Bahadur shah zafar biography in hindi language
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बहादुर शाह ज़फ़र (अंग्रेज़ी: Bahadur Shah Zafar, जन्म: 24 अक्तूबर सन् 1775 ई.; मृत्यु: 7 नवंबर सन् 1862 ई.) मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह थे। इनका शासनकाल 1837-57 तक था। बहादुर शाह ज़फ़र एक कवि, संगीतकार व खुशनवीस थे और राजनीतिक नेता के बजाय सौंदर्यानुरागी व्यक्ति अधिक थे।
जीवन परिचय
बहादुर शाह ज़फ़र का जन्म 24 अक्तूबर सन् 1775 ई.
को दिल्ली में हुआ था। बहादुर शाह अकबर शाह द्वितीय और लालबाई के दूसरे पुत्र थे। उनकी माँ लालबाई हिंदूपरिवार से थीं। 1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईट से ईट बजा दी। अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी। अपने शासनकाल के अधिकांश समय उनके पास वास्तविक सत्ता नहीं रही और वह अंग्रेज़ों पर आश्रित रहे। 1857 ई.
में अंग्रेज़ों ने दुबारा दिल्ली पर क़ब्ज़ा जमा लिया और बहादुर शाह द्वितीय को गिरफ़्तार करके उन पर मुक़दमा चलाया गया तथा उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया।
प्रसिद्ध उर्दू कवि
बहादुर शाह ज़फ़र सिर्फ एक देशभक्त मुग़ल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के प्रसिद्ध कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफ़ी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। उनके द्वारा उर्दू में लिखी गई पंक्तियां भी काफ़ी मशहूर हैं-
हिंदिओं में बू रहेगी जब तलक ईमान की।
तख्त ए लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।।
हिन्दुस्तान से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फ़िक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
ज़फ़र की एक कविता
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में
बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में
इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में
उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में
कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
निधन
मुल्क से अंग्रेजों को भगाने का सपना लिए 7 नवंबर 1862 को उनका निधन हो गया। बहादुर शाह ज़फ़र की मृत्यु 86 वर्ष की अवस्था में रंगून (वर्तमान यांगून), बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में हुई थी। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।" जिस दिन बहादुरशाह ज़फ़र का निधन हुआ उसी दिन उनके दो बेटों और पोते को भी गिरफ़्तार करके गोली मार दी गई। इस प्रकार बादशाह बाबर ने जिस मुग़ल वंश की स्थापना भारत में की थी, उसका अंत हो गया।
बाहरी कड़ियाँ
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इस अध्याय के माध्यम से हम जानेंगे बहादुर शाह जफर (Bahadur Shah Zafar) से जुड़े महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्य जैसे उनकी व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षा तथा करियर, उपलब्धि तथा सम्मानित पुरस्कार और भी अन्य जानकारियाँ। इस विषय में दिए गए बहादुर शाह जफर से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया गया है जिसे पढ़कर आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद मिलेगी। Bahadur Shah Zafar Biography and Interesting Facts in Hindi.
बहादुर शाह जफर का संक्षिप्त सामान्य ज्ञान
| नाम | बहादुर शाह जफर (Bahadur Shah Zafar) |
| जन्म की तारीख | 24 अक्टूबर |
| जन्म स्थान | दिल्ली (भारत) |
| निधन तिथि | 07 नवम्बर |
| माता व पिता का नाम | लालबाई / अकबर शाह द्वितीय |
| उपलब्धि | 1837 - मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह |
| पेशा / देश | पुरुष / स्वतंत्रता सेनानी / भारत |
बहादुर शाह जफर - मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह (1837)
बहादुर शाह जफर मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह और उर्दू के जानेे-माने शायर थे। इनका शासनकाल 1837-57 तक था। बहादुर शाह ज़फ़र एक कवि, संगीतकार व खुशनवीस थे और राजनीतिक नेता के बजाय सौंदर्यानुरागी व्यक्ति अधिक थे।
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भारत के इतिहास में मुग़ल साम्राज्य का विशेष स्थान रहा है। बाबर से लेकर औरंगज़ेब तक मुग़ल शासकों ने भारत में राजनीतिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य की दृष्टि से गहरी छाप छोड़ी। परन्तु मुग़ल साम्राज्य का अंतिम अध्याय अत्यंत करुण और प्रेरणादायक है, जिसका नेतृत्व Bahadur Shah Zafar ने किया। वे न केवल एक सम्राट थे, बल्कि एक विद्वान, कवि और संवेदनशील इंसान भी थे। उनका जीवन एक ऐसी गाथा है जो मुग़ल साम्राज्य के अंत और भारत के नवजागरण का प्रतीक बन गई।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
Bahadur Shah Zafar का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को दिल्ली के लाल किले में हुआ। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और माता लल बाई थीं। ज़फ़र का बचपन एक ऐसे काल में बीता जब मुग़ल साम्राज्य अपना प्रभाव और ताक़त खो रहा था। अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे पूरे भारत पर नियंत्रण स्थापित कर रही थी और मुग़ल बादशाह केवल नाममात्र के शासक रह गए थे।
अकबर शाह द्वितीय के कई पुत्रों में से Bahadur Shah Zafar को उत्तराधिकारी बनाना एक राजनीतिक समझौता था। मिर्ज़ा जहांगीर, जो अकबर शाह का प्रिय पुत्र था, अंग्रेज़ों से विवाद में पड़ गया, जिससे रास्ता ज़फ़र के लिए साफ हुआ।
ताजपोशी और प्रतीकात्मक शासन
1837 में जब Bahadur Shah Zafar ने सत्ता संभाली, तब दिल्ली पर उनका नियंत्रण बहुत सीमित था। वह न तो कोई राजनीतिक शक्ति रखते थे, न ही सैन्य बल। अंग्रेज़ों ने केवल शिष्टाचारवश उन्हें सम्राट स्वीकार किया था। उनके शासनकाल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी पूरे भारत की सत्ता चला रही थी, और Bahadur Shah Zafar केवल लाल किले के अंदर “शाही” जीवन जी रहे थे।
परन्तु उनके दरबार को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र कहा जा सकता है। उन्होंने अपने चारों ओर कवियों, संगीतकारों, और कलाकारों को एकत्रित किया। उनके दरबार में ग़ालिब, ज़ौक़, मोमिन, और दाग़ देहलवी जैसे प्रसिद्ध शायरों की उपस्थिति रहती थी। Bahadur Shah Zafar स्वयं एक बेहतरीन उर्दू शायर थे और उन्होंने “Zafar” तख़ल्लुस (उपनाम) से शायरी की।
साहित्यिक योगदान
Bahadur Shah Zafar की शायरी में गहरी भावनाएँ, रहस्यवाद, धार्मिकता और व्यक्तिगत पीड़ा झलकती है। वे सूफी परंपरा से प्रभावित थे और उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता का रंग स्पष्ट रूप से दिखता है। उनकी रचनाओं में वेदना, अकेलापन और एक टूटे हुए दिल की आवाज़ सुनाई देती है।
उनका सबसे प्रसिद्ध शेर जो आज भी लोगों के दिलों को छूता है:
“कितना है बदनसीब ‘Zafar’, दफ़्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।”
यह शेर उनकी जिंदगी का यथार्थ बन गया। उन्होंने जो महसूस किया, वही लिखा। उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता, मानवीय करुणा और नैतिकता की वकालत की। उनकी कविताएँ आज भी उर्दू साहित्य का अमूल्य हिस्सा हैं।
1857 का संग्राम और ज़फ़र की भूमिका
1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारत का पहला व्यापक विद्रोह था जिसमें सैनिकों, किसानों, नवाबों और आम जनता ने मिलकर अंग्रेज़ों के खिलाफ बग़ावत की। विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए विद्रोही सैनिकों और भारतीयों को एक प्रतीकात्मक सम्राट की आवश्यकता थी और उन्होंने Bahadur Shah Zafar को चुना।
शुरू में उन्होंने विद्रोह में भाग लेने से हिचकिचाहट दिखाई, परंतु जब उनके पास पहुंचे विद्रोही सैनिकों ने उन्हें भारत का सम्राट घोषित किया, तो उन्होंने नेतृत्व स्वीकार कर लिया। अब वे केवल नाम के सम्राट नहीं थे, बल्कि क्रांतिकारियों के लिए एक उम्मीद बन चुके थे।
Bahadur Shah Zafar ने विद्रोहियों का नेतृत्व तो किया, लेकिन उनकी उम्र और स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे रणनीतिक तौर पर बहुत कुछ कर सकें। फिर भी उनका नाम ही पूरे देश में एकजुटता का प्रतीक बन गया। देशभर में लोगों ने उनके नाम पर विद्रोह किया और ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी।
विद्रोह की असफलता और गिरफ्तारी
क्रांति के कुछ ही महीनों में अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलना शुरू कर दिया। दिल्ली पर पुनः कब्ज़ा हो गया और Bahadur Shah Zafar को लाल किले से भागना पड़ा। वे हुमायूं के मकबरे में छुपे, लेकिन अंग्रेज़ों ने उन्हें वहां से गिरफ्तार कर लिया।
उनके तीन बेटों और एक पोते को पकड़ कर अंग्रेज़ अधिकारी हडसन ने खुलेआम कत्ल कर दिया और उनके सिर Bahadur Shah Zafar के सामने पेश किए। यह दृश्य उनके जीवन का सबसे दर्दनाक पल रहा।
इसके बाद उन्हें लाल किले में एक सार्वजनिक मुकदमे का सामना करना पड़ा। उन पर विद्रोह का समर्थन करने, ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या में भूमिका निभाने और देशद्रोह के आरोप लगाए गए। उन्हें दोषी ठहराया गया और सज़ा के रूप में बर्मा (अब म्यांमार) निर्वासित कर दिया गया।
रंगून में निर्वासित जीवन
Bahadur Shah Zafar को 1858 में रंगून ले जाया गया, जहां उन्हें एक छोटे से घर में नजरबंद रखा गया। वे अपने जीवन के अंतिम चार वर्षों में अत्यंत दयनीय अवस्था में रहे। उनके पास न कोई शाही ठाठ-बाठ था, न ही परिवार का सहयोग। वे एक ऐसे सम्राट थे जिनका जीवन गुमनामी और अकेलेपन में समाप्त हो गया।
7 नवंबर 1862 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें रंगून में एक मामूली कब्र में दफनाया गया। वर्षों तक उनकी कब्र भी अनजान रही, और फिर बाद में वहां एक स्मारक बनाया गया। उनकी कविता में लिखा गया “दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में” सच साबित हुआ।
बहादुर शाह ज़फ़र की ऐतिहासिक विरासत
Bahadur Shah Zafar आज भारतीय इतिहास में एक ऐसे सम्राट के रूप में जाने जाते हैं जो सत्ता से अधिक संस्कृति, शायरी और नैतिक मूल्यों का प्रतीक बने। उनका जीवन एक ऐसी गाथा है जो बताती है कि कैसे एक शायर सम्राट ने बिना तलवार उठाए भी इतिहास में अपनी जगह बना ली।
1857 के विद्रोह के बाद भारत में अंग्रेज़ों का शासन और कठोर हो गया, लेकिन Bahadur Shah Zafar की स्मृति एक प्रेरणा बन गई। उन्होंने यह दिखा दिया कि एक कमजोर समझे जाने वाला सम्राट भी जनांदोलन का प्रतीक बन सकता है।
उनका साहित्यिक योगदान उर्दू भाषा और भारतीय साहित्य के लिए अविस्मरणीय है। आज भी उनकी कविताएँ पढ़ी जाती हैं, गाई जाती हैं, और उनमें से प्रेरणा ली जाती है।
निष्कर्ष
Bahadur Shah Zafar का जीवन केवल एक राजा की कहानी नहीं है, यह एक सभ्यता के अंत, संस्कृति के पुनरुत्थान और मानवीय भावना की अजेयता की गाथा है। वे अंतिम मुग़ल सम्राट थे, पर उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक गरिमा और संवेदना बनाए रखी।
उनकी कविताएं आज भी हमारे दिलों में गूंजती हैं और हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास केवल युद्धों और विजयों का नहीं, बल्कि संवेदना, सृजन और आत्मबल का भी होता है। Bahadur Shah Zafar का नाम जब भी लिया जाएगा, वह एक ऐसे सम्राट के रूप में याद किए जाएंगे जिन्होंने सत्ता भले ही खो दी, लेकिन अपनी आत्मा को कभी पराजित नहीं होने दिया।
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लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।” जिस दिन बहादुरशाह ज़फ़र का निधन हुआ उसी दिन उनके दो बेटों और पोते को भी गिरफ़्तार करके गोली मार दी गई। इस प्रकार बादशाह बाबर ने जिस मुग़ल वंश की स्थापना भारत में की थी, उसका अंत हो गया।
ज़फर महल – Jafar Mahal
ज़फर महल मुघलो के अंतिम शासक बहादुर शाह ज़फर द्वारा निर्मित एक अंतिम मुघल ईमारत है। ज़फर महल भारत के दिल्ली में स्थापित किया गया है। अकबर द्वितीय, बहादुर शाह जफ़र द्वारा ज़फर महल के प्रवेश द्वार का निर्माण 19 वी शताब्दी के मध्यकाल में किया गया था। ज़फर महल दिल्ली के मेहरुली में बना हुआ है। मेहरुली एक रमणीय स्थल है जहाँ लोग शिकार करने और साथ ही पिकनिक मनाने के लिए भी आते है। पहले से ही प्रसिद्ध मेहरुली में ज़फर ने ज़फर महल और दरगाह बनाकर इसकी सुन्दरता और बढ़ा दी। प्रवेश द्वारा के पास बना गुम्बद तक़रीबन 15 वी शताब्दी में बनवाया गया था और महल के बाकी भाग पश्चिमी कला के अनुसार बनाये गए है।
प्रसिद्ध कवि –
बहादुर शाह ज़फ़र सिर्फ एक देशभक्त मुग़ल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के प्रसिद्ध कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफ़ी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। उनके द्वारा उर्दू में लिखी गई पंक्तियां भी काफ़ी मशहूर हैं।
वे मिर्जा गालिब, ज़ौक़, मोमिन और दाग़ जैसे अपने समय के प्रतिष्ठित और मशहूर उर्दू कवियों के एक महान कद्रदान थे। उनकी अधिकांश उर्दू गजलें 1857 के युद्ध के दौरान खो गयी थीं। उनमें से जो बची थी, उन्हें संकलित किया और कुल्लियात-ऐ-जफर नाम दिया गया।
हिन्दुस्तान से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फ़िक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
ज़फ़र की एक कविता – Bahadur Shah Zafar Poem in Hindi
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।
बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।
एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में।
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।
दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,
फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में।
कितना है बदनसीब ‘ज़फर’ दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥
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बहादुर शाह ज़फ़र | |
| पूरा नाम | अबु ज़फ़र सिराजुद्दीन महम्मद बहादुर शाह ज़फ़र |
| अन्य नाम | बहादुरशाह द्वितीय |
| जन्म | 24 अक्तूबर सन् 1775 |
| जन्म भूमि | दिल्ली |
| मृत्यु तिथि | 7 नवंबर, 1862 |
| मृत्यु स्थान | रंगून, बर्मा |
| पिता/माता | अकबर शाह द्वितीय और लालबाई |
| पति/पत्नी | 4 (अशरफ़ महल, अख़्तर महल, ज़ीनत महल, ताज महल) |
| राज्य सीमा | उत्तर और मध्य भारत |
| शासन काल | 28 सितंबर 1837 – 14 सितंबर 1857 |
| शा.
में स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के समय बहादुर शाह 82 वर्ष के बूढे थे, और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को खो चुके थे। सितम्बर 1857 ई. को दिल्ली में हुआ था। बहादुर शाह अकबर शाह द्वितीय और लालबाई के दूसरे पुत्र थे। उनकी मां लालबाई हिंदू परिवार से थीं। उन्होंने अपने दो शिक्षकों, इब्राहिम ज़ौक और असद उल्लाह खान गालिब से कविता की शिक्षा प्राप्त की। एक राजकुमार होने के नाते, उन्हें घुड़सवार सेना की कलाओं, तलवारबाजी, धनुष और तीर पर गोली चलाना और अग्नि-हथियारों के साथ प्रशिक्षित किया गया। 1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईट से ईट बजा दी। अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी। अपने शासनकाल के अधिकांश समय उनके पास वास्तविक सत्ता नहीं रही और वह अंग्रेज़ों पर आश्रित रहे। 1857 ई. में अंग्रेज़ों ने दुबारा दिल्ली पर क़ब्ज़ा जमा लिया और बहादुर शाह द्वितीय को गिरफ़्तार करके उन पर मुक़दमा चलाया गया तथा उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया। भारत में मुगलकाल के अंतिम बादशाह कहे जाने वाले जफर को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली का बादशाह बनाया गया था। बादशाह बनते ही उन्होंने जो चंद आदेश दिए, उनमें से एक था गोहत्या पर रोक लगाना। इस आदेश से पता चलता है कि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के कितने बड़े पक्षधर थे। 1857 के समय बहादुर शाह जफर एक ऐसी बड़ी हस्ती थे, जिनका बादशाह के तौर पर ही नहीं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में भी सभी सम्मान करते थे। इसीलिए बेहद स्वाभाविक था कि मेरठ से विद्रोह कर जो सैनिक दिल्ली पहुंचे उन्होंने सबसे पहले बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह बनाया। निजी जीवन – Bahadur Shah Zafar Personal Lifeउनकी चार पत्नियाँ (बेगम) थी, बेगम अशरफ महल, बेगम अख्तर महल, बेगम जीनत महल और बेगम ताज महल। इन सभी बेगमो में से जीनत बेगम उनकी सबसे प्रिय थी। उनके बहुत से बेटे और बेटियाँ थी। निधन – Bahadur Shah Zafar Death in Hindiमुल्क से अंग्रेजों को भगाने का सपना लिए 7 नवंबर 1862 को सुबह 5 बजे उनका निधन हो गया। बहादुर शाह ज़फ़र की मृत्यु 86 वर्ष की अवस्था में रंगून (वर्तमान यांगून), बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में हुई थी। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। उस समय जफर के अंतिम संस्कार की देखरेख कर रहे ब्रिटिश अधिकारी डेविस ने भी लिखा है कि जफर को दफनाते वक्त कोई 100 लोग वहां मौजूद थे। जफर की मौत के 132 साल बाद साल 1991 में एक स्मारक कक्ष की आधारशिला रखने के लिए की गई खुदाई के दौरान एक भूमिगत कब्र का पता चला. में स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के समय बहादुर शाह 82 वर्ष के बूढे थे, और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को खो चुके थे। सितम्बर 1857 ई. Bahadur Shah Zafar in Hindi/ बहादुर शाह ज़फ़र, चार दशक से हिंदुस्तान पर राज करने वाले मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह थे। इनका शासनकाल 1837-57 तक था। बहादुर शाह ज़फ़र एक कवि, संगीतकार व खुशनवीस थे और राजनीतिक नेता के बजाय सौंदर्यानुरागी व्यक्ति अधिक थे। उन्होंने 1857 की पहली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेजा जहां उनकी मृत्यु हुई थी। अंतिम मुग़ल बहादुर शाह ज़फर का इतिहास – Bahadur Shah Zafar ki Historyमिर्ज़ा अबू ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह ज़फर अपने पिता अकबर द्वितीय की 28 सितंबर 1837 को मृत्यु होने के बाद उत्तराधिकारी बने। वास्तव में, वह सफल होने के दृष्टिकोण से अपने पिता की मुख्य पसंद नहीं थे। अकबर द्वितीय अपनी पत्नी मुमताज बेगम के बेटे मिर्ज़ा जहांगीर को अपना उत्तराधिकारी बनाने की योजना बना रहे थे। जफ़र अनुभवहीन होने के कारण सम्राट बनने पर अंग्रेजो को कोई परेशानी नहीं हुई। सम्राट बनने के बाद उन्होंने अपने बेटे मिर्जा मुगल को अपने बलों के प्रमुख में कमांडर के रूप में भी नियुक्त किया। मिर्जा मुगल बहुत अनुभवहीन था, और वह सेना को प्रतिज्ञापूर्वक नहीं चला पाया। शहर का प्रशासन में अव्यवस्था थी और सेना में अराजकता फ़ैल गयी, जिसका लाभ उठाकर अंग्रेजो ने दिल्ली पर आक्रमण तेज कर दी। हालाँकि एक सम्राट की दृष्टि से उन्होंने अपनी प्रजा के सभी धर्मों के लोगों के साथ अच्छा वर्ताव किया करते थे। न्होंने यह सुनिश्चित किया कि होली और दिवाली जैसे प्रमुख हिंदू त्योहारों को राजसभा में आयोजित किया जाना चाहिए। वह हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के प्रति बहुत संवेदनशील थे। वे अपने नाम में “ज़फर” का उपयोग करते है जिसका अर्थ विजेता है। उन्होंने बहुत सी उर्दू कविताये और ग़ज़ल लिखी है। वे केवल नाममात्र के लिए ही शासक थे, एक मुग़ल शासक की तरह उनका नाम केवल इतिहास में लिखित था और उसके पास केवल दिल्ली (शाहजहाँबाद) पर शासन करने का ही अधिकार था। प्रारम्भिक जीवन – Early Life of Bahadur Shah Zafarबहादुर शाह ज़फ़र का जन्म 24 अक्तूबर सन् 1775 ई. | |