Nanda devi wiki in hindi

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Nanda Devi kaun hai? Raj Jat route kya hai? Next in 2026.

3. | Who is Nanda Devi?

Himalaya ki beti aur Shiv ji ki ardhangini, Uttarakhand ki lok devi.
Daughter of Himalayas, wife of Shiva, and folk goddess of Uttarakhand.

2. Nanda Devi Yatra kab hoti hai? Kya is yatra ka live telecast hota hai? Unka yatra, mela aur upasana prachin paramparaon ka jeevant roop hai.

English:

Nanda Devi is the spiritual soul of Uttarakhand.

2025 mein tayyariyan hongi, yatra 2026 mein hai.
No. 2025 will see preparations; yatra is in 2026.

4. | Can tourists attend?

Haan, lekin registration aur rules follow karna hota hai.
Yes, but requires registration and adherence to rules.


📍 How to Reach

  • By Road: Buses to Karnaprayag, Almora, Chamoli

  • By Train: Nearest stations - Kathgodam, Rishikesh

  • By Air: Jolly Grant Airport (Dehradun), Pantnagar Airport


📊 Conclusion:

Hindi:

Nanda Devi ke bina Uttarakhand ki lok sanskriti adhoori hai.

Her worship and yatra reflect the living heritage of the Himalayas.

Nanda devi doli

उत्तराखंड दर्शन: भूमि एक, अनुभव अनेक।

Nanda DeviRaj Jat YatraReligious TourismUttarakhand CultureUttarakhand Templesउत्तराखंड धर्म स्थलीनंदा देवीयात्रा

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नंदा देवी: अध्यात्म और रहस्य का संगम, कहानी उत्तराखंड के कुल देवी की

भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित नंदा देवी पर्वत को केवल एक ऊंचा पर्वत नहीं, बल्कि एक जीवंत देवी के रूप में पूजा जाता है। हिमालय की गोद में बसा यह पर्वत रहस्यों, आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। इसकी ऊंचाई 7,816 मीटर (25,643 फीट) है, जो इसे भारत का दूसरा सबसे ऊंचा पर्वत बनाता है। यह पर्वत केवल पर्वतारोहियों और पर्यटकों के लिए ही आकर्षण नहीं है, बल्कि यह साधुओं-संत, श्रद्धालु और वैज्ञानिकों के लिए भी बेहद खास है। इस पर्वत से जुड़ी कहानियां, मान्यताएं और उसके आसपास का वातावरण इसे आध्यात्मिक और भौगोलिक दोनों रूपों में रहस्यमयी बनाता है।

 

उत्तराखंड के लोग नंदा देवी को अपनी कुलदेवी मानते हैं। वह नंदा देवी को शक्ति स्वरूपा, पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी के रूप में पूजते हैं। नंदा देवी केवल एक देवी नहीं, बल्कि वह इस क्षेत्र की संरक्षक शक्ति हैं। यह विश्वास है कि वह स्वयं इस पर्वत पर निवास करती हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। इस कारण, यह पर्वत सांस्कृतिक रूप से अति पवित्र माना जाता है और इसे छेड़ने का साहस बहुत कम लोग करते हैं।

नंदा देवी का आध्यात्मिक स्वरूप

हर 12 साल में होने वाली नंदा देवी राज जात यात्रा इसका जीवंत प्रमाण है। यह यात्रा लगभग 280 किलोमीटर लम्बी होती है और इसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। यात्रा के दौरान देवी की प्रतिमा को गांव-गांव घुमाया जाता है और फिर एक पवित्र स्थल ‘होमकुंड’ में विसर्जित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह यात्रा स्वयं नंदा देवी के मायके से ससुराल (कैलाश) की यात्रा का प्रतीक है।

नंदा देवी का भौगोलिक रहस्य

भौगोलिक दृष्टि से नंदा देवी क्षेत्र एक संरक्षित बायोडाइवर्सिटी क्षेत्र है। यह पर्वत नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के केंद्र में स्थित है, जिसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया है। इस क्षेत्र में कई दुर्लभ वनस्पतियां और पशु-पक्षी पाए जाते हैं, जैसे कि कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ, भूरे भालू और मोनाल पक्षी।

 

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी भौगोलिक खासियत यह है कि यह एक तरह से प्राकृतिक दीवारों से घिरा हुआ है। इसके चारों ओर की चोटियां इतनी ऊंची और कठिन हैं कि यह एक प्राकृतिक दुर्ग की तरह बन गया है। यही कारण है कि लंबे समय तक यह क्षेत्र इंसानी दखल से बचकर शुद्ध और रहस्यमयी बना रहा।

 

यहां तक कि पर्यावरण की नाजुकता और धार्मिक मान्यताओं के कारण नंदा देवी के मुख्य शिखर पर चढ़ाई 1983 के बाद से प्रतिबंधित कर दी गई है। वैज्ञानिकों और पर्वतारोहियों को भी खास अनुमति के बिना इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं मिलता है।

पौराणिक कथा: नंदा की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, नंदा देवी वास्तव में राजा यशोधवल की पुत्री थीं, जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ। विवाह के बाद जब नंदा अपने ससुराल जा रही थीं, तब रास्ते में राक्षसों ने उन्हें परेशान किया। नंदा देवी ने उस समय हिमालय की ऊंचाई में जाकर छुपने का प्रयास किया और फिर वहीं बस गईं। तभी से इस पर्वत को नंदा देवी के निवास स्थान के रूप में पूजा जाता है।

 

एक अन्य कथा कहती है कि नंदा देवी को अपनी बहन सुनंदा के साथ देवताओं ने पृथ्वी पर भेजा था, ताकि वह बुराइयों का नाश करें। इसके बाद दोनों देवियां हिमालय में समाहित हो गईं और तब से इस पर्वत को उनका पवित्र रूप माना गया।

 

नंदा देवी पर्वत एक ऐसा स्थान है जहां भक्ति, पर्यावरण और गूढ़ता एकसाथ जीवित हैं। यहां कई लोग आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस करते हैं और यहां की चट्टानों में विज्ञान के रहस्य। यही कारण है कि यह पर्वत सिर्फ एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत शक्ति, एक आस्था का प्रतीक और एक अनुत्तरित पहेली भी है।

Next: 2026.
Every 12 years.

| What is the Raj Jat route?

Nauti > Kansuwa > Roopkund > Homkund (280 km)

7. Yatra ke dauran kya hota hai? | What happens during the yatra?

Doliyon ki yatra, bhajan, local geet, tapasya aur darshan.
Goddess palanquins, bhajans, folk songs, and darshan.

9. Kya yeh yatra sabke liye hai? | When is Nanda Devi Yatra held?

Har 12 saal mein ek baar.

nanda devi wiki in hindi

Nanda Devi Mela kya hai?

नंदा देवी राजजात यात्रा से जुड़ी कहानी है बेहद पौराणिक, जानें यात्रा से जुड़े कुछ विशेष तथ्य

Uttarakhand Nanda Devi Raj jaat yatra : उत्तराखंड अपनी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिकताओं के चलते पूरे विश्व भर में अपनी विशेष पहचान रखता है जो विश्व भर के लोगों को अपनी ओर बेहद आकर्षित करता है। ठीक उसी प्रकार से उत्तराखंड मे विशेष महत्व रखती है नंदा देवी राजजात यात्रा जिसका संबंध गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों से है। नंदा देवी राज जात यात्रा को विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्रा माना जाता है जिसका आगाज 12 वर्षों में किया जाता है। अगली नंदा राजजात यात्रा वर्ष 2026 में होनी है।उत्तराखंड में माँ नंदा को अनेकों रूप में पूजा जाता है जो स्वयं में विशेष धार्मिक महत्व रखती है। आपको बता दें कि यह तीर्थयात्रा चमोली जिले के कर्णप्रयाग के पास नौटी गांव से शुरू होती है और होमकुंड नामक एक ऊंचे मैदान पर जाकर समाप्त होती है।

यह भी पढ़िए: उत्तराखंड का हाट कालिका मंदिर जिसमे माँ काली स्वयं करती है विश्राम, लगाई जाती है माँ की शैय्या

इस यात्रा की शुरुआत करने का श्रेय गढ़वाल के राजा शालीपाल और कनक पाल को दिया जाता है। मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि प्राचीन काल में भगवान आशुतोष एवं पार्वती कैलाश की ओर प्रस्थान कर रहे थे तभी इस दौरान मां नंदा को प्यास लगी और वह निकटवर्ती गांव बन्धाणि जा पहुंची जबकि भगवान शंकर सीधे आगे की ओर निकल गए। बन्धाणि गांव में उस समय के चौकीदार एवं प्रधान जमन सिंह जादोडा ने मां पार्वती को पानी पिलाने के साथ-साथ उनका खूब आदर सत्कार करते हुए दही और भात खिलाया तथा विदा होते समय जमन सिंह ने मां पार्वती को कहा कि कैलाश जाते समय वे एक बार फिर से उनके घर जरूर आएं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्री नंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व इडा बंधानी में जादौड़ा वंशज गुसाईं लोगों के घर मां नंदा देवी की डोली रात्रि विश्राम करती है।

Nanda Devi Raj Jat Yatra Story: मां नंदा से जुड़ी कथा

जाने कहां से शुरुआत होती है मां नंदा राजजात यात्रा

चमोली के नॉटी से शुरू होकर कुरूड के मंदिर से दसौली और बंधाण की डोलिया राजजात का आगाज करती है जिसके लिए लगभग 240 किलोमीटर की दूरी पर नॉटी से हेमकुंड तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है। इस बीच उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक छतोलिया इस यात्रा में शामिल होते है। इस यात्रा में नौटियाल और कुंवर लोग चौसिंग्या खाडू और रिगाल की छतौलिया लेकर आते हैं। नौटियाल और कुंवर लोग मां नंदा के उपहार को इस बकरे की पीठ पर हेमकुंड तक ले जाते हैं और वहां से यह बकरा अकेला ही आगे बढ़ जाता है ऐसा कहा जाता है कि ठीक कैलाश पर्वत तक जाते ही इस खाडू के जन्म के साथ ही विचित्र चमत्कारिक घटनाएं शुरू होने लग जाती है जिस भी जगह पर यह जन्म लेता है उसी दिन से वहां शेर आना शुरू कर देता है जब तक इस खाडू का मालिक राजा को अर्पित करने की मनौती नहीं रखना तब तक वहां शेर लगातार आता ही रहता है। बताते चले चौसिंगा खाडू (काले रंग का भेड़) श्रीनंदा राजजात की अगुवाई करता है मनौती के बाद पैदा हुए चौसिंगा खाडू को ही यात्रा में शामिल किया जाता है।

यात्रा के मुख्य पडाव
० ईड़ाबधाणी
चमोली के नौटी से यात्रा के शुरू होते ही श्रद्धा का सैलाब उमड़ता रहता है। ढोल-दमाऊं और पौराणिक वाद्य यंत्रों के साथ ईड़ाबधाणी पहुंचने पर मां श्रीनंदा का भव्य स्वागत किया जाता है।
० नौटी
ईड़ाबधाणी से दूसरे दिन राजजात रिठोली, जाख, दियारकोट, कुकडई, पुडियाणी, कनोठ, झुरकंडे और नैंणी गांव का भ्रमण करते हुए रात्रि विश्राम के लिए नौटी पहुंचती है। यहां मंदिर में मां नंदा का जागरण होता है।
० कांसुवा
नौटी से मां श्रीनंदा तीसरे पड़ाव कांसुवा गांव पहुंचती हैं, जहां राजवंशी कुंवर माई नंदा और यात्रियों का भव्य स्वागत करते हैं। यहां भराड़ी देवी और कैलापीर देवता के मंदिर हैं। भराड़ी चौक में चार सिंग के मेढ और पवित्र छंतोली की पूजा होती है।
० सेम
कांसुवा से सेम जाते समय चांदपुर गढ़ी विशेष राजजात का आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां से महादेव घाट मंदिर होते हुए उज्ज्वलपुर, तोप की पूजा प्राप्त कर देवी सेम गांव पहुंचती है। यहां गैरोला और चमोला गांव की छंतोलियां शामिल होती हैं।
० कोटी
सेम से धारकोट, घड़ियाल और सिमतोली में देवी की पूजा होती है। सितोलीधार में देवी की कोटिश प्रार्थना की जाती है, इसलिए धार के दूसरे छोर पर स्थित गांव का नाम कोटी पड़ा। कोटी पहुंचने पर देवी की विशेष पूजा होती है।
० भगोती
भगोती मां श्रीनंदा के मायके क्षेत्र का सबसे अंतिम पड़ाव है। यहां केदारु देवता की छंतोली यात्रा में शामिल होती है।
० कुलसारी
मायके से विदा होकर मां श्रीनंदा की छंतोली अपनी ससुराल के पहले पड़ाव कुलसारी पहुंचती हैं। यहां पर राजजात हमेशा अमावस्या के दिन पहुंचती है।
० चेपड्यूं
कुलसारी से विदा होकर थराली पहुंचने पर भव्य मेला लगता है। यहां कुछ दूरी पर देवराड़ा गांव है, जहां बधाण की राजराजेश्वरी नंदादेवी वर्ष में छ: माह रहती है। चेपड्यूं बुटोला थोकदारों का गांव है। यहां मां नंदादेवी की स्थापना घर पर की गई है।
० नंदकेशरी
वर्ष 2000 की राजजात में नंदकेशरी राजजात पड़ाव बना। यहां पर बधाण की राजराजेश्वरी नंदादेवी की डोली कुरुड से चलकर राजजात में शामिल होती है। कुमाऊं से भी देव डोलियां और छंतोलियां शामिल होती हैं।
० फल्दियागांव
नंदकेशरी से फल्दियागांव पहुंचने के दौरान देवी मां पूर्णासेरा पर भेकलझाड़ी यात्रा में विशेष महत्व है।
पूजा-अर्चना के बाद मुंदोली पहुंचती है राजजात
० मुंदोली
ल्वाणी, बगरियागाड़ में पूजा-अर्चना के बाद राजजात मुंदोली पहुंचती है। गांव में महिलाएं और पुरुष सामूहिक झौंड़ा गीत गाते हैं।
० वाण
लोहाजंग से देवी की राजजात अंतिम बस्ती गांव वाण पहुंचती है। यहां पर घौंसिंह, काली दानू और नंदा देवी के मंदिर हैं।
० गैरोलीपातल
द्धाणीग्वर और दाडिमडाली स्थान के बाद गरोलीपातल आता है। यह पहाड़ यात्रा का पहला निर्जन पड़ाव है।
० वैदनी
इस राजजात में वैदनी को पड़ाव बनाया गया है। मान्यता है कि महाकाली ने जब रक्तबीज राक्षस का वध किया था, तो भगवान शंकर ने महाकाली को इसी कुंड में स्नान कराया था, जिससे वे पुन: महागौरी रूप में आ गई थी।
० पातरनचौंणियां
वेदनी कुड से यात्री दल पातरनचौंणियां पहुंचती है। यहां पर पूजा के बाद विश्राम होता है।
० शिला समुद्र
पातरनचौंणियां के बाद तेज चढ़ाई पार कर कैलवाविनायक पहुंचा जाता है। यहां गणेश जी की भव्य मूर्ति है। इस दौरान बगुवावासा, बल्लभ स्वेलड़ा, रुमकुंड आदि स्थानों से होकर मां नंदा की राजजात शिलासमुद्र पहुंचती है।
० चंदनियाघाट
हेमकुंड में राजजात मनाने के बाद नंदा भक्त रात्रि विश्राम के लिए चंदनियाघाट पहुंचते हैं। यहां पहुंचने का रास्ता काफी खतरनाक है।
० सुतोल
राजजात पूजा के बाद श्रद्धालु रात्रि विश्राम के लिए सुतोल पहुंचते हैं। इस गांव के रास्ते में तातड़ा में धौसिंह का मंदिर है।
० घाट
नंदाकिनी नदी के दाहिने किनारे चलकर सितैल से नंदाकिनी का पुल पार कर श्रद्धालु घाट पहुंचते हैं।
इसके बाद यात्रा वापस नौटी पहुंचती है
घाट और नंदप्रयाग से होते हुए श्रद्धालु सड़क मार्ग से कर्णप्रयाग पहुंचते हैं। यहां ड्यूड़ी ब्राह्मण राजकुंवर और बारह थोकी के ब्राह्मणों को विदा करते हैं नौटी पहुंचते हैं। अन्य को भी सुफल देते हुए राजकुंवर और राज पुरोहित के साथ शेष यात्री नंदाधाम नौटी पहुंचते हैं।

उत्तराखंड की संस्कृति में नन्दा देवी का नाम विशेष स्थान रखता है। उन्हें हिमालय की राजकुमारी, पार्वती का अवतार और पूरे कुमाऊँ और गढ़वाल की रक्षक देवी माना जाता है। नन्दा देवी का नाम आते ही श्रद्धा, शक्ति, और आस्था का अनुभव होता है। यह लेख नन्दा देवी की कथा, उनकी धार्मिक महत्ता, और विशेष नन्दा राजजात यात्रा के बारे हैं, जो हर बारह साल में आयोजित होती है और इस यात्रा का केंद्र बिंदु नन्दा देवी होती हैं।


नन्दा देवी की पौराणिक कथा

नन्दा देवी की पौराणिक कथा भारतीय हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। देवी नन्दा को हिमालय की देवी और कुमाऊं क्षेत्र की कुलदेवी माना जाता है।

नन्दा देवी का जन्म:

नन्दा देवी का जन्म ऋषि कश्यप और कांची देवी के यहाँ हुआ था। कांची देवी हिमालय क्षेत्र की प्रमुख देवी थीं, और देवी नन्दा को हिमालय की कन्या के रूप में पूजा जाता है। देवी नन्दा का विवाह भगवान शिव से हुआ था, और उनके साथ देवी ने पर्वतीय क्षेत्र में जीवन व्यतीत किया।

नन्दा और भगवान शिव:

कथाओं के अनुसार, भगवान शिव और देवी नन्दा का विवाह एक दिव्य और पवित्र संबंध था। यह विवाह केवल सांसारिक नहीं था, बल्कि इसमें आध्यात्मिक और धार्मिक शक्ति का समावेश था। नन्दा देवी का स्थान हिमालय के कुमाऊं क्षेत्र में बताया जाता है, जहाँ उन्हें हिमालय की बेटी माना जाता है।

नन्दा देवी और उनका पर्वतीय स्थान:

नन्दा देवी का स्थान मुख्यतः नन्दा देवी की श्रृंखला के रूप में पहचाना जाता है। यह पर्वत श्रृंखला उत्तराखंड राज्य में स्थित है और इसे देवी नन्दा की पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इस श्रृंखला के शिखर पर नन्दा देवी पर्वत स्थित है, जो 7,816 मीटर (25,643 फीट) ऊँचा है। यह पर्वत भारतीय उपमहाद्वीप का दूसरा सबसे ऊँचा पर्वत है और यह देवी नन्दा की शक्ति और दिव्यता का प्रतीक है।

नन्दा देवी की पूजा:

नन्दा देवी की पूजा का एक विशेष रूप है जिसे नन्दा चौथ कहते हैं। यह पर्व कुमाऊं क्षेत्र में खासतौर पर बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। नन्दा चौथ में देवी की पूजा की जाती है, जिसमें विशेष रूप से नन्दा देवी का रथ कुमाऊं के विभिन्न इलाकों में यात्रा करता है और लोग रथ की पूजा करते हैं। यह पर्व एक धार्मिक और सांस्कृतिक महोत्सव का रूप ले चुका है।

नन्दा देवी को कुमाऊं की कुलदेवी के रूप में माना जाता है और कुमाऊं के लोगों का विश्वास है कि देवी नन्दा उन्हें अपनी आशीर्वाद देती हैं। यही कारण है कि कुमाऊं क्षेत्र में नन्दा देवी के पूजा स्थल की अत्यधिक मान्यता है।

नन्दा देवी के महत्व के कारण:

  1. धार्मिक महत्व: नन्दा देवी का पूजा स्थल कुमाऊं क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थानों में से एक है। नन्दा देवी को हर घर में पूजा जाती है और विशेष रूप से नन्दा चौथ पर उनका पूजन अत्यधिक श्रद्धा से किया जाता है।
  2. सांस्कृतिक महत्व: नन्दा देवी की पूजा कुमाऊं क्षेत्र के लोककला, संगीत, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी हुई है। उनके सम्मान में कई मेले, उत्सव और रैलियाँ आयोजित की जाती हैं।
  3. ऐतिहासिक महत्व: नन्दा देवी का पर्वतीय क्षेत्र कुमाऊं की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है। यहां के पहाड़ों पर देवी की उपस्थिति से लोगों को शक्ति और सुरक्षा का आभास होता है।

नन्दा देवी और उनके संबंधी पर्वत:

नन्दा देवी पर्वत श्रृंखला की उपस्थिति इस क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ाती है। यह पर्वत हिमालय की सबसे ऊँची चोटियों में से एक है और इसे पूजा का एक प्रमुख स्थल माना जाता है। नन्दा देवी पर्वत और अन्य चोटियों का दृश्य भक्तों को अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति का अहसास कराता है।

नन्दा देवी का कुमाऊं क्षेत्र में योगदान:

कुमाऊं क्षेत्र के लोग नन्दा देवी की पूजा करते हुए अपने जीवन के सभी पहलुओं को धर्म, संस्कृति और आस्था से जोड़ते हैं। उनका विश्वास है कि देवी नन्दा से उनके जीवन में सुख, समृद्धि, और सुरक्षा मिलती है। यही कारण है कि नन्दा देवी की पूजा से जुड़ी परंपराएँ और उत्सव आज भी कुमाऊं क्षेत्र में जीवित हैं और इनका आयोजन बड़े धूमधाम से किया जाता है।

पार्वती के तपस्या और शिव से विवाह के बाद, नन्दा देवी का स्थान विशेष बन गया। कहा जाता है कि शिव और पार्वती ने हिमालय में तपस्या के लिए कड़ी मेहनत की और इसी के प्रतीक रूप में कुमाऊँ और गढ़वाल में उनकी प्रतिष्ठा स्थापित हुई। यहाँ तक कि उनकी उपस्थिति को महसूस करने के लिए लोग नन्दा देवी के मंदिरों की यात्रा करते हैं और उनकी पूजा करते हैं।


नंदा देवी के प्रमुख मंदिर

  1. नंदा देवी मंदिर, अल्मोड़ा
    अल्मोड़ा में स्थित नंदा देवी का यह मंदिर प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह मंदिर कुमाऊं क्षेत्र में नंदा देवी की प्रमुख पूजा स्थली है और यहाँ नंदा अष्टमी का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में देवी के साथ उनके अन्य रूपों की भी पूजा होती है, और इसे स्थानीय लोग गहरी आस्था से पूजते हैं।
  2. नंदा देवी मंदिर, नैनीताल
    नैनीताल में स्थित नंदा देवी का मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहाँ नंदा अष्टमी और नंदा महोत्सव के दौरान हजारों श्रद्धालु देवी के दर्शन और पूजा के लिए आते हैं। नैनीताल का यह मंदिर एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है, जहाँ नंदा देवी की प्रतिमा के दर्शन से भक्तों को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
  3. नंदा देवी मंदिर, जोशीमठ
    जोशीमठ में स्थित यह नंदा देवी का मंदिर जोशीमठ का प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहाँ हर बारह साल में नंदा देवी राजजात यात्रा का आयोजन होता है, जो जोशीमठ से लेकर नंदा देवी के पवित्र स्थल तक जाती है। यह यात्रा पूरे क्षेत्र में आस्था और उत्साह के साथ मनाई जाती है।
  4. नंदा देवी मंदिर, मुनस्यारी
    मुनस्यारी में स्थित नंदा देवी का यह मंदिर हिमालय की गोद में बसा हुआ है, और यहाँ से नंदा देवी पर्वत का दृश्य भी देखा जा सकता है। मुनस्यारी के लोग विशेष रूप से नंदा देवी की पूजा करते हैं, और यहाँ से नंदा अष्टमी पर्व का आयोजन किया जाता है।
  5. नंदा देवी मंदिर, बागेश्वर
    बागेश्वर में भी नंदा देवी का मंदिर स्थित है, जहाँ हर साल नंदा अष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। यह मंदिर स्थानीय भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जहाँ भक्त नंदा देवी की कृपा पाने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

नन्दा देवी न केवल एक देवी हैं बल्कि उन्हें समूचे क्षेत्र की रक्षक के रूप में देखा जाता है। जब लोग कठिनाइयों और विपत्तियों में होते हैं, तो नन्दा देवी से प्रार्थना करते हैं और उनकी शक्ति पर विश्वास करते हैं। माना जाता है कि देवी नन्दा अपने भक्तों को कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं और उनके जीवन में शांति का संचार करती हैं।

माँ नन्दा देवी के मंदिर अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, चमोली सहित कुमाऊँ और गढ़वाल में कई स्थानों में है। इन स्थानों पर नन्दा देवी की पूजा में विशेष आस्था रखी जाती है। हर वर्ष नन्दा अष्टमी के समय देवी की पूजा पूरे हर्षोल्लास के साथ होती है और श्रद्धालु देवी का आशीर्वाद पाने के लिए दूर-दूर से आते हैं।


नन्दा देवी राजजात यात्रा

उत्तराखंड की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में से एक है नन्दा देवी राजजात यात्रा। यह यात्रा हर बारह वर्षों में होती है और इसमें हजारों भक्त नन्दा देवी के सम्मान में शामिल होते हैं। राजजात यात्रा का आरंभ कर्णप्रयाग से होता है और यह हिमालय की दुर्गम घाटियों, नदियों और ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से होकर गुजरती है।

इस यात्रा में नन्दा देवी की प्रतिमा को विभिन्न देवी-देवताओं के प्रतीकों के साथ ले जाया जाता है। यह एक सामूहिक उत्सव होता है जिसमें न केवल उत्तराखंड बल्कि अन्य राज्यों और यहाँ तक कि विदेशों से भी लोग शामिल होते हैं। यात्रा के दौरान भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजन होते हैं। लोग नन्दा देवी से प्रार्थना करते हैं कि वे उनकी जिंदगी में सुख-शांति बनाए रखें।

राजजात यात्रा के प्रमुख स्थान:

  • नौटी गाँव: यात्रा का प्रारंभ बिंदु।
  • बेदनी बुग्याल: हरे-भरे बुग्याल जहाँ भक्त रुकते हैं और विशेष पूजा की जाती है।
  • होमकुंड: यात्रा का अंतिम पड़ाव जहाँ देवी को विदा दी जाती है।

नन्दा देवी और लोक आस्थाएँ

नन्दा देवी के प्रति गहरी आस्था रखने वाले लोग उन्हें कुमाऊँ और गढ़वाल के हर घर में पूजते हैं। उनके बारे में कई लोककथाएँ भी प्रचलित हैं, जिनमें से एक यह है कि नन्दा देवी ने एक बार अपने भक्तों को बचाने के लिए भयंकर राक्षस का संहार किया था।

इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि नन्दा देवी आज भी हिमालय में निवास करती हैं और अपने भक्तों को हर संकट से बचाती हैं। उनका नाम लेकर लोग कई कठिनाइयों में धैर्य प्राप्त करते हैं। उनके प्रति आस्था इतनी गहरी है कि उत्तराखंड के लोग उन्हें अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं।


सांस्कृतिक महत्व और विरासत

नन्दा देवी की पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक आयोजन है जो समाज को एकजुट करने का कार्य करता है। नन्दा देवी के प्रति आस्था पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। यहाँ तक कि कई लोकगीत और लोकनृत्य भी नन्दा देवी के सम्मान में गाए जाते हैं।

कुमाऊँनी और गढ़वाली समाज में नन्दा देवी को लेकर जो भक्ति है, वह अपने आप में अनोखी है। इस क्षेत्र के लोग उन्हें अपनी बेटी की तरह मानते हैं जो समय-समय पर अपने मायके आती हैं। देवी नन्दा को कुमाऊँनी में ‘माँ’ के रूप में भी संबोधित किया जाता है, और उनके प्रति भक्ति में आदर, स्नेह और आस्था का अद्भुत संगम है

उत्तराखंड के हर कोने में नन्दा देवी के प्रति आस्था का यह अद्भुत रूप देखने को मिलता है। चाहे नन्दा देवी का मंदिर हो या राजजात यात्रा, हर स्थान पर उनके प्रति प्रेम और श्रद्धा की गूंज सुनाई देती है। नन्दा देवी केवल एक धार्मिक देवी नहीं हैं, बल्कि वह एक सांस्कृतिक प्रतीक हैं जो उत्तराखंड के समाज को जोड़ती हैं और उसे अपनी अनोखी पहचान देती हैं।

उत्तरपीड़िया पर इस लेख के माध्यम से हम नन्दा देवी की कथा, उनके प्रति आस्था, और उनकी महान यात्रा की महत्ता को हर पाठक के हृदय तक पहुँचाना चाहेंगे, ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर सदा बनी रहे।

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🛕 Nanda Devi Temple & Rajjat Yatra (2026)-उत्तराखंड की नंदा देवी यात्रा की संपूर्ण जानकारी।

Nanda devi doli

घुमावारी: Nanda Devi – Uttarakhand ki Lok Devi

हिंदी:

नंदा देवी उत्तराखंड की जीवा जागराण और लोक संस्कृति का प्रतीक चिन्न है। उन्हें कुमाओं और गढ़वाल की लोक देवी के रूप में ग्राम की बेटी की तरह पूजा जाती है।

English:

Nanda Devi is the presiding folk goddess of Uttarakhand.

Kya koi tourist ja sakta hai? | Is there a live telecast?

Kayi bar local channels ya YouTube streams available hoti hain.
Sometimes via local channels or YouTube livestreams.

10. | Is there a yatra in 2025?

Nahi. She is considered the daughter of the mountains and a manifestation of Goddess Parvati. | How long is the Yatra?

Lagbhag 22–28 din.
About 22–28 days.

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