Hindi poet kabir das wikipedia

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कबीर दास ने मुख्य रूप से ‘सधुक्कड़ी’ भाषा में रचना की थी। 

आशा है कि आपको संत कबीर दास का जीवन परिचय पर हमारा यह ब्लॉग पसंद आया होगा। ऐसे ही अन्य प्रसिद्ध कवियों और महान व्यक्तियों के जीवन परिचय को पढ़ने के लिए Leverage Edu के साथ बने रहें।

नीरज

नीरज वर्तमान में Leverage Edu के स्टडी अब्रॉड प्लेटफॉर्म में एसोसिएट कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें स्टडी अब्रॉड, करंट अफेयर्स, NEET परीक्षा, ट्रेंडिंग इवेंट्स, स्टोरी राइटिंग और साहित्यिक विषयों पर लेखन का तीन वर्षों से अधिक का अनुभव है। इससे पहले वे upGrad Campus, Neend App और ThisDay App में कंटेंट राइटर और कंटेंट डेवलपर रह चुके हैं। उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से हिंदी में और दिल्ली विश्वविद्यालय से बौद्ध अध्ययन में मास्टर डिग्रियाँ प्राप्त की हैं। उनसे [email protected] या LinkedIn प्रोफाइल के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।

Kabir Das and the Bhakti Movement: Dohas, Naam, Anti-Caste Devotion, and a Shared Heritage

For Hindus for Human Rights, Kabir’s enduring relevance isn’t only literary—it’s ethical.

संत कबीरदास (Kabirdas) या कबीर (Kabir), कबीर साहेब (Kabir Saheb) 15वीं सदी के हिंदी साहित्य में भक्तिकाल के सबसे प्रमुख कवि और विचारक माने जाते हैं। वे भक्तिकाल की निर्गुण भक्ति धारा की “ज्ञानमार्गी” उपशाखा से संबंधित थे। कबीर दास जी ने अपने दोहों और पदों के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधविश्वास, आडंबर और पाखंड का विरोध किया और सरलता व भक्ति का संदेश दिया।

कबीरदास का विस्तृत जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, कवि परिचय एवं भाषा शैली और उनकी प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ आगे दिया गया है। जो प्रतियोगी और बोर्ड परीक्षाओं के लिए अति महत्वपूर्ण है।

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पूरा नामसंत कबीरदास
उपाधिसंत
अन्य नामकबीरदास, कबिरा, कबीर
जन्म1398 ई०, लहरतारा, काशी, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु1518 ई०, मगहर, उत्तर प्रदेश, भारत
मातानीमा
पितानीरू
पत्नीलोई
पुत्रकमाल
पुत्रीकमाली
शिक्षानिरक्षर
भाषाअवधी, सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी
रचनाएंसाखी, सबद, रमैनी
कार्यक्षेत्रकवि, समाज सुधारक, बुनकर

प्रश्न 1.

कबीर दास का विवाह किससे हुआ था?

कबीर दास का विवाह ‘लोई’ नाम की एक स्त्री से हुआ था जिससे इनके दो बच्चे भी हुए थे जिनके नाम हैं- कमाल (पुत्र) और कमाली (पुत्री) ।

हिन्दी साहित्य के अन्य जीवन परिचय

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संत कबीर दास का जीवन परिचय, साहित्यिक रचनाएं, भाषा शैली और प्रसिद्ध दोहे

संत कबीर दास 15वीं सदी में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के सबसे प्रसिद्ध कवि एवं विचारक माने जाते हैं। उनका संबंध भक्तिकाल की निर्गुण शाखा ‘ज्ञानमार्गी उपशाखा’ से था। इनकी रचनाओं और गंभीर विचारों ने भक्तिकाल आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया था। इसके साथ ही उन्होंने उस समय समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांडों, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना की। उनकी रचनाओं के कुछ अंश सिक्खों के ‘आदि ग्रंथ’ में भी सम्मिलित किए गए हैं। इस लेख में संत कबीर दास का जीवन परिचय और उनकी साहित्यिक रचनाओं की जानकारी दी गई है।  

नामसंत कबीर दास
जन्म स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
पिता का नामनीरू
माता का नामनीमा
पत्नी का नामलोई
संतान कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)
मुख्य रचनाएं साखी, सबद, रमैनी
काल भक्तिकाल 
शाखा ज्ञानमार्गी शाखा

कबीर दास का जन्म 

संत कबीर दास का जन्म कब हुआ, यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। परन्तु ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म 14वीं-15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) में हुआ था। कबीर के जन्म के बारे में कई किवदंतियाँ हैं, जिनमें एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था, जिसने उन्हें जन्म के तुरंत बाद ही नदी में बहा दिया था।

नीरू और नीमा नामक एक जुलाहा दंपति को वे नदी किनारे मिले, जिन्होंने उनका पालन-पोषण किया। कबीर के गुरु का नाम ‘संत स्वामी रामानंद’ था। उनका विवाह ‘लोई’ नामक महिला से हुआ था, जिनसे उन्हें ‘कमाल’ और ‘कमाली’ नामक दो संतानें प्राप्त हुईं। अधिकांश विद्वानों के अनुसार संत कबीर का सन 1575 के आसपास मगहर में स्वर्गवास हुआ था। 

कबीर दास की साहित्यिक रचनाएं 

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने अपनी वाणी से स्वयं ही कहा है “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ”। इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपनी रचनाएँ स्वयं नहीं लिखीं। इसके बावजूद, उनके वचनों का संकलन कई प्रमुख ग्रंथों में मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बाद में उनके शिष्यों ने उनके वचनों को संकलित कर ‘बीजक’ नामक ग्रंथ की रचना की।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि, “कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें संत-मेंत में मिली वस्तु थी, उनका लक्ष्य लोकहित था।” कबीर की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार हैं:-

रचनाअर्थप्रयुक्त छंदभाषा
साखीसाक्षीदोहाराजस्थानी पंजाबी मिली खड़ी बोली
सबदशब्दगेय पदब्रजभाषा और पूर्वी बोली
रमैनीरामायणचौपाई और दोहाब्रजभाषा और पूर्वी बोली

संत कबीर दास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था वे साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते रहते थे इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया था। इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारो और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। जिसे स्थानीय लोग उनकी वचनो को भली भांति समझ जाते थे। उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है।

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कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे 

संत कबीरदास ने अपने जीवनभर लोककल्याण के लिए उपदेश दिए और समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा आडंबरों का निर्भीकता से विरोध किया। हिंदी साहित्य में उन्हें एक महान कवि का स्थान प्राप्त है। उनके अनमोल विचार आज भी पढ़े जाते हैं। उनके कुछ शिक्षाप्रद दोहे निम्नलिखित हैं:-

“माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।” 

“पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ !

कबीर का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखिए।

कबीर का जन्म सन् 1398 ई. घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!”

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाय । बलिहारी गुरु आपने , गोविंद दियो मिलाय।।”

“यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।”

“उजला कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं॥”

“निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें । बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।”

“प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए । राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए।”

“जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान । जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण।”

“मैं-मैं बड़ी बलाइ है, सकै तो निकसो भाजि । कब लग राखौ हे सखी, रूई लपेटी आगि॥”

“चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये । दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।”

“तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार।”

“जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि॥”

“कबीर’ नौबत आपणी, दिन दस लेहु बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ॥”

“जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप । जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।”

“ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।”

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संत कबीर दास की जयंती 2026

संत कबीर दास जी की जयंती प्रतिवर्ष जेयष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष यह तिथि सोमवार 29 जून, 2026 को पड़ रही है। इसलिए आज पूरे देशभर में कबीर दास जी की जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर लोग अपने प्रियजनों, सगे-संबंधियों और मित्रों को शुभकामना संदेश भेजते हैं। इस दिन को विशेष बनाने के लिए लोग सत्संग, कीर्तन और विचार गोष्ठियों का आयोजन भी करते हैं। वहीं कई स्थानों पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है जो कबीर मंदिरों तक जाती है।

FAQs

संत कबीर दास का जन्म कहाँ हुआ था?

कबीरदास का जीवन-परिचय देते हुए उनकी प्रमुख कृतियों का उल्लेख कीजिए।

कबीर के जीवन-परिचय का विवरण प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ हैं- ‘कबीर चरित्र बोध‘, ‘भक्तमाल‘, ‘कबीर परिचयी‘ किन्तु इनमें दिए गए तथ्यों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। इन ग्रन्थों के आधार पर जो निष्कर्ष कबीर के सम्बन्ध में विद्वानों ने निकाले हैं उनका सार इस प्रकार है:

कबीर दास का जीवन परिचय : Sant Kabir Ka Jivan Parichay

कबीर का जन्म सम्वत् 1555 (सन् 1398 ई.) में हुआ था। जनश्रुति के अनुसार उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ जिसने लोकलाज के भय से उन्हें त्याग दिया। एक जुलाहा दम्पति नीमा और नीरू को वे लहरतारा नामक तालाब के किनारे पड़े हुए मिले जिसने उनका पालन-पोषण किया। उन्हें ही कबीर के माता-पिता कहा जाता है। कबीर के गुरु प्रसिद्ध सन्त रामानन्द थे। कबीर के जन्म के सम्बन्ध में एक दोहा बहुत प्रचलित है:

चौदह सौ पचपन साल गए चन्द्रवार एक ठाट ठए।
जेठ सुदी बरसाइत को पूरनमासी प्रगट भए॥

जनश्रुतियों के अनुसार कबीर की पत्नी का नाम लोई था जिससे उन्हें दो सन्तानें, पुत्र कमाल और पुत्री कमाली प्राप्त हुई, किन्तु कुछ विद्वान कबीर के विवाहित होने का खण्डन करते हैं।

कबीर की मृत्यु 120 वर्ष की आयु में सम्बत् 1575 (1518 ई.) में मगहर में हुई थी। मगहर में जाकर उन्होंने इसलिए मृत्यु का वरण किया, क्योकि वे जनमानस में व्याप्त इस अन्धविश्वास को गलत सिद्ध करना चाहते थे कि मगहर में शरीर त्यागने वाले व्यक्ति को नरक मिलता है और काशी में मरने वाले को स्वर्ग।

जीवन-पर्यन्त अन्धविश्वास एवं रूढ़ियों का खण्डन करने वाले इस सन्त ने अपनी मरण बेला में भी अन्धविश्वास का खण्डन करने का प्रयास किया और सही अर्थों में समाज-सुधारक होने का परिचय दिया।

कबीर का साहित्यिक परिचय

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यौ नहीं हाथ।” वे अपनी अनुभूतियों को कविता के रूप में व्यक्त करने में कुशल थे। उनकी कविताओं का संग्रह एवं संकलन बाद में उनके भक्तों ने किया।

साहित्यिक रचनाएं एवं कृतियां

कबीर की रचनाओं का संकलन ‘बीजक‘ नाम से किया गया है, जिसके तीन भाग है- (1) साखी, (2) सबद, और (3) रमैनी।

  1. साखी– दोहा छन्द्र में लिखी गई है तथा कबीर की शिक्षाओं एवं सिद्धान्तों का विवेचन इसकी विषय-वस्तु में हुआ है।
  2. सबद– कबीरदास के पदो को ‘सबद’ कहा जाता है। ये पद गेय हैं तथा इनमें संगीतात्मकता विद्यमान है। इन्हें विविध राग-रागिनियों में निबद्ध किया जा सकता है। रहस्यवादी भावना एवं अलीकिक प्रेम की अभिव्यक्ति इन पदों में हुई है।
  3. रमैनी– रमैनी की रचना चौपाइयों में हुई है। कबीर के रहस्यवादी एवं दार्शनिक विचारों की अभिव्यक्ति इसमें हुई है।

अवश्य पढ़ें: कबीर के दोहे।

भाषा शैली

संत कबीर दास जी एक विद्वान संत थे जिन्हें कई भाषाओं का गहरा ज्ञान था। साधु-संतों के साथ विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करने के कारण उन्होंने विभिन्न भाषाओं का अनुभव प्राप्त किया। कबीरदास जी अपनी वाणी में स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग करते थे ताकि आम लोग उनके विचारों और अनुभवों को आसानी से समझ सकें। उनकी भाषा में सरलता और स्पष्टता थी, और इसे ‘सधुक्कड़ी‘ भाषा के नाम से भी जाना जाता है।

हिन्दी साहित्य में स्थान

ज्ञानमार्गी कबीर दास का हिन्दी साहित्य में मूर्धन्य स्थान है। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में सत्य और पावनता पर बल दिया। समाज सुधार, राष्ट्रीय और धार्मिक एकता उनके उपदेशों का काव्यमय स्वरूप था। तत्कालीन समाज की विसंगतियों और विषमताओं को उन्होंने निद्वन्द्व भाव से अपनी साखियों के माध्यम से व्यक्त किया। वे सारग्रही महात्मा थे। अनुभूति की सच्चाई एवं अभिव्यक्ति की ईमानदारी उनका सबसे बड़ा गुण था। भारत की जनता को तुलसीदास के अतिरिक्त जिस दूसरे कवि ने सर्वाधिक प्रभावित किया, वे कबीरदास ही हैं। उनकी शिक्षाएं आज भी हमारे लिए उपयोगी एवं प्रासंगिक हैं।

प्रश्न 2.

Kabir’s dohas are often taught and recited because they compress big spiritual ideas into direct, everyday language.

What is the Bhakti movement, and how is Kabir connected to it?

The Bhakti movement refers to devotional traditions that emphasize a direct relationship with the divine. He is closely associated with Varanasi in present-day Uttar Pradesh and is described as belonging to the julaha (weaver) community.

Why is Kabir so famous and so frequently searched today?

Kabir remains famous because his poetry is short, memorable, and radical in tone—focused on devotion, truth-telling, and inner transformation rather than religious performance.

Kabir is commonly associated with Bhakti because his poetry centers devotion (bhakti), inner experience, and spiritual truth over external ritual.

What is “Naam,” and why does Kabir emphasize it?

Naam means the name of God—a focus of devotional remembrance and practice. From a Hindus for Human Rights perspective, Kabir can be engaged as part of a longer moral vocabulary that supports human dignity, resists hierarchy, and pushes back on exclusion—without pretending the past was perfect.

What does Kabir offer to conversations about progressive Hinduism and human rights?

Kabir offers a way to talk about faith and justice together: devotion as ethics, spirituality as responsibility, and tradition as something we interpret toward dignity.

कबीर दास की मुख्य रचनाएँ ‘साखी’, ‘सबद’ और ‘रमैनी’ हैं।

कबीर दास ने किस भाषा में रचना की थी? “कबीर एक समाज सुधारक कवि थे” इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
अथवा– “कबीर काव्य का मुख्य स्वर समाज सुधार है” सोदाहरण पुष्टि कीजिए।
अथवा– ‘कबीर भक्त और कवि बाद में थे, समाज सुधारक पहले थे’ इस कथन की विवेचना उदाहरण सहित कीजिए।
अथवा– “कबीर की रचनाओं का महत्व उनमें निहित सन्देश से है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।

कबीर एक समाज सुधारक कवि – कबीर का सामाजिक परिचय

कबीर की प्रसिद्धि एक समाज सुधारक सन्त कवि के रूप में रही है। उन्होंने अपने समय में व्याप्त सामाजिक रूढ़ियों, अन्धविश्वासों का खण्डन किया तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रशंसनीय प्रयास किया। वे भक्त और कवि बाद में है, समाज सुधारक पहले हैं। उनकी कविता का उद्देश्य जनता को उपदेश देना और उसे सही रास्ता दिखाना था। उन्होंने जो गलत समझा उसका निर्भीकता से खण्डन किया। अनुभूति की सच्चाई और अभिव्यक्ति की ईमानदारी कबीर की सबसे बड़ी विशेषता रही है।

कबीरदास (Kabirdas) का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब समाज में छुआछूत, आडम्बर एवं पाखण्ड का बोलबाला था, हिन्दू-मुसलमानों में पारस्परिक द्वेष एवं वैमनस्य की भावना थी और समाज में जाति प्रथा का विष व्याप्त था। रूढ़ियों एवं अन्धविश्वासों के कारण जनता का शोषण धर्म के ठेकेदार कर रहे थे।

कबीर ने अपने दोहों और पदों के माध्यम से इन सब पर एक साथ प्रहार किया और सरलता एवं भक्ति का संदेश दिया। उन्होंने अपनी बात निर्भीकता से कही तथा हिन्दुओ आर मुसलमान को डटकर फटकारा।

वे सही अर्थों में प्रगतिशील चेतना से युक्त ऐसे कवि थे जो अपार साहस, निर्भीकता एवं सच्चाई के हथियारों से लैस थे। उन्होंने बिना कोई पक्षपात किए हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों की बुराइयों पर प्रहार किया। उनके विचारों में ईश्वर की सच्ची भक्ति के साथ आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों पर बल दिया गया है।

वस्तुतः कबीर भक्त और कवि बाद में, सही अर्थों में समाज-सुधारक पहले थे। कबीर की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि, “कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें संत-मेंत में मिली वस्तु थी, उनका लक्ष्य लोकहित था।

कबीर के समाज सुधारक व्यक्तित्व की विशेषताओं का निरूपण निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है:

मूर्ति पूजा का विरोध

मूर्ति पूजा से भगवान नहीं मिलते। वे कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से भगवान मिल जायें तो मैं पहाड़ पूज सकता है। इससे ता अच्छा है कि लोग घर की चक्की की पूजा करें:

पाहन पूजै हरि मिले तो में पूजूँ पहार।
घर की चाकी कोई न पूजै पीसि खाय संसार।।

जाति-पाति का खण्डन

जाति-पाति का विरोध करते हुए वे कहते हैं कि कोई छोटा-बडा नहीं है। सब एक समान है:

जाति पाँति पूछ नहिं कोई।
हरि को भजैं सो हरि को होई।।

ऊंचा वह नहीं है जिसने उच्च कुल में जन्म लिया है। ऊंचा वह है जिसके कर्म ऊँचे हैं। ब्राह्मण यदि नीच कर्म करता है तो निन्दनीय ही कहा जाएगा:

ऊँचे कुल का जनमिया करनी ऊँच न होय।
सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दत सोय।।

बाह्याडम्बरों का विरोध

कबीर ने रोजा, नमाज, छापा, तिलक, माला, गंगास्नान, तीर्थाटन, आदि का विरोध किया, माला का विरोध करते हुए वे कहते हैं :

माला फेरत जुग गया गया न मन का फेर।
करका मनका डारि के मन का मनका फेर।।

हिंसा का विरोध

कबीर ने जीवहिंसा का विरोध करते हुए लिखा है कि अहिंसा ही परम धर्म है। जो व्यक्ति मांसाहारी हैं उन्हें उसका दण्ड अवश्य मिलता है :

बकरी पाती खात है ताकि काढ़ी खाल।
जे नर बकरी खात हैं तिनके कौन हवाल।।

हिन्दू-मुस्लिम एकता

कबीर चाहते थे कि हिन्दू-मुसलमान प्रेम से रहें, इसलिए उन्होंने राम-रहीम को एक मानते हुए कहा :

दुई जगदीस कहाँ तै आया।
कहु कौने भरमाया।।

ये धर्म के ठेकेदार ही हिन्दुओं-मुसलमानों को परस्पर लड़ाते रहते हैं। वास्तविकता यह है कि राम और रहीम में कोई अन्तर नहीं है।

सदाचरण पर बल

कबीर दास सदाचरण पर बल देते थे। उन्होंने जनता को सत्य, अहिंसा तथा प्रेम का मार्ग दिखाया, वे कहते हैं कि किसी को धोखा नहीं देना चाहिए :

कबिरा आपु ठगाइये आपु न ठगिए कोय।

सत्य का आचरण करने को वे श्रेष्ठ मानते हैं :

साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।
जाके हृदय साँच है ताके हृदय आप।।

कबीरदास ने सत्संग पर विशेष बल देते हुए कहा है:

कबीर संगति साधु की हरै और की व्याधि।
संगति बुरी असाधु की आठों पहर उपाधि।

सामाजिक समन्वय पर बल

कबीर चाहते थे कि हिन्दू और मुसलमानों में भाई-चारे की भावना उत्पन्न हो। वे कहते हैं :

हिन्दू तुरक की एक राह है सतगुरु यहै बताई।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कबीर एक सच्चे समाज सुधारक थे। उनका मार्ग सत्य का मार्ग था। वे ढोंग तथा अन्धविश्वास को समाप्त करना चाहते थे। कबीर नैतिक मूल्यों के पक्षधर ऐसे सन्त कवि थे, जो जनता के पथ प्रदर्शक कहे जा सकते हैं। आचरण की पवित्रता का जो मार्ग उन्होंने जनता के लिए उचित बताया, उस पर स्वयं भी चलकर दिखाया। उन्होंने व्यक्ति के सुधार पर इसलिए बल दिया, क्योंकि व्यक्तियों से ही समाज बनता है। यदि किसी समाज में अच्छे आचरण वाले व्यक्ति प्रचुरता से होंगे तो समाज स्वयमेव ही सुधर जाएगा।

प्रश्न 3.

में में हुआ था। ये दंपति जुलाहे नीमा और नीरू को लहरतारा ताल (काशी) वाराणसी में एक टोकरी में मिले थे। अतः इनके जन्म के विषय में वास्तविक जानकारी ज्ञात नहीं है। अब्दुल्ला नीरू और नीमा को उनके माता-पिता के रूप में माना जाता है। बचपन में उन्होंने अपनी सारी धार्मिक शिक्षा रामानंद नामक गुरु से ली। कबीरदास का विवाह लोई नाम की कन्या से हुआ, विवाह के बाद कबीर और लोई को दो संतानें, लड़के का नाम ‘कमाल’ तथा लड़की का नाम ‘कमाली’ था। कबीर दास की मृत्यु सन् 1518 ईसवीं में मगहर (उत्तर प्रदेश) में हुई।

2.

‘साखी’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए कबीर की साखियों का महत्व प्रतिपादित कीजिए।
अथवा– साखी से क्या अभिप्राय है? This theme is one reason his poetry feels urgent and contemporary across centuries.

What role does a guru (true teacher) play in Kabir’s poetry?

Kabir’s poems often emphasize the spiritual need for a true teacher (guru)—not as a status figure, but as someone who guides a seeker toward clarity, discipline, and truth.

Why is Kabir associated with the weaver (julaha) community?

Kabir is described as belonging to the julaha (weaver) class in Varanasi.

Kabir is widely claimed and loved across Hindu, Sikh, and Sufi lineages, and his poetry is often taught in secular education systems in India and in Indian international schools abroad. कबीर दास के गुरु का क्या नाम था?

कबीर के गुरु महान आचार्य रामानंद थे। स्वामी जगतगुरु श्री रामानन्दाचार्य जी मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के महान सन्त थे। उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाया। स्वामी रामानन्द का जन्म प्रयागराज में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

8.

कबीर की मृत्यु कब और कहाँ हुई?

कबीर दास की मृत्यु सन् 1518 ईसवीं में मगहर, उत्तर प्रदेश, भारत में हुई।

4. That social location matters because it places his voice in the world of working people—not elite institutions—helping explain why his poetry often cuts through hierarchy and speaks in accessible language.

Is Kabir “Hindu” or “Muslim” or something else?

Kabir is widely claimed and loved by multiple communities, including Hindu, Sikh, and Sufi traditions.

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माना जाता है कि संत कबीर दास का जन्म वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। 

कबीर दास के माता-पिता का क्या नाम था?