Very short biography of tulsidas in hindi

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आपकी जानकारी के लिए बता दें की तुलसीदास की धर्मपत्नी का नाम रत्नावली था।

Q. हनुमान चालीसा का वर्णन रामचरितमानस में तुलसीदास के द्वारा किया गया है

Q. tulsidas ka janm kab aur kahan hua?

Ans.

very short biography of tulsidas in hindi

तुलसीदास का जन्म 15 अगस्त सन् 1532 ई० में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर गाँव में हुआ

Q. तुलसीदास आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी देवी था |

Q. Tulsidas ki mrityu kab hui thi | तुलसीदास की मृत्यु कब हुई ?

Tulsidas ki mrityu 31 जुलाई सन 1623 में काशी के अस्सी घाट में उन्होंने अपना शरीर त्याग  दिया था

Q.

tulsidas kiske bhakt the?

Ans  तुलसीदास भगवान राम के भक्त थे

Q. तुलसीदास जी के बचपन का क्या नाम था ?

Ans. जो अस तन पर भई प्रीति, तौ का राम महँ?” इस पर तुलसीदास ने सांसारिक जीवन त्याग दिया।

प्रश्न 9: हनुमान चालीसा की रचना कैसे हुई?
उत्तर: हनुमान चालीसा की रचना तुलसीदास जी ने हनुमान जी की कृपा से की थी। यह 40 छंदों का स्तोत्र है, जिसमें हनुमान जी के गुण, बल, भक्ति और शक्ति का वर्णन है।

प्रश्न 10: तुलसीदास की जाति क्या थी?
उत्तर: तुलसीदास जी सारस्वत ब्राह्मण थे। कुछ विद्वान उन्हें कन्या-कुब्ज ब्राह्मण मानते हैं।

प्रश्न 11: अकबर ने तुलसीदास को कैद क्यों किया था?
उत्तर: अकबर ने तुलसीदास को इसलिए बंदी बनाया क्योंकि उन्होंने चमत्कार दिखाने से मना कर दिया था। बाद में बंदीगृह में बंदरों की विचित्र लीला से प्रभावित होकर उन्हें मुक्त कर दिया गया।

प्रश्न 12: तुलसीदास के कितने दांत थे?
उत्तर: इस संबंध में कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं है। यह प्रश्न अधिकतर जिज्ञासावश पूछा जाता है।

प्रश्न 13: तुलसीदास जी की मृत्यु कहाँ हुई थी?
उत्तर: तुलसीदास जी की मृत्यु अस्सी घाट, वाराणसी (काशी) में हुई थी।

प्रश्न 14: तुलसीदास की कितनी पत्नियां थीं?
उत्तर: तुलसीदास जी की केवल एक पत्नी थीं – रत्नावली। उनके वैराग्य धारण करने के बाद उन्होंने फिर विवाह नहीं किया।

तुलशीदास का जीवन परिचय Tulsidas ka jivan parichay Biography of Tulsidas in hindi

तुलशीदास 

तुलशीदास का जीवन परिचय Tulsidas ka jivan parichay Biography of Tulsidas in hindi

नाम—गोस्वामी तुलसीदास

उपनाम—मानस का हंस

बचपन का नाम—तुलाराम

पिता का नाम—आत्माराम दुबे

माता का नाम—हुलसी

पत्नी का नाम—रत्नावली

जन्म—सन् -1532 ई०

जन्म स्थान—राजापुर (बाँदा) 

मृत्यु—1623 ई०

गुरु—नरहरिदास

भाषा—अवधी और ब्रज भाषा

जन्मकाल—भक्तिकाल

तुलशीदास का जीवन परिचय

मातु पिता जग ज्याइ तज्यो, विधि हूँ न लिखी कछु भाल भलाई। 

तुलशी जी का बचपन

सुना जाता हैं कि अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने से माता-पिता ने इनका परि-त्याग कर दिया था। छोटी अवस्था में ही साधु-संतों में रहने लगे थे और इनका पालन-पोषण गुरु नरहरिदास ने किया। 

तुलशीदास के गुरु

तुलसीदास के गुरु नरहरिदास हैं तुलसी जी ने अपनी शिक्षा गुरु नरहरिदास के चरणों में रहकर इन्होंने विद्याध्ययन किया था। 

तुलसीदास के आराध्य

तुलसीदास के आराध्य भगवान श्री राम हैं। तुलसी जी ने शाक्त और शैव मत का, वैष्णवोपासना में राम और कृष्ण की उपासना का, वेदान्त में निर्गुण और सगुण पक्ष का चारों वर्णों और चारों आश्रमों का व्यापक समन्वय उपस्थित किया। 

तुलशीदास का जीवन परिचय Tulsidas ka jivan parichay Biography of Tulsidas in hindi

तुलशीदास का विहाव

गोस्वामी तुलसीदा जी का विवाह दिनबन्धु पाठक की कन्या रत्नावाली से हुआ था। वैवाहिक जीवन के कुछ समय बाद ही पत्नी के प्रेम ने इनके जीवन को एक नई दिशा, एक नवीन चेतना प्रदान की, जिसमें तुलसी इतने महान् लोकनायक बनने में असमर्थ हुए।

तुलशीदास के प्रमुख रचना

तुलशीदास के काव्य समन्वय

तुलसीदास जी का समस्त काव्य समन्वय का महाप्रयास है। भक्ति, नीति, दर्शन, धर्म, कला का इनकी कृतियों में अपूर्व संगम है। तुलसी ने अपने काव्य में आदर्श और व्यवहार का समनव्य, लोक और शास्त्र का समन्वय, गृहस्थ और वैराग्य का समन्वय उपस्थित किया है। तुलसीदास जी ने कभी किसी का खंडन नहीं किया। जिन विषयों में उनकी आस्था नहीं थी, उनको भी वे आदर की दृष्टि से देखते थे। 

तुलशीदास के काव्य शैलियाँ

 

 निष्कर्ष:

"तुलसीदास की वाणी अमृत समान है, जो हर हृदय को पावन बना देती है।"

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इस लेख में

तुलसीदास जी के जन्म की कथा बहुत ही अद्भुत है, जो उनके महापुरुष होने का उनके जन्म के समय ही इंगित करती है। आज के भारत वर्ष के उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर नाम का एक गांव है, जहाँ तुलसीदास जी के पिता, आत्मा राम दुबे निवास करते थे। वे एक सम्मानित ब्राह्मण थे। तुलसीदास जी की माता का नाम हुलसी था।

बाल्य-काल

तुलसीदास जी का जन्म सम्वत 1557 में श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ। यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता है। इस शंका को बढ़ाने के लिए जो घटनाएं हुईं, उनमें कुछ हैं, जैसे तुलसीदास जी जन्मते ही रोये ही नहीं अपितु उनके मुँह से राम शब्द निकला। उनके शरीर का आकार भी सामान्य शिशु की तुलना में अधिक था और सबसे बढ़कर उनके मुख में जन्म के समय ही दाँतों की उपस्थिति थी। यह सब लक्षण देखकर उनके पिता किसी अमंगल की आशंका से भयभीत थे।

उनकी माता ने घबराकर, कि बालक के जीवन पर कोई संकट न आए, अपनी एक चुनियां नाम की दासी को बालक के साथ उसके ससुराल भेज दिया। विधि का विधान ही कुछ और था और वे अगले दिवस ही गोलोक वासी हो गई। चुनियां ने बालक तुलसीदास का पालन पोषण बड़े प्रेम से किया पर जब तुलसीदास जी करीब साढ़े पाँच वर्ष के हुए तो चुनियां शरीर छोड़ गई। अनाथ बालक द्वार – द्वार भटकने लगा। इस पर माता पार्वती को दया आई और वे एक ब्राह्मणी का वेश रखकर प्रतिदिन बालक को भोजन कराने लगीं। 

विद्याध्ययन

श्री अनन्तानन्दजी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्दजी जो रामशैल पर निवास कर रहे थे, उन्हें भगवान शंकर से प्रेरणा प्राप्त हुई और वे बालक तुलसीदास को ढूढ़ते हुए वहाँ पहुंचे और मिलकर उनका नाम रामबोला रखा। वे बालक को अपने साथ अयोध्या ले गए और वहाँ उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया। तुलसीदास जी ने जहाँ बिना सिखाए ही गायत्री मंत्र का उच्चारण कर सभी को एक बार फिर चकित कर दिया। नरहरि महाराज ने वैष्णवों के पांच संस्कार कराए और राम मंत्र से दीक्षित किया। 

फिर, उनका विद्याध्ययन प्रारम्भ हो गया। तुलसीदास जी जो भी एक बार सुन लेते थे उसे वे कंठस्थ कर लेते थे। उनकी प्रखर बुद्धि की सभी प्रशंसा करते थे। फिर एक बार नरहरि महाराज उन्हें लेकर शूकर क्षेत्र सोरों पहुँचे, जहाँ उन्होंने रामायण सुनाई। और उन्हें काशी में शेषसनातन जी के पास वेदाध्ययन के लिए छोड़ गए। यहाँ तुलसीदास जी ने 15 वर्ष वेद-वेदांग का अध्ययन किया। 

वैवाहिक जीवन

उन्हीं दिनों उनका मन संसार की ओर प्रवृत हुआ और वे अपने गांव वापस आए, जहाँ आकर उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। वहाँ उन्होंने अपने पिता सहित सभी पितरों का श्राद्ध किया और राम कथा सुना कर जीवन यापन करने लगे।

वहीं गुरुजनों के परामर्श से उन्होंने रत्नावली नामक एक सुन्दर कन्या से सम्वत 1583 में ज्येष्ठ मास की शुक्ल 13 को विवाह किया और सुखपूर्वक वैवाहिक जीवन बिताने लगे। एक दिन पत्नी के भाई के साथ मायके चले जाने पर वे उनके पीछे पीछे पहुँच गए। इससे पत्नी को बहुत रोष हुआ और उन्होंने धिक्कारते हुए कहा कि आपकी जैसी आसक्ति मेरे हाड़ मांस के शरीर में है ऐसी यदि भगवान में होती तो आपका बेड़ा पार हो जाता। यह बात तुलसीदास जी को चुभ गई और वह उसी समय वहाँ से चल दिए।

संत एवं भगवान के दर्शन

उन्होंने प्रयागराज पहुँच कर सन्यास लिया‌ और तीर्थाटन करने लगे। इसी क्रम में, मानसरोवर में उन्हें काकभुशुण्डि जी के दर्शन हुए। तीर्थाटन के पश्चात् तुलसीदास जी काशी में रहकर राम कथा सुनाने लगे। यहीं पर उनकी एक प्रेत से भेंट हुई जिसने उन्हें हनुमान जी का पता बताया। तुलसीदास जी हनुमान जी से जब मिले तो उन्होंने भगवान राम के दर्शन की लालसा जताई और उनसे दर्शन कराने की विनती की। हनुमान जी ने उन्हें कहा कि श्री राम जी के दर्शन उन्हें चित्रकूट में होंगे। हनुमान जी का आशीष प्राप्त कर वे चित्रकूट पहुँचे। 

चित्रकूट में उन्होंने रामघाट पर अपना एक स्थान तय किया और वहीं प्रभु के दर्शन के इंतजार में साधनारत हो गए। वहीं एक बार प्रदक्षिणा करते हुए मार्ग में ही रघुनाथ जी के दर्शन हुए और वे उन्हें पहचान नहीं पाए। उन्होंने घोड़े पर सवार अद्भुत छवि वाले दो राजकुमार देखे जो धनुष और बाण लिए हुए थे, तुलसीदास जी बस उन्हें देखते ही रह गए पर उन्हें पहचान न सके। हनुमान जी ने उन्हें आकर बताया कि आज आपको प्रभु श्री राम के दर्शन हुए। इस पर तुलसीदास जी बहुत दुखी हुए कि वे उन्हें पहचान न सके। तब हनुमान जी ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि आपको कल सुबह फिर से एक बार दर्शन होंगे।

मौनी अमावस्या के उस सुन्दर बुधवार के दिन सम्वत 1607 में भगवान राम उनके सम्मुख पुनः प्रकट हुए। इस बार वे बालक के रूप में थे। उन्होंने तुलसीदास जी से कहा, बाबा हमें चन्दन दो। पर तुलसीदास जी दर्शन में ऐसे खोए कि प्रभु की वाणी भी नहीं सुनी। तब हनुमान जी ने तुलसीदास जी की सहायता के लिए तोते के रूप में आकर एक दोहा बोला – चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर, तुलसीदास चन्दन घिसत तिलक देत रघुबीर॥

प्रभु श्री राम ने अपने हाथ से ही चन्दन लेकर अपने और तुलसीदास जी के माथे पर लगाया और अंतर्ध्यान हो गए। एक बार तीर्थाटन करते हुए तुलसीदास जी प्रयाग पहुँचे। वहाँ माघ मेला चल रहा था। वे वहाँ कुछ दिन रुक गए और छः दिन के बाद उन्हें एक वृक्ष के नीचे भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय राम कथा हो रही थी जो तुलसीदास जी ने अपने गुरुदेव से सूकर क्षेत्र में सुनी थी। वहाँ से वे काशी आ गए और प्रह्लाद घाट पर एक ब्राह्मण के घर रहने लगे।

श्री रामचरितमानस की रचना

यहीं पर उनके भीतर कवित्व शक्ति का प्राकट्य हुआ और वे संस्कृत में पद्य रचना करने लगे। यहाँ एक विचित्र घटना हुई। दिन में वे जितने भी पद लिखते, रात्रि को वे सब लुप्त हो जाते थे। यह क्रम आठ दिन तक चला और आठवें दिन तुलसीदास जी को एक सपना आया। स्वप्न में भगवान शंकर ने उन्हें जनभाषा में काव्यरचना के लिए कहा। तुलसीदास जी की नींद खुल गई और जैसे ही वे उठे उन्होंने देखा कि स्वयं भवानी शंकर उनके सम्मुख हैं। तुलसीदास जी ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।

भगवान शंकर ने स्वप्न की बात पुनः दोहराई कि अयोध्या जाकर जनभाषा में काव्य रचना करो और आशीर्वाद दिया कि यह काव्य वेदों के समान फलदायी होगा। इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए और तुलसीदास जी भगवान शंकर के आदेशानुसार अयोध्या आ गए।

सम्वत 1631 की राम नवमी के दिन ग्रहों की स्थिति लगभग वैसी ही थी जैसी त्रेतायुग में राम जन्म के समय थी। इसी पावन दिवस पर प्रातःकाल तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छब्बीस दिन में ग्रन्थ की रचना पूर्ण हुई। सम्वत 1633 में मार्गशीर्ष मास में राम विवाह के दिन सातों कांड को पूर्ण किया। इसके बाद तुलसीदास जी काशी आ गए और उन्होंने भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को कथा सुनाई। 

पंडितो द्वारा विरोध

रात के समय पुस्तक को भगवान् विश्वनाथ के मंदिर में रख दिया गया। सुबह पट खुलने पर पुस्तक पर ‘सत्यम शिवम् सुंदरम’ लिखा था और भगवान विश्वनाथ के सही (हस्ताक्षर) थे। वहाँ उपस्थित लोगों ने भी सत्यम शिवम् सुंदरम की ध्वनि सुनी। काशी के पंडितों को यह बात रास न आई। ईर्ष्यावश वे तुलसीदास जी की निंदा करने लगे और पुस्तक को नष्ट करने के उपाय करने लगे।

एक बार उन्होंने चोर भी भेजे पर वे चोर ही सुधर गए। फिर पंडितों ने श्रीमधुसूदन सरस्वती जी को उस पुस्तक को देखने के लिए मनाया। उन्हें पुस्तक देखकर बहुत प्रसन्नता हुई और उन्होंने उस पर अपनी सम्मति लिख दी, जो इस प्रकार है – 

आनन्दकानने ह्यास्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः

कविता मंजरी भाति रामभ्रमरभूषिता

इस काशी रुपी आनंद वन में तुलसीदास चलता फिरता तुलसी का पौधा है। उसकी कविता रूपी मंजरी बड़ी ही सुन्दर है, जिस पर श्री राम रूपी भंवरा सदा मंडराया करता है।

पंडितों को इस पर भी संतोष नहीं हुआ। अब उन्होंने पुस्तक की परीक्षा के लिए स्वयं भगवान विश्वनाथ की शरण ली। भगवान विश्वनाथ के समक्ष श्रीरामचरितमानस के ऊपर पुराण और उसके ऊपर शास्त्र और सबसे ऊपर वेद रखे और मंदिर को बंद कर दिया गया। जब दूसरे दिन प्रातः समय मंदिर खोला गया तो रामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा था। आखिरकार पंडितों ने अपनी मूर्खता के लिए क्षमा मांगी और तुलसीदास जी का सम्मान किया। तुलसीदास जी अब अस्सीघाट पर रहने लगे।

हनुमान चालीसा की रचना

तुलसीदास जी को एक बार अकबर ने अपने दरबार में बुलवाया। तुलसीदास जी के मना करने पर जबरदस्ती उन्हें बंदी बनाकर अकबर के सामने लाया गया। अकबर ने कहा कि “सुना है तुमने मुर्दों को भी जिंदा कर दिया। हमें भी चमत्कार कर के दिखाओ”। तो तुलसीदास जी ने कहा कि “मुझे कोई चमत्कार नहीं आता, मैं तो राम नाम जपता हूँ और उस नाम में ही चमत्कार होता है”। क्रोध में आकर अकबर ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया और यहीं पर उन्होंने हनुमान चालीसा लिखना आरंभ किया। प्रतिदिन एक चौपाई लिखते और चालीसवे दिन जब हनुमान चालीसा पूर्ण हुई तब हजारों बंदरों ने फतेहपुर सीकरी पर हमला कर दिया। तब अकबर के सलाहकार ने संत को छोड़ने की विनती की। जैसे ही अकबर ने तुलसीदास को मुक्त किया तो सारे बंदर वापस चले गए।

विनय पत्रिका की रचना

एक दिन कलियुग ने मानव रूप में आकर तुलसीदास जी को परेशान करना प्रारम्भ किया। तुलसीदास जी ने रक्षा के लिए हनुमान जी को पुकारा। तब हनुमान जी ने उन्हें विनय के पद लिखने को कहा। तभी तुलसीदास जी ने एक बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ विनय पत्रिका की रचना की और इसे भगवान के चरणों में अर्पित किया।

श्री राम जी ने उस पर अपने हस्ताक्षर किये और तुलसीदास जी को अभय किया। तुलसीदास जी ने श्री राम कथा का गान करते हुए बाकि समय काशी में ही गुजारा, और रामकथा से सम्बंधित कुल 13 ग्रन्थ लिखे। सम्वत 1680 श्रवण शुक्ल तृतीया शनिवार को अस्सीघाट पर गोस्वामी जी ने राम राम कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया। 

तुलसीदास जी पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

तुलसीदास मध्यकाल के महान भक्त कवि थे, जो रामचरितमानस, हनुमान चालीसा और कई भक्ति ग्रंथों के रचयिता हैं।

उनका जन्म 16वीं शताब्दी में उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में राजापुर गाँव में हुआ था।

रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, विनय पत्रिका, दोहावली, कवितावली, संकटमोचन सहित कई प्रसिद्ध रचनाएँ शामिल हैं।

उन्होंने भगवान राम की कथा को सरल भाषा में आम लोगों तक पहुँचाया। उनकी रचनाएँ भक्ति, प्रेम और धर्म के गहरे संदेश देती हैं।

यह अवधी भाषा में लिखा गया रामायण का महाकाव्य है, जो भारतीय समाज का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर माना जाता है।

रामचरितमानस को जन-भाषा (अवधी) में लिखा गया है और इसे संस्कृत रामायण के समकक्ष माना जाता है — यह भक्ति, सदाचार और भगवान राम के प्रेम को नई पीढ़ी तक पहुँचाता है। 

हनुमान चालीसा तुलसीदास ने लिखी थी। यह भक्ति स्तुति शक्ति, साहस, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करती है।

कथाओं और लोक परंपराओं के अनुसार तुलसीदास को भगवान राम और हनुमान के दर्शन प्राप्त हुए थे।

उन्होंने मुख्य रूप से अवधी और ब्रज भाषा में रचनाएँ कीं, जो सरल, मधुर और भावपूर्ण हैं।

तुलसीदास जयंती श्रावण महीने की शुक्ल सप्तमी तिथि को मनाई जाती है।

संत तुलसीदास को एक बार अकबर ने अपने दरबार में बुलवाया। तुलसीदास जी के मना करने पर जबरदस्ती उन्हें बंदी बनाकर अकबर के सामने लाया गया। अकबर ने कहा कि “सुना है तुमने मुर्दों को भी जिंदा कर दिया। हमें भी चमत्कार कर के दिखाओ”। तो तुलसीदास जी ने कहा कि “मुझे कोई चमत्कार नहीं आता, मैं तो राम नाम जपता हूँ और उस नाम में ही चमत्कार होता है”। क्रोध में आकर अकबर ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया और यहीं पर उन्होंने हनुमान चालीसा लिखना आरंभ किया। प्रतिदिन एक चौपाई लिखते और चालीसवे दिन जब हनुमान चालीसा पूर्ण हुई तब हजारों बंदरों ने फतेहपुर सीकरी पर हमला कर दिया। तब अकबर के सलाहकार ने संत को छोड़ने की विनती की। जैसे ही अकबर ने तुलसीदास को मुक्त किया तो सारे बंदर वापस चले गए।

तुलसीदास जी का जीवन परिचय  | Tulsidas ji ka Jeevan Parichay: तुलसीदास के गिनती भक्ति काल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में किया जाता है उन्होंने अपने दोहे और चौपाईयों के माध्यम  समाज में एक नई जागृति दिलाने का प्रयास किया है उन्होंने रामचरितमानस काव्यशास्त्र लिखे थे जिसमें उन्होंने हिंदू धर्म के आराध्य भगवान राम के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन किया है रामचरित मानस का आम जनमानस पर विशेष प्रभाव रहा है इस पवित्र काव्यशास्त्र को पढ़ने के बाद आप भगवान राम को और भी करीब से जान पाएंगे | भारत में तुलसीदास के जन्मदिन को Tulsidas jayanti के रूप में 23 अगस्त को मनाया जाता है हम सभी लोग अपने घर में जो हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं उसकी रचना भी गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा की गई है तुलसीदास को मशहूर ऋषि बाल्मीकि का अवतार माना जाता है |

ऐसा कहा जाता है कि रामचरितमानस की रचना करने में उनकी मदद भगवान हनुमान जी के द्वारा की गई थी | उन्होंने रामचरितमानस के अलावा रामलीला नहछु, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, दोहावली, कवितावली, विनय पत्रिका, कृष्ण गीतावली, गीतावली आदि। ऐसे में आप भी गोस्वामी तुलसीदास के जीवन के प्रत्येक पहलू के बारे में जानना चाहते हैं जैसे-: तुलसीदास जी का परिवार (family): Tulsi Das Education, tulsidas ka jivan parichay ‘तुलसीदास जी प्रसिद्ध कथन (Quotes) संबंधित चीजों के बारे में हम आपको विस्तार पूर्वक जानकारी उपलब्ध करवाएंगे इसलिए आपसे अनुरोध है कि हमारे आर्टिकल को आखिर तक पढ़े:-

Tulsi Das ka Jivan Parichay | Tulsidas Biography in HindiOverview

पूरा नामगोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulasidas)
बचपन का नामरामबोला
उपनामगोस्वामी, अभिनववाल्मीकि, इत्यादि
जन्मतिथि1511 ई० इतिहासकारों के अनुसार
उम्रमृत्यु के समय 112 वर्ष
जन्म स्थानसोरों शूकरक्षेत्र, कासगंज , उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु की तारीख1623 ई०
मृत्यु का स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
गुरुनरसिंहदास
कौन से धर्म के थेहिन्दू
पत्नी का नामरत्नाबाली
तुलसीदास जी प्रसिद्ध कथन (Quotes)सीयराममय सब जग जानी।करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी ॥(रामचरितमानस १.८.२)
प्रसिद्ध साहित्यिक रचनायेंरामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, इत्यादि

तुलसीदास जी का परिवार (Family)

पिता का नाम (Father)आत्माराम शुक्ल दुबे
माँ का नाम (Mother)हुलसी दुबे
पत्नी का नाम (Wife)बुद्धिमती (रत्नावली)
बच्चो के नाम (Children)बेटा  – तारकशैशवावस्था में ही निधन

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Tulsi Das ji ka Jivan Parichay | तुलसीदास जी (रामबोला) का बचपन (Early life)

तुलसीदास के जन्म को लेकर अलग-अलग मत व्यक्त किए गए हैं इनका जन्म 1511 में कासगंज , उत्तर प्रदेश में एक सर्यूपारिय ब्राह्मण परिवार में हुआ था।  लेकिन कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इनका जन्म चित्रकूट में हुआ था इतिहास में इनके जन्म को लेकर अलग-अलग प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं  जन्म के समय इनके मुंह से सबसे पहले राम निकला था जिसके बाद ही इनका नाम रामबोला रखा गया | जन्म के बाद ही उनके माता का स्वर्गवास हो गया जिसके बाद पिता ने इन्हें मनहूस समझकर त्याग दिया था | इनके पिता का नाम आत्माराम शुक्ला दुबे और माता का नाम हुलसी दुबे था | तुलसीदास के जन्म से संबंधित एक काफी रोचक प्रसंग है कहा जाता है कि तुलसीदास का जन्म 12 महीने गर्भ में रहने के बाद हुआ था जन्म के समय उनके मुंह में दांत था जिसे देखकर लोग आश्चर्य चकित  हो गए थे |

तुलसीदास जी की शिक्षा (Education)

Tulsidas Education: गोस्वामी तुलसीदास की प्राथमिक शिक्षा  गुरु नरसिंह दास जी के आश्रम में जाकर उन्होंने प्राप्त किया आश्रम में तुलसीदास  14 से 15 साल तक रहे इस दौरान उन्होंने सनातन  धर्म, संस्कृत, व्याकरण, हिन्दू साहित्य, वेद दर्शन, छः वेदांग, ज्योतिष शास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्त की। गोस्वामी तुलसीदास का नामकरण इन के गुरु नरसिंह दास के द्वारा किया गया था शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह अपने निवास स्थान चित्रकूट चले गए जहां  लोगों को राम और महाभारत कथा सुनाते थे |

तुलसीदास का विवाह | Tulsidas Biography in Hindi

Tulsidas Vivah : तुलसीदास के उम्र जब 29 साल से तो उनकी शादी रत्नावली नाम की लड़की के साथ हुआ है तो काफी खूबसूरत थी शादी के बाद तुलसीदास पूरी तरह से अपनी पत्नी की प्यार में खो चुके थे  | लेकिन एक बार उनकी पत्नी मायके चली गई अपनी पत्नी का भी और उनसे सहा नहीं गया और अपने पत्नी से मिलने का उन्होंने निश्चय किया लेकिन उस समय काफी तेज बारिश हो रही थी ऐसे में उन्होंने बारिश की परवाह किए बिना अपने पत्नी के घर पहुंचे परंतु वहां पर दरवाजा बंद था इसके बाद उन्होंने घर की दीवार के द्वारा अपने पत्नी कक्षा में प्रवेश किया जब पत्नी ने उन्हें देखा तो वह काफी क्रोधित हुए और उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आप मेरे प्यार में इतना खो गए हैं अगर आप उसका कुछ प्रतिशत भगवान श्री राम के भक्ति में खो जाते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जाता है पत्नी की इस बात को सुनने के बाद उनका मन सांसारिक मोह माया से भंग हो गया जिसके बाद उन्होंने अपना घर त्याग कर राम की भक्ति में अपना पूरा जीवन उन्होंने समर्पित कर दिया |

तुलसीदास का तपस्वी बनना | Tulsidas ka Janm kab aur kahan hua

तुलसीदास गुरु का नाम | Tulsi Das Ke Guru

Tulsi Das Ke GuruName: तुलसीदास के  गुरु का नाम नरसिंह दास जी है उनके माध्यम से उन्होंने अपनी शिक्षा ग्रहण की थी जैसा की आप लोगों को मालूम है कि तुलसीदास का नाम राम बोला था ऐसे में उनका नाम तुलसीदास उनके गुरु ने रखा था |

तुलसीदास जी की हनुमान जी से मुलाक़ात | Tulsidas Ji Hanuman Ji Se Mulakat

इस आर्टिकल में तुलसीदास के बारे में कहा जाता है कि उनकी मुलाकात भगवान हनुमान जी से हुई थी इस संबंध में वह लिखते हैं कि एक बार में बैराग्य धारण कर वाराणसी में रह रहे थे 1 दिन हुआ बनारस की घाट पर जा रहे थे तभी रास्ते में मुलाकात एक साधु से हुई जो भगवान राम का जाप कर रहा था  इसके बाद तुलसीदास ने कहा है कि मैं आपको पहचान गया हूं आप कौन हैं!

तुलसीदास के जन्म के समझ में कहा जाता है कि जब इनका जन्म हुआ तो इनके मुंह से पहला शब्द राम निकला जिसके कारण उनका नाम राम बोला रखा गया | जन्म के समय इनके मुख में 32 दांत थी जिसके कारण इनके पिता ने इन्हें मनहूस समझ कर इनका परित्याग कर दिया | गोस्वामी तुलसीदास के गुरु का नाम स्वामी नरहरिदास था उनकी देखरेख में ही इन्होंने अपनी शिक्षा ग्रहण ग्रहण किया इसके बाद तुलसीदास ने रत्नावली नाम के सुंदर कन्या से विवाह किया विवाह होने बाद तुलसीदास अपनी पत्नी से बहुत ज्यादा प्रेम करते थे  परंतु पत्नी के अपमानित किए जाने के कारण सांसारिक मोह माया छोड़कर भगवान श्री राम की खोज में निकल पड़े भारत के कई जगहों का उन्होंने भ्रमण किया और भगवान राम के भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित और हनुमान चालीसा जैसे महाकाव्य ग्रंथों लिखे थे | तुलसीदास ने अपना आखिरी जीवन काशी अयोध्या और चिरकुट में गठित किया 31 जुलाई सन 1623 में काशी के अस्सी घाट में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया

रामचरितमानस की रचना | Ramcharitmanas Ki Rachna

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना 16 शताब्दी में किया गया था इस महा ग्रंथ में तुलसीदास ने दोहा और चौपाई के माध्यम से राम के पूरे जीवन का वर्णन काफी मनमोहक और सरल तरीके से किया है इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप अपने आराध्य राम को आसानी से जान सकते हैं इस महाकाव्य को अवधी भाषा में लिखा गया था|

गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनायें

गोस्वामी तुलसीदास के द्वारा कई प्रकार के प्रसिद्ध साहित्यिक रचना उनके द्वारा लिखी गई है जिसका पूरा विवरण हम आपको नीचे दे रहे हैं आइए जानते हैं-:

रचनायेंप्रकाशित वर्ष
रामचरितमानस1574 ईस्वी
रामललानहछू1582 ईस्वी
वैराग्यसंदीपनी1612 ईस्वी
सतसई –
बरवै रामायण1612 ईस्वी
हनुमान बाहुक –
कविता वली1612 ईस्वी
गीतावली –
श्रीकृष्णा गीतावली1571 ईस्वी
पार्वती-मंगल1582 ईस्वी
जानकी-मंगल1582 ईस्वी
रामाज्ञाप्रश्न –
दोहावली1583 ईस्वी
विनय पत्रिका1582 ईस्वी
छंदावली रामायण –
कुंडलिया रामायण –
राम शलाका –
झूलना –
हनुमान चालीसा –
संकट मोचन –
करखा रामायण –
कलिधर्माधर्म निरूपण –
छप्पय रामायण –
कवित्त रामायण –
रोला रामायण –

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तुलसीदास का जीवन परिचय और उनकी लघु रचनाएँ

तुलसीदास के द्वारा निम्नलिखित प्रकार के लघु रचनाएं रचित की गई थी जिसका विवरण हम आपको नीचे दे रहे हैं आइए जानते हैं- तुलसीदास का जीवन परिचय और उनकी रचनाएँ

●  वैराग्य संदीपनी’

● ’रामलला नहछू’,

● ’जानकी मंगल’,

●  ’पार्वती मंगल’

● ’बरवै रामायण’

तुलसीदास जी का निधन (Death) | Tulsidas ki Mrityu

Tulsidas ki Mrityu: तुलसीदास की मृत्यु के संबंध में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मृत्यु के अंतिम समय में तुलसीदास वाराणसी में रहा करते थे और आखरी जीवन के क्षणों में उन्होंने अपना पूरा जीवन राम के भक्ति में समर्पित कर दिया था 112 साल की उम्र में 1623 ईस्वी में उन्होंने अपने शरीर का त्याग कियाजबकि कुछ दूसरे इतिहासकार मानते हैं कि तुलसीदास की मृत्यु 1680 ईस्वी को 126 साल की उम्र में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में विनय पत्रिका पुस्तक लिखा था जिस पर भगवान श्री राम के हस्ताक्षर थे |

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Tulsidas ka Jivan Parichay (About Tulsidas in Hindi)

तुलसीदास जीवन परिचय(Tulsidas jivan Parichay)

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Tulsidas Wikipedia in Hindi | तुलसीदास का जीवन परिचय

Tulis Jeevan parichay Hindi  के बारे में बात करेगा तो:

तुलसीदास( Tulidas) के जन्म के संबंध में कई प्रकार के अलग-अलग धारणाएं प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत किए गए हैं कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इनका जन्म  15 अगस्त सन् 1532 ई० में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर गाँव में हुआ था.

इसलिए मैं आपको जाने नहीं दूंगा मेरा तो जीवन धन्य हो गया आपके दर्शन पाकर |  जिसके बाद साधु ने कहा कि हे तपस्वी आपका भला भगवान श्रीराम करेंगे और मैं आपको आशीर्वाद देता हूं कि आप जब भी चित्रकूट में आएंगे आप को भगवान श्री राम के साक्षात दर्शन प्राप्त होंगे

तुलसीदास जी की भगवान रामजी से मुलाक़ात | Ram Ji Bhagwan Se Mulakat

Ram Ji Bhagwan Se Mulakat : तुलसीदास जी को भगवान श्री राम के दर्शन भी प्राप्त हुए थे इस संबंध में एक कहानी प्रचलित है कहा जाता है कि जब चित्रकूट में तुलसीदास आश्रम बनाकर  रहते थे तो 1 दिन तुलसीदास कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा करने गए हुए थे।  वहां पर उन्होंने दो राजकुमारों को घोड़े पर सवार होकर जाते हुए देखा लेकिन तुलसीदास उन्हें पहचान ना सके इस घटना को घटित होने के एक दिन बाद सुबह गंगा घाट के किनारे तुलसीदास चंदन का लेप बना रहे थे तब दो राजकुमार साधु का भेष धारण कर  उनके पास आए जिसे देखकर तुलसीदास समझ गए कि यह और कोई नहीं बल्कि भगवान श्री राम और उनके भाई लक्ष्मण है | जिसके बाद तुलसीदास ने भगवान श्री राम को प्रणाम किया और अपने कुटिया में आने का आग्रह किया इसके बाद भगवान श्रीराम ने तुलसीदास चंदन का तिलक मांगा |  तुलसीदास जी भगवान श्री राम के माथे पर चंदन का तिलक लगाया और पैरों को छूकर आशीर्वाद लिया इस प्रकार तुलसीदास की मुलाकात भगवान श्री राम के साथ हुई थी |

तुलसीदास जी प्रसिद्ध कथन कोट्स | Tulsi Das Quotes

सुंदर वेष देखकर न केवल मूर्ख अपितु चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। सुंदर मोर को ही देख लो उसका वचन तो अमृत के समान है लेकिन आहार साँप का है। -आचार्य तुलसी

हे मनुष्य ,यदि तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार की जीभरुपी देहलीज़ पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो। – आचार्य तुलसी

शत्रु को युद्ध में उपस्थित पा कर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं। – आचार्य तुलसी

स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है। – आचार्य तुलसी

मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने-पीने को तो अकेला है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है। – आचार्य तुलसी

मंत्री, वैद्य और गुरु – ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं तो (क्रमशः) राज्य,शरीर एवं धर्म – इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है। – आचार्य तुलसी

मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं। किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे। – आचार्य तुलसी

धार्मिक व्यक्ति दुःख को सुख में बदलना जानता है। – आचार्य तुलसी

धार्मिक वृत्ति बनाये रखने वाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं हो सकता और धार्मिक वृत्ति को खोने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। – आचार्य तुलसीदास

आग्रह हर समन्वय को कठिन बनाता है, जबकि उदारता उसे सरल।

प्रलोभन और भय का मार्ग बच्चों के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन सच्चे धार्मिक व्यक्ति के दृष्टिकोण में कभी लाभ हानि वाली संकीर्णता नहीं होती।

मनुष्य की धार्मिक वृत्ति ही उसकी सुरक्षा करती है। – आचार्य तुलसी

धार्मिक व्यक्ति दुःख को सुख में बदलना जानता है। – आचार्य तुलसी

धार्मिक वृत्ति बनाये रखने वाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं हो सकता और धार्मिक वृत्ति को खोने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। – आचार्य तुलसी

आग्रह हर समन्वय को कठिन बनाता है, जबकि उदारता उसे सरल। – आचार्य तुलसी

लक्ष्य निश्चित हो, पाव गतिशील हों तो मंजिल कभी दूर नहीं होता।- आचार्य तुलसी

धर्म का काम किसी का मत बदलना नहीं , बल्कि मन बदलना है। – आचार्य तुलसी

सफलता का सबसे बड़ा सूत्र है व्यक्ति का अपना पुरुषार्थ।- आचार्य तुलसी

मानव वह होता है जो नए पाठ का निर्माण करे। – आचार्य तुलसी

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तुलसीदास का जीवन परिचय कक्षा 10 (Tulsidas Short Jivan Parichay in Hindi

Tulsidas Short Jivan Parichay in Hindi:- आप दसवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं और आप को  Tulsidas Short Jivan Parichay in Hindi लिखना चाहते हैं तो हम आपको आसान भाषा में Tulsidas short Biography के बारे में जानकारी देंगे हम आपको बता गोस्वामी तुलसीदास का जन्म 15 अगस्त सन् 1532 ई० में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर गाँव में हुआ था.

Tulsidas ki Mrityu?

Ans. हनुमान चालीसा का वर्णन हमें किस पुरातन ग्रथ में मिलता है ?

Ans. तुलसीदास के आराध्य देव कौन है?

Ans. तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना 1631 में चैत्र मास की रामनवमी से लेकर 1633 में मार्गशीर्ष के बीच उन्होंने किया था

Q. 30 July 1623, Assi Ghat, Varanasi

Q.तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ

Ans.  तुलसीदास की प्रमुख रचनाएं

  • रामचरितमानस
  • रामललानह
  • वैराग्य-संदीपनी
  • बरवै रामायण
  • पार्वती-मंगल
  • जानकी-मंगल
  • रामाज्ञाप्रश्न
  • दोहावली

tulsidas ke mata pita ka naam?

Ans.

तुलसीदास जी के बचपन का नाम रामबोला था।

Q.

जीवन परिचय

तुलसीदास भारतीय साहित्य के भक्ति काल के सबसे प्रमुख कवि और संत थे। उनकी ख्याति मुख्यतः रामचरितमानस की रचना के कारण है, जिसे हिंदी साहित्य की अमर कृति माना जाता है। तुलसीदास ने अपनी कविताओं और भजनों के माध्यम से रामभक्ति की भावना को गहराई तक पहुँचाया और आम जनमानस के बीच रामकथा का प्रचार किया।

जन्म और परिवार

तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 (1532 ई.) में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर नामक गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि उनका जन्म अशुभ समय में हुआ था, जिससे उनके माता-पिता ने उन्हें छोड़ दिया।

तुलसीदास का जन्म विशेष रूप से अद्वितीय था। लोककथाओं के अनुसार, जन्म के समय उन्होंने “राम” का उच्चारण किया। इस चमत्कारिक घटना के कारण उन्हें बचपन में “रामबोला” नाम दिया गया।

बचपन और शिक्षा

माता-पिता के त्याग के बाद तुलसीदास का पालन-पोषण उनके गुरु नरहरिदास ने किया। नरहरिदास एक महान संत और विद्वान थे, जिन्होंने तुलसीदास को रामकथा और वेदों का ज्ञान दिया। उन्होंने बालक तुलसीदास को संस्कृत, दर्शन और भक्ति के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी।

युवावस्था में तुलसीदास काशी गए, जहाँ उन्होंने विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त की। वहाँ उन्होंने संस्कृत के साथ-साथ अन्य धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन किया।

विवाह और जीवन का मोड़

युवावस्था में तुलसीदास का विवाह रत्नावली नामक स्त्री से हुआ। रत्नावली अत्यंत धार्मिक और ज्ञानी थीं। विवाह के बाद तुलसीदास अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्त हो गए।

एक बार जब रत्नावली ने तुलसीदास को अपनी आसक्ति का एहसास दिलाया, तो उन्होंने कहा:
अस्थिचर्ममयदेहयह, तासोंऐसीप्रीति।
जोहोतीश्रीरामसे, तोमिटतीभवभीति।
रत्नावली के इन शब्दों ने तुलसीदास के जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने सांसारिक मोह छोड़कर रामभक्ति के मार्ग को अपनाया।

रामभक्ति की ओर अग्रसर

तुलसीदास ने राम के प्रति अपने अनन्य प्रेम को भक्ति के रूप में व्यक्त किया। वे तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े और अयोध्या, काशी, और चित्रकूट जैसे पवित्र स्थानों पर निवास किया। वहाँ उन्होंने राम कथा के महत्व को समझा और उसे जन-जन तक पहुँचाने का निश्चय किया।

रामचरितमानस का निर्माण

तुलसीदास की सबसे महत्वपूर्ण रचना रामचरितमानस है। यह ग्रंथ सात कांडों में विभाजित है और श्रीराम के जीवन की कथा को सरल और सुंदर भाषा में प्रस्तुत करता है। उन्होंने इसे अवधी भाषा में लिखा, जो उस समय आम जनता की भाषा थी।

रामचरितमानस में तुलसीदास ने न केवल राम के आदर्श चरित्र का वर्णन किया, बल्कि समाज को नैतिकता, धर्म और आध्यात्मिकता का संदेश भी दिया। इसमें श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया गया है।

अन्य रचनाएँ

तुलसीदास ने कई अन्य महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की, जिनमें शामिल हैं:

  1. विनयपत्रिका: इसमें भक्त का अपने ईश्वर के प्रति समर्पण का वर्णन है।
  2. हनुमानचालीसा: हनुमानजी की स्तुति में रचित यह काव्य आज भी हर घर में श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
  3. कवितावली: इसमें श्रीराम की जीवन घटनाओं का वर्णन है।
  4. गीताावली: श्रीराम के प्रति प्रेम और भक्ति से ओत-प्रोत गीतों का संग्रह।
  5. दोहावली: यह नैतिकता और जीवन के आदर्शों पर आधारित दोहों का संग्रह है।

भक्ति आंदोलन और तुलसीदास

तुलसीदास ने भक्ति आंदोलन में एक नई ऊर्जा का संचार किया। उन्होंने भक्ति को केवल संस्कृत तक सीमित रखने के बजाय क्षेत्रीय भाषाओं में प्रस्तुत किया, जिससे साधारण जनता भी ईश्वर की भक्ति कर सकी। उनके कार्यों ने उत्तर भारत में रामभक्ति को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तुलसीदास का दर्शन

तुलसीदास का जीवनदर्शन भक्ति, सेवा और समर्पण पर आधारित था। वे मानते थे कि ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग भक्ति है। उनका मानना था कि:
रामनाममनिदीपधरुजीहदेहरीद्वार।
तुलसीभीतरबाहेरहुँजौचाहसिउजियार।

मृत्यु और विरासत

तुलसीदास ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष काशी में बिताए। उन्होंने काशी के अस्सी घाट पर संवत् 1680 (1623 ईस्वी) में अपने प्राण त्याग दिए। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी रचनाएँ और विचार भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बने रहे।

तुलसीदास की रामभक्ति और साहित्यिक योगदान ने उन्हें भारतीय इतिहास में अमर बना दिया। आज भी रामचरितमानस का पाठ देश के कोने-कोने में श्रद्धा के साथ किया जाता है।

निष्कर्ष
तुलसीदास केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और धर्म के महान प्रवर्तक थे। उन्होंने भक्ति के माध्यम से न केवल साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि समाज को भी एकजुट किया। उनका जीवन और कृतित्व हर युग में प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

तुलसीदास के योगदान का महत्व

तुलसीदास ने समाज में प्रेम, सद्भाव और धार्मिकता का संदेश फैलाया। उनके काव्य ने आम जनता को आध्यात्मिकता के करीब लाने का कार्य किया। आज भी तुलसीदास का नाम भारतीय साहित्य, धर्म और संस्कृति में गौरव के साथ लिया जाता है।

FAQs: तुलसीदास जी के जीवन से जुड़े प्रश्न

प्रश्न 1: तुलसीदास जी के कितने बच्चे थे?
उत्तर: तुलसीदास जी का केवल एक पुत्र था, लेकिन उसका शीघ्र ही निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया।

प्रश्न 2: तुलसीदास को जेल क्यों हुई थी?
उत्तर: एक कथा के अनुसार, सम्राट अकबर के दरबार में तुलसीदास जी ने चमत्कार दिखाने से इनकार कर दिया था, जिस कारण उन्हें जेल भेज दिया गया। बाद में चमत्कारी घटनाओं के कारण उन्हें छोड़ दिया गया।

प्रश्न 3: तुलसीदास का विवाह किससे हुआ था?
उत्तर: तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नामक महिला से हुआ था, जो अत्यंत बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ थीं।

प्रश्न 4: तुलसीदास की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर: तुलसीदास जी की मृत्यु वाराणसी में शांतिपूर्वक हुई। वे लगभग 91 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए।

प्रश्न 5: तुलसीदास क्यों प्रसिद्ध हैं?
उत्तर: तुलसीदास जी रामचरितमानस और हनुमान चालीसा जैसे महान ग्रंथों के रचयिता थे। उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन और गुणों का सरल भाषा में वर्णन किया, जिससे आम जन भी उन्हें समझ सके।

प्रश्न 6: तुलसीदास को किस वस्तु की भूख है?
उत्तर: तुलसीदास जी को सांसारिक वस्तुओं की नहीं, बल्कि श्रीराम के दर्शन और भक्ति की भूख थी।

प्रश्न 7: तुलसीदास का असली नाम क्या था?
उत्तर: तुलसीदास जी का जन्म नाम रामबोला था। बाद में उन्हें गोस्वामी तुलसीदास कहा जाने लगा।

प्रश्न 8: तुलसीदास ने अपनी पत्नी को क्यों छोड़ा था?
उत्तर: रत्नावली के एक तीखे वचन से तुलसीदास को वैराग्य प्राप्त हुआ। उसने कहा था: “लाज न आवत नाथ!

तुलसीदास जी की प्रसिद्ध रचनाएं कौन – कौन सी हैं

रामचरितमानस, कवितावली, संकट मोचन और वैराग्य संदीपनी आदि तुलसीदास की कुछ प्रमुख प्रसिद्ध रचनायें हैं।

Q. तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना कब की ?

Ans. तुलसीदास के आराध्य भगवान श्रीराम थे उन्होंने उनके भक्ति में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था |

Q.

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निष्कर्ष:

उम्मीद करता हूं कि हमारे द्वारा लिखा गया आर्टिकल तुलसीदास जी का जीवन परिचय  | Tulsidas ji ka आपको पसंद आया होगा इस आर्टिकल में हमने आपको तुलसीदास के जीवन से जुड़े हुए सभी पहलुओं के बारे में विस्तार पूर्वक विवरण दिया है इसके बावजूद भी अगर आपके मन में कोई भी सवाल है तो हमारे कमेंट बॉक्स में आकर आप कमेंट कर सकते हैं हम आपके कमेंट का अतः शीघ्र जवाब देने का भरसक प्रयास करेंगे और बायोग्राफी संबंधित लेटेस्ट जानकारी आप नियमित रूप से प्रयास करना चाहते हैं तो आप हमारे वेबसाइट को बुकमार्क कर लीजिए जैसे कोई बायोग्राफी संबंधित पोस्ट हमारे वेबसाइट पर पब्लिश होगी उसकी जानकारी आपको तुरंत मिल जाएगी तब तक के लिए धन्यवाद और मिलते हैं अगले आर्टिकल में

FAQs: Tulsidas Biography in Hindi

Q.