Shiv prasad singh biography of abraham
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SHIV PRASAD SINGH
शिवप्रसाद सिंह (अंग्रेज़ी: Dr. शिवप्रसाद सिंह ने एम.ए. शिवप्रसाद सिंह का जन्म 19 अगस्त, 1928 को बनारस के जलालपुर गांव में एक ज़मींदार परिवार में हुआ था। वे प्रायः अपने बाबा के जमींदारी वैभव की चर्चा किया करते; लेकिन उस वातावरण से असंपृक्त बिलकुल पृथक् संस्कारों में उनका विकास हुआ। उनके विकास में उनकी दादी मां, पिता और माँ का विशेष योगदान रहा, इस बात की चर्चा वे प्रायः करते थे। दादी माँ की अक्षुण्ण स्मृति अंत तक उन्हें रही और यह उसी का प्रभाव था कि उनकी पहली कहानी भी 'दादी मां' थी, जिससे हिन्दीकहानी को नया आयाम मिला। 'दादी मां' से नई कहानी का प्रवर्तन स्वीकार किया गया और यही नहीं, यही वह कहानी थी जिसे पहली आंचलिक कहानी होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। तब तक रेणु का आंचलिकता के क्षेत्र में आविर्भाव नहीं हुआ था। बाद में डॉ.
Through his evocative prose and vivid characters, Singh captured the essence of rural life, shedding light on the struggles and aspirations of ordinary people.
Beyond his literary contributions, Singh’s legacy endures through the impact he had on aspiring writers and future generations. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी से प्रभावित थे, लेकिन डॉ.
His schooling was done at Uday Pratap College, Benares. (A-III/COMP.), RAJASTHAN, JAIPUR
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शिवप्रसाद सिंह | |
| पूरा नाम | डॉ.
शिवप्रसाद सिंह ने अपनी कहानियों में आंचलिकता के जो प्रयोग किए वह प्रेमचंद और रेणु से पृथक् थे। एक प्रकार से दोनों के मध्य का मार्ग था; और यही कारण था कि उनकी कहानियां पाठकों को अधिक आकर्षित कर सकी थीं। इसे विडंबना कहा जा सकता है कि जिसकी रचनाओं को साहित्य की नई धारा के प्रवर्तन का श्रेय मिला हो, उसने किसी भी आंदोलन से अपने को नहीं जोड़ा। वे स्वतंत्र एवं अपने ढंग के लेखन में व्यस्त रहे और शायद इसीलिए वे कालजयी कहानियां और उपन्यास लिख सके। शिक्षा1949 में उदय प्रताप कॉलेज से इंटरमीडिएट कर शिवप्रसाद जी ने 1951 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. शिवप्रसाद सिंह ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उनके जीवन का बेहद दुःखद प्रसंग था उनकी पुत्री मंजुश्री की मृत्यु। उससे पहले वे दो पुत्रों को खो चुके थे; लेकिन उससे वे इतना न टूटे थे जितना मंजुश्री की मृत्यु ने उन्हें तोड़ा था। वे उसे सर्वस्व लुटाकर बचाना चाहते थे। बेटी की दोनों किडनी खराब हो चुकी थीं। वे उसे लिए दिल्ली से दक्षिण भारत तक भटके थे। अपनी किडनी देकर उसे बचाना चाहते थे, लेकिन नहीं बचा सके थे। उससे पहले चार वर्षों से वे स्वयं साइटिका के शिकार रहे थे, जिससे लिखना कठिन बना रहा था। मंजुश्री की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया था। आहत लेखक लगभग विक्षिप्त-सा हो गया था। उनकी स्थिति से चिंतित थे डॉ. शिवप्रसाद सिंह |
| जन्म | 19 अगस्त, 1928 |
| जन्म भूमि | जलालपुर गांव, बनारस, उत्तर प्रदेश |
| मृत्यु | 28 सितंबर, 2008 |
| कर्म भूमि | भारत |
| कर्म-क्षेत्र | साहित्यकार, अध्यापक |
| मुख्य रचनाएँ | 'नीला चांद', 'कर्मनाशा की हार', 'धतूरे का फूल', 'नन्हों', 'एक यात्रा सतह के नीचे', 'राग गूजरी', 'मुरदा सराय', 'कोहरे में युद्ध', 'दिल्ली दूर है', 'शैलूष' आदि |
| विषय | उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना |
| भाषा | हिन्दी |
| विद्यालय | बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय |
| शिक्षा | एम.ए., पीएच.डी |
| पुरस्कार-उपाधि | व्यास सम्मान (1992), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1990) |
| नागरिकता | भारतीय |
| अन्य जानकारी | डॉ.
(AGRICULTURE ENTOMOLOGY (SPECIALI.IN SERICULTURE)),M.Sc. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी और द्विवेदी जी ने अज्ञेय जी को कहा था कि वे उन्हें बुलाकर कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर ले जाएं, स्थान परिवर्तन से शिवप्रसाद सिंह शायद ठीक हो जाएंगे। साहित्य के महाबली डॉ. किया था। स्वर्ण पदक विजेता डॉ. शिवप्रसाद सिंह अस्पताल की शय्या पर ऊब गए थे। उन्हें अपनी मृत्यु का आभास भी हो गया था शायद। वे अपने बेटे नरेंद्र से काशी ले जाने की जिद करते, जिसके सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को वे अपने तीन उपन्यासों- 'नीला चांद', 'गली आगे मुड़ती है' और 'वैश्वानर' में जी चुके थे; जिसे विद्वानों ने इतालवी लेखक लारेंस दरेल के 'एलेक्जेंड्रीया क्वाट्रेट' की तर्ज पर ट्रिलाजी कहा था। वे कहते- "जो होना है वहीं हो" और वे 7 सितंबर, 2008 को 'सहारा' की 9 बजकर 20 मिनट की फ्लाइट से बनारस गए थे। उनके पुत्र नरेंद्र जानते थे कि वे अधिक दिनों साथ नहीं रहेंगे। उन्हें फेफड़ों का कैंसर था; लेकिन इतनी जल्दी साथ छोड़ देंगे, यह कल्पना से बाहर था। 28 सितंबर, 2008 को सुबह चार बजे डॉ. शिवप्रसाद सिंह 'रेलवे बोर्ड के राजभाषा विभाग' के मानद सदस्य भी रहे और साहित्य अकादमी, बिरला फाउंडेशन, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान जैसी अनेक संस्थाओं से किसी-न-किसी रूप में संबद्ध रहे। |
| अद्यतन | 13:03, 11 सितम्बर 2021 (IST) |
| इन्हें भी देखें | कवि सूची, साहित्यकार सूची |
डॉ.
शिवप्रसाद सिंह उन बिरले लेखकों में थे, जो किसी विषय विशेष पर कलम उठाने से पूर्व विषय से संबंधित तमाम तैयारी पूरी करके ही लिखना प्रारंभ करते थे। 'नीला चांद', 'कोहरे में युद्ध', 'दिल्ली दूर है' या 'शैलूष' इसके जीवंत उदाहरण हैं। 'वैश्वानर' पर कार्य करने से पूर्व उन्होंने संपूर्ण वैदिक साहित्य खंगाल डाला था और कार्य के दौरान भी जब किसी नवीन कृति की सूचना मिली, उन्होंने कार्य को वहीं स्थगित कर जब तक उस कृति को उपलब्ध कर उससे गुजरे नहीं, 'वैश्वानर' लिखना स्थगित रखा। किसी भी जिज्ञासु की भांति वे विद्वानों से उस काल पर चर्चा कर उनके मत को जानते थे। 1993 के दिसंबर में वे इसी उद्देश्य से डॉ.
His writings continue to resonate with readers, offering profound insights into the human experience and the complexities of Indian society. Historical contents includes World History, Indian History, and what happened today.