Uitspraken indira gandhi biography in hindi

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कामराज की भूमिका से इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने आर्थिक नीतियों में वामपंथी दृष्टिकोण अपनाया और कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाया। 1971 में भारत-पाक युद्ध में निर्णायक जीत के बाद, देश में अस्थिरता बढ़ी, जिसके चलते 1975 में उन्होंने आपातकाल लागू किया। 1977 के चुनाव में पहली बार पराजय झेलने के बाद, 1980 में वे पुनः सत्ता में लौटीं। अपने अंतिम वर्षों में, वे पंजाब में अलगाववादियों से निपटने में व्यस्त रहीं, जिसके परिणामस्वरूप 1984 में उनके अंगरक्षकों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई।

भारतीय राजनीति में भूमिका और कैरियर | Indira Gandhi

जैसा की ऊपर बताया जा चुका है कि इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को पंडित जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू के घर हुआ। वह उनकी एकमात्र संतान थीं। नेहरू परिवार की जड़ें कश्मीरी ब्राह्मण समुदाय से जुड़ी थीं। उनके दादा, मोतीलाल नेहरू, एक प्रतिष्ठित बैरिस्टर और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेता थे। जब इंदिरा का जन्म हुआ, उस समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो चुके थे।

उनका बचपन चुनौतियों से भरा रहा। उनकी माँ अक्सर बीमार रहती थीं, जिससे इंदिरा पर आत्मनिर्भरता और संवेदनशीलता का गहरा प्रभाव पड़ा। उनके पिता और दादा का राजनीतिक व्यस्तता के कारण घर में कम समय बिताना उनके लिए सामाजिक मेलजोल को कठिन बना देता था। यहां तक कि उनकी अपनी बुआओं, विशेष रूप से विजयलक्ष्मी पंडित के साथ भी मतभेद बने रहे, जो आगे चलकर राजनीतिक मतभेदों में परिवर्तित हो गए।

बचपन में ही इंदिरा ने ‘वानर सेना’ नामक एक युवा संगठन बनाया, जिसने विरोध प्रदर्शनों, झंडा जुलूसों और कांग्रेस के नेताओं के लिए गुप्त संदेशों के प्रसार में भूमिका निभाई। एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, उन्होंने 1930 के दशक में एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी दस्तावेज को पुलिस की नजरों से बचाकर अपने स्कूल बैग में छिपाकर बाहर निकाला था।

1936 में, उनकी माँ का तपेदिक से लंबी लड़ाई के बाद निधन हो गया, जब इंदिरा केवल 18 वर्ष की थीं। इसने उनके जीवन में एक स्थायी अस्थिरता ला दी। उन्होंने शांतिनिकेतन, बैडमिंटन स्कूल और ऑक्सफोर्ड सहित विभिन्न प्रतिष्ठित भारतीय और विदेशी संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की।

1930 के दशक के अंत में, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सोमरविल कॉलेज में अध्ययन के दौरान, वे लंदन स्थित भारतीय स्वतंत्रता समर्थक संगठन ‘इंडियन लीग’ से जुड़ीं। इसी समय, उनकी मुलाकात पारसी कांग्रेस कार्यकर्ता फिरोज गांधी से हुई। कुछ वर्षों बाद, 16 मार्च 1942 को इलाहाबाद के आनंद भवन में एक ब्रह्म-वैदिक समारोह में दोनों ने विवाह कर लिया।

विवाह के तुरंत बाद, भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, और सितंबर 1942 में ब्रिटिश अधिकारियों ने इंदिरा को गिरफ्तार कर बिना किसी आरोप के हिरासत में डाल दिया। उन्होंने 243 दिन जेल में बिताए और 13 मई 1943 को रिहा हुईं। 1944 में उन्होंने राजीव गांधी और दो वर्ष बाद संजय गांधी को जन्म दिया।

1947 में भारत विभाजन की अराजकता के दौरान, इंदिरा गांधी ने शरणार्थी शिविरों के संगठन में मदद की और पाकिस्तान से आए लाखों विस्थापितों के लिए चिकित्सा सेवाएँ सुनिश्चित करने में योगदान दिया। यह उनके सार्वजनिक जीवन का पहला बड़ा अवसर था, जहाँ उन्होंने मानवीय सहायता कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई।

बाद में, इंदिरा और फिरोज गांधी इलाहाबाद में बस गए, जहाँ फिरोज कांग्रेस पार्टी के समाचार पत्र और एक बीमा कंपनी से जुड़े। शुरूआती वर्षों में उनका वैवाहिक जीवन सहज था, लेकिन जब इंदिरा अपने पिता के पास नई दिल्ली चली गईं, तो उनके बीच दूरियां बढ़ने लगीं। प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू एकाकी जीवन जी रहे थे, और इंदिरा उनकी विश्वासपात्र, सचिव और देखभालकर्ता बन गईं। उनके बच्चे उनके साथ रहे, जबकि फिरोज़ से संबंध औपचारिक रूप से कायम रहा, लेकिन वे अलग-अलग रहने लगे।

1951 में भारत के पहले आम चुनावों के दौरान, इंदिरा ने अपने पिता और पति दोनों के चुनाव प्रचार का प्रबंधन किया। फिरोज़ ने रायबरेली से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के लिए नेहरू से सलाह नहीं ली थी। चुनाव जीतने के बाद, उन्होंने दिल्ली में अलग निवास का चयन किया। जल्द ही, उन्होंने राष्ट्रीयकृत बीमा उद्योग में एक बड़े घोटाले का खुलासा कर खुद को भ्रष्टाचार विरोधी नेता के रूप में स्थापित किया, जिससे नेहरू के एक करीबी सहयोगी और वित्त मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।

तनावपूर्ण परिस्थितियों में, इंदिरा और फिरोज़ का वैवाहिक संबंध औपचारिक रूप से अलग हो चुका था। हालांकि, 1958 में एक उपचुनाव के बाद, जब फिरोज को दिल का दौरा पड़ा, तो यह दोनों को फिर से करीब ले आया। इंदिरा कश्मीर में उनके स्वास्थ्य सुधार के दौरान उनके साथ रहीं। लेकिन 8 सितंबर 1960 को, जब इंदिरा अपने पिता के साथ विदेश यात्रा पर थीं, फिरोज गांधी का निधन हो गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष | Indira Gandhi

1959 और 1960 में, इंदिरा गांधी ने चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, क्योंकि वे मुख्य रूप से अपने पिता के सहयोगी और प्रशासनिक गतिविधियों की देखरेख कर रही थीं।

27 मई 1964 को नेहरू के निधन के बाद, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के अनुरोध पर इंदिरा गांधी ने चुनाव लड़ा और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में सरकार में शामिल हुईं। जब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के मुद्दे पर दक्षिण भारत में विरोध प्रदर्शन हुए, तो उन्होंने चेन्नई का दौरा किया। वहां उन्होंने सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की, स्थानीय समुदायों की चिंताओं को सुना और प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण में सहायता की। उनके सक्रिय हस्तक्षेप से वरिष्ठ मंत्रियों को संकोच महसूस हुआ, हालांकि उनके प्रयासों का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक लाभ कमाना नहीं था। उनके मंत्रालय के कार्यों में उनकी सीधी रुचि सीमित थी, लेकिन वे मीडिया प्रबंधन और सार्वजनिक छवि निर्माण में निपुण थीं।

1965 के बाद, कांग्रेस नेतृत्व में उत्तराधिकार को लेकर इंदिरा गांधी और उनके प्रतिद्वंद्वियों के बीच संघर्ष शुरू हुआ। उन्होंने रणनीतिक रूप से विभिन्न प्रदेश कांग्रेस संगठनों में उच्च जाति के नेताओं को हटाकर पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधियों को प्रमुख स्थान दिलाया। यह बदलाव न केवल सामाजिक प्रगति की दिशा में एक कदम था, बल्कि कांग्रेस के भीतर अपने विरोधियों को कमजोर करने की रणनीति भी थी। हालांकि, इन हस्तक्षेपों के चलते कई राज्यों में जातीय और क्षेत्रीय संघर्ष और अधिक उभरने लगे, जिससे कांग्रेस संगठन में नए तरह की चुनौतियाँ खड़ी हो गईं।

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, इंदिरा गांधी श्रीनगर सीमा क्षेत्र में मौजूद थीं। सेना ने उन्हें आगाह किया कि पाकिस्तानी घुसपैठिए तेजी से शहर के करीब पहुंच रहे हैं और उन्हें सुरक्षित स्थान, जैसे जम्मू या दिल्ली, जाने की सलाह दी। लेकिन उन्होंने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और स्थानीय प्रशासन से मुलाकात करने के साथ-साथ मीडिया का ध्यान आकर्षित करने में भी सक्रिय रहीं। उनके इस कदम को जनता और सैनिकों के बीच साहसिक नेतृत्व के रूप में देखा गया।

बाद में, जब ताशकंद में सोवियत मध्यस्थता के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, तो इसके कुछ ही घंटों बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का आकस्मिक निधन हो गया। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष के.

उन्होंने बचपन से ही महात्मा गांधी को अपने इलाहाबाद वाले घर में आते-जाते देखा था, इसलिए उनकी देश और यहाँ की राजनीति में रूचि थी.

1951-52 के लोकसभा चुनावोंमें इंदिरा गांधी ने अपने पति फिरोज गांधी के लिए बहुत सी चुनावी सभाएं आयोजित की और उनके समर्थन में चलने वाले चुनावी अभियान का नेतृत्व किया. गांधी ने वहाँ से हटने से मना कर दिया, इस बात ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खीचा, जिससे विश्व पटल पर उनकी पहचान वो भारत की सशक्त महिला के रूप में बनी.

  • केथरीन फ्रैंक ने अपनी किताब “दी लाइफ ऑफ़ इंदिरा नेहरु गाँधी” में लिखा हैं कि इंदिरा का पहला प्यार शान्ति निकेतन में उनके जर्मन टीचर थे, उसके बाद जवाहर लाल नेहरु के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई ( O.

    Mathai) से उनके निकट-संबंध रहे. मोरारजी देसाई और जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में उभरते जनता दल गठबंधन ने उन्हें हराया था.

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    इंदिरा के पिता जवाहरलाल एक  सुशिक्षित वकील और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय सदस्य थे. इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट रिसर्च(मुम्बई), इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, इंदिरा गाँधी ट्रेनिंग कॉलेज, इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेंटल साइंस इत्यादि कई शैक्षिक संस्थाएं हैं.

    देश की राजधानी दिल्ली के इंटरनेशनल एअरपोर्ट का नाम भी इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एअरपोर्ट हैं.

    इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी जी देश की प्रथम और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री थी, जो कि अपने राजनैतिक कौशल और सूझबूझ के लिए भी पहचानी जाती थी। उन्होंने उस समय देश का प्रधानमंत्री के रुप में नेतृत्व किया जब महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की इजाजत नहीं दी जाती थी।

    तमाम चुनौतियों का सामना कर वे न सिर्फ देश के पीएम के पद पर आसीन हुई, बल्कि अपनी राजनैतिक प्रतिभा से उन्होंने देश के लिए कई अहम फैसले लिए। इंदिरा गांधी जी के शासनकाल में ही बांग्लादेश का निर्माण हुआ।

    तो आइए जानते हैं अपनी राजनैतिक निष्ठुरता एवं दृढ़ता के लिए पहचाने जाने वाली इंदिरा गांधी जी के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातों के बारे में-

    भारत की लौह महिला इंदिरा गांधी जी का प्रेरणादायी सफर – Indira Gandhi Biography in Hindi

    एक नजर में –

    नाम (Name)इंदिरा फिरोज गांधी
    जन्म (Birthday)19 नवंबर, 1917, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश
    पिता (Father Name)जवाहर लाल नेहरू
    माता (Mother Name)कमला नेहरू
    पति (Husband Name)फिरोज गांधी
    बेटे (Son Name)राजीव गांधी, संजय गांधी
    बहु (Daughter In Law)सोनिया गांधी, मेनका गांधी
    नाती/नातिन राहुल गांधी, वरुण गांधी, प्रियंका गांधी
    शिक्षा (Education)
    • पुणे यूनिवर्सिटी,
    • शांति निकेतन,
    • पश्चिम बंगाल,
    • ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन,
    • सोमेरविल्ले कॉलेज, स्विटजरलैंड।
    मृत्यु (Death)31 अक्टूबर, 1984

    जन्म एवं प्रारंभिक जीवन –

    इंदिरा गांधी जी 19 नवंबर, 1917 को उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद शहर में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी और कमला नेहरू जी के यहां प्रियदर्शनी के रुप में जन्मीं थी।

    इंदिरा गांधी जी आर्थिक रुप से संपन्न, देश के जाने-माने राजनैतिक परिवार एवं देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत परिवार से संबंध रखती थी, उनके दादा मोतीलाल नेहरू और उनके पिता जवाहरलाल नेहरू जी दोनों ने ही देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    वहीं अपने परिवार को देख इंदिरा गांधी जी के अंदर देशभक्ति की भावना बचपन से ही आ गई थी। इंदिरा गांधी जी की माता का नाम कमला नेहरू था। वहीं जब इंदिरा गांधी 18 साल की थी, तब उनकी मां कमला नेहरू जी की तपेदिक बीमारी के कारण मृत्यु हो  गई।

    पढ़ाई-लिखाई –

    इंदिरा गांधी जी के पिता की राजनैतिक व्यस्तता और मां का स्वास्थ्य खराब होने के कारण इंदिरा गांधी जी को शुरुआत में शिक्षा का अनुकूल माहौल नहीं मिला थी, जिसकी वजह से उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई घर पर रहकर ही की थी।

    उनके पिता और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने उनकी पढ़ाई के लिए घर पर ही शिक्षकों का बंदोबस्त किया था।

    इसके कुछ समय बाद उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से अपनी हाईस्कूल की पढ़ाई की एवं फिर साल 1934-35 में इंदिरा गांधी जी ने शान्ति निकेतन में एडमिशन लिया और यहां पर ही उनका नाम रवीन्द्रनाथ टैगोर जी द्वारा प्रियदर्शिनी रखा गया।

    फिर इसके बाद वे लंदन चली गईं जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सोमेरविल्ले कॉलेज से अपनी आगे की पढ़ाई की। वहीं इसी दौरान उनकी मुलाकात फिरोज गांधी से भी हुई थी।

    अपनी पढ़ाई के दौरान इंदिरा गांधी ने कुछ खास हासिल नहीं किया, वे एक औसत दर्जे की विद्यार्थी थीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी।

    शादी एवं वैवाहिक जीवन –

    अपने अद्भुत राजनैतिक प्रतिभा के लिए पहचाने जाने वाली महान राजनेता इंदिरा गांधी जी जब अपने पढ़ाई के दिनों के दौरान नेशनल कांग्रेस की सदस्य बनी तभी उनकी मुलाकात फिरोज गांधी से हुई।

    उस दौरान फिरोज गांधी एक जर्नलिस्ट होने के साथ-साथ यूथ कांग्रेस के प्रमुख सदस्य भी थे, जो कि गुजरात के एक पारसी परिवार से थे।

    फिर दोनों की मुलाकातें प्रेम में बदल गईं और साल 1942 के दौरान उन्होंने फिरोज गांधी से शादी कर ली थी।

    हालांकि, इंदिरा गांधी के इस फैसले से उनके पिता जवाहर लाल नेहरू बिल्कुल भी सहमत नहीं थे, लेकिन बाद में अपनी बेटी की जिद के सामने उन्हें इन दोनों के रिश्ते को स्वीकार करना पड़ा था।

    वहीं इस शादी का सार्वजनिक तौर पर भी काफी विरोध हुआ था, क्योंकि उस दौरान इंटरकास्ट विवाह होना इतना आम नहीं था।  शादी के बाद इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी को 2 बच्चे हुए। पहले राजीव गांधी हुए और फिर इसके करीब ढाई साल बाद संजय गांधी का जन्म हुआ। वहीं साल 1960 में एक कार्डियक गिरफ्तारी के बाद फिरोज गांधी की मृत्यु हो गई थी।

    स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका –

    इंदिरा गांधी जी अंदर बचपन से ही देशभक्ति की भावना निहित थी। दरअसल, उनके पिता और दादा जी दोनों ही देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे।

    शुरू से ही देशप्रेम की भावना से प्रेरित परिवार में जन्म लेने से इंदिरा गांधी जी पर इसका गहरा असर पड़ा था। वे अपने पढ़ाई के दौरान ही इंडियन लीग की सदस्य बन गईं थीं और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद जब वे साल 1941 में भारत वापस लौंटी तो फिर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं।

    यही नहीं स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें जेल की यातनाएं भी सहनी पड़ी थी। इंदिरा गांधी एक देशप्रेमी थी। देशसेवा उनमे कूट-कूट के भरी थी। वह हमेशा कहती थी,

    “आपको गतिविधि के समय स्थिर रहना और विश्राम के समय क्रियाशील रहना सीख लेना चाहिये।”

    मतलब इंसान को कोई भी काम करते समय वो सचेत दिमाग से करना चाहिये। जीवन में क्रियाशील होने के साथ-साथ विश्राम भी जरुरी होता है ताकि हम हमारे दिमाग को और अधिक क्रियाशील बना सके।

    राजनैतिक करियर –

    इंदिरा गांधी जी का परिवार देश के सबसे प्रमुख एवं प्रसिद्ध राजनैतिक परिवारों में से एक है, इसलिए इंदिरा गांधी जी की भी शुरु से हीराजनीति की तरफ दिलचस्पी कोई हैरान करने वाली बात नहीं है।

    जब उनके पिता जी जवाहर लाल नेहरू जी स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रुप में नियुक्त हुए थे। तब से ही उनके घर में आजादी के महानायक महात्मा गांधी समेत कई बड़े राजनेताओं का उनके घर में आना-जाना था, जिसकी मेजबानी अक्सर इंदिरा गांधी जी ही करती थी।

    इस दौरान कई बार वे अपने पिता जी और राजनैतिक आगंतुकों द्वारा देश के विकास एवं बेहतर भविष्य के लिए हो रही बातचीत को भी ध्यानपूर्वक सुनती थी, जिसके चलते धीमे-धीमे उनका मन भी राजनीति की तरफ लगने लगा था।

    वहीं साल 1951 और 1952 के बीच हुए लोकसभा चुनावों के दौरान इंदिरा गांधी जी ने अपने पति फिरोज गांधी जी के कई चुनावी रैली और सभाओं का आयोजित करने की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाली थी।

    इसके बाद साल 1955 में इंदिरा गांधी जी को कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी के रुप में शामिल कर लिया था। यही नहीं इंदिरा गांधी जी की राजनैतिक समझ को परखते हुए नेहरू जी भी न सिर्फ अपनी बेटी इंदिरा से कई अहम मुद्दों पर राजनैतिक सलाह लेते थे, बल्कि उन पर अमल भी करते थे।

    इसके बाद साल 1959 में इंदिरा गांधी जी कांग्रेस की प्रेसीडेंट के रुप में नियुक्त हुईं।

    फिर साल 1964 में अपने पिता एवं देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी की मौत के बाद उन्हें लाल बहादुर शास्त्री जी के सरकार के समय सूचना और प्रसारण मंत्री बना दिया गया था।

    इस पद की जिम्मेदारी भी इंदिरा गांधी जी ने बखूबी निभाई एवं आकाशवाणी के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। साल 1965 में  भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान आकाशवाणी राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    इसके अलावा इस युद्ध के दौरान उन्होंने सकुशल नेतृत्व किया एवं सीमाओं पर जाकर भारतीय सेना के जवानों का हौसला भी बढ़ाया।

    देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रुप में –

    इंदिरा गांधी जी महिला सशक्तिकरण का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण रही हैं।

    उन्होंने प्रधानमंत्री के रुप में देश का 4 बार कुशल नेतृत्व किया एवं देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। साल 1966 से 1977 तक लगभग 11 साल वे लगातार 3 बार प्रधानमंत्री के पद पर कार्यरत रहीं।

    फिर साल 1980 से 1984 में उन्हें चौथी बार देश का प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ।

    आपको बता दें कि पहली बार 1966 में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मौत के बाद, कांग्रेस के अध्यक्ष के.

    थैचर भी इंदिरा की तरह ही बहादुर एवं सशक्त प्रधानमंत्री थी, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता हैं कि आतंकी हमले की आशंका होते हुए भी वो इंदिरा के अंतिम-संस्कार में आई थी. भारी संख्या में शरणार्थी होने की स्थिति ने इंदिरा गांधी को पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ आजामी लीग के स्वतंत्रता के संघर्ष को समर्थन देने के लिए प्रेरित किया.

    भारत ने सैन्य सहायता प्रदान की और पश्चिम पाकिस्तान के खिलाफ लड़ने के लिए सैनिकों को भी भेजा.

    इसका नाम बंदर ब्रिगेड रखा गया था जो कि बंदर सेना से प्रेरित था, जिसने महाकाव्य रामायण में भगवान राम की सहायता की थी. उनका इंदु से लेकर इंदिरा और फिर प्रधानमंत्री बनने तक का सफर ना केवल प्रेरणादायी हैं, बल्कि भारत में महिला सशक्तिकरण के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय भी हैं. मथाई के साथ उनकी निकटता का रिश्ता रहा। उसके बाद उनका नाम योग शिक्षक धीरेंद्र ब्रह्मचारी और अंत में कांग्रेस नेता दिनेश सिंह के साथ भी जुड़ा। लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद इंदिरा के विरोधी उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान नहीं पहुंचा पाए, और उनके आगे बढ़ने के रास्ते को रोक नहीं पाए।

    1980 में विमान दुर्घटना में संजय की मौत के बाद गांधी परिवार में तनाव बढ़ गया और 1982 तक इंदिरा और मेनका गांधी के बीच कड़वाहट काफी बढ़ गई। इस कारण इंदिरा ने मेनका को घर से निकल जाने को कहा, लेकिन मेनका ने बैग के साथ घर से निकलते हुए अपनी फोटो भी मीडिया को दे दी। और जनता के सामने भी यह घोषणा कर दी, उन्हें नहीं पता कि उन्हें घर से क्यों निकाला जा रहा है। वह अपनी मां से ज्यादा अपनी सास इंदिरा को मानती रही हैं। मेनका अपने बेटे वरुण को भी अपने साथ ले गई थीं और इंदिरा के लिए अपने पोते से दूर रहना काफी मुश्किल था।

    20वीं सदी में महिला नेताओं की संख्या कम ही थी, जिसमें इंदिरा का नाम भी शामिल है। लेकिन फिर भी इंदिरा की एक दोस्त थीं, मार्गरेट थैचर। इन दोनों की मुलाकात 1976 में हुई थी। और यह जानते हुए भी कि इंदिरा पर आपातकाल के दौरान तानाशाही का आरोप लगाया गया था, और वह अगला चुनाव हार गईं, मार्गरेट ने इंदिरा का साथ नहीं छोड़ा थैचर भी इंदिरा की तरह एक बहादुर और मजबूत प्रधानमंत्री थीं, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आतंकवादी हमले की आशंका के बावजूद वह इंदिरा के अंतिम संस्कार में पहुंची थीं। उन्होंने इंदिरा की असामयिक मौत पर राजीव को एक संवेदनशील पत्र भी लिखा था।

    जब इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं, तो कांग्रेस में एक ऐसा वर्ग था जो किसी महिला के हाथ में सत्ता को स्वीकार नहीं कर सकता था। फिर भी, इंदिरा ने उन सभी व्यक्तियों और पारंपरिक सोच के कारण राजनीति में आने वाली बाधाओं का साहस के साथ सामना किया।

    इंदिरा ने देश में कृषि के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इसके लिए उन्होंने कृषि से संबंधित नई योजनाएं बनाई और कार्यक्रम आयोजित किए। इनमें विभिन्न फसलों की खेती और खाद्य पदार्थों का निर्यात करना जैसे मुख्य उद्देश्य शामिल थे। उनका लक्ष्य देश में रोजगार की समस्या को कम करना और खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना था। यहीं से हरित क्रांति की शुरुआत हुई।

    इंदिरा गांधी ने भारत को एक सक्षम आर्थिक और औद्योगिक राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल के दौरान, भारत ने विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में भी काफी प्रगति की। इसी समय, किसी भारतीय द्वारा चांद पर कदम रखना देश के लिए गर्व का क्षण था।

    इंदिरा गाँधी के नाम पर विरासत (Heritage in the name of Indira Gandhi):

    नई दिल्ली में उनके घर को एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है, जिसे इंदिरा गांधी स्मारक संग्रहालय के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा, उनके नाम पर कई मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भी स्थापित किए गए हैं।

    इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (अमरकंटक), इंदिरा गांधी महिला तकनीकी विश्वविद्यालय, और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (रायपुर) जैसे कई विश्वविद्यालय हैं। इसके साथ ही, इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान संस्थान (मुंबई), इंदिरा गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदिरा गांधी प्रशिक्षण महाविद्यालय, इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, और इंदिरा गांधी दंत चिकित्सा संस्थान जैसे कई शैक्षणिक संस्थान भी मौजूद हैं।

    देश की राजधानी दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भी इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। देश के सबसे प्रसिद्ध समुद्री पुल पाम बान ब्रिज का नाम भी इंदिरा गांधी रोड ब्रिज है। इसके अलावा, देश भर के कई शहरों में कई सड़कों और चौराहों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया है।

    इंदिरा गांधी जी को पुरस्कार (Indira Gandhi Ji Awarded):

    इंदिरा गांधी को 1971 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। 1972 में उन्हें बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए मैक्सिकन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फिर 1973 में द्वितीय वार्षिक पदक, एफएओ (2nd Annual Medal, FAO) और 1976 में नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा हिंदी में साहित्य वाचस्पति पुरस्कार दिया गया।

    इंदिरा को कूटनीति के क्षेत्र में बेहतरीन काम करने के लिए इटली के इस्लबेला डी’एस्टे पुरस्कार के अलावा 1953 में यूएसए में मदर्स अवार्ड भी दिया गया था। उन्हें येल विश्वविद्यालय से हॉलैंड मेमोरियल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

    1967 और 1968 में फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के सर्वेक्षणों के अनुसार, वह फ्रांसीसी लोगों द्वारा सबसे अधिक पसंद की जाने वाली महिला राजनीतिज्ञ थीं।

    1971 में यूएसए के विशेष गैलप पोल सर्वेक्षण के अनुसार, वह दुनिया की सबसे सम्मानित महिला थीं। इसी वर्ष अर्जेंटीना सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ एनिमल्स ने भी उन्हें डिप्लोमा ऑफ ऑनर से सम्मानित किया।

    इंदिरा गांधी का जीवन दुनिया में भारत की महिलाओं को एक सशक्त महिला के रूप में पहचान दिलाने वाला रहा है। हालांकि उनके व्यक्तित्व को दो पक्षों से समझा जाता रहा है और उनके समर्थकों के साथ-साथ विरोधियों की संख्या भी काफी बड़ी है। उनके लिए लिए गए कई राजनीतिक और सामाजिक फैसले भी अक्सर चर्चा का विषय रहते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारत ने विकास के कई आयाम स्थापित किए थे और उन्होंने विश्व पटल पर भारत की छवि को बदला था।

    यह जीवनी सार्वजनिक स्रोतों में उपलब्ध जानकारी पर आधारित है और इसे पूरी तरह से सटीक नहीं माना गया है। उल्लेखित विवरण केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए हैं, और पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे तथ्यों की पुष्टि अपने स्वयं के शोध और विश्वसनीय स्रोतों के माध्यम से करें।


    वित्त मंत्री को तब जवाहर लाल नेहरु का करीबी माना जाता था.

    इस तरह फिरोज राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की मुख्य धारा में सामने आये, और अपने थोड़े से समर्थकों के साथ उन्होंने केंद्र सरकार के साथ अपना संघर्ष ज़ारी रखा, लेकिन 8 सितम्बर 1960 को फिरोज की हृदयघात से मृत्यु हो गई.

    कांग्रेस प्रेसिडेंट के रूप में इंदिरा (Indira as Congress President)

    1959 में इंदिरा को इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी का प्रेसिडेंट चुना गया था.

    ये दोनों 1976 में मिली थी.  मंदिर परिसर में हजारों नागरिकों की उपस्थिति के बावजूद, इंदिरा गांधी ने सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार करने के लिए पवित्र मंदिर में जाने का आदेश दे दिया. उस दौरान ही पहली बार एक भारतीय ने चाँद पर कदम रखा था,जो कि देश के लिए काफी गर्व का विषय था.

  •  इंदिरा गांधी के नाम पर धरोहर

    नई दिल्ली में उनके घर को म्यूजियम बनाया गया हैं, जिसे इंदिरा गांधी मेमोरियल म्यूजियम के नाम से जाना जाता हैं.

    पश्चिमी पाकिस्तानी सशस्त्र बल ने भारत के सामने आत्मसमर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर किए, जिससे एक नए देश का जन्म हुआ, जिसका नाम बांग्लादेश रखा गया.

    FAQ

    Q- इंदिरा गांधी का जन्म कहां और कब हुआ?

    Ans- इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को उत्तर प्रदेश के प्रायगराज में हुआ।

    Q- इंदिरा गांधी का राजनीतिक सफर कब शुरू हुआ?

    Ans- इंदिरा गांधी का राजनीतिक सफर 1951 से शुरू हुआ।

    Q- क्यों मारी गई थी इंदिरा गांधी को गोली?

    Ans- ऑपरेशन ब्लू स्टार के कारण सिख गार्ड ने मारी थी इंदिरा गांधी को गोली।

    Q- कब हुई थी इंदिरा गांधी की हत्या?

    Ans- 31 अक्टूबर 1984 को हुई इंदिरा गांधी की हत्या।

    Q- इंदिरा गांधी की मृत्यृ के बाद कौन बना प्रधानमंत्री?

    Ans- इंदिरा गांधी की मृत्यृ के बाद राजीव गांधी को बनाया गया प्रधानमंत्री।

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    Categories जीवन परिचय

    इंदिरा गांधी का जीवन परिचय Indira Gandhi Biography in Hindi

    भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में पहचान बनाने वाली इंदिरा गांधी की जीवनी बेहद दिलचस्प है। इंदु से इंदिरा और फिर प्रधानमंत्री बनने का उनका सफर न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि भारत में महिला सशक्तिकरण के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी है। इंदिरा गांधी 1966-77 और 1980-84 तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं और 20वीं सदी की राजनीति में सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली महिलाओं में से एक मानी जाती हैं। उनके पिता जवाहरलाल नेहरू थे, जो स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री (1947-64) रहे।

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    इंदिरा गांधी का संक्षिप्त विवरण (Indira Gandhi Brief Summary):

    जन्म दिन : 19 नवंबर 1917

    आयु : 66 साल

    जन्म का स्थान : इलाहाबाद

    शिक्षा   : विश्वविद्यालय शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की

    पिता : जवाहरलाल नेहरू

    माता : कमला नेहरू

    व्यवसाय : राजनीतिज्ञ

    पुत्र : संजय गाँधी और राजीव गाँधी

    राष्ट्रीयता : भारतीय

    देश : भारत

    मृत्यु: 31 अक्टूबर 1984

    इंदिरा गांधी का जीवन परिचय (Indira Gandhi Biography in Hindi):

    इंदिरा गाँधी की वानर सेना (Indira Gandhi Vanar Sena):

    इंदिरा जी जब 12 साल की थीं, तब उन्होंने कुछ बच्चों के साथ मिलकर वानर सेना बनाई और उसका नेतृत्व किया। इस समूह का नाम बंदर ब्रिगेड रखा गया, जो कि महाकाव्य रामायण में भगवान राम की मदद करने वाली बंदर सेना से प्रेरित था। बच्चों के साथ मिलकर उन्होंने भारत की आज़ादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में इस समूह में 60,000 युवा क्रांतिकारी भी शामिल हुए थे, जिन्होंने कई आम लोगों को संबोधित किया, झंडे बनाए, संदेश दिए और प्रदर्शनों की जानकारी जनता तक पहुंचाई। ब्रिटिश शासन के दौरान यह सब करना बहुत जोखिम भरा था, लेकिन इंदिरा आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए उत्साहित थीं।

    इंदिरा गाँधी की शिक्षा (Indira Gandhi Education): 

    इंदिरा ने पुणे विश्वविद्यालय से मैट्रिकुलेशन किया और पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन से कुछ शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद, वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सोमरविले कॉलेज में अध्ययन करने के लिए स्विट्जरलैंड और लंदन गईं। 1936 में, उनकी मां कमला नेहरू तपेदिक से बीमार हो गईं, और इंदिरा ने अपनी पढ़ाई के दौरान अपनी बीमार मां के साथ कुछ महीने स्विट्जरलैंड में बिताए। कमला की मृत्यु के समय जवाहरलाल नेहरू एक भारतीय जेल में थे।

    इंदिरा गाँधी का पारिवारिक जीवन (Indira Gandhi Family Life):

    जब इंदिरा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्य बनीं, तो उनकी मुलाकात फिरोज गांधी से हुई। फिरोज गांधी उस समय पत्रकार और युवा कांग्रेस के अहम सदस्य थे। इंदिरा ने अपने पिता की असहमति के बावजूद 1941 में फिरोज गांधी से शादी कर ली। इंदिरा ने पहले राजीव गांधी को जन्म दिया और दो साल बाद संजय गांधी को। इंदिरा की शादी फिरोज गांधी से हुई थी, लेकिन फिरोज और महात्मा गांधी के बीच कोई रिश्ता नहीं था। फिरोज आजादी की लड़ाई में उनके साथ थे, लेकिन वह पारसी थे, जबकि इंदिरा हिंदू थीं। और उस समय अंतरजातीय विवाह इतना आम नहीं था। दरअसल, इस जोड़ी को सार्वजनिक रूप से पसंद नहीं किया जा रहा था, इसलिए महात्मा गांधी ने इस जोड़ी का समर्थन किया और यह सार्वजनिक बयान दिया, जिसमें मीडिया से उनका अनुरोध भी शामिल था, “मैं अपमानजनक पत्रों के लेखकों के प्रति अपना गुस्सा कम करना चाहता हूं। मैं आपको इस शादी में नवविवाहितों को आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित करता हूं” और ऐसा कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने फिरोज और इंदिरा को राजनीतिक छवि बनाए रखने के लिए गांधी लगाने का सुझाव दिया था।

    आज़ादी के बाद, इंदिरा गांधी के पिता जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने, और इस दौरान इंदिरा अपने पिता के साथ दिल्ली आ गईं। उनके दोनों बेटे उनके साथ थे, लेकिन फ़िरोज़ ने इलाहाबाद में रहने का निर्णय लिया, क्योंकि वह उस समय मोतीलाल नेहरू द्वारा शुरू किए गए समाचार पत्र नेशनल हेराल्ड में संपादक के रूप में कार्यरत थे।

    इंदिरा गाँधी का राजनीतिक करियर (Indira Gandhi Political Career):

    नेहरू परिवार भारत की केंद्र सरकार में एक प्रमुख परिवार था, इसलिए इंदिरा का राजनीति में प्रवेश कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। उन्होंने अपने बचपन में महात्मा गांधी को अपने इलाहाबाद के घर में आते-जाते हुए देखा था, जिससे उनको देश और देश की राजनीति में रुचि हुई।

    1951-52 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपने पति फिरोज गांधी के लिए कई चुनावी सभाएं आयोजित कीं और उनके समर्थन में चुनाव अभियान का नेतृत्व किया। उस समय फिरोज रायबरेली से चुनाव लड़ रहे थे। जल्द ही फिरोज सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रमुख चेहरा बन गए। उन्होंने कई भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर किया, जिसमें बीमा कंपनी और वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी का नाम भी शामिल था। उस समय वित्त मंत्री को जवाहरलाल नेहरू का करीबी माना जाता था।

    इस तरह फिरोज राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में शामिल हो गए और अपने कुछ समर्थकों के साथ उन्होंने केंद्र सरकार से अपना संघर्ष जारी रखा, लेकिन 8 सितंबर 1960 को दिल का दौरा पड़ने से फिरोज की मृत्यु हो गई।

    इंदिरा गाँधी कांग्रेस अध्यक्ष (Indira Gandhi as Congress President):

    1959 में इंदिरा गांधी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष चुना गया। उन्हें जवाहरलाल नेहरू की मुख्य सलाहकार टीम में शामिल किया गया। 27 मई 1964 को नेहरू की मृत्यु के बाद, इंदिरा गांधी ने चुनाव में भाग लेने का निर्णय लिया और उन्होंने जीत हासिल की। लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया।

    इंदिरा गाँधी का भारत के प्रधानमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल (Indira Gandi First Term as Prime Minister of India):

    11 जनवरी 1966 को ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद, उन्होंने अंतरिम चुनावों में बहुमत हासिल किया और प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला। प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियाँ रियासती खजाने को खत्म करने के प्रस्तावों का पारित होना, 1969 में भारत के चौदह सबसे बड़े बैंकों के साथ-साथ प्रमुख राज्यों के पूर्व शासकों और चार प्रीमियम तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करना था। उन्होंने देश में खाद्य पदार्थों को हटाने में रचनात्मक कदम उठाए और 1974 में भारत के पहले भूमिगत विस्फोट के साथ देश को परमाणु युग में ले गए।

    1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में इंदिरा गाँधी की भूमिका (Indira Gandhi Roll in India-Pakistan War in 1971):

    दरअसल, 1971 में इंदिरा गांधी को एक बहुत बड़े संकट का सामना करना पड़ा था। युद्ध तब शुरू हुआ जब पश्चिमी पाकिस्तान की सेनाएं बंगाली पूर्वी पाकिस्तान में उनके स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए गईं। उन्होंने 31 मार्च को भीषण हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन प्रतिरोध जारी रहा और लाखों शरणार्थी पड़ोसी देश भारत में घुसने लगे।

    इन शरणार्थियों की देखभाल में भारत में संसाधनों का संकट था, जिसके कारण देश के भीतर तनाव भी काफी बढ़ गया। हालांकि भारत ने वहां स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे सेनानियों का समर्थन किया। स्थिति तब और जटिल हो गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चाहते थे कि अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा हो, जबकि चीन पहले से ही पाकिस्तान को हथियार दे रहा था और भारत ने “शांति, मैत्री और सहयोग की संधि” पर हस्ताक्षर किए।

    पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में नागरिकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनाया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 10 मिलियन पूर्वी पाकिस्तानी नागरिक देश छोड़कर भारत में शरण लेने के लिए चले गए। शरणार्थियों की बड़ी संख्या ने इंदिरा गांधी को पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ़ आज़ादी के लिए आज़मी लीग के संघर्ष का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। भारत ने सैन्य सहायता प्रदान की और पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ़ लड़ने के लिए सेना भी भेजी।

     जब 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारत के ठिकानों पर बमबारी की और युद्ध शुरू हुआ, तो इंदिरा ने बांग्लादेश की आज़ादी के महत्व को समझा और वहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों को शरण देने और बांग्लादेश के निर्माण का समर्थन करने की घोषणा की। 9 दिसंबर को निक्सन ने अमेरिकी जहाजों को भारत भेजने का आदेश दिया, लेकिन 16 दिसंबर को पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

    अंततः 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पश्चिमी पाकिस्तान बनाम पूर्वी पाकिस्तान युद्ध समाप्त हो गया। पश्चिमी पाकिस्तानी सशस्त्र बलों ने भारत के समक्ष आत्मसमर्पण के कागजात पर हस्ताक्षर किए, जिससे एक नए देश का जन्म हुआ, जिसका नाम बांग्लादेश रखा गया। पाकिस्तान के खिलाफ 1971 के युद्ध में भारत की जीत ने इंदिरा गांधी की एक चतुर राजनीतिक नेता के रूप में लोकप्रियता को दर्शाया। इस युद्ध में पाकिस्तान का घुटने टेकना न केवल बांग्लादेश और भारत के लिए, बल्कि इंदिरा के लिए भी एक जीत थी। इसी वजह से युद्ध की समाप्ति के बाद इंदिरा ने घोषणा की कि मैं किसी भी दबाव में काम करने वाली व्यक्ति नहीं हूँ, चाहे वह कोई व्यक्ति हो या देश।

    इंदिरा गाँधी का आपातकाल लागू करना (Imposition of Emergency):

    1975 में विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बढ़ती महंगाई, अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के खिलाफ इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। उसी वर्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि इंदिरा गांधी ने पिछले चुनाव में अवैध तरीकों का सहारा लिया था, और यह मौजूदा राजनीतिक हालात में आग में घी डालने जैसा था। इस फैसले के तहत इंदिरा को तुरंत अपनी सीट खाली करने का आदेश दिया गया, जिससे लोगों में उनके प्रति गुस्सा और बढ़ गया। 26 जून 1975 को इस्तीफा देने के बजाय, श्रीमती गांधी ने “देश में अशांत राजनीतिक स्थिति के कारण” आपातकाल की घोषणा कर दी।

    आपातकाल के दौरान उन्होंने अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया, और इस समय नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया था। प्रेस पर भी कड़ी सेंसरशिप लागू की गई थी। गांधीवादी समाजवादी जयप्रकाश नारायण और उनके समर्थकों ने भारतीय समाज में बदलाव लाने के लिए छात्रों, किसानों और मजदूर संगठनों को एक ‘संपूर्ण अहिंसक क्रांति’ में एकजुट करने की कोशिश की। बाद में नारायण को भी गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया। 1977 की शुरुआत में इंदिरा ने आपातकाल को समाप्त करते हुए चुनावों की घोषणा की, लेकिन उस समय जनता ने आपातकाल और नसबंदी अभियान के कारण इंदिरा का समर्थन नहीं किया।

    इंदिरा गाँधी का सत्ता छिनना और विपक्ष की भूमिका में आना (Snatching Power and Role of Opposition):

    माना जाता है कि आपातकाल के दौरान उनके छोटे बेटे संजय गांधी ने देश को पूरी तरह से चलाने की कोशिश की और झुग्गी-झोपड़ियों को सख्ती से हटाने का आदेश दिया। इसके अलावा, एक बेहद अलोकप्रिय नसबंदी कार्यक्रम ने इंदिरा को विपक्ष में बदल दिया था। फिर भी, 1977 में इंदिरा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि उन्होंने विपक्ष को तोड़ दिया है और चुनाव की मांग की। मोरारजी देसाई और जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में उभरते जनता दल गठबंधन ने उन्हें हरा दिया। पिछली लोकसभा में 350 सीटों की तुलना में कांग्रेस केवल 153 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रही।

    इंदिरा गाँधी का भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल (Indira Gandhi Second Term as Prime Minister of India):

    इंदिरा ने जनता पार्टी के सहयोगियों के बीच चल रहे आंतरिक संघर्ष का फ़ायदा उठाया। उस समय, जनता पार्टी की सरकार ने इंदिरा गांधी को संसद से बाहर निकालने के प्रयास में उनकी गिरफ़्तारी का आदेश दिया। हालांकि, यह रणनीति उनके विरोधियों के लिए विनाशकारी साबित हुई और इससे इंदिरा गांधी को व्यापक सहानुभूति मिली। अंततः, 1980 के चुनावों में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और इंदिरा गांधी एक बार फिर भारत की प्रधानमंत्री बनीं। वास्तव में, उस समय जनता पार्टी की स्थिति भी स्थिर नहीं थी, जिसका पूरा फ़ायदा कांग्रेस और इंदिरा ने उठाया।

    1981 के सितंबर में, एक सिख आतंकवादी समूह “खालिस्तान” की मांग कर रहा था, और यह समूह अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में घुस गया था। मंदिर परिसर में हजारों नागरिकों की मौजूदगी के बावजूद, इंदिरा गांधी ने सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत पवित्र मंदिर में जाने का आदेश दिया।

    इंदिरा गाँधी की हत्या (Indira Gandhi Assassination):

    31 अक्टूबर 1984 को गांधी जी के अंगरक्षक सतवंत सिंह और बंट सिंह ने सवर्ण मंदिर में हुए नरसंहार का बदला लेने के लिए कुल 31 गोलियां मारकर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। यह घटना नई दिल्ली के सफदरगंज रोड पर हुई थी।

    इंदिरा गाँधी के बारे में रोचक तथ्य (Interesting Facts about Indira Gandhi):

    माना जाता है कि इंदिरा गांधी अपनी छवि को बनाए रखने पर बहुत ध्यान देती थीं। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वे श्रीनगर में छुट्टियां मना रही थीं। सुरक्षा अधिकारी द्वारा यह बताए जाने के बावजूद कि पाकिस्तान उनके होटल के बहुत करीब आ गया है, वे यह जानते हुए भी वहीं रुकी रहीं। गांधी का वहां से हटने से इनकार करना, इस बात ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा, जिसके कारण उन्हें विश्व मंच पर भारत की सशक्त महिला के रूप में पहचान मिली।

    कैथरीन फ्रैंक अपनी किताब “द लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधी” में लिखती हैं कि इंदिरा का पहला प्यार शांतिनिकेतन में उनके जर्मन शिक्षक थे, इसके बाद जवाहरलाल नेहरू के सचिव एम.ओ.

    उनके राजनैतिक मतभेद के बारें में अनेक जगहों एंव किताबों में लिखा हुआ मिलता है. इस पूरे घटनाक्रम से तात्कालिक परिस्थितयों में   इंदिरा गांधी की राजनीतिक छवि भी खराब हो गई थी.

    इंदिरा गाँधीहत्या (Assassination)

    31 अक्टूबर  1984 को गांधी के बॉडीगार्ड सतवंत सिंह और बिंत सिंह ने सवर्ण मंदिर में हुए नरसंहार के बदले में कुल 31 बुलेट मारकर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी.

    उन्होंने 31 मार्च को भयानक हिंसा के खिलाफ बात की, लेकिन प्रतिरोध  जारी रहा और लाखों शरणार्थियों ने पड़ोसी देश भारत में प्रवेश करना शुरू कर दिया.

    इन शरणार्थियों की देखभाल में भारत में संसाधनों का संकट होने लगा, इस कारण देश के भीतर भी तनाव काफी बढ गया. उन्होंने देश में खाद्य सामग्री को दूर करने में रचनात्मक कदम उठाए और देश को परमाणु युग में 1974 में भारत के  पहले भूमिगत विस्फोट के साथ नेतृत्व किया.

    भारत-पकिस्तान युद्ध 1971 में इंदिरा गाँधी की भूमिका  (Indo-Pakistan War in 1971)

    वास्तव में 1971 में इंदिरा को बहुत बडे  संकट का सामना करना पड़ा.

    फिरोज गाँधी तब एक पत्रकार और यूथ कांग्रेस के महत्वपूर्ण सदस्य थे. इसमें विविध फसलें उगाना और खाध्य सामग्री को निर्यात करना जैसे मुख्य उद्देश्य शामिल थे. कामराज जी ने इंदिरा गांधी जी को देश के प्रधानमंत्री बनने की सलाह दी।

    हालांकि इस दौरान कांग्रेस पार्टी के जाने-माने एवं कद्दावर नेता मोरारजी देसाई खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, फिर पार्टी द्धार वोटिंग के बाद इंदिरा गांधी जी को देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रुप में नियुक्त किया गया।

    इस तरह 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी जी ने देश की प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ली। फिर इसके करीब एक साल बाद 1967 में हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी जी फिर से पीएम उम्मीदवार के रुप में खड़ी हुईं।

    इस चुनाव में वे ज्यादा बहुमत तो हासिल नहीं कर पाईं लेकिन चुनाव जीतने में सफल रहीं और फिर से उन्हें देश के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला। हालांकि, इस दौरान मोरार जी देसाई और इंदिरा गांधी जी को लेकर कांग्रेस पार्टी के अंदर कई आपसी मतभेद हो गए।

    दरअसल, पार्टी के कुछ बड़े नेता जहां इंदिरा गांधी जी का समर्थन कर रहे थे तो कुछ मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री के रुप में चाहते थे, जिसके चलते साल 1969 में कांग्रेस पार्टी दो अलग-अलग गुटों में बंट गई।

    प्रधानमंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान इंदिरा गांधी जी ने देश के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए। उन्होंने साल 1969 में भारत के 14 सबसे बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    1971 में इंदिरा गांधी जी द्वारा मध्याविधि चुनाव की घोषणा –

    साल 1971 में इंदिरा गांधी जी ने कांग्रेस की बिगड़ती हालत को देख एवं देश में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करने के लिए मध्याविधि चुनाव को घोषणा कर विपक्ष को बड़ा झटका दे दिया।

    अपनी राजनैतिक कौशल के लिए पहचानी जानी वाली इंदिरा गांधी जी ”देश से गरीबी हटाओ” के नारे के साथ इस चुनाव में उतरीं और देश में चुनावी महौल बनाकर 518 में से 352 सीटें हासिल कर अपनी सरकार बनाने में सफल रहीं।

    इस चुनाव के बाद देश में इंदिरा गांधी जी की स्थिति काफी मजबूत हो गई थी।

    भारत-पाक के युद्ध में का सकुशल नेतृत्व

    इंदिरा गांधी जी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 1971 में  बांग्लादेश के मुद्दे को लेकर जब भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, उस दौरान देश में काफी तनाव बढ़ गया और इंदिरा गांधी जी को भी काफी बड़े संकट से जूझना पड़ा।

    हालांकि इस दौरान उन्होंने सूझबझ और समझदारी से काम लेते हुए देश का सकुशल नेतृत्व किया। आपको बता दें कि युद्ध के दौरान जब स्थिति और भी ज्यादा गंभीर हो गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाक का समर्थन देना शुरु कर दिया और चीन पहले से ही पाकिस्तान को हथियार सप्लाई कर उसका समर्थन कर रहा था।

    इसके बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व ने भारत ने सोवियत संघ के साथ ”शांति, दोस्ती और सहयोग की संधि” पर हस्ताक्षर किए।

    इस दौरान पूर्वी पाकिस्तान से भारी संख्या में शरणार्थियों ने भारत में प्रवेश करना शुरु कर दिया।

    इस दौरान इंदिरा गांधी जी ने न सिर्फ लाखों शरणार्थियों को भारत में शरण दी बल्कि पश्चिमी पाकिस्तान से लड़ने के लिए सैन्य सहायता भी प्रदान की।

    इंस दौरान इंदिरा गांधी जी ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता के महत्व को समझते हुए बांग्लादेश के निर्माण को समर्थन देने की घोषणा की। वहीं इसके बाद 16 दिसंबर को पश्चिमी पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके चलते बांग्लादेश का निर्माण हुआ।

    इस युद्ध में भारत की जीत से इंदिरा गांधी जी की छवि एक लोकप्रिय राजनेता के रुप में बन गई एवं उनकी स्थिति देश में इतनी अधिक मजबूत हो गई कि वे स्वतंत्र फैसले लेने के लिए भी सक्षम हो गईं।

    वहीं इस युद्ध के बाद इंदिरा गांधी जी ने खुद को पूरी तरह देश की सेवा और विकास में समर्पित कर दिया।

    उन्होंने साल 1972 में बीमा और कोयला उद्योग का भी राष्ट्रीयकरण कर जनता का ध्यान अपनी तरफ खींचा एवं एक सक्रिय एवं कुशल राजनेता के रुप में समाज कल्याण, अर्थ जगत समेत भूमि सुधार के लिए कई सुधार काम किए।

    देश में आपातकाल लागू करना एवं सत्ता छिनना –

    इंदिरा गांधी जी ने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान देश के विकास के लिए कई नई योजनाएं लागू की थी एवं कई काम करवाए थे, लेकिन 1975 के दौरान देश में महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार, की समस्याए काफी बढ़ गई थी, जिसके चलते कई विपक्षी दलों और देश की जनता ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन किए थे।

    वहीं इसी दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इंदिरा गांधी जी के चुनाव से संबंधित एक केस पर फैसला सुनाते हुए उनका चुनाव रद्द करने के साथ 6 साल तक उनका चुनाव लड़ने से भी बैन लगा दिया।

    जिसके बाद देश के राजनैतिक हालात और भी अधिक खराब हो गए और लोगों के अंदर उनके खिलाफ और अधिक प्रतिशोध भर गया।

    फिर 26 जून, 1975 के दिन इंदिरा गांधी जी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की बजाय देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। जिसके तहत उन्होंने मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण समेत तमाम विपक्षी नेता और उनके राजनैतिक दुश्मनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

    यही नहीं आपातकाल के दौरान आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकार भी छीन लिए गए एवं मीडिया पर भी प्रतिबंध लगा दिया, रेडियो अखबार और टीवी पर सेंसर लगा दिए गए।

    फिर इसके बाद साल 1977 की शुरुआत में इंदिरा गांधी जी ने आपातकाल को हटाते हुए चुनाव की घोषणा कर दी।

    इस दौरान राजनैतिक कैदियों की रिहाई कर दी गईं एवं फिर से मीडिया से बैन हटा दिया था एवं जनता को मौलिक अधिकार वापस देने के साथ राजनैतिक सभाओं और चुनाव प्रचार की आजादी दे गई।

    हालांकि इस चुनाव के दौरान आपातकाल और नसबंदी अभियान के चलते आम जनता में उनके खिलाफ काफी क्रोध बढ़ गया था।

    वहीं उस दौरान जनता ने आपातकाल और नसबंदी अभियान के बदले में इंदिरा गांधी जी को समर्थन नहीं किया। जिसके परिणाम स्वरुप, मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ”जनता पार्टी” एक सशक्त एवं मजबूत होकर सामने आईं एवं चुनाव में 542 में 330 सीटें हासिल कीं, जबकि इंदिरा गांधी जी के खेमे में सिर्फ 153 सीटें ही आईं।

    जनता पार्टी की आंतरिक कलह और इंदिरा गांधी जी की सत्ता में फिर से वापसी:

    साल 1979 में जनता पार्टी के अंदर आंतरिक कलह की वजह से यह सरकार गिर गई जिसका फायदा इंदिरा गांधी जी को हुआ।

    दरअसल, जनता पार्टी के राजनेताओं ने इंदिरा गांधी जी को संसद से बाहर निकालने के मकसद से इंदिरा गांधी जी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे एवं भ्रष्टाचार के आरोप में इंदिरा गांधी जी को जेल भी भेजा गया था।

    वहीं जनता पार्टी की यह रणनीति और इंदिरा गांधी जी के प्रति ऐसा रवैया जनता को रास नहीं आया और फिर भारी संख्या में आम जनता इंदिरा गांधी जी के समर्थन में आ गई और फिर साल 1980 के चुनाव के दौरान कांग्रेस ने 592 में से 353 सीटें हासिल की और इंदिरा गांधी ने बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और  एक बार फिर उन्हें देश के प्रधानमंत्री के रुप में देश का नेतृत्व करने का मौका मिला।

    नाम पर धरोहर –

    नई दिल्ली में उनके नाम पर इंदिरा गांधी मेमोरियल म्यूजियम बना हुआ है।

    इसके अलावा इंदिरा गांधी जी के नाम पर इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी(अमरकंटक), इंदिरा गांधी टेक्निकल यूनिवर्सिटी फॉर वीमेन, इंदिरा गांधी इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी, इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू), इंदिरा गांधी इंस्टीटयूट ऑफ डेंटल साइंस समेत कई शिक्षण संस्थान हैं।

    यही नहीं देश के कई शहरों में बहुत सी सड़कों और चौराहों के नाम भी इंदिरा गांधी जी के नाम पर है।

    इसके अलावा देश की राजधानी दिल्ली के इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम भी इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है और देश के सबसे मुख्य समुद्री ब्रिज पंबन ब्रिज का नाम भी इंदिरा गांधी रोड ब्रिज है।

    पुरस्कार और सम्मान –

    देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी को साल 1971 में देश के सर्वोच्च सम्मान ”भारत रत्न” से सम्मानित किया गया था।

    साल 1972 में उन्हें बांग्लादेश को आजाद करवाने के लिए मेक्सिकन अवॉर्ड से नवाजा गया।

    साल 1976 में उन्हें नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा हिन्दी में साहित्य वाचस्पति सम्मान से नवाजा गया था।

    इसके अलावा उन्हें मदर्स अवार्ड, हॉलैंड मेमोरियल प्राइज से भी सम्मानित किया गया था।

    ऑपरेशन ब्लू स्टार और हत्या –

    1981 में एक सिख आतंकवादी समूह ”खालिस्तान” की मांग को लेकर अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर एवं हरिमिंदर साहिब परिसर के अंदर प्रवेश कर गए थे।

    मंदिर परिसर में हजारों लोग होने के बाबजूद भी इंदिरा गांधी जी ने सेना के जवानों को इन आतंकवादियों से निपटने के लिए सिखों के प्रमुख धार्मिक स्थल ऑपरेशन ब्लू स्टार करने की इजाजत दे दी।

    वहीं ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान हजारों बेकसूरों और मासूमों की जान चली गईं एवं सिख समुदाय की धार्मिक आस्था को काफी ठेस पहुंची।

    इस ऑपरेशन के बाद इंदिरा गांधी जी के खिलाफ विद्रोह की भावना भड़क उठी एवं देश में संप्रदायिक तनाव की स्थिति बन गई, यही नहीं सिख समुदाय के कई लोगों ने इस दौरान सरकारी पदों से इस्तीफा दे दिया एवं सरकारी पुरस्कार एवं उपाधियां वापस कर विरोध जताया।

    इस तरफ एक बार फिर से इंदिरा गांधी जी की राजनैतिक छवि काफी खराब हो गई एवं इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

    दरअसल, गोल्डन टेंपल में हुए भयावह नरसंहार का बदला लेने के लिए इंदिरा गांधी जी के दो सिख बॉडीगार्ड सतवंत सिंह और बित सिंह ने 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी।

    निस्कर्ष-

    देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी के प्रधानमंत्री बनने का सफर काफी प्रेरणादायक है। इसके साथ ही उन्होंने जिस तरह काफी चुनौतियों का सामना कर खुद को दुनिया की सबसे सशक्त एवं मजबूत महिला के रुप में पहचान दिलवाई वो सराहनीय है।

    यही नहीं प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए इंदिरा गांधी जी ने देश के आर्थिक, औद्योगिक, विज्ञान और कृषि समेत कई क्षेत्रों में विकास काम करवाए एवं भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रुप उभारने में मदत की।

    इंदिरा गांधी जी के देश के लिए किए गए योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

    Editorial Team

    इंदिरा गांधी (Indira Gandhi), जिन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी के नाम से भी जाना जाता है, वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार तीन कार्यकाल तक भारत गणराज्य की प्रधानमंत्री रहीं। इसके बाद, चौथे कार्यकाल में 1980 से 1984 तक उन्होंने प्रधानमंत्री पद संभाला, जब तक कि उनकी राजनीतिक हत्या नहीं हो गई। वह भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री थीं। और सेवा अवधि के लिहाज से भारत की दूसरी सबसे लंबे समय तक कार्य करने वाली प्रधानमंत्री थीं। 

    इंदिरा गांधी का संक्षिप्त परिचय, Indira Gandhi Biography in Hindi, Indira Gandhi Jeevan Parichay / Indira Gandhi Jivan Parichay / इंदिरा गांधी :

    नामइंदिरा गांधी (Indira Gandhi)
    पूरा नामइंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी (Indira Priyadarshini Gandhi)
    उपनामनेहरू (Nehru)
    जन्म19 नवंबर 1917
    जन्म स्थानआनंद भवन, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
    पितापंडित जवाहरलाल नेहरू
    माताकमला नेहरू
    पतिफिरोज़ गांधी
    संतानराजीव गांधी, संजय गांधी
    कार्य क्षेत्रराजनीति और सामाजिक सेवा
    राजनीतिक दलभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)
    पुरस्कार व सम्मानभारत रत्न (1971), मैक्सिकन अकादमी अवार्ड, मदर्स अवार्ड, येल विश्वविद्यालय हाउलैंड मेमोरियल पुरस्कार, मरणोपरांत जवाहरलाल नेहरू अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार, कोलंबिया विश्वविद्यालय से विशिष्ट सम्मान आदि।
    प्रकाशित पुस्तकेंSafeguarding Environment, My Truth, On People and Problems, Eternal India आदि।
    निधन31 अक्टूबर 1984, नई दिल्ली
    स्मारकशक्ति स्थल, दिल्ली

    इंदिरा गांधी के महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य:

    • 1955 में इंदिरा गांधी कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल हुईं और पार्टी के केन्द्रीय चुनाव में भाग लिया।
    • 1956 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महिला विभाग तथा अखिल भारतीय युवक कांग्रेस की राष्ट्रीय एकता परिषद की अध्यक्षता की।
    • 1958 में वे कांग्रेस के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड की सदस्य रहीं।
    • 1959 में, वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गईं , इस पद पर वह 1960 तक रहीं और फिर जनवरी 1978 में दोबारा इस पद पर रहीं।
    • 1964-1966 तक इंदिरा गांधी सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहीं। 
    • जनवरी 1966 से मार्च 1977 तक और फिर 14 जनवरी 1980 से 31 अक्टूबर 1984 तक वे भारत की प्रधानमंत्री रहीं ।
    • जनवरी 1980 में उन्होंने योजना आयोग के अध्यक्ष का पद संभाला।

    इंदिरा गांधी का जीवन परिचय | Indira Gandhi Ka Jivan Parichay

    इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को आनंद भवन, प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में हुआ था। वह पंडित जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू की एकमात्र संतान थीं। उनके दादा, मोतीलाल नेहरू, प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने सेंट मेरी कान्वेंट (इलाहाबाद), लेकोले नोवेल (स्विट्जरलैंड), प्यूपिल्स ओन स्कूल (पुणे), विश्व-भारती (शांतिनिकेतन), और समरविल कॉलेज (ऑक्सफोर्ड) से शिक्षा प्राप्त की। शांतिनिकेतन में अध्ययन के दौरान वह रवींद्रनाथ टैगोर के दर्शन और शिक्षा विचारों से गहराई से प्रभावित हुईं।

    प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा | Indira Gandhi

    इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नेहरू परिवार में हुआ था। उनके पिता, जवाहरलाल नेहरू, स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेता और भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, जबकि उनकी माता कमला नेहरू सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं। विवाह के बाद उन्हें “गांधी” उपनाम फिरोज़ गांधी से मिला, हालांकि उनका महात्मा गांधी से कोई पारिवारिक संबंध नहीं था। उनके दादा, मोतीलाल नेहरू, प्रसिद्ध वकील और भारतीय राष्ट्रवादी थे।

    1934-35 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, इंदिरा ने शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, जहां टैगोर ने उन्हें “प्रियदर्शिनी” नाम दिया। इसके बाद वे इंग्लैंड गईं, जहां ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में असफल होने के कारण कुछ समय ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में अध्ययन किया। 1937 में परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने सोमरविल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात फिरोज़ गांधी से होती रही, जिनसे उन्होंने 26 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद में विवाह किया।

    1941 में भारत लौटने के बाद, इंदिरा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गईं। 1950 के दशक में वे अपने पिता के प्रधानमंत्रित्व काल में उनकी अनौपचारिक सहयोगी के रूप में कार्य करती रहीं। नेहरू के निधन के बाद, 1964 में वे राज्यसभा सदस्य बनीं और लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री नियुक्त हुईं।

    शास्त्री जी की आकस्मिक मृत्यु के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष के.