Salim ali autobiography books in hindi
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जिसके बाद वह दावर कॉलेज में ही प्राणी शास्त्र की कक्षाओं में भाग लेने लगे.
सलीम अली ने दिसंबर 1918 में एक दूर की रिश्तेदार तेहमिना से विवाह किया. वर्ष 1914 में इन्होने ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्ड’ प्रकाशित की. जहां उन्होंने प्रोफेसर इरविन के सानिध्य में जूलॉजिकल संग्रहालय में कार्य किया.
सलीम अली ने बर्लिन में कई प्रमुख जर्मन ऑर्निथोलॉजिस्टों से परिचय किया और उनसे साथ बर्ड वेधशाला में कार्य किया.
इन्होने भारत में ऑर्निथोलॉजी के विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका थी.
सलीम अली प्रमुख कार्य (Salim Ali Major Works)
सलीम अली द्वारा लिखित पुस्तक ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्ड’ को भारतीय ऑर्निथोलॉजी पर एक ऐतिहासिक पुस्तक माना जाता है. जहां उन्हें अपने पसंदीदा शौक पक्षियों का अध्ययन आदि को जारी रखने के अवसर मिले.
वर्ष 1917 में सलीम अली वापस भारत लौट आए और उन्होंने दावर कॉलेज ऑफ कॉमर्स में वाणिज्य कानून और अकाउंटेंसी का अध्ययन जारी रखा परंतु सेंट जेवियर स्कूल के फादर एथेलबर्ट ब्लैटर मैं उनके असली जुनून अर्थात पक्षी प्रेम को पहचान लिया था.
फादर नहीं सलीम अली को प्राणी शास्त्र का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया. डिलन रिपली के साथ लिखा था.
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सलीम अली
जन्म: 12 नवम्बर 1896, बॉम्बे (अब मुम्बई)
मृत्यु: 27 जुलाई, 1987, मुम्बई
कार्यक्षेत्र: पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी, वन्यजीव संरक्षणवादी
डॉ सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली एक भारतीय पक्षी विज्ञानी, वन्यजीव संरक्षणवादी और प्रकृतिवादी थे। डॉ अली देश के पहले ऐसे पक्षी विज्ञानी थे जिन्होंने सम्पूर्ण भारत में व्यवस्थित रूप से पक्षियों का सर्वेक्षण किया और पक्षियों पर ढेर सारे लेख और किताबें लिखीं। उनके द्वारा लिखी पुस्तकों ने भारत में पक्षी-विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके कार्यों के मद्देनजर उन्हें “भारत का बर्डमैन” के रूप में भी जाना जाता है। उनके कार्यों और योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें सन 1958 में पद्म भषण और सन 1976 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। सन 1947 के बाद वे ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के सबसे प्रधान व्यक्ति बन गए और ‘भरतपुर पक्षी अभयारण्य’ (केओलदेव् राष्ट्रिय उद्यान) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ‘साइलेंट वैली नेशनल पार्क’ को बर्बादी से बचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
स्रोत:targetstudy.com
प्रारंभिक जीवन
सलीम अली का जन्म बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में 12 नवम्बर 1896 में हुआ। वे अपने माता-पिता के सबसे छोटे और नौंवे बच्चे थे। जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन चल बसे और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता ज़ीनत-उन-निस्सा की भी मृत्यु हो गई। सलीम और उनके भाई-बहनों की देख-रेख उनके मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और चाची हमिदा द्वारा मुंबई की खेतवाड़ी इलाके में हुआ।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सचिव डबल्यू.एस.
उसने अपने बाद कई वर्षों तक अपनी बहन और उसके पति के साथ रहे.
सलीम अली करियर (Salim Ali Career)
सलीम अली भारत में ऑर्निथोलॉजिस्ट अर्थात पक्षी विज्ञान को उच्च स्तर पर ले जाना चाहते थे परंतु उनके पास डिग्री नहीं थी. वर्ष 1926 में सलीम अली को मुंबई के प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय के इतिहास खंड में गाइड लेक्चरर के रूप में नियुक्त किया गया.
1990 में भारत सरकार द्वारा कोयंबटूर में उनके सम्मान में नामित ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री (सैकॉन) के लिए सलीम अली सेंटर की स्थापना की गई थी.
सलीम अली से प्रेरित फिल्म (Films based on Salim Ali)
29 नवम्बर 2018 को निर्देशक शंकर की फिल्म “2.0” रिलीज़ हुई थी. वह अपने पिता मोइज़ुद्दीन और माँ जेनत-अन-निसा का नौवां और सबसे छोटा बच्चा था.
एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज ने उन्हें पावलोवस्की शताब्दी मेमोरियल पदक प्रदान किया गया.
सलीम अली मृत्यु (Salim Ali Death)
सलीम अली प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे. इस फिल्म में अक्षय कुमार का किरदार पक्षीराजन सलीम अली से प्रेरित था जो कि पक्षियों पर हो रहे रेडिएशन पर रिसर्च करता हैं.
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Ornithologist Salim Ali /सालिम अली एक भारतीय पक्षी विज्ञानी, वन्यजीव संरक्षणवादी और प्रकृतिवादी थे। इन्हे परिंदो का विश्वकोष भी कहा जाता है।
सालिम अली का परिचय – Salim Ali Biography in Hindi
| पूरा नाम | सालिम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली (Sálim Moizuddin Abdul Ali) |
| जन्म दिनांक | 12 नवम्बर 1896 |
| जन्म भूमि | बॉम्बे (अब मुम्बई) |
| मृत्यु | 27 जुलाई, 1987, मुम्बई |
| पिता का नाम | मोइज़ुद्दीन अब्दुल |
| माता का नाम | ज़ीनत-अन-नीसा |
| पत्नी | तहमिना अली |
| कर्म-क्षेत्र | पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी |
| कर्म भूमि | भारत |
| पुरस्कार-उपाधि | पद्म भूषण, पद्म विभूषण |
| विशेष योगदान | भरतपुर पक्षी विहार की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई |
सालिम अली हमारे देश के ही नहीं बल्कि दुनिया भर के पक्षी वैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने बर्ड सेंचुरी के बनने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। पक्षियों के लिए सर्वे करने वाले वो हिंदुस्तान के शुरुआती लोगों में हैं। 10 साल की उम्र में एक चिड़िया को मार गिराने पर पक्षियों को लेकर दिलचस्पी जागी और आगे चलकर वे एक पक्षी विज्ञानी बने।
प्रारंभिक जीवन – Early Life of Salim Ali
सलीम अली का जन्म बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में 12 नवम्बर, 1896 में हुआ। उनका पूरा नाम था सालिम मोइउद्दीन अब्दुल अली, जो बाद में सालिम अली के नाम से परिंदो के मसीहा के रूप में विश्व प्रसिद्ध हुए। वे अपने माता-पिता के सबसे छोटे और नौंवे बच्चे थे। जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन चल बसे और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता ज़ीनत-उन-निशा की भी मृत्यु हो गई। सलीम और उनके भाई-बहनों की देख-रेख उनके मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और चाची हमिदा द्वारा मुंबई की खेतवाड़ी इलाके में हुआ।
शिक्षा और वैज्ञानिक जीवन – Salim Ali Life History in Hindi
प्राथमिक शिक्षा के लिए सलीम और उनकी दो बहनों का दाखिला गिरगाम स्थित ज़नाना बाइबिल मेडिकल मिशन गर्ल्स हाई स्कूल और बाद में मुंबई के सेंट जेविएर में कराया गया। बचपन मे गंभीर सिरदर्द की बीमारी से पीड़ित हुए, जिसके कारण उन्हें उन्हें अक्सर कक्षा छोड़ना पड़ता था। किसी ने सुझाव दिया कि सिंध की शुष्क हवा से शायद उन्हें ठीक होने में मदद मिले इसलिए उन्हें अपने एक चाचा के साथ रहने के लिए सिंध भेज दिया गया। वे लंबे समय के बाद सिंध से वापस लौटे और बड़ी मुश्किल से सन 1913 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की।
एक बार उन्होंने पेड़ पर बैठे एक पक्षी को मार गिराया था। उस समय वह 10 वर्ष के होंगे। वह उस पक्षी को उठाकर अपने चाचा के पास पहुंचे। पक्षी के गले पर पीला धब्बा देखकर वे चौंक पड़े। चाचा अमीरुद्दीन भी पक्षी को पहचान न सके। तो उसे वे ‘नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के ऑफिस ले गए जहां उनके जानकार डब्ल्यू.एस मिलार्ड थे जो पक्षी विशेषज्ञ थे। मिलार्ड ने बालक को कुछ नहीं बताया और उससे उस कमरे में ले गए जहां मृत पक्षियों का भूसा भर कर रखा गया था।
उन्होंने उसे सभी पक्षियों को दिखाया, किंतु उन में उस जैसा एक भी पक्षी नहीं था, फिर मिलार्ड ने वैसा ही एक पक्षी दिखाया जैसा सालिम अली के हाथ में था यह पक्षी नर बया था जिसके गले पर वर्षा ऋतु मे ही पीला धब्बा बनता है। अली को विभिन्न पक्षी देख कर आश्चर्य भी हुआ और उनके प्रति जिज्ञासा भी। वे उस विभाग पर पक्षियो के बारे में ज्ञान बढ़ाने आने लगे तथा उनकी रक्षा व अन्य जानकारियां के बारे में सोचने लगे।
सलीम अली ने प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से ग्रहण की पर कॉलेज का पहला साल ही मुश्किलों भरा था जिसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के वोलफ्रेम (टंग्सटेन) माइनिंग और इमारती लकड़ियों के व्यवसाय की देख-रेख के लिए टेवोय, बर्मा (टेनासेरिम) चले गए। यह स्थान सलीम के अभिरुचि में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि यहाँ पर घने जंगले थे जहाँ इनका मन तरह-तरह के परिन्दों को देखने में लगता। लगभग 7 साल बाद सलीम अली मुंबई वापस लौट गए और बंबई से उन्होंने जंतु विज्ञान में एक कोर्स किया, जिसके बाद बंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के संग्रहालय में उनकी गाइड के रूप में नियुक्ति हुई।
गाइड के रूप में वह मरे हुए सुरक्षित पक्षियों को दर्शकों को दिखाते और उनके विषय में बताते। इस कार्य के दौरान उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि पक्षियों के विषय में पूरी जानकारी तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके रहन-सहन को नजदीक से देखा जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह जर्मनी गए और विश्वविख्यात पक्षी विज्ञानी डॉक्टर इर्विन स्ट्रॉसमैन के संपर्क में आएँ। एक वर्ष पश्चात जब वह जर्मनी से वापस भारत आए तब तक उनकी गैरहाजिरी में संग्रहालय के गाइड की नौकरी समाप्त हो गई थी।
सौभाग्यवश माहिम मे उनकी पत्नी तहमीना अली का एक छोटा-सा मकान था वह उसी में जाकर रहने लगे।
उनके घर के अहाते में एक पेड़ था, जिस पर बया ने एक घोंसला बनाया था। सारे दिन वे पेड़ के नीचे बैठे रहते और बया के क्रिया-कलापों को एक नोट बुक में लिखते रहते थे। बया के क्रिया-कलापो और व्यवहार को उन्होंने एक शोध निबंध के रूप में प्रकाशित कराया। सन 1930 में छपाया यह निबंध पक्षी विज्ञान में उनकी प्रसिद्धि के लिए अत्यंत महत्वपुर्ण सिद्ध हुआ। इसके बाद वे जगह-जगह जाकर पक्षियों के विषय में जानकारी प्राप्त करने लगे। इन जानकारियों के आधार पर उन्होने’ द बुक ऑफ इंडियन बर्डस’ लिखी जो सन 1941 में प्रकाशित हुई, इस पुस्तक ने रिकॉर्ड बिक्री की। इस पुस्तक में पक्षियों के विषय में अनेक नई जानकारियां प्रस्तुत की गई थी।
सन 1948 मे उन्होने विश्व-प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी दिन्लौन रिप्ले के साथ एक प्रोजेक्ट आरंभ किया, जिसमें 10 भागों में भारत व पाकिस्तान के पक्षियों के विषय में जानकारी लिखनी थी। इस पुस्तक का नाम ‘हैंड बुक ऑफ द बर्ड्स ऑफ इंडियन एंड पाकिस्तान’ है। इसमें उनके 20 वर्ष के अध्ययनों का निचोड़ प्रस्तुत किया गया है। इसमें सभी प्रकार के पक्षियों, उनके दिखाई देने, प्रवासी आदतो आदि से संबंधित अनेक बातों की जानकारी दी गई है। इसके अलावा पक्षियों के उपर उन्होंने एक और भी पुस्तके लिखी हैं। ‘द फ़ॉल ऑफ ए स्पेरो’ में उन्होंने अपने जीवन में घटी अनेक घटनाओं को प्रस्तुत किया है।
सम्मान और पुरूस्कार – Salim Ali Awards
सालिम अली ने पक्षियों के सर्वेक्षण के लिए 65 वर्ष से भी अधिक समय तक समस्त भारत देश का भ्रमण किया। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 60 वर्ष भारतीय पक्षियों के साथ बिताए। परिंदों के विषय में इनका ज्ञान इतना अधिक था कि लोग उन्हें परिंदों का चलता-फिरता विश्वकोश कहने लगे थे। उन्होंने पक्षियों का अध्ययन ही नहीं किया बल्कि प्रकृति संरक्षण की दिशा में भी बहुत काम किया। उन्हें 5 लाख रुपया का अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होंने मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी को समर्पित कर दिया। सन 1983 में उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से भी अलंकृत किया गया था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी।
निधन – Salim Ali Died
91 साल का यह पक्षी विज्ञानी 27 जुलाई, 1987 को अल्लाह को प्यारा हो गया। डॉ सालिम अली भारत में एक ‘पक्षी अध्ययन व शोध केन्द्र’ की स्थापना करना चाहते थे। इनके महत्वपूर्ण कार्यों और प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में अहम् योगदान के मद्देनजर ‘बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ और ‘पर्यावरण एवं वन मंत्रालय’ द्वारा कोयम्बटूर के निकट ‘अनाइकट्टी’ नामक स्थान पर ‘सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र’ स्थापित किया गया।
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Gk Skill की इस पोस्ट में सालिम अली (Salim Ali ) से जुड़े महत्वपूर्ण एवं रोचक तथ्य जैसे उनकी व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षा तथा करियर, उपलब्धि तथा सम्मानित पुरस्कार और भी अन्य जानकारियाँ। इस पोस्ट में दिए गए सालिम अली (Salim Ali ) से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्रित किया गया है जिसे पढ़कर आपको प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में मदद मिलेगी और आप इनके बारे में अपनी जानकारी बड़ा पाएंगे । Salim Ali Biography and Interesting Facts in Hindi.
स्मरणीय बिंदु:-
- सलीम अली को “भारत के बर्ड मैन” के नाम से जाना जाता है!
सालिम अली की जीवनी (Salim Ali Biography ):-
पूरा नाम- सालिम मुईनुद्दीन अब्दुल अली
जन्म ( Born) – 12 नवंबर 1896
मृत्यु (Died) – 20 जून 1987
जन्म स्थान- मुंबई
पिता -मोइज़ुद्दीन
माता – ज़ीनत-उन-निस्सा
सालिम अली (Salim Ali )
- सालिम मुईनुद्दीन अब्दुल अली एक भारतीय पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी थे
- उन्हें “भारत के बर्डमैन” के रूप में जाना जाता है
- इनके जन्मदिन 12 नवंबर को राष्ट्रीय पक्षी दिवस के रूप में मनाया जाता है
- सालिम अली भारत के ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत भर में व्यवस्थित रूप से पक्षी सर्वेक्षण का आयोजन किया
- पक्षियों पर लिखी उनकी किताबों ने भारत में पक्षी-विज्ञान के विकास में काफी मदद की है
- 1947 के बाद वे बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के प्रमुख व्यक्ति बने और संस्था की खातिर सरकारी सहायता के लिए उन्होंने अपने प्रभावित किया
- भरतपुर पक्षी अभयारण्य (केवलादेव नेशनल पार्क) के निर्माण और एक बाँध परियोजना को रुकवाने पर उन्होंने काफी जोर दिया जो कि साइलेंट वेली नेशनल पार्क के लिए एक खतरा थी
- सालिम अली का जन्म बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में 12 नवंबर 1896 को हुआ
- वे अपने परिवार में सबसे छोटे और नौंवे बच्चे थे
- जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन का स्वर्गवास हो गया और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता ज़ीनत-उन-निस्सा का भी देहांत हो गया
- बच्चों का बचपन मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और बेऔलाद चाची, हमिदा बेगम की देख-रेख में मुंबई की खेतवाड़ी इलाके में एक मध्यम वर्ग परिवार में हुआ
- उनके एक और चाचा अब्बास तैयाबजी थे जो कि प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे
- बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बी॰एन॰एच॰एस॰) के सचिव डबल्यू॰एस॰ मिलार्ड की देख-रेख में सालिम ने पक्षियों पर गंभीर अध्ययन करना शुरू किया
- मिलार्ड ने सालिम को पक्षियों के संग्रह करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कुछ किताबें दी जिसमें कहा कि कॉमन बर्ड्स ऑफ मुंबई भी शामिल थी और छाल निकालने और संरक्षण में उन्हें प्रशिक्षित करने की पेशकश की
- युवा सालिम की मुलाकात (बाद के अध्यापक) नोर्मन बॉयड किनियर से हुई, जो कि बी॰एन॰एच॰एस॰ में प्रथम पेड क्यूरेटर थे, जिन्हें बाद में ब्रिटिश संग्रहालय से मदद मिली थी
- उनकी आत्मकथा द फॉल ऑफ ए स्पैरो में अली ने पीले-गर्दन वाली गौरैया की घटना को अपने जीवन का परिवर्तन-क्षण माना है क्योंकि उन्हें पक्षी-विज्ञान की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा वहीं से मिली थी
- उनकी प्रारंभिक रूचि भारत में शिकार से संबंधित किताबों पर थी, लेकिन बाद में उनकी रूचि स्पोर्ट-शूटिंग की दिशा में आ गई
- आस-पड़ोस में अक्सर शूटिंग प्रतियोगिता का आयोजन होता था जहाँ वे पले-बढ़े थे और उनके खेल साथियों में इसकंदर मिर्ज़ा भी थे, जो बाद में पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति बने
- बीमारी के कारण बड़ी मुश्किल से सालिम ने 1913 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण हो पाए
- भारत सरकार ने 1958 में उन्हें पद्म भूषण और 1976 में पद्म विभूषण पुरस्कार से नवाजा 1985 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था
- 20 जून, 1987 को उनका निधन हुआ था
सालिम अली (Salim Ali ) से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर जो प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं। यह उन विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। यह प्रश्नोत्तरी एसएससी (SSC), यूपीएससी (UPSC), रेलवे (Railway), बैंकिंग (Banking) तथा अन्य परीक्षाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (FAQs):
- बर्डमैन ऑफ इंडिया के नाम से विख्यात हैं?
हमारा उद्देश्य उन सभी छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की सभी समाग्री उपलब्ध कराना है जो पैसे ना होने की वजह से इन पुस्तकों को खरीदने में दिक्कत होती हैं और अपने सपनों को पूरे नही कर पाते है, धन्यवाद. मिलार्ड ने सलीम के अन्दर पक्षियों के प्रति जिज्ञासा बढ़ाई और बालक सलीम को पक्षियों के अध्ययन के लिए उत्साहित किया जिसके स्वरुप सलीम ने गंभीर अध्ययन करना शुरू किया। मिलार्ड ने सोसायटी में संग्रहीत सभी पक्षियों को सलीम को दिखाना प्रारंभ किया और पक्षियों के संग्रहण के लिए प्रोत्साहित भी किया। उन्होंने सलीम को कुछ किताबें भी दी जिसमें ‘कॉमन बर्ड्स ऑफ मुंबई’ भी शामिल थी। मिल्लार्ड ने सलीम को पक्षियों के छाल निकालने और संरक्षण में प्रशिक्षित करने की पेशकश भी की। उन्होंने ने ही युवा सलीम की मुलाकात नोर्मन बॉयड किनियर से करवाई, जो कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी में प्रथम पेड क्यूरेटर थे।
सलीम की प्रारंभिक रूचि शिकार से संबंधित किताबों पर थी जो बाद में स्पोर्ट-शूटिंग की दिशा में आ गई जिसमें उनके पालक-पिता अमिरुद्दीन ने उन्हें काफी प्रोत्साहित भी किया। उनके आस-पड़ोस में अक्सर शूटिंग प्रतियोगिता का आयोजन होता था।
प्राथमिक शिक्षा के लिए सलीम और उनकी दो बहनों का दाखिला गिरगाम स्थित ज़नाना बाइबिल मेडिकल मिशन गर्ल्स हाई स्कूल और बाद में मुंबई के सेंट जेविएर में कराया गया। जब वे 13 साल के थे तब गंभीर सिरदर्द की बीमारी से पीड़ित हुए, जिसके कारण उन्हें उन्हें अक्सर कक्षा छोड़ना पड़ता था। किसी ने सुझाव दिया कि सिंध की शुष्क हवा से शायद उन्हें ठीक होने में मदद मिले इसलिए उन्हें अपने एक चाचा के साथ रहने के लिए सिंध भेज दिया गया। वे लंबे समय के बाद सिंध से वापस लौटे और बड़ी मुश्किल से सन 1913 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की।
बर्मा और जर्मनी में प्रवास
सलीम अली ने प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से ग्रहण की पर कॉलेज का पहला साल ही मुश्किलों भरा था जिसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के वोलफ्रेम (टंग्सटेन) माइनिंग और इमारती लकड़ियों के व्यवसाय की देख-रेख के लिए टेवोय, बर्मा (टेनासेरिम) चले गए। यह स्थान सलीम के अभिरुचि में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि यहाँ पर घने जंगले थे जहाँ इनका मन तरह-तरह के परिन्दों को देखने में लगता।
लगभग 7 साल बाद सलीम अली मुंबई वापस लौट गए और पक्षी शास्त्री विषय में प्रशिक्षण लिया और बंबई के ‘नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के म्यूज़ियम में गाइड के पद पर नियुक्त हो गये। बहुत समय बाद इस कार्य में उनका मन नहीं लगा तो अवकास लेकर जर्मनी जाकर पक्षी विज्ञान में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया। जब एक साल बाद भारत लौटे तब पता चला कि इनका पद ख़त्म हो चुका था। सलीम अली की पत्नी के पास कुछ रुपये थे जिससे उन्होंने बंबई बन्दरगाह के पास किहिम नामक स्थान पर एक छोटा सा मकान ले लिया।
बर्डमैन ऑफ़ इंडिया
डॉ सलीम अली ने अपना पूरा जीवन पक्षियों के लिए समर्पित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली परिंदों की ज़ुबान समझते थे। उन्होंने पक्षियों के अध्ययन को आम जनमानस से जोड़ा और कई पक्षी विहारों की तामीर में अग्रणी भूमिका निभाई।
उन्होंने पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों के बारे में अध्ययन के लिए देश के कई भागों और जंगलों में भ्रमण किया। कुमाऊँ के तराई क्षेत्र से डॉ अली ने बया पक्षी की एक ऐसी प्रजाति ढूंढ़ निकाली जो लुप्त घोषित हो चुकी थी। साइबेरियाई सारसों की एक-एक आदत की उनको अच्छी तरह पहचान थी। उन्होंने ही अपने अध्ययन के माध्यम से बताया था कि साइबेरियन सारस मांसाहारी नहीं होते, बल्कि वे पानी के किनारे पर जमी काई खाते हैं। वे पक्षियों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते थे और उन्हें बिना कष्ट पहुंचाए पकड़ने के 100 से भी ज़्यादा तरीक़े उनके पास थे। पक्षियों को पकड़ने के लिए डॉ सलीम अली ने प्रसिद्ध ‘गोंग एंड फायर’ व ‘डेक्कन विधि’ की खोज की जिन्हें आज भी पक्षी विज्ञानियों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
जर्मनी के ‘बर्लिन विश्वविद्यालय’ में उन्होंने प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक इरविन स्ट्रेसमैन के देख-रेख में काम किया। उसके बाद सन 1930 में वे भारत लौट आये और फिर पक्षियों पर और तेजी से कार्य प्रारंभ किया। देश की आज़ादी के बाद डॉ सलीम अली ‘बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’ (बीएनएसच) के प्रमुख लोगों में रहे। भरतपुर पक्षी विहार की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही।
लेखन कार्य
सन 1930 में सलीम अली ने अपने अनुसन्धान और अध्ययन पर आधारित लेख लिखे। इन लेखों के माध्यम से लोगों को उनके कार्यों के बारे में पता चला और उन्हें एक ‘पक्षी शास्त्री’ के रूप में पहचाना मिली। लेखों के साथ-साथ सलीम अली ने कुछ पुस्तकें भी लिखीं। वे जगह जगह जाकर पक्षियों के बारे में जानकारी इकठ्ठी करते थे। उन्होंने इन जानकारियों के आधार पर एक पुस्तक तैयार की जिसका नाम था ‘द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स’। सन 1941 में प्रकाशित इस पुस्तक ने रिकॉर्ड बिक्री की। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी पुस्तक ‘हैण्डबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एण्ड पाकिस्तान’ भी लिखी, जिसमें सभी प्रकार के पक्षियों, उनके गुणों-अवगुणों, प्रवासी आदतों आदि से संबंधित अनेक रोचक और मतवपूर्ण जानकारियां दी गई थी। डॉ सलीम अली ने एक और पुस्तक ‘द फाल ऑफ़ ए स्पैरो’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का ज़िक्र किया है।
सम्मान और पुरस्कार
डॉ सलीम अली ने प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस दिशा में उनके कार्यों के मद्देनजर उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान दिए गए। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी। उनके महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए उन्हें भारत सरकार ने भी उन्हें सन 1958 में पद्म भूषण व 1976 में पद्म विभूषण जैसे महत्वपूर्ण नागरिक सम्मानों से नवाजा।
निधन
27 जुलाई 1987 को 91 साल की उम्र में डॉ.
जिसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, बॉम्बे आगे की शिक्षा ग्रहण की. इसमें पक्षियों की उपस्थिति, आवास, प्रजनन आदतों, प्रवासन आदि शामिल हैं.
सलीम अली पुरस्कार और उपलब्धियां (Salim Ali Awards and Achievements)
- भारत सरकार ने उन्हें 1958 में पद्म भूषण और 1976 में पद्म विभूषण पुरूस्कार से अलंकृत किया था.
- सलीम अली 1967 में ब्रिटिश ऑर्निथोलॉजिस्ट यूनियन के स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले पहले गैर-ब्रिटिश नागरिक थे.
- उन्हें 1969 में नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ के जॉन सी फिलिप्स स्मारक पदक प्रदान किया था.
- 1973 में, यू.एस.एस.आर.मिलार्ड से सलीम की मुलाकात कराई.
पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली (बर्डमैन) की जीवनी, कहानी, करियर, पुस्तकें और उपलब्धियां | Birdman Salim Ali Biography, Story, Career, Books and Awards in Hindi
सलीम अली एक भारतीय ऑर्निथोलॉजिस्ट और प्रकृतिवादी थे, जिन्हें अक्सर “बर्ड मैन ऑफ़ इंडिया” के रूप में जाना जाता हैं. यह आम आदमी के बीच एक लोकप्रिय पुस्तक के रूप में स्थापित हो गई.
90 वर्ष की उम्र में 20 जून 1987 को उनकी मृत्यु हो गई. सालिम अली का निधन मुंबई में हुआ। डॉ सलीम अली भारत में एक ‘पक्षी अध्ययन व शोध केन्द्र’ की स्थापना करना चाहते थे। इनके महत्वपूर्ण कार्यों और प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में अहम् योगदान के मद्देनजर ‘बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ और ‘पर्यावरण एवं वन मंत्रालय’ द्वारा कोयम्बटूर के निकट ‘अनाइकट्टी’ नामक स्थान पर ‘सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र’ स्थापित किया गया।