तथा खगोल-विज्ञान और यांत्रिकी से जुड़े सिद्धांतों को 75 श्लोकों में समाहित किया गया है। इस छोटे ग्रंथ में उन्होंने अपने समय से पहले और बाद के भारतीय तथा विदेशी सिद्धांतों पर क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए।
आर्यभटीय गणित और खगोल विज्ञान का एक संकलन है, जिसे भारतीय गणितीय साहित्य में बड़े पैमाने पर उद्धृत किया गया है और जो आज भी उपलब्ध है। इसके गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल और गोलीय त्रिकोणमिति शामिल हैं। इसमें सतत भिन्न, द्विघात समीकरण, घात शृंखला के योग और ज्याओं की एक तालिका का विवरण भी मिलता है।
आर्य-सिद्धांत खगोलीय गणनाओं पर आधारित एक ग्रंथ था, जो अब लुप्त हो चुका है। इसकी जानकारी वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कर I के लेखों से मिलती है। यह सूर्य सिद्धांत पर आधारित था और इसमें मध्यरात्रि-दिवस गणना का उपयोग किया गया था, जबकि आर्यभटीय में सूर्योदय-आधारित गणना पद्धति अपनाई गई थी। इस ग्रंथ में कई खगोलीय यंत्रों, जैसे शंकु-यंत्र, छाया-यंत्र, अर्धवृत्ताकार उपकरण, चक्र-यंत्र, यस्ती-यंत्र, छत्र-यंत्र और दो प्रकार की जल घड़ियों का उल्लेख किया गया है।
एक तीसरा ग्रंथ, जिसका अरबी अनुवाद अल-नन्तफ या अल-नन्फ़ नाम से जाना जाता है, आर्यभट्ट की कृति होने का दावा करता है, लेकिन इसका मूल संस्कृत नाम अज्ञात है। 9वीं शताब्दी के अभिलेखों में फारसी विद्वान और इतिहासकार अल-बिरूनी ने इसका उल्लेख किया है।
आर्यभटीय (आर्यभट्ट की पुस्तक)
आर्यभट्ट के कार्यों का प्रत्यक्ष विवरण केवल आर्यभटीय से प्राप्त होता है। यह नाम बाद के विद्वानों द्वारा दिया गया था, जबकि स्वयं आर्यभट्ट ने इसे कोई शीर्षक नहीं दिया होगा। उनके शिष्य भास्कर प्रथम ने इसे अश्मकतंत्र या अश्माका के लेखों में संदर्भित किया है। इसे कभी-कभी आर्य-शत-अष्ट (अर्थात आर्यभट्ट के 108) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कुल 108 छंद हैं। यह ग्रंथ सूत्र शैली में लिखा गया है, जहाँ हर पंक्ति एक जटिल प्रणाली को याद रखने में सहायक होती है। इसके अर्थ की व्याख्या बाद के टिप्पणीकारों के योगदान से स्पष्ट होती है। इसमें 108 मूल छंदों के अतिरिक्त 13 परिचयात्मक छंद भी शामिल हैं, और पूरा ग्रंथ चार प्रमुख अध्यायों में विभाजित है:
- गीतिकपाद (13 छंद): इसमें समय की बड़ी इकाइयाँ—कल्प, मन्वंतर, युग—विवेचित हैं, जो वेदांग ज्योतिष से भिन्न ब्रह्मांडीय अवधारणाएँ प्रस्तुत करता है। इसमें जीवाओं (साइन) की एक तालिका शामिल है और ग्रहों की गति के लिए 4.32 मिलियन वर्षों की गणना दी गई है।
- गणितपाद (33 छंद): इसमें क्षेत्रमिति, गणितीय व ज्यामितीय श्रेणियाँ, शंकु और छाया से जुड़े सिद्धांत, सरल व द्विघात समीकरण, युगपत समीकरण और कुट्टक पद्धति (अनिश्चित समीकरणों का हल) शामिल हैं।
- कालक्रियापाद (25 छंद): इसमें समय की विभिन्न इकाइयों का विश्लेषण, किसी भी दिन ग्रहों की स्थिति की गणना, अधिकमास की अवधारणा, क्षय तिथियाँ, तथा सप्ताह के सात दिनों के नामों का विवरण है।
- गोलपाद (50 छंद): इसमें खगोलीय ज्यामिति, क्रांतिवृत्त, आकाशीय भूमध्य रेखा, पृथ्वी के आकार, दिन-रात के कारण, और क्षितिज पर राशियों के उदय आदि का वर्णन किया गया है।
कुछ संस्करणों में अंत में ग्रंथ की प्रशंसा और पुष्पिकाएं जोड़ी गई हैं।
आर्यभटीय ने गणित और खगोल विज्ञान में काव्य रूप में कई नवीन अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं, जो सदियों तक प्रभावशाली बनी रहीं। इसकी संक्षिप्तता पर भास्कर प्रथम (600 ई.) और नीलकंठ सोमयाजी (1465 ई.) ने अपने भाष्यों में विशेष टिप्पणी की है।
आर्यभट का योगदान
भारतीय इतिहास में जिसे ‘गुप्तकाल‘ या ‘स्वर्ण युग‘ कहा जाता है, उस अवधि में साहित्य, कला और विज्ञान में अद्वितीय उन्नति हुई। इसी समय मगध में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जहाँ देश-विदेश से विद्यार्थी ज्ञानार्जन हेतु आते थे। खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए वहाँ एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार, आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे।
आर्यभट्ट का प्रभाव भारतीय और वैश्विक खगोलीय सिद्धांतों पर गहरा पड़ा। विशेष रूप से, उन्होंने केरल की ज्योतिष परंपरा को अत्यधिक प्रभावित किया। भारतीय गणित में उनका योगदान सर्वोपरि माना जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में 120 आर्या छंदों में ज्योतिष और गणितीय सिद्धांतों को सूत्रबद्ध किया।
गणित में उन्होंने आर्किमिडीज़ से भी अधिक सटीक रूप से π (पाई) का मान निकाला, जबकि खगोलशास्त्र में सबसे पहले उदाहरण देकर यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
आर्यभट्ट ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद ज्योतिषशास्त्र में असाधारण खोजें कीं। कोपरनिकस (1473-1543 ई.) द्वारा प्रस्तुत सिद्धांतों को वे हजार वर्ष पूर्व ही प्रतिपादित कर चुके थे। अपने गोलपाद अध्याय में उन्होंने लिखा:
“नाव में बैठा यात्री जब जलधारा में आगे बढ़ता है, तो उसे तट पर स्थित वृक्ष और पर्वत पीछे जाते प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार, गतिशील पृथ्वी से स्थिर नक्षत्र उलटी दिशा में गतिशील दिखते हैं।”
इस प्रकार, उन्होंने सबसे पहले यह प्रमाणित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
उन्होंने सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को समान अवधि का माना। उनके अनुसार, एक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं, प्रत्येक मन्वंतर में 72 महायुग (चतुर्युग) होते हैं, और एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग समान होते हैं।
गणित में, उन्होंने किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात 62,832:20,000 बताया, जो चार दशमलव स्थानों तक शुद्ध है।
संख्याओं को निरूपित करने के लिए आर्यभट्ट ने अक्षरों के समूहों पर आधारित एक अत्यंत वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया, जो गणितीय संकेतन में क्रांतिकारी योगदान माना जाता है।
गणित
स्थान-मूल्य प्रणाली और शून्य
स्थान-मूल्य अंक प्रणाली, जिसे सर्वप्रथम तीसरी सदी की बख्शाली पांडुलिपि में देखा गया था, आर्यभट्ट के कार्यों में भी स्पष्ट रूप से विद्यमान थी। यद्यपि उन्होंने स्पष्ट रूप से शून्य का प्रतीक नहीं अपनाया, फिर भी फ्रांसीसी गणितज्ञ जॉर्ज इफ्रह के अनुसार, आर्यभट्ट की अंक प्रणाली में रिक्त गुणांक और दशमलव स्थान-धारक के रूप में शून्य का उपयोग अंतर्निहित था।
हालाँकि, आर्यभट्ट ने ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने वैदिक परंपरा का अनुसरण करते हुए संख्याओं को निरूपित करने के लिए संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों का प्रयोग किया, जो गणना को याद रखने के लिए एक प्रकार की सांकेतिक विधि थी। यह विधि ज्याओं की तालिका जैसी मात्राओं को स्मरणीय बनाने के लिए प्रयुक्त होती थी।
अपरिमेय (इर्रेशनल) रूप में π
आर्यभट्ट ने π (पाई) के सन्निकटन पर कार्य किया और संभवतः यह समझ लिया था कि π एक अपरिमेय संख्या है। आर्यभटीय के गणितपाद के दूसरे भाग में उन्होंने लिखा:
चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥
“100 में 4 जोड़ें, इसे 8 से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें। इस नियम से, 20000 परिधि वाले एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है।”
इस गणना के अनुसार, परिधि और व्यास का अनुपात:
जो पाँच दशमलव स्थानों तक शुद्ध है।
आर्यभट्ट ने “आसन्न” (निकटतम मान) शब्द का उपयोग कर यह संकेत दिया कि यह केवल एक सन्निकटन नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि π एक अपरिमेय संख्या हो सकती है। यदि यह व्याख्या सही मानी जाए, तो यह एक अत्यधिक परिष्कृत गणितीय अवधारणा है, क्योंकि यूरोप में π के अपरिमेय होने का प्रमाण जॉन लैम्बर्ट ने 1761 में प्रस्तुत किया।
आर्यभटीय के अरबी अनुवाद के बाद (लगभग 820 ई.), मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी की बीजगणित पुस्तक में भी इस सन्निकटन का उल्लेख किया गया।
क्षेत्रमिति और त्रिकोणमिति
गणितपाद 6 में, आर्यभट ने त्रिभुज के क्षेत्रफल की गणना का सूत्र इस प्रकार दिया:
त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः
इसका अर्थ है: किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल, उसके आधार और ऊँचाई के गुणनफल के आधे के बराबर होता है।
आर्यभट ने अपने कार्यों में द्विज्या (साइन) पर भी चर्चा की और इसे अर्ध-ज्या नाम दिया, जिसका अर्थ है “अर्ध-तंत्री”। बाद में, इसे संक्षेप में ज्या कहा जाने लगा। जब उनके कार्यों का अरबी अनुवाद हुआ, तो ध्वन्यात्मक समानता के कारण इसे जिबा लिखा गया। चूँकि अरबी में स्वरों का प्रयोग न्यूनतम होता है, इसका संक्षिप्त रूप ज्ब रह गया। बाद में, जब विद्वानों ने इसे पुनः जिबा के रूप में पढ़ा, तो इसका अर्थ “खोह” या “गुफा” निकाला, जो अरबी में एक तकनीकी शब्द था। 12वीं शताब्दी में, जब क्रीमोना के घेरार्दो ने इसे लैटिन में अनुवाद किया, तो उन्होंने जिबा के लिए लैटिन समकक्ष साइनस का प्रयोग किया, जिसका अर्थ भी “खोह” या “गुफा” होता है। यही शब्द आगे चलकर अंग्रेजी में साइन बन गया।
अनिश्चित समीकरण
प्राचीन भारतीय गणितज्ञों को विशेष रूप से उन समीकरणों में रुचि थी, जिनके पूर्णांक हल ज्ञात करने होते थे, जैसे कि ax+b=cy यह समस्या आधुनिक गणित में डायोफैंटाइन समीकरण के रूप में जानी जाती है। आर्यभटीय पर भास्कर प्रथम की व्याख्या में ऐसा ही एक उदाहरण मिलता है:
ऐसी संख्या ज्ञात करो जो 8 से विभाजित करने पर शेष 5, 9 से विभाजित करने पर शेष 4, और 7 से विभाजित करने पर शेष 1 दे।
अर्थात, समीकरण निम्नलिखित होंगे:
इसका सबसे छोटा हल N=85N = 85 प्राप्त होता है।
डायोफैंटाइन समीकरणों को हल करना कठिन माना जाता है। इनका उल्लेख प्राचीन वैदिक ग्रंथ शुल्बसूत्र में भी मिलता है, जो 800 ई.पू.
550
Ans : अश्मक, महाराष्ट्र, भारत
Ans : 74 साल
Ans : पाई एवं शून्य की खोज
अन्य जीवन परिचय पढ़े:
महान गणितज्ञ आर्यभट की जीवनी – Aryabhatta Biography In Hindi
एक नजर में-
| नाम (Name) | आर्यभट्ट |
| जन्म (Birthday) | 476 ईसवी अश्मक, महाराष्ट्र, भारत |
| मृत्यु (Death) | 550 ईसवी |
| कार्य (Work) | गणितज्ञ, ज्योतिषविद एवं खगोलशास्त्री |
| पढ़ाई (Education) | नालंदा विश्वविद्यालय |
| प्रसिद्ध रचनायें | आर्यभटीय, आर्यभट्ट सिद्धांत |
| महत्वपूर्ण योगदान | पाई एवं शून्य की खोज |
जन्म और शुरुआती जीवन –
महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी का जन्म के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग मत है। कई इतिहासकार उनका जन्म 476 ईसवी में कुसुमपुर ( आधुनिक पटना) में बताते हैं, तो कई इतिहासकार उनका जन्म महाराष्ट्र के अश्मक में बताते हैं। वहीं ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट पटना की मुख्य नालंदा यूनिवर्सिटीसे जुड़े हुए थे।प्रसिद्द रचनाएं –
आर्यभट्ट ने अपनी जीवनकाल में कई महान ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें से उनके आर्य़भट्टीय, तंत्र, दशगीतिका और आर्यभट्ट सिद्धांत प्रमुख थे। हालांकि, उनकी आर्यभट्ट सिंद्धात नामक ग्रंथ एक विलुप्त ग्रंथ है। जिसके सिर्फ 34 श्लोक ही वर्तमान में उपलब्ध है। इतिहासकारों की माने तो आर्यभट्ट के इस ग्रंथ का सबसे अधिक इस्तेमाल सातवीं सदी में किया जाता था। यह उनका सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ था, जिसमें उन्होंने अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमति की व्याख्या बेहद खूबसूरत तरीके से की थी। इसके अलावा इस ग्रंथ में वर्गमूल, घनमूल, सामान्तर श्रेणी समेत कई समीकरणों को भी आसान भाषा में समझाया गया है। उनके इस ग्रंथ में कुल 121 श्लोक हैं, जिन्हें अलग-अलग विषयों के आधार पर गीतिकापद, गणितपद, कालक्रियापद एवं गोलपद में बांटा गया है। आर्यभट्ट के इस ग्रंथ में 108 छंद है, उनके इस ग्रंथ को ”आर्यभट्टीय” नाम से संबोधित करते हैं।”आर्यभट्ट सिद्धान्त” –
महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट की यह प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। इसमें उन्होंने शंकु यंत्र, बेलनाकार यस्ती यंत्र, जल घड़ी, छाया यंत्र, कोण मापी उपकरण, छत्र यंत्र और धनुर यंत्र/चक्र यंत्र आदि का उल्लेख किया है।गणित और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान –
महान वैज्ञानिक और गणतिज्ञ आर्यभट्ट जी ने अपने महान खोजों और सिद्धान्तों से विज्ञान और गणित के क्षेत्र में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। उन्होंने शून्य, पाई, पृथ्वी की परिधि आदि की लंबाई बताकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण खोज इस प्रकार हैं-- पाई का मान- आर्यभट्ट जी ने दशमलव के चार अंकों तक पाई का मान बताया है। उन्होंने पाई का मान 62832/20000 = 3.1416 के बराबर बताया।
- त्रिकोणमिति में आर्यभट्ट जी का योगदान- आर्यभट्ट जी का त्रिकोणमिति के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने अपने इस ग्रंथ में आर्य सिद्धांत में ज्या, कोज्या, उत्क्रम ज्या, व्युज्या की परिभाषा बताई।
- शून्य की खोज- आर्यभट्ट ने शून्य की खोज कर गणित में अपना अतिमहत्वपूर्ण योगदान दिया है।
- बीजगणित में घनों और वर्गों के जोड़ के सूत्र का अविष्कार किया।
- खगोल विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट जी ने अपना अहम योगदान दिया है, उन्होंने यह सिद्द किया है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर निरंतर रुप से घूमती है, जिसकी वजह से आसमान में तारों की स्थिति में बदलाव होता है । इसके साथ ही आर्यभट्ट जी ने यह भी बताया है कि पृथ्वी को अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करने में करीब 23 घंटे, 56 मिनट और 1 सेकंड का समय लगता है।
- आर्यभट्ट जी ने सूर्य से ग्रहों की दूरी बताई, जो कि वर्तमान माप से मिलती-जुलती है। वहीं आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी करीब 15 करोड़ किलोमीटर मानी जाती है, इसे एक 1 (AU) भी कहा जाता है।
- पृथ्वी की परिधि की लंबाई की गणना- आर्यभट्ट जी ने पृथ्वी की लंबाई 39,968.05 किलोमीटर बताई थी, जो कि इसकी वास्तविक लंबाई (40,075.01 किलोमीटर) से महज 2 प्रतिशत ही कम है। वहीं आज के विज्ञान में इसे अभी भी आश्चर्यजनिक रुप से देखा जाता है।
- इसके अलावा आर्यभट्ट जी ने वायुमंडल की ऊंचाई 80 किलोमीटर बताई। हालांकि, इसकी वास्तविक ऊंचाई 1600 किलोमीटर से भी ज्यादा है, लेकिन इसका करीब 99 फीसदी हिस्सा 80 किलोमीटर की सीमा तक ही सीमित है।
- आर्यभट्ट जी ने एक साल की लंबाई 365.25868 दिन के बराबर बताई थी, जोकि वर्तमान गणना 365.25868 के काफी निकटतम है।
- महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी की खगोलीय गणना ने ”जलाली कैलेंडर” बनाने में मद्द की थी।
उपग्रह एवं प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान –
19 अप्रैल, 1975 को भारत सरकार ने अपने पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था, जिसका नाम उन्होंने महान गणितज्ञ और खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी के नाम पर रखा था। यही नहीं इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO)द्धारा वायुमंडल के संताप मंडल में जीवाणुओं की खोज की गई थी। जिनमें से एक प्रजाति का नाम बैसिलस आर्यभट्ट रखा गया था, जबकि भारत के उत्तराखंडराज्य के नैनीताल में आर्यभट्ट के सम्मान में एक वैज्ञानिक संस्थान का नाम ”आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान” रखा गया है।मृत्यु –
गणित और विज्ञान के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आर्यभट्ट जी ने लगभग 550 ईसा पूर्व में अपने जीवन की अंतिम सांस ली थी।रोचक तथ्य –
- आर्यभट्ट दुनिया के सबसे बुद्दिमान व्यक्तियों में शुमार है, जिन्होंने गणित और विज्ञान के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था,उन्होंने वर्तमान वैज्ञानिक दुनिया के लिए एक आश्चर्य प्रकट किया था। वहीं उनकी रचनाओं का इस्तेमाल ग्रीक और अरब देशों द्धारा और अधिक विकसित करने के लिए किया गया था।
- आर्यभट्ट जी ने खगोलशास्त्र, गोलीय त्रिकोणमिति से संबंधित अपनी प्रसिद्ध रचना ‘आर्यभाटिया’ को कविता के रुप में लिखा है। यह प्राचीन भारत की सबसे लोकप्रिय और पसंदीदा किताबों में से एक है। आपको बता दें कि उन्होंने अपनी इस प्रसिद्ध रचना में अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के 33 महत्वपूर्ण नियम बताए हैं।
- महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने पाई का मान (3.1416) को दशमलव के चार अंकों तक ही सही बताया था।
- महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी ने दशगीतिका हिस्से में पहले पांच ग्रहों की गणना एवं हिन्दू कालगणना और त्रिकोणमिति की चर्चा की है।
- कालक्रिया में आर्यभट्ट जी ने हिन्दुकाल की गणना समेत ग्रहों की जानकारी दी थी।
- गणितपाद में उन्होंने अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित पर संपूर्ण जानकारी प्रदान की थी।
- आज पूरी दुनिया में पढ़ी जाने वाली त्रिकोणमिति की खोज आर्यभट्ट ने की थी।
- आर्यभट्ट दुनिया के एक ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण लगने की भी खोज की थी। इसके साथ-साथ ग्रहण लगने का समय निकलने का फॉर्मूला और ग्रहण कितनी देर तक रहेगा, इसके बारे में भी बताया था।
- शून्य की खोज करने वाले महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी का मानना था कि सौर मंडल के केन्द्र में स्थित है, पृथ्वी समेत अन्य ग्र्ह इसके परिक्रमा करते हैं।
महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी ब्रम्हांड को अनादि-अनंत मानते थे। वहीं भारतीय दर्शन के मुताबिक इस सृष्टि का निर्माण वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश इन पांच तत्वों को मिलकर हुआ है, जबकि आर्यभट्ट जी आकाश को इन पंचतत्व में शामिल नहीं करते थे।
Editorial Team
375 AU
- गीतिकापद [ 13 छंद ],
- गणितपद [ 33 छंद ],
- कालक्रियापद [ 25 छंद ],
- गोलपद [ 50 छंद ].
आर्य – सिद्धांत (Arya Siddhanta)
आर्यभट की यह रचना पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं हैं. परन्तु इसके अवशेषों में अनेक खगोलीय उपकरणों के उपयोग का वर्णन मिलता हैं, जैसे -: शंकु – यन्त्र [ Gnomon ], छाया – यन्त्र [ Shadow Instrument ], बेलनाकार यस्ती –यन्त्र [ Cylindrical Stick ], छत्र–यन्त्र [ Umbrella Shaped Device], जल – घडी [ Water Clock ], कोण – मापी उपकरण [ Angle Measuring Device ], धनुर – यंत्र / चक्र यंत्र [ Semi – Circular / Circular Instrument], आदि.
इस रचना में सूर्य सिद्धांत का प्रयोग किया गया हैं. सूर्य सिद्धांत में सूर्योदय की उपेक्षा की जाती हैं और इसमें अर्द्ध – रात्रि गणना [ Midnight Calculations ] का उपयोग किया जाता हैं.
आर्यभट का योगदान(Aryabhatta Contribution)
आर्यभट द्वारा गणित एवं खगोलशास्त्र के क्षेत्र में अनेक योगदान दिये, जिनमें से कुछ निम्नानुसार हैं -:
गणितज्ञ के रूप में योगदान (Aryabhatta Contribution to Mathematics)
पाई की खोज (History of Pai in Hindi)
आर्यभट ने पाई के मान की खोज की, इसका वर्णन आर्यभटीय के गणितपाद 10 में मिलता हैं.
पृथ्वी की छाया जितनी बड़ी होती है, ग्रहण भी उतना ही बड़ा कहलाता हैं.
कक्षाओं का वास्तविक समय (Sidereal Periods)
आर्यभट ने पृथ्वी की एक परिक्रमा का बिल्कुल उचित समय ज्ञात किया. यह अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा प्रतिदिन 24 घंटों में नहीं, बल्कि 23 घंटें, 56 मिनिट और 1 सेकेण्ड में पूरी कर लेती है. इस प्रकार हमारे 1 साल में 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनिट और 30 सेकेंड होते हैं.
ज्योतिर्विद के रूप में योगदान (Astronomer Contribution)
आर्यभट ने लगभग डेढ़ हजार साल पहले ही ज्योतिष विज्ञान कि खोज कर ली थी, जब इतने उन्नत साधन एवं उपकरण भी उपलब्ध नही थे. .
आर्यभट के अन्य रोचक तथ्य (Aryabhatta Interesting Facts)
- आर्यभट द्वारा रचित आर्यभटिय का उपयोग आज भी हिन्दू पंचांग हेतु किया जाता हैं.
- गणित और खगोलशास्त्र में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत के प्रथम उपग्रह का नाम उन्ही के नाम पर ‘ आर्यभट ’ रखा गया.
- आर्यभट ने दशमलव प्रणाली का निर्माण किया.
- आर्यभट ने सूर्य सिद्धांत की भी रचना की.
- 23 वर्ष कि आयु में आर्यभट ने ‘ आर्यभटिय ग्रन्थ ’ की रचना की, जिसकी उपयोगिता एवम् सफलता को देखते हुए तत्कालीन राजा बुद्धगुप्त ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बना दिया.
- आर्यभट ने बिहार के तरेगाना क्षेत्र में सूर्य मंदिर में एक निरिक्षण शाला की स्थापना की.
- विद्वानों के अनुसार अरबी रचनायें ‘ अल – नत्फ़ ’ और ‘ अल – नन्फ ’ आर्यभट के कार्यों का ही अनुवाद हैं.
- आर्यभट ने अंकों को दर्शाने के लिए कभी भी ब्राह्मी लिपि का उपयोग नहीं किया, जो कि वैदिक समय से सांस्कृतिक प्रथा के अनुसार चले आ रहे थे.
वे लिखते हैं -:
सौ में चार जोड़ें, फिर आठ से गुणा करें और फिर 62,000 जोड़ें और 20,000 से भागफल निकालें, इससे प्राप्त उत्तर पाई का मान होगा अर्थात्
[ ( 4 + 100) * 8 + 62,000 ] / 20,000 = 62,832 / 20,000 = 3.1416
शून्य की खोज (History of zero in Mathematics)
आर्यभट ने शून्य की खोज की, जो कि गणित की सर्वश्रेष्ठ खोज हैं, जिसके अभाव में गणनाएँ असंभव होती क्योंकिं किसी संख्या के आगे शुन्य लगाते ही उसका मान 10 गुना बढ़ जाता हैं. इन्होने ही सर्वप्रथम स्थानीय मानक पद्धति के बारे में जानकारी दी.
त्रिकोणमिति (Aryabhatta Contributions Trigonometry)
आर्यभटीय के गणितपद 6 में त्रिभुज के क्षेत्रफल की बात कही हैं.
आर्यभट ने Concept of Sine का भी विवेचन किया हैं, जिसे उन्होंने ‘अर्द्ध – ज्या’ [ Half – Chord ] नाम दिया हैं. सरलता के लिए इसे ‘ज्या’ कहा जाता हैं.
बीजगणित (Aryabhatta Algebra)
आर्यभट ने आर्यभटीय में वर्गों एवं घनो [ Squares & Cubes ] की श्रंखला के जोड़ का भी उचित परिणाम का वर्णन किया हैं -:
12 + 22 + ………….
वान डर वार्डेन की समीक्षा कहती है, “यह पुस्तक भारतीय ग्रह सिद्धांत को पूरी तरह अनदेखा करती है और आर्यभट के प्रत्येक कथन का खंडन करती है।”
कुछ विद्वानों का मत है कि आर्यभट की प्रणाली संभवतः किसी पूर्ववर्ती सूर्य केंद्रित मॉडल से विकसित हुई थी, जिसका उन्हें प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं था। यह भी दावा किया गया कि वे ग्रहों की कक्षाएँ अंडाकार मानते थे, परंतु इसका कोई ठोस प्राथमिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
यद्यपि सामोस के एरिस्तार्चुस (तीसरी शताब्दी ई.पू.) और कभी-कभी पोंटस के हेराक्लिड्स (चौथी शताब्दी ई.पू.) को सूर्यकेंद्रित सिद्धांत का श्रेय दिया जाता है, लेकिन प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पाए जाने वाले यूनानी खगोलशास्त्र (पौलिसा सिद्धांत) में सूर्यकेंद्रित प्रणाली का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
भारतीय खगोलीय परंपरा पर आर्यभट का प्रभाव
आर्यभट के कार्यों ने भारतीय खगोलशास्त्र पर गहरा प्रभाव डाला और अनुवादों के माध्यम से उन्होंने कई पड़ोसी संस्कृतियों को प्रभावित किया। इस्लामी स्वर्ण युग (820 ई.) में उनका अरबी अनुवाद विशेष रूप से प्रभावशाली रहा। उनके कुछ निष्कर्ष अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किए गए थे, और 10वीं शताब्दी के विद्वान अल-बिरूनी ने उनका उल्लेख किया, जिन्होंने लिखा कि आर्यभट के अनुयायी यह मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
त्रिकोणमिति में योगदान
साइन (ज्या) और कोसाइन (कोज्या) के साथ ही, आर्यभट ने वरसाइन (उक्रमज्या) और विलोम साइन (उत्क्रम ज्या) की भी परिभाषा दी, जिससे त्रिकोणमिति की अवधारणा को बढ़ावा मिला। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 0° से 90° तक, 3.75° के अंतराल पर, साइन और वरसाइन की तालिकाएँ चार दशमलव तक की सूक्ष्मता के साथ तैयार कीं।
“साइन” और “कोसाइन” शब्दों की उत्पत्ति भी आर्यभट के “ज्या” और “कोज्या” शब्दों के गलत उच्चारण से हुई। अरबी में ये “जिबा” और “कोजिबा” के रूप में लिखे गए। जब क्रेमोना के जेरार्ड ने एक अरबी ज्यामिति ग्रंथ का लैटिन में अनुवाद किया, तो उन्होंने “जिबा” को अरबी शब्द “जेब” (जिसका अर्थ “कपड़े की तह”) से जोड़ दिया और इसे “साइनस” (1150 ई.) के रूप में लिख दिया।
इस्लामी और यूरोपीय विज्ञान में प्रभाव
आर्यभट की खगोलीय गणनाएँ अत्यधिक प्रभावशाली रहीं। उनकी त्रिकोणमितीय तालिकाएँ इस्लामी जगत में व्यापक रूप से उपयोग में आईं और अरबी खगोलीय तालिकाओं (ज़ीज) की गणना में प्रयुक्त की गईं। विशेष रूप से, अरबी स्पेन के खगोलविद अल-ज़रकाली (11वीं सदी) की गणनाओं को तोलेडो की खगोलीय तालिकाओं (12वीं सदी) के रूप में लैटिन में अनुवादित किया गया, जो यूरोप में शताब्दियों तक सबसे सटीक पंचांग के रूप में प्रसिद्ध रहीं।
पंचांग और तिथिपत्र पर प्रभाव
आर्यभट और उनके अनुयायियों द्वारा विकसित तिथि गणना प्रणाली पंचांगों के रूप में भारत में लगातार प्रचलित रही। यह प्रणाली इस्लामी खगोलविदों तक भी पहुँची, जिनके आधार पर जलाली तिथिपत्र (1073 ई.) विकसित हुआ, जिसे उमर खय्याम सहित कई गणितज्ञों ने प्रस्तुत किया।
जलाली तिथिपत्र वास्तविक सौर पारगमन पर आधारित था, ठीक वैसे ही जैसे आर्यभट के सिद्धांतों में था। इस तिथिपत्र को 1925 में संशोधित किया गया और यह आज भी ईरान व अफगानिस्तान में आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रचलित है। यद्यपि इसकी गणना जटिल थी, लेकिन इसमें ग्रेगोरियन कैलेंडर की तुलना में मौसमी त्रुटियाँ कम थीं।
सम्मान और विरासत
भारत के पहले कृत्रिम उपग्रह “आर्यभट” का नामकरण उनके सम्मान में किया गया। चंद्रमा पर स्थित एक गड्ढे (Aryabhata Crater) को भी उनका नाम दिया गया। भारत में खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान अनुसंधान के लिए नैनीताल के पास स्थापित संस्थान का नाम “आर्यभट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (ARIES)” रखा गया है।
इसके अलावा, अंतर्विद्यालयीय आर्यभट गणित प्रतियोगिता उनके नाम पर आयोजित की जाती है। 2009 में, इसरो के वैज्ञानिकों ने “बैसिलस आर्यभट” नामक एक बैक्टीरिया की खोज की, जिसका नाम भी आर्यभट के सम्मान में रखा गया।
चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्विषष्टिरथ सहस्राणाम्।
अयुतद्वयव्यासस्यासन्नः परिधिर्वृत्तस्य।।(आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक १०)अनुलोमगतिः प्लवगः पश्यत्यचलान् विलोमगामिव।
अचलानि ग्रहाणि तद्वद्विपर्ययगानि लंकायाम्।।(आर्यभटीय, गोलपाद, श्लोक 9)अर्थ: जैसे नाव में बैठा व्यक्ति जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तो उसे प्रतीत होता है कि स्थिर वृक्ष, पर्वत, और शिलाएं उल्टी दिशा में जा रही हैं। ठीक उसी प्रकार, गतिमान पृथ्वी से देखे जाने पर स्थिर नक्षत्र विपरीत दिशा में गति करते हुए प्रतीत होते हैं।
FAQs
Q1.
आर्यभट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या था?
आर्यभट ने गणित और खगोल विज्ञान में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उन्होंने π (पाई) का मान लगभग सही निकाला, बीजगणितीय समीकरणों, त्रिकोणमितीय फलनों, और ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या की। उन्होंने यह भी बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन-रात होते हैं।
Q2.
आर्यभट ने शून्य की खोज की थी क्या?
हालांकि आर्यभट ने शून्य का स्वतंत्र रूप से उल्लेख नहीं किया, लेकिन उनकी गणना पद्धतियों और संख्यात्मक प्रणाली ने शून्य की अवधारणा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यों से प्रेरित होकर भारतीय गणितज्ञ बाद में शून्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने में सक्षम हुए।
Q3.
आर्यभट का खगोल विज्ञान में क्या योगदान है?
आर्यभट ने ग्रहों की गति, सौर मंडल की संरचना, और ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या दी। उन्होंने बताया कि चंद्र और सूर्य ग्रहण राहु-केतु के कारण नहीं, बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की छाया के कारण होते हैं। उन्होंने पृथ्वी की परिधि का सटीक मान निकाला, जो आधुनिक गणनाओं से बहुत निकट था।
आर्यभट की जीवनी, जीवन परिचय, जन्म कब हुआ, कौन थे, जयंती, उपग्रह, खोज (Aryabhatta Biography in Hindi) (Date of Birth, Jayanti, Foundation, Books, Inventions)
आर्यभट की जीवनी, जीवन परिचय Aryabhatta biography in hindi आर्यभट प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ, ज्योतिषविद एवं खगोलशास्त्री थे.
476 में इसी स्थान पर हुआ था .एक अन्य मान्यता के अनुसार आर्यभट का जन्म बिहार में पटना में हुआ था, जिसका प्राचीन नाम पाटलीपुत्र था , जिसके समीप स्थित कुसुमपुर में उनका जन्म माना जाता हैं.
आर्यभट की शिक्षा (Aryabhatta Education)
इस संबंध में इतिहासकारों के पास पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं हैं , परन्तु ये स्पष्टतः ज्ञात हैं कि आर्यभट अपने जीवनकाल में किसी समय उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु कुसुमपुर अवश्य गये थे, जो कि उस समय उच्च शिक्षा हेतु प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था.
आर्यभट के कार्य (Aryabhatta Work and Contribution)
आर्यभट ने गणित एवं खगोलशास्त्र पर अनेक रचनायें की, इसमें से कुछ रचनाये विलुप्त हो चुकी हैं. परन्तु आज भी कई रचनाओ का प्रयोग किया जाता हैं, जैसे -: आर्यभटीय.
आर्यभटीय(Aryabhatiya)
यह आर्यभट की एक गणितीय रचना हैं, जिसमे अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोंमिति का विस्तृत वर्णन हैं. साथ ही इसमें सतत भिन्न [ Continued Fractions ], द्विघात समीकरण [ Quadratic Equations ], ज्याओं की तालिका [ Table of Sines ], घात श्रंखलाओ का योग [ Sums of Power Series ], आदि भी शामिल हैं.
आर्यभट के कार्यों का वर्णन मुख्यतः इसी रचना [आर्यभटीय] से मिलता हैं. संभवतः इसका यह नाम भी स्वयं आर्यभट ने नहीं, बल्कि बाद के समीक्षकों ने यह नाम दिया.
उन्होंने सदैव Alphabets ही प्रयोग किये.
इस प्रकार आर्यभट हमारे देश के महान गणितज्ञ, ज्योतिर्विद एवं खगोलशास्त्री थे, जिनका इन क्षेत्रों में अतुलनीय योगदान हैं.
FAQ
Ans : एक गणितज्ञ, ज्योतिषविद एवं खगोलशास्त्री
Ans : दिसंबर, ई.स.476
Ans : दिसंबर, ई.स.
550 [74 वर्ष ]
आर्यभट का जन्म कब हुआ, शुरूआती जीवन (Aryabhatta Birth and Early Life)
आर्यभट के जन्म के संबंध में कोई ठोस प्रमाण तो उपलब्ध नही हैं, परन्तु कहा जाता हैं कि भगवान बुद्ध के समय अश्मक देश के कुछ लोग मध्य भारत में नर्मदा नदी और गोदावरी नदी के बीच बस गये .
425) में उल्लिखित प्रणाली से मेल खाता है, जिसमें प्रत्येक ग्रह की गति दो ग्रहचक्रों—एक मंद (धीमा) और एक शीघ्र (तेज़)—द्वारा नियंत्रित होती है।
पृथ्वी से दूरी के अनुसार ग्रहों का क्रम इस प्रकार था:
चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शनि, और नक्षत्र।
ग्रहों की स्थितियाँ और उनकी अवधि को सापेक्ष गति से गणना किया गया था। बुध और शुक्र पृथ्वी के चारों ओर औसत सूर्य गति से चलते थे, जबकि मंगल, बृहस्पति और शनि राशिचक्र में अपनी विशिष्ट गति से गति करते थे।
खगोल विज्ञान के इतिहासकारों के अनुसार, आर्यभट का यह द्वि-ग्रहचक्र मॉडल यूनानी खगोलशास्त्र के टॉलेमी मॉडल के तत्वों को दर्शाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार, उनका सिघ्रोका मॉडल—जो ग्रहों की गति को सूर्य के सापेक्ष मापता था—एक संभावित सूर्यकेंद्रीय दृष्टिकोण का संकेत दे सकता है।
ग्रहण
आर्यभट ने बताया कि चंद्रमा और ग्रह सूर्य के परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं। प्रचलित मान्यताओं से भिन्न, जहाँ राहु और केतु को ग्रहणों का कारण माना जाता था, उन्होंने ग्रहणों को पृथ्वी द्वारा उत्पन्न छाया से जोड़ा। चंद्रग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है (गोलपाद 37), और उन्होंने इस छाया के आकार व विस्तार का विस्तार से वर्णन किया (गोलपाद 38-48)। इसके बाद उन्होंने ग्रहण के दौरान प्रभावित क्षेत्र के आकार और उसकी गणना की विधि बताई। बाद के खगोलविदों ने इन गणनाओं में सुधार किए, परंतु आर्यभट की पद्धति इस विषय में आधार बनी।
यह गणनात्मक विधि इतनी सटीक थी कि 18वीं सदी में फ्रांसीसी खगोलशास्त्री गुइलौम ले जेंटिल ने पांडिचेरी में देखा कि भारतीयों द्वारा 30 अगस्त 1765 के चंद्रग्रहण की गणना वास्तविक अवधि से मात्र 41 सेकंड कम थी, जबकि टोबियास मेयर (1752) के यूरोपीय चार्ट में 68 सेकंड अधिक त्रुटि थी।
पृथ्वी की परिधि
आर्यभट की गणना के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किमी थी, जो आधुनिक माप 40,075.0167 किमी से केवल 0.2% कम है। यह यूनानी गणितज्ञ एराटोस्थनीज (200 ईसा पूर्व) की गणना से अधिक सटीक थी, जिनके अनुमान में 5-10% की त्रुटि थी।
नक्षत्रों के आवर्तकाल
यदि आधुनिक समय की इकाइयों में तुलना करें, तो आर्यभट के अनुसार पृथ्वी का घूर्णन काल (स्थिर तारों के संदर्भ में) 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड था, जबकि आधुनिक मान 23:56:4.091 है। इसी प्रकार, उनके अनुसार पृथ्वी का वर्ष365 दिन 6 घंटे 12 मिनट 30 सेकंड था, जो आधुनिक मान से 3 मिनट 20 सेकंड अधिक है। उस समय अन्य खगोलीय प्रणालियों में नक्षत्र समय की अवधारणा ज्ञात थी, लेकिन आर्यभट की गणना सर्वाधिक सटीक मानी जाती थी।
सूर्य केंद्रीयता
आर्यभट ने कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, और उनके ग्रहचक्र मॉडल के कुछ तत्व उसी गति से घूमते हैं जिस गति से ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उनकी गणनाएँ एक अंतर्निहित सूर्य केंद्रित प्रणाली पर आधारित थीं, जहाँ ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
हालांकि, कुछ विद्वानों ने इस सूर्यकेंद्रीय व्याख्या को अस्वीकार किया है। बी.एल.
तक के पुराने हो सकते हैं। आर्यभट ने इन समस्याओं के हल के लिए एक विशेष विधि विकसित की, जिसे कुट्टक विधि कहा जाता है। संस्कृत में कुट्टक का अर्थ “पीसना” या “छोटे टुकड़ों में तोड़ना” होता है, और यह विधि समीकरणों को छोटे अंशों में विभाजित कर पुनरावर्ती गणनाओं के माध्यम से हल निकालती थी।
621 ईस्वी के बाद, भास्कर प्रथम ने इस विधि की व्याख्या की, और यह पहले क्रम के डायोफैंटाइन समीकरणों को हल करने की मानक पद्धति बन गई। इसे आज आर्यभट एल्गोरिद्म के नाम से भी जाना जाता है।
डायोफैंटाइन समीकरणों का आधुनिक उपयोग क्रिप्टोलॉजी में होता है। 2006 के RSA सम्मेलन ने विशेष रूप से कुट्टक विधि और शुल्बसूत्र के प्राचीन गणितीय योगदान पर ध्यान केंद्रित किया था।
बीजगणित
आर्यभटीय में आर्यभट ने वर्गों और घनों की श्रेणियों के रोचक निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं।
तथा
खगोल विज्ञान
आर्यभट की खगोल विज्ञान प्रणाली औदायक प्रणाली कहलाती थी, जिसमें दिन की गणना सूर्योदय से की जाती थी। उनके खगोल विज्ञान पर आधारित बाद के ग्रंथ, जो संभवतः एक अर्ध-रात्रिका प्रणाली (मध्यरात्रि से शुरू होने वाली) प्रस्तुत करते थे, अब उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, ब्रह्मगुप्त के खण्डखाद्यक में हुई चर्चाओं से उनके विचार आंशिक रूप से पुनर्निर्मित किए जा सकते हैं। कुछ ग्रंथों में उन्होंने पृथ्वी के घूर्णन को आकाशीय गतियों का कारण बताया है।
सौर प्रणाली की गतियाँ
ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यभट पृथ्वी को अपनी धुरी पर घूमता मानते थे। यह विचार श्रीलंका के सन्दर्भ में दिए गए उनके कथन से स्पष्ट होता है, जहाँ तारों की गति को पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न आपेक्षिक गति के रूप में वर्णित किया गया है।
अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत्।
अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लंकायाम् ॥ (आर्यभटीय गोलपाद 9)
अर्थ: जैसे कोई व्यक्ति नाव में बैठा हो और आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की ओर जाते देखे, वैसे ही भूमध्य रेखा (लंका) पर स्थित व्यक्ति को स्थिर तारे पश्चिम की ओर गतिशील प्रतीत होते हैं।
अगले श्लोक में तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक बताया गया है:
उदय-अस्तमय-निमित्तम् नित्यम् प्रवहेण वायुना क्षिप्तस्।
लंका-सम-पश्चिम-गस् भ-पंजरस् स-ग्रहस् भ्रमति ॥ (आर्यभटीय गोलपाद 10)
अर्थ: तारे और ग्रह निरंतर पश्चिम की ओर गति कर रहे हैं, जिससे उनके उदय और अस्त की घटनाएँ घटित होती हैं।
इस श्लोक में “लंका” का उल्लेख भूमध्य रेखा के संदर्भ बिंदु के रूप में किया गया है, जिसे खगोलीय गणनाओं के लिए मानक संदर्भ माना जाता था।
भूकेंद्रीय मॉडल
आर्यभट ने सौर मंडल का एक भूकेंद्रीय मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें सूर्य और चंद्रमा ग्रहचक्र के माध्यम से पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। यह मॉडल पितामहसिद्धांत (ई.
+ n )2
खगोलशास्त्री के रूप में योगदान (Aryabhatta as an Astronomer)
आर्यभट के खगोलशास्त्र के सिद्धांतों को सामूहिक रूप से Audayaka System कहते हैं. उनके बाद की कुछ रचनाओं में पृथ्वी के परिक्रमा की बात कही गयी हैं और उनका यह भी मानना था कि पृथ्वी की कक्षा गोलाकार नहीं, अपितु दीर्घवृत्तीय हैं.
उदाहरण के रूप में यदि कोई व्यक्ति किसी नाव या ट्रेन में बैठा हैं और नाव या ट्रेन जब आगे बढती हैं तो उसे वृक्ष, मकान, आदि वस्तुएं पीछे की ओर जाती हुई प्रतीत होती हैं, जबकि ऐसा होता नहीं हैं. इसी तरह गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी विपरीत दिशा में जाते दिखाई देते हैं. हमें ऐसा इसलिए प्रतीत होता है क्योंकिं पृथ्वी अपने अक्ष पर घुमती हैं और इसकी यह गतिशीलता यह भ्रम उत्पन्न करती हैं.
सौरमंडल की गतिशीलता [Motions of the Solar System]
आर्यभट ने यह तथ्य स्थापित किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर निरंतर रूप से घुमती रहती हैं और यहीं कारण हैं कि आकाश में तारों की स्थिति बदलती रहती हैं. यह तथ्य इसके बिल्कुल विपरीत हैं कि आकाश घूमता हैं.इसका वर्णन उन्होंने आर्यभटीय में भी किया हैं.
ग्रहण [Eclipse]
हिन्दू मान्यता के अनुसार राहु नामक ग्रह द्वारा सूर्य और चन्द्रमा को निगल जाने के कारण क्रमशः सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होता हैं.
आर्यभट द्वारा इस धारणा को गलत सिद्ध किया गया और उन्होंने इस सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण का वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया हैं. उन्होंने ये बताया कि चाँद एवं अन्य ग्रह सूर्य – प्रकाश के परावर्तित [ Reflection ] होने के कारण प्रकाशमान होते हैं, वास्तव में उनका अपना कोई प्रकाश नहीं होता.
उस समय अनेकों भारतीय विद्वानों, जैसे-: वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, कमलाकर, आदि में आर्यभट का नाम भी शामिल हैं.
आर्यभट की जीवनी(Aryabhatta Biography in Hindi)
| पूरा नाम | आर्यभट |
| जन्म | दिसंबर, ई.स.476 |
| मृत्यु | दिसंबर, ई.स.
+ n2 =[ n ( n+1) ( 2n + 1) ] / 6 & 13 + 23+ ………….. आर्यभट ने स्पष्ट किया कि ये ग्रहण नामक घटना पृथ्वी पर पड़ने वाली छाया हैं अथवा पृथ्वी की छाया हैं. सूर्यग्रहण (Solar Eclipse)पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती हैं और चन्द्रमा अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी की परिक्रमा के साथ ही सूर्य की भी परिक्रमा करता हैं और इस दौरान जब पृथ्वी और सूर्य के बीच जब चन्द्रमा आ जाता हैं तो चंद्रमा के बीच में आने से सूर्य का उतना हिस्सा छुप जाता हैं और वह हमें काला या प्रकाशहीन दिखाई देता हैं और यह घटना सूर्यग्रहण कहलाती हैं. चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse)चूँकि चन्द्रमा अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी की परिक्रमा के साथ ही सूर्य की भी परिक्रमा करता हैं और इस दौरान सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है तो पृथ्वी की परछाई चन्द्रमा पर पड़ती हैं और वह सूर्य प्रकाश प्राप्त नहीं कर पाता और यह घटना चंद्रग्रहण कहलाती हैं. |