Philosophy of dayanand saraswati biography in hindi
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इन समस्याओं के समाधान का मार्ग बतलाया. 30 अक्टूबर 1883 को खराब स्वास्थ्य के चलते महर्षि दयानन्द का परलोक गमन हो गया. इनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था. उन्होंने राजा को बहुत से मुश्किलों में मार्गदर्शन भी दिया था.
एक बार राजा एक नन्ही सी नर्तकी के साथ समय व्यतीत कर रहे थे. स्वामी जी की बातों का राजा के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा. जिससे स्वामी जी का स्वास्थ्य ख़राब हो गया.
उस समय के बहुत से क्रांतिकारी तात्या टोपे, नाना साहेब पेशवा, हाजी मुल्ला खां, बाला साहब आदि स्वामी दयानंद से प्रभावित थे. घर में धार्मिक वातावरण और माता के संस्कारों का बालक दयानंद पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा. सिर्फ 59 वर्ष की आयु में राष्ट्र में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ जग जागरण का कार्य करते उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया.
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जिसका उद्देश्य समाज का मानसिक, शारीरिक एवम सामाजिक उन्नति करना था. जिसके कारण नन्ही नर्तकी ने स्वामी दयानंद से नाराज होकर उनके भोजन में कांच के टुकड़े मिला दिए.
बचपन से ही स्वामी दयानंद कुशाग्र बुद्धि के धनी थे. उन्हें कई बार जहर देने का प्रयास किया गया. दयानंद सरस्वती के सामाजिक विचार
- उन्होंने वेदों का अध्ययन कर कहा कि किसी मनुष्य की जाति उसकी परिवार की जाति के अनुसार ना होकर, कर्म के अनुसार निर्धारित होनी चाहिए।
- समाज में शूद्रों के साथ हो रहे अत्याचार व भेदभाव के भी वे विरुद्ध थे। स्वामी जी ने उन्हें अधिकार दिलाने के लिए कई प्रयास किए। वे शूद्रों के उद्धार के पक्षधर थे।
- महिलाओं की शिक्षा पर उस समय ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था व शुरुआत से ही उन्हें घर का काम दे दिया जाता था, जिसका उन्होंने विरोध किया। वे महिलाओं को भी समान अधिकार व शिक्षित करने के समर्थक थे।
- कुछ राज्यों में बच्चों के बाल विवाह की परंपरा थी। स्वामी जी ने इस प्रथा का भी पुरजोर विरोध किया।
- उस समय तक कुछ जगह सती प्रथा भी प्रचलन में थी जिसमें पति की मृत्यु के बाद पत्नी को जलती चिता में स्वयं का आत्म-दाह करना होता था। उन्होंने इस कुरीति का भी पुरजोर विरोध किया।
- इसी के साथ उस समय महिला के विधवा हो जाने के बाद उसे समाज के शुभ कार्यों से वंचित कर दिया जाता था व उसे एक असहाय जीवन व्यतीत करना होता था। समाज में एक विधुर पुरुष को पुनः विवाह करने का अधिकार था लेकिन विधवा महिला को नहीं। इसलिए उन्होंने विधवा विवाह का भी समर्थन किया।
- उन्होंने मनुष्य को शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के उद्देश्य से योग व प्राणायाम को बढ़ावा दिया व सभी को प्रतिदिन योग करने के लिए प्रेरित किया।
- उन्होंने लोगों को शाकाहार अपनाने के लिए भी प्रेरित किया। वे जीव-हत्या के विरोधी थे व सभी जीवों की रक्षा करना अपना दायित्व समझते थे।
स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु कैसे हुई?
स्वामी जी को धर्म के प्रति विरोधावासी विचार रखने व अंग्रेज़ सरकार के प्रति क्रांतिकारी विचारधारा रखने के कारण, कई बार षड़यंत्र के तहत मारने का प्रयास किया गया। इन प्रयासों में उन्हें विष देना, नदी में डुबोकर मारना इत्यादि प्रमुख है किंतु वे हर बार बच निकले। एक बार मुस्लिम समाज के लोगों ने उन्हें गंगा नदी में फेंक दिया था लेकिन अपनी योग शक्ति से वे बच गए थे।
फिर एक दिन जोधपुर के महाराज ने उन्हें आमंत्रित किया था जहाँ नन्ही नाम की एक वैश्या ने स्वामी जी के रसोइए के साथ मिलकर उनके दूध में पिसा हुआ कांच मिला दिया था। बाद में उनके चिकित्सक के द्वारा भी उन्हें धीमी मात्रा में विष दिया गया। लोगों के अनुसार इसमें अंग्रेज़ सरकार की भूमिका थी। अंत में 30 अक्टूबर 1983 को मंत्रों का उच्चारण करते हुए स्वामी जी ने अपना देह त्याग दिया।
निष्कर्ष
इस तरह से आज के इस लेख के माध्यम से आपने स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati In Hindi) विस्तृत रूप में जान लिया है। यहाँ आपको विभिन्न विषयों पर दिए गए स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार भी पढ़ने को मिले। हालांकि यह भी एक सत्य है कि हिन्दू धर्म सहित अन्य सभी धर्मों ने उनके इन विचारों को मानने से मना कर दिया है।
स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न: स्वामी दयानंद के बचपन का नाम क्या था?
उत्तर: स्वामी दयानंद के बचपन का नाम मूल शंकर था। बाद में उनके गुरु ने उनका नाम दयानंद सरस्वती रखा था।
प्रश्न: स्वामी दयानंद का जन्म कहां हुआ था?
उत्तर: स्वामी दयानंद का जन्म गुजरात राज्य के टंकारा में सन 12 फरवरी 1824 को हुआ था।
प्रश्न: स्वामी दयानंद के गुरु कहां रहते थे?
उत्तर: स्वामी दयानंद अपना घर छोड़ने के बाद लगभग 25 वर्षों के लिए इधर-उधर भटकते रहे थे। तभी उनकी भेंट अपने गुरु स्वामी विरजानंद जी महाराज से हुई थी।
प्रश्न: स्वामी दयानंद सरस्वती के शिक्षा संबंधी विचार क्या है?
उत्तर: स्वामी दयानंद सरस्वती के शिक्षा संबंधी विचार आर्य समाज में सिखाए जाते हैं। इसमें मुख्यतया वेदों का ज्ञान दिया जाता है और मानवता के गुण डाले जाते हैं।
प्रश्न: स्वामी दयानंद का जन्म कब हुआ?
उत्तर: स्वामी दयानंद का जन्म सन 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था।
प्रश्न: स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म कब हुआ?
उत्तर: स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म आज से लगभग 200 वर्षों पहले सन 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा हुआ था।
प्रश्न: वेदों की ओर लौटो का नारा किसने दिया?
उत्तर: वेदों की ओर लौटो का नारा स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने दिया था जो आर्य समाज के संस्थापक भी थे।
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महर्षि दयानंद सरस्वती: जीवन, विचार और योगदान
महर्षि दयानंद सरस्वती एक महान हिंदू दार्शनिक, समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक थे। उन्होंने वेदों की शुद्ध शिक्षाओं पर जोर दिया और भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए व्यापक आंदोलन चलाया। उन्होंने 1876 में “स्वराज” (भारत भारतीयों के लिए) का नारा दिया, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने अपनाया।
प्रारंभिक जीवन
दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 (हिंदू कैलेंडर के अनुसार की तारीख) को गुजरात के मोरबी जिले (तब काठियावाड़ क्षेत्र) के टंकारा गांव में एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के अनुसार, दयानंद सरस्वती का जन्म फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को हुआ था। उनका मूल नाम मूलशंकर तिवारी (त्रिवेदी) था। उनके पिता कर्शनजी लालजी त्रिवेदी और माता यशोदाबाई थीं।
आठ वर्ष की उम्र में उनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ, जिससे उनकी औपचारिक शिक्षा शुरू हुई। उनके पिता शिव भक्त थे और उन्होंने दयानंद को शिव पूजा और उपवास का महत्व सिखाया। एक बार, शिवरात्रि पर जागरण के दौरान, उन्होंने देखा कि एक चूहा शिवलिंग पर चढ़कर प्रसाद खा रहा है। यह देखकर उन्होंने सोचा कि जो भगवान खुद की रक्षा नहीं कर सकते, वे संसार के रक्षक कैसे हो सकते हैं?
अपनी बहन और चाचा की मृत्यु से वे जीवन और मृत्यु के रहस्यों को लेकर चिंतन करने लगे। किशोरावस्था में उनका विवाह तय हुआ, लेकिन उन्होंने गृहस्थ जीवन अस्वीकार कर दिया और 1846 में घर छोड़ दिया।
इसके बाद, उन्होंने 25 वर्षों (1845-1869) तक संन्यास जीवन बिताया और आध्यात्मिक सत्य की खोज में भारत भर में भ्रमण किया। वे हिमालय और विभिन्न तीर्थ स्थलों पर गए और योग साधना की। इस दौरान वे गुरु विरजानंद दंडीश के शिष्य बने। विरजानंद का मानना था कि हिंदू धर्म अपने मूल स्वरूप से भटक गया है। दयानंद सरस्वती ने अपने गुरु को वचन दिया कि वे वेदों के प्रचार और हिंदू धर्म को शुद्ध स्वरूप में पुनर्स्थापित करने के लिए अपना जीवन समर्पित करेंगे।
प्रमुख विचार और शिक्षाएँ
दयानंद सरस्वती ने मूर्तिपूजा, अंधविश्वास और कर्मकांडों का विरोध किया और वेदों को सत्य का सर्वोच्च स्रोत माना। उन्होंने कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया और ब्रह्मचर्य तथा ईश्वर की भक्ति को जीवन का मूल आधार बताया। वे महिलाओं के अधिकारों और समाज में समानता के समर्थक थे। उन्होंने जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों का विरोध किया।
आर्य समाज की स्थापना
1875 में, उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य वेदों के अनुसार धर्म और समाज का पुनर्गठन करना था। आर्य समाज ने शिक्षा, स्त्री उत्थान और सामाजिक सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को भी प्रेरित किया।
प्रमुख ग्रंथ
महर्षि दयानंद ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें सत्यार्थ प्रकाश सबसे प्रसिद्ध है। इस पुस्तक में उन्होंने धर्म, समाज और राजनीति पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। इसके अलावा, उन्होंने वेदों की व्याख्या करने के लिए ऋग्वेद भाष्य भूमिका और यजुर्वेद भाष्य जैसे ग्रंथ लिखे।
अन्य धर्मों पर विचार
दयानंद सरस्वती ने ईसाई धर्म, इस्लाम, जैन धर्म और बौद्ध धर्म की भी समीक्षा की और उनमें मौजूद त्रुटियों को उजागर किया। उन्होंने हिंदू समाज को वेदों की ओर लौटने का आग्रह किया और धार्मिक ग्रंथों की तर्कसंगत व्याख्या की आवश्यकता पर बल दिया।
समाज सुधार
उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह और जाति प्रथा का विरोध किया तथा महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की वकालत की। उनका मानना था कि समाज में सभी को समान अधिकार मिलने चाहिए।
मृत्यु
1883 में, जोधपुर नरेश के महल में उन्हें विष देकर मारने का प्रयास किया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। अपने अंतिम समय में भी उन्होंने अपने हत्यारे को माफ कर दिया।
विरासत
दयानंद सरस्वती के विचारों का भारतीय समाज और स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा। आज भी आर्य समाज उनके सिद्धांतों को आगे बढ़ा रहा है। उनके योगदान को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
निष्कर्ष
महर्षि दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाने का कार्य किया। उन्होंने सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और समाज को वेदों के वास्तविक ज्ञान की ओर लौटने का संदेश दिया। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और समाज सुधार के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
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भारतीय समाज संस्कृति के उद्धारक और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती एक महान देशभक्त और भारत माता के सच्चे सपूत है.
उठो, जागो, और आगे बढ़ो।'”
इन विचारों से स्पष्ट होता है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक पुनर्जागरण में भी अमूल्य योगदान दिया।
Dayanand Saraswati Jayanti
स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती हिंदू कैलेंडर के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन, आर्य समाज के मंदिरों में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें यज्ञ, प्रवचन और उनके विचारों पर चर्चा की जाती है। उनकी शिक्षाओं और उनके द्वारा किए गए समाज सुधार कार्यों को याद करते हुए लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनका आदर्श वाक्य “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ मानव बनाओ) था।
Dayananda Saraswati Jayanti Dates:
- 2025: रविवार, 23 फरवरी
- 2026: शुक्रवार, 13 मार्च
- 2027: मंगलवार, 2 मार्च
- 2028: शनिवार, 19 फरवरी
दयानंद सरस्वती के अनमोल विचार एवं कोट्स
Swami Dayanand Saraswati Inspirational Quotes in Hindi:
जो व्यक्ति सच्चाई का पालन करता है, धर्म के अनुसार कार्य करता है, और दूसरों को प्रसन्न करने का प्रयास करता है, वही श्रेष्ठ और बुद्धिमान कहलाता है।
धन वह है जो ईमानदारी और न्याय से कमाया गया हो। इसके विपरीत अधर्म का खजाना विनाशकारी है।
आत्मा अपने स्वरुप में एक है, लेकिन उसके अस्तित्व के रूप अनेक हैं।
मृत्यु अवश्यंभावी है। हर कोई इसे जानता है, लेकिन अधिकांश लोग इसे दिल से स्वीकार नहीं करते। यही कारण है कि मृत्यु जीवन की सबसे कठिन चुनौती है।
प्रार्थना किसी भी रूप में प्रभावी होती है, क्योंकि यह एक क्रिया है। इसका परिणाम होना अनिवार्य है, क्योंकि यह ब्रह्मांड का नियम है।
मानव हृदय से सहानुभूति को कोई भी धर्म, राष्ट्र या संस्कृति नष्ट नहीं कर सकती। यह मानवता का स्वाभाविक गुण है।
जो व्यक्ति कम से कम लेता है और अधिक से अधिक योगदान देता है, वही परिपक्वता की ओर अग्रसर होता है। आत्म-विकास इसी में निहित है।
आप तभी स्वतंत्र हो सकते हैं जब आप दूसरों को स्वीकार करना सीखें। दूसरों को बदलने की कोशिश करने से मुक्ति नहीं मिलती।
स्वामी दयानंद सरस्वती के ये विचार हमें सत्य, सहानुभूति और आत्म-विकास का मार्ग दिखाते हैं।
FAQs
Q1.
स्वामी दयानंद सरस्वती कौन थे?
स्वामी दयानंद सरस्वती एक हिंदू समाज सुधारक थे और आर्य समाज के संस्थापक थे।
Q2.
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा, गुजरात, भारत में हुआ था।
Q3.
आर्य समाज क्या है?
आर्य समाज एक हिंदू सुधार आंदोलन है जिसे स्वामी दयानंद ने 1875 में स्थापित किया था। यह वैदिक सिद्धांतों को बढ़ावा देता है, मूर्ति पूजा का विरोध करता है, और सामाजिक सुधारों की वकालत करता है।
Q4.
स्वामी दयानंद सरस्वती की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौन-सी है?
उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक 'सत्यार्थ प्रकाश' है, जिसे उनकी सर्वोत्तम कृति माना जाता है। इसमें उनके उपदेश और विभिन्न धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा दी गई है।
Q5.
स्वामी दयानंद सरस्वती के भारतीय समाज में मुख्य योगदान क्या हैं?
वैदिक शिक्षा को बढ़ावा देना, अंधविश्वास और मूर्ति पूजा का विरोध करना, महिलाओं की शिक्षा की वकालत करना, जाति प्रथा के खिलाफ अभियान चलाना, विधवा पुनर्विवाह और अन्य सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देना।
Q6.
स्वामी दयानंद के शिक्षा के बारे में क्या विचार थे?
उन्होंने वैदिक शिक्षा, महिलाओं की शिक्षा और नैतिक उत्थान के लिए ज्ञान पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने स्थानीय भाषाओं में पढ़ाने का समर्थन किया।
Q7.
स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु कब और कैसे हुई?
उनकी मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को हुई। उन्हें उनके रसोइए के साथी ने जहर दे दिया था। उनकी मृत्यु के हालात को अक्सर एक षड्यंत्र माना जाता है।
Q8.
स्वामी दयानंद का प्रसिद्ध वाक्य क्या है?
उनका प्रसिद्ध सिद्धांत है "कृण्वन्तो विश्वमार्यम", जिसका अर्थ है "संपूर्ण संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ।"
Q9.
स्वामी दयानंद ने कौन-कौन से सुधार किए?
उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, महिलाओं की शिक्षा और जातीय समानता को बढ़ावा दिया, साथ ही छुआछूत का विरोध किया।
Q10.
स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को कैसे प्रभावित किया?
उन्होंने आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय एकता और भारतीय परंपराओं के प्रति जागरूकता का प्रचार किया, जिससे कई स्वतंत्रता सेनानी प्रेरित हुए। लोकमान्य तिलक और सुभाष चंद्र बोस उनके विचारों से प्रभावित थे।
Q11.
स्वामी दयानंद सरस्वती को भारत का “पुनर्जागरण पुरुष” क्यों कहा जाता है?
उन्हें पुनर्जागरण पुरुष इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने वैदिक सिद्धांतों को पुनर्जीवित करने और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान सामाजिक व धार्मिक सुधार में प्रमुख भूमिका निभाई।
Q12.
स्वामी दयानंद सरस्वती की मूर्ति पूजा पर क्या राय थी?
उन्होंने मूर्ति पूजा का कड़ा विरोध किया और वैदिक शिक्षाओं के अनुसार निराकार, सर्वव्यापी भगवान की उपासना पर जोर दिया।
Q13.
स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु को रहस्यमय क्यों माना जाता है?
उनकी मृत्यु विष देने से हुई थी, और कुछ लोग इसे एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा मानते हैं, क्योंकि वे अपने विचारों और सुधारों के कारण कई लोगों के निशाने पर थे।
Q14.
‘सत्यार्थ प्रकाश’ का क्या अर्थ है?
सत्यार्थ प्रकाश का अर्थ है "सत्य का प्रकाश।" यह पुस्तक वैदिक दर्शन को समझाती है और मूर्ति पूजा व अन्य प्रथाओं की समीक्षा करती है।
Q15.
स्वामी दयानंद सरस्वती ने राष्ट्रवाद को कैसे बढ़ावा दिया?
उन्होंने आत्मनिर्भरता, सामाजिक एकता और भारतीय परंपराओं को अपनाने की वकालत की, जिससे आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की नींव पड़ी।
आज हम आपके सामने स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय (Swami Dayanand Saraswati In Hindi) रखने जा रहे हैं। वे भारतीय समाज में जन्मे एक समाज सुधारक, वेदों शास्त्रों के ज्ञाता, कुरीतियों के विरुद्ध लड़ने वाले, महान चिंतक वआर्य समाज के संस्थापक थे। उन्होंने भारतीय समाज में फैली कई कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी व उन्हें समाप्त करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी।
साथ ही वे वेदों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे व उनका प्रचार-प्रसार पूरे विश्व में करना चाहते थे। स्वामी जी के विचार धार्मिक, राजनीतिक, शिक्षा व सामाजिक सुधार से जुड़े हुए थे। ऐसे में आज हम आपके सामने स्वामी दयानंद सरस्वती की जीवनी (Swami Dayanand Saraswati Ka Jivan Parichay) विस्तृत रूप में रखने जा रहे हैं।
Swami Dayanand Saraswati In Hindi | स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय
स्वामी दयानंद सरस्वती जी भारतवर्ष में जन्मे एक ऐसे महान पुरुष थे जिन्होंने धर्म में फैली कई कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में केवल हिन्दू धर्म पर ही टिपण्णी नहीं की अपितु उन्होंने विश्व के अन्य धर्मों पर भी अपने विचार रखे। इन्हें हम इसी लेख में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार के अंतर्गत पढ़ेंगे।
सबसे पहले तो हम दयानंद सरस्वती का जीवन परिचय आपके सामने रखने वाले हैं। यहाँ आपको स्वामी जी के जन्म, माता-पिता, मूल नाम, जाति, परिवार इत्यादि के बारे में जानकारी दी जाएगी।
- स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात के टंकारा में हुआ था।
- स्वामी दयानंद का जन्म 12 फरवरी 1824 ईस्वी में मूल नक्षत्र में हुआ था।
- स्वामी दयानंद सरस्वती का वास्तविक नाम मूलशंकर था। इसे हम स्वामी दयानंद के बचपन का नाम भी कह सकते हैं।
- स्वामी जी का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
- स्वामी दयानंद सरस्वती के माता-पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी व यशोदाबाई था।
स्वामी जी के पिता शिव भक्त थे और वे बचपन से ही उन्हें भगवान शिव की उपासना करना व व्रत रखना सिखाया करते थे। एक दिन स्वामी जी महाशिवरात्रि के दिन मंदिर में रखे प्रसाद को देखने के लिए रात भर जागे रहे और देखा कि शिवजी के लिए रखा प्रसाद एक चूहा खा रहा है। यह देखकर उन्होंने अपने पिता से भगवान के अस्तित्व को लेकर वाद-विवाद किया।
कुछ समय पश्चात, अपने चाचा व छोटी बहन की मृत्यु ने उन्हें अंदर तक झंकझोर के रख दिया था। इसने उन्हें मनुष्य के जीवन-मृत्यु के बारे में गहराई से सोचने को विवश किया। उनके माता-पिता उनका विवाह जल्द करवा देना चाहते थे किंतु स्वामी जी को विवाह नहीं करना था। उनका मन समाज के लिए कार्य करने का था, इसलिए उन्होंने सन 1846 में अपने घर को छोड़ दिया।
स्वामी दयानंद सरस्वती की जीवन
अब हम स्वामी जी के घर छोड़ने के बाद के जीवन के बारे में बात करने वाले हैं। इसके बाद ही उनका असली कार्य शुरू हुआ था। घर छोड़ कर जाने के बाद ही स्वामी जी को अपने गुरु मिले (Swami Dayanand Saraswati Ka Jivan Parichay) थे। गुरु से मिलने से पहले वे कई वर्षों तक इधर-उधर सत्य की खोज में भटकते ही रहे। अंत में जाकर उन्हें अपने गुरु मिले जिन्होंने उनका मार्गदर्शन किया।
इसके बाद ही उन्होंने प्रसिद्ध आर्य समाज की स्थापना की थी तथा एक नारा दिया था। वह नारा आज आर्य समाज का प्रमुख नारा है और सभी आर्य समाजी उसी का ही पालन करते हैं। आइए स्वामी जी के घर छोड़ने के बाद का विवरण भी जान लेते हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु कौन थे?
बहुत लोग Swami Dayanand Saraswati Ke Guru Kaun The, के बारे में भी जानना चाहते हैं। चलिए इस प्रश्न का भी उत्तर जान लेते हैं। घर से निकलने के बाद उन्होंने एक साधु की भांति अपना जीवनयापन किया व लगभग 25 वर्षों तक सत्य की खोज में वनों, पहाड़ों पर घूमते रहे। इस दौरान वे स्वामी विरजानंद जी के संपर्क में आए। स्वामी विरजानंद जी ही स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु बने। उन्होंने अपनी जिज्ञासा को शांत करने के उद्देश्य से वेदों, शास्त्रों, संस्कृत भाषा व अन्य धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया।
वेदों ने स्वामी जी को बहुत प्रभावित किया। स्वामी विरजानंद जी ने उनसे कहा कि लोग आजकल हिंदू धर्म के मूल अर्थात वेदों को भूल चुके हैं व समाज में कई बुराइयां व्याप्त हो चुकी हैं। तो स्वामी दयानंद जी ने निश्चय किया कि वे समाज में व्याप्त बुराइयों को मिटाएंगे व लोगों को वेदों की ओर वापस लेकर आएंगे।
स्वामी जी का वेदों की ओर लौटो का नारा
वेदों व सभी शास्त्रों का अध्ययन करने के पश्चात लोगों को धर्म के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने विश्वप्रसिद्ध नारा वेदों की ओर लौटो का नारा दिया। स्वामी जी का यह नारा आज भी उन्हें मानने वालों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। उन्होंने हिंदू धर्म का मुख्य आधार वेदों को ही माना। इसी के साथ उन्होंने समाज में व्याप्त कई कुरीतियों का विरोध किया व अंतर-जातीय विवाह व विधवा विवाह का समर्थन किया।
सन 1875 में उन्होंने मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य भारत वर्ष में धर्म की स्थापना करना व वेदों का प्रकाश फैलाना था। उन्होंने धर्म का ज्ञान फैलाने के उद्देश्य से कई पुस्तकों की भी रचना की। साथ ही आर्य समाज के 10 सूत्रीय नियम थे जिनका नाम था कृण्वन्तो विश्वमार्यम् अर्थात विश्व को आर्य बनाते चलो।
दयानंद सरस्वती जी का हिंदी भाषा के प्रति प्रेम
स्वामी दयानंद जी को हिंदी भाषा से अत्यधिक लगाव था और वे भारत की राष्ट्र भाषा हिंदी को बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि भारत के विभिन्न राज्यों में आपस में बोली जाने वाली आम भाषा अंग्रेजी ना होकर हिंदी हो व हम अपनी संस्कृति पर गर्व कर सकें।
हालांकि उनकी मातृभाषा गुजराती थी व धर्म भाषा संस्कृत थी किंतु हिंदी एक ऐसी भाषा थी जिसे भारत के ज्यादातर सभी लोग बोल, समझ व पढ़ सकते थे। इसलिए उन्होंने संपूर्ण भारत की आम भाषा के लिए अपने देश की सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा हिंदी को बनाने पर बल दिया।
स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार
जैसा कि हमने आपको ऊपर ही बताया कि स्वामी जी ने प्रत्येक विषय पर अपने विचार रखे थे। फिर चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक, शिक्षा से संबंधित हो या सामाजिक सुधार से जुड़ा हुआ कोई विषय। दयानंद सरस्वती जी ने समाज के हरेक वर्ग के उत्थान का कार्य किया था और उस पर अपने विचार प्रकट किए थे। अब हम एक-एक करके स्वामी दयानंद सरस्वती के विभिन्न विषयों के ऊपर रखे गए सभी तरह के विचारों को विस्तृत रूप में रखने जा रहे हैं।
#1.
तूने अच्छी लीला की, आपकी इच्छा पूर्ण हो।”
महर्षि दयानंद सरस्वती का सिद्धांत (प्रसिद्ध वाक्य) था- “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”, अर्थात सारे संसार को श्रेष्ठ मानव बनाओ।
स्वामी जी की पुस्तकें एवं रचनाएं
स्वामी दयानंद सरस्वती ने कई धार्मिक और सामाजिक पुस्तकों की रचना की। उनकी प्रारंभिक कृतियाँ संस्कृत में थीं, लेकिन समय के साथ उन्होंने इन्हें अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए आर्यभाषा (हिन्दी) में भी लिखा। हिन्दी को उन्होंने ‘आर्यभाषा‘ नाम दिया था और इसके प्रचार-प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाई।
यदि उनके ग्रंथों और वेद-प्रदत्त विचारों का पालन किया जाए, तो राष्ट्र वैभवशाली, शक्तिशाली, और सदाचारी बन सकता है। उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं:
- सत्यार्थप्रकाश
- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
- ऋग्वेद भाष्य
- यजुर्वेद भाष्य
- चतुर्वेदविषयसूची
- संस्कारविधि
- पंचमहायज्ञविधि
- आर्याभिविनय
- गोकरुणानिधि
- आर्योद्देश्यरत्नमाला
- भ्रान्तिनिवारण
- अष्टाध्यायीभाष्य
- वेदांगप्रकाश
- संस्कृतवाक्यप्रबोधः
- व्यवहारभानु
प्रसिद्ध कृतियों का विवरण:
| कृति का नाम | विवरण |
|---|---|
| सत्यार्थ प्रकाश | स्वामी दयानंद सरस्वती की सर्वोत्तम कृति, 14 समुल्लासों में रचित। पहले 10 समुल्लास वैदिक धर्म पर, जबकि अंतिम 4 में विभिन्न मतों की समीक्षा। |
| आर्योद्देश्यरत्नमाला (1873) | 100 शब्दों की परिभाषा वाली लघु पुस्तिका (8 पृष्ठ)। ईश्वर, धर्म-कर्म जैसे शब्दों के सही अर्थ को स्पष्ट किया गया है। |
| गोकरुणानिधि (1881) | गोरक्षा आंदोलन को बढ़ावा देने वाली पुस्तक। सभी समुदायों से गोकृष्यादि रक्षा समिति में सदस्यता लेने की अपील और पशु संरक्षण के लाभ बताए गए हैं। |
| व्यवहारभानु (1880) | वैदिक यन्त्रालय, बनारस द्वारा प्रकाशित। धर्म और उचित आचरण के नियमों का वर्णन, धार्मिक और सामाजिक मार्गदर्शन देने वाली पुस्तक। |
| स्वीकारपत्र (1883) | 27 फरवरी 1883 को प्रकाशित। 23 व्यक्तियों को परोपकारिणी सभा की जिम्मेदारी सौंपी गई। महादेव गोविन्द रानडे का भी नाम शामिल था। |
| संस्कृतवाक्यप्रबोधः | संस्कृत सिखाने वाली वार्तालाप पुस्तिका। संस्कृत वाक्य और उनके हिन्दी अनुवाद विभिन्न विषयों पर प्रस्तुत किए गए हैं। |
महापुरुषों के विचारों में स्वामी दयानन्द का योगदान
- डॉ॰ भगवान दास: “स्वामी दयानन्द हिन्दू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता थे।”
- श्रीमती एनी बेसेन्ट: “वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘आर्यावर्त (भारत) आर्यावर्तियों (भारतीयों) के लिए’ की घोषणा की।”
- सरदार पटेल: “भारत की स्वतन्त्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानन्द ने डाली थी।”
- पट्टाभि सीतारमैया: “गाँधी जी राष्ट्रपिता हैं, पर स्वामी दयानन्द राष्ट्र–पितामह हैं।”
- रोमां रोलां (फ्रांसीसी लेखक): “वे राष्ट्रीय भावना और जन-जागृति को क्रियात्मक रूप देने में प्रयत्नशील थे।”
- रिचर्ड (फ्रेंच लेखक): “ऋषि दयानन्द जाति बन्धन तोड़ने और लोगों को कारागार से मुक्त कराने के लिए आए। उनका आदर्श है- ‘आर्यावर्त!
इन्होंने अपनी ओजस्वी विचारों से समाज में नव चेतना का संचार जागृत किया.
बिंदु(Points) जानकारी (Information) नाम (Name) महर्षि दयानंद सरस्वतीं वास्तविक नाम (Real Name) मूल शंकर तिवारी जन्म (Birth) 12 फरवरी 1824 मृत्यु (Death) 30 अक्टूबर 1883 जन्म स्थान (Birth Place) टंकारा कार्यक्षेत्र (Profession) समाज सुधारक उपलब्धि (Achievement) आर्य समाज की स्थापना महर्षि दयानंद जन्म और प्रारंभिक जीवन (Maharshi Dayanand Saraswati Birth and Life History)
महर्षि दयानंद का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में ब्राह्मण परिवार में हुआ था.
स्वामी जी के इलाज के लिए राजा द्वारा अथक प्रयास किये गए. जागरण के दौरान इस घटना ने स्वामी दयानंद पर गहरा प्रभाव डाला और आत्मज्ञान की खोज में इन्होने अपना घर छोड़ दिया.
महर्षि दयानंद सरस्वती के गुरु विरजानंद
महर्षि दयानंद जब ज्ञान की खोज में भ्रमण कर रहे थे.