Short biography saint kabir das in hindi

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संत कबीर दास की कविताओं को दोहा कहा जाता है।

Q : कबीर दास के माता पिता का नाम क्या था?

Ans : उनके पिता नीरू और उनकी माता नीमा थी।

Q : संत कबीर दास की मृत्यु कब हुई ?

Ans : सन् 1519 (विक्रम संवत 1575) मगहर, उत्तर प्रदेश (120 वर्ष)

Q : संत कबीर दास जयंती कब मनायी जाती है ?

Ans : जयंता पूर्णिमा को मनाया जाता है।

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मुझे केवल उतना ही दीजिए जिसमें मैं और मेरा परिवार भूखा ना रहे और दरवाजे पर से कोई वापस न लौटें।

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।

सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।

अर्थ –कबीर दास जी कहते हैं कि जब मेरे अंदर अहम था तब मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई लेकिन जब मुझे हरी मिल गए तो मेरे अंदर से सारा निकल गया या बिल्कुल उसी तरह निकल गया जैसे दीपक जलाने पर सारा अंधियारा मिट जाता है।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।

जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि जब मैं इस संसार में बुरा खोजने चला तो मुझे कोई भी बुरा आदमी नहीं मिला, जब मैंने अपने ही मन में झांक कर देखा तो मुझे पता चला कि संसार में मुझसे बुरा इंसान कोई नहीं है।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय

अर्थ –कबीरदास जी कहते हैं कि हमें कभी अपने जीवन में एक तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकि जो तिनका हमारे पांव के नीचे होता है वही जब आंख में पड़ जाता है तो हमें कष्ट देता है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग इस संसार में जन्म लेते हैं पढ़ते हैं और मर जाते हैं लेकिन कोई भी पंडित नहीं हो पाता जो व्यक्ति प्रेम के ढाई अक्षर को समझ लेता है वह सबसे बड़ा विद्वान होता है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में हर एक काम धीरे-धीरे होता है जिस तरह माली अपने फूलों को 100 घड़े भी  सींच ले लेकिन जब ऋतु आती है तभी उस में फल लगते हैं।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ –कबीरदास जी कहते हैं कि हमें कभी भी साधु की  शरीर नहीं देखनी चाहिए बल्कि हमें उनसे ज्ञान की बातें सीखनी चाहिए जिस प्रकार से तलवार की दुकान पर मूल्य केवल तलवार का होता है ना कि उसकी म्यान का जिसमें वह रखा गया है।

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें ।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ।

अर्थ – 

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर ।

पंछीको छाया नहीं फल लागे अति दूर ।

अर्थ – कबीर कहते हैं कि इतना बड़ा होने से क्या होगा अगर आप किसी की सहायता न कर पाए जिस प्रकार खजूर का पेड़ इतना बड़ा होता है लेकिन वह किसी भी पक्षी को ना तो छाया दे पाता है और उसमें फल भी बहुत दूर लगते हैं।

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये,

ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये

अर्थ –कबीर कहते हैं कि जब हम पैदा हुए थे तो सारा संसार हंसा था और हम रोए थे लेकिन हमें इस संसार में ऐसा काम करके जाना है कि जब हमारी मृत्यु तो हम हंसे और यह पूरा संसार हमारी मृत्यु पर आँसू बहाये ।

मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख,

मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख

अर्थ –कबीरदास जी कहते हैं कि मांगना और मरना एक समान है इसलिए भीख मत मांगो उनके गुरु कह गए हैं कि भीख मांगने से अच्छा मरना है।

लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट ।

अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट ।

अर्थ –कबीरदास जी कहते हैं कि अभी समय है अभी से ही ईश्वर की भक्ति करना प्रारंभ कर दो क्योंकि जब अंत समय आएगा और प्राण छूटने लगेंगे तब पछताने से कुछ भी नहीं होगा।

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य रात में सो कर और दिन में खा कर अपने अमूल्य समय को बर्बाद कर देता है और इस हीरे रूपी जन्म को कौड़ी में बदल देता है।

कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार ।

साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ।

अर्थ – 

तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार ।

सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ।

अर्थ – कबीर का कहना है कि तीरथ जाने से हमें एक फल मिलता है वहीं अगर संत मिल जाए तो हमें चार फल मिलते हैं लेकिन अगर हमारे जीवन में एक अच्छे गुरु मिल जाए तो हमें अनेकों फल मिलते हैं।

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप ।

जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि जहां पर दया होती है वहां धर्म होता है जहां पर लालच होती है वहां पाप होता है और जहां पर क्रोध होता है वहां पर मृत होती है लेकिन जहां पर क्षमा होती है वहां पर स्वयं ईश्वर निवास करते हैं

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पल में परलय होएगी, बहुरि करेगो कब ।

अर्थ – कबीरदास जी कहते हैं जो काम कल करना चाहिए वह आज करो और जो आज करना है वह भी करो क्योंकि समय कब गुजर जाएगा हमें पता नहीं चलेगा और हम पछताते रह जाएंगे।

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।

अर्थ –कबीरदास जी कहते हैं कि मिट्टी कुंभार से कहती है कि तू मुझे क्या  एक दिन ऐसा आएगा जब मैं खुद तुम्हें मिट्टी में मिला दूंगी।

धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर।

अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।

अर्थ –कबीर दास जी कहते हैं कि धर्म का कार्य करने से कभी धन नहीं घटता है ना तो नदी को देखने से उसका पानी कम होता है कबीर जी कहते हैं कि यह उन्होंने अपनी आंखों से देखा है।

माला फेरत जग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ – कबीर दास जी कहते हैं की दिन रात भगवान की पूजा करने से कुछ नहीं होगा जब तक आपका मन अंदर से शुद्ध नहीं है इसीलिए सबसे पहले हमें अपने मन को शुद्ध करना चाहिए।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि ना तो ज्यादा बोलना ही अच्छा है और ना ही ज्यादा चुप रहना अच्छा है उसी तरह ना तो ज्यादा बरसना ही अच्छा है और ना तो बहुत ज्यादा धूप ही अच्छी है।

Kabir Das Biography in Hindi

कबीरदास के भजन (Kabir Das Ke Bhajan)

कबीरदास के प्रसिद्ध भजन इस प्रकार है –

भजन 1.

साकी, वो पीकर चला गया,

घर आपना छोड़कर चला गया।

साकी, वो पीकर चला गया।

जब जब जियरा भर आया,

तब तब पिया सताया।

साकी, वो पीकर चला गया।

अच्छा होता, जो मैं पीता,

पीता तौ गोली बिखराता।

साकी, वो पीकर चला गया।

कबीरा ते नाउ मनु ले,

मूआ तो सब कोई।

भजन 2.

“कोई बोले राम राम, कोई खुदाइ

कोई से इश्वर अल्लाह उपासे

अन्य तो सिक्ख तोये, मसीत मनाये

पांडित बैठे बैठे लाव नये

सब ही खुदाई खपाये

एक ही दिल है, एक ही जान

जुआ-जैसे दूसरा माने।

जैसे तिल मीठे चिन सोवा

सागर से गहरा नीर

राम रहीम रहीम बैरों बार

सब ही एक रुपी फीका नीर।

भजन 3.

“सुना ले रे भई राम नाम का,

चितवन में घूंघट की धार चढ़ आई।

दरबार में बैठी मात ध्यान में,

जो मन में आवत है बड़ी भार चढ़ आई।

धूप बती तेल मलीपी पासी भयो,

रूप लागे चन्दन की मार चढ़ आई।

प्रेम भी मलीन हो गया चह सूता,

कपट तरवर सांप गरज चढ़ आई।

कूदती बूँद सबकी नेत्रों में,

राम रसायन नहीं नारियल बरसढ़ आई।

कबीरदास के बारे में रोचक जानकारियाँ (Kabir Das Information in Hindi)

1.कबीर मठ

कबीर मठ कबीर चौरा, वाराणसी और लहरतारा, वाराणसी में पीछे के मार्ग में स्थित है जहाँ संत कबीर के दोहे गाने में व्यस्त हैं। यह लोगों को जीवन की वास्तविक शिक्षा देने का स्थान है। नीरू टीला उनके माता-पिता नीरू और नीमा का घर था। अब यह कबीर के कार्यों का अध्ययन करने वाले छात्रों और विद्वानों के लिए आवास बन गया है।

2.

कबीर दास ने कुल 72 रचनाएँ कि हैं और उनमें से कुछ प्रसिद्ध हैं कबीर बीजक, कबीर बानी, रेख़्तास, अनुराग सागर, सुखनिधान, मंगल, कबीर ग्रन्थावली, वसंत, सबदास, सखियाँ और आदि हैं।

Q. ऐसा माना जाता है कि कबीर दास ने लोई नाम की एक स्थानीय महिला से शादी की थी और उनके दो बच्चे एक बेटा और एक बेटी भी थे। बेटे का नाम कमल और बेटी का नाम कमली हैं। हालाँकि, कुछ अन्य सूत्रों का कहना है कि उन्होंने दो बार शादी की है, वहीं कई लोगों का मानना है कि उन्होंने कभी शादी ही नही की।

Q.संत कबीर दास ने ईश्वर के बारे में क्या कहा था ?

Ans.

उन्होंने 25 दोहे लिखे।

Q. इस लेख में हम आपको बताने वाले हैं महान संत कबीरदास के जीवन से जुड़ी ढेर सारी जानकारी तो दोस्तों शुरू करते हैं और जानते हैं विस्तार से कबीरदास का जीवन परिचय

कबीरदास का जीवन परिचय | Kabir Das Biography in Hindi

नामसंत कबीर दास
अन्य नामकबीरदास, कबीर परमेश्वर, कबीर साहब, कबीरा
जन्मसन् 1398 (विक्रम संवत 1455) लहरतारा, काशी, उत्तर प्रदेश
मृत्युसन् 1519 (विक्रम संवत 1575) मगहर, उत्तर प्रदेश (120 वर्ष)
नागरिकताभारतीय
शिक्षानिरक्षर (पढ़े-लिखे नहीं)
पेशासंत (ज्ञानाश्रयी निर्गुण), कवि, समाज सुधारक, जुलाहा
पिता-मातानीरू, नीमा
गुरुरामानंद
मुख्य रचनाएंसबद, रमैनी, बीजक, कबीर दोहावली, कबीर शब्दावली, अनुराग सागर, अमर मूल
भाषाअवधी, साधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी

जानकारी संग्रह-:

इस पोस्ट में जो भी संत कबीरदास के जीवन से संबन्धित अभी तक जितने भी प्रमाण मिले हैं उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। स्वयं उनके द्वारा रचित काव्य और कुछ तत्कालीन कवियों द्वारा रचित काव्यों में उनके जीवन से संबन्धित तथ्य प्राप्त हुए हैं। इन तथ्यों के आधार पर इस पोस्ट में जानकारी दी है यदि इस पोस्ट में कोई भी जानकारी गलत लगती है तो हमें कांटेक्ट करके जरूर बताएं-

कबीरदास का जन्म और प्रारम्भिक जीवन ( Kabirdas Birthdate and Family Condition )

भारत के महान संत कबीर का जन्म सन 1398 ईसवी में एक जुलाहा परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम नीरू एवं माता का नाम नीमा था। कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे ,जिसने लोक लाज के डर से जन्म देते ही कबीर को त्याग दिया था। नीरू और नीमा को कबीर पड़े हुए मिले और उन्होंने कबीर का पालन-पोषण किया। कबीर के गुरु प्रसिद्ध संत स्वामी रामानंद थे। लोक कथाओं के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि कबीर विवाहित थे। इनकी पत्नी का नाम लोई था। इनकी दो संताने थी एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम कमाल था और पुत्री का नाम कमाली

कबीर दास की शिक्षा (Kabir Das Biography in Hindi)

कबीर ने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली और न ही उन्होंने कभी कागज़ कलम को छुआ। वे अपनी आजीविका के लिए जुलाहे का काम करते थे। कबीर अपनी आध्यात्मिक खोज को पूर्ण करने के लिए वाराणसी के प्रसिद्ध संत रामानंद के शिष्य बनना चाहते थे।

स्वामी रामानन्द जी अपने समय के सुप्रसिद्ध ज्ञानी कहे जाते थे पर रामानंद उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे। किन्तु कबीर ने उन्हें मन ही मन अपना गुरु मान लिया था। वे अपने गुरु से गुरु मंत्र लेना चाहते थे पर कबीर दास को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।

कबीर दास जब संत रामानंद रात्रि चार बजे स्नान के लिए काशी घाट पर जाते थे तो उनके मार्ग में लेट जाते थे ताकि उनके गुरु मुख से जो भी पहला शब्द निकले उसे ही गुरु मंत्र मान लेंगे। तब एक दिन मार्ग में उनके गुरु के पैर कबीर पर पड़े तो संत रामानंद ने अपने मुंह से “राम” नाम लिया। बस कबीर ने उसे ही गुरु मंत्र मान लिया।

कुछ लोग मानते हैं कि कबीर दास जी के कोई गुरु नहीं थे। उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ वह अपनी ही बदौलत प्राप्त किया। वे पढ़े-लिखे नहीं थे यह बात उनके इस दोहा से मिलता है –

कबीर दास जी ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा, उन्होंने सिर्फ उसे बोले थे। उनके शिष्यों ने उनके द्वारा कही गई बातों और उपदेशों को कलमबद्ध किया था। कबीर दास के बारे में जानकर ही आश्चर्य होता है कि उन्होंने कभी कागज कलम को हाथ तक नहीं लगाया, ना ही कोई पढ़ाई की और न ही उनके कोई औपचारिक गुरु थे।

पर कैसे उन्हें इतना आत्मज्ञान प्राप्त हुआ?

कबीर दास कौन से धर्म के अनुयायी थे ?

Ans. में   काशी के लहरतारा तालाब में ज्येष्ठ के पूर्णिमा को  प्रगट हुवे थे। निरु और नीमा नामक दम्पति अपने घर ले गए। कबीर बचपन से ही बहुत ज्ञान ध्यान की बाते  करते थे। इन बातो को सुनकर लोग बोलते थे। तुम्हारा गुरु कौन है, कबीर बोलते की मैंने  अभी तक  गुरु नहीं किया  है।

तो लोग बोलते , गुरु बिना तुम्हारे ज्ञान का कोई अर्थ नहीं है। तो कबीर इस  बात को लेकर गुरु करने का विचाए किये। उस समय रामानंद स्वामी हिन्दुओ के प्रख्यात गुरु थे। जब कबीर रामानंद स्वामी से गुरु दीक्षा की बात किये तो रामानंद स्वामी अपना शिष्य बनाने से माना कर दिए।

Kabir Das Biography in Hindi कबीर का अबोध बालक बनना 

कबीर ने एक अबोध बालक का रूप धारण कर , भोर में उस तालाब के सीढ़ियों पर जा कर लेट गए जहा पर स्वामी रामानंद स्नान करने जाया करते थे।  जब स्वामी जी स्नान करने आये तो अँधेरे के कारन सीढ़ी पर लेटा बालक कबीर दिखा नहीं और स्वामी जी के खड़ाऊ से बालक कबीर को चोट लग गया।

कबीर जोर-जोर से रोने लगे तभी स्वामी जी बोले , राम , राम बोल बच्चा , सब दुःख दूर हो जायेगा।  कबीर राम-राम कहने लगे।

Kabir Das Biography in Hindi वार्ता कबीर और स्वामी जी की 

अब कबीर किसी से सत्संग करते ज्ञान की बात करते तो कोई बोलता तुम्हारे गुरु कौन है , तो कबीर बोलते  स्वामी रामानंद मेरे गुरु है।  अब ये बात धीरे-धीरे  स्वामी जी के कानो में पड़ी , तो स्वामी जी बोलेन के मैंने तो कबीर को अपना शिष्य नहीं बनाया है।

Kabir Das Biography in Hindi

स्वामी जी बोले कबीर को बुला लाओ , स्वामी जी के शिष्य लोग कबीर को बुला लाए।

स्वामी जी कबीर से पूछे तुमको कब मै  शिष्य बनाया , तो कबीर बोले उस दिन जब तालाब के सीढ़ियों पर आपके खड़ाऊ से एक बालक को चोट लगा , और आप ने राम राम बोलने को कहा तो वो बालक मै  ही था।

आप जब राम नाम मुझे दिए तो आप तभी से मेरा गुरु बन गए और मै  आपका शिष्य। स्वामी जी बोले वो एक छोटा बच्चा था और तुम बड़े हो , इस बात पर कबीर जी ने उसी वक़्त एक कला दिखाई और वही रूप धरकर बोले गुरु जी यही बच्चा था।  स्वामी जी सबकुछ समझ गए

Kabir Das Biography in Hindi – वाणी है 

कबीर हमेशा सभी को समझाते थे सभी को मिलजुल कर रहना चाहिए, जात – पात का भेद नहीं रखना चाहिए।  वो हमेशा पाखंड को छोड़ कर सत्य क्या है इस बारे में हमेशा बात किया करते थे और समझाया करते थे।

कबीर जी की एक  वाणी है – पत्थर पूजे तो हरी मिले , तो मै  पुजू पहाड़ , पत्थर से चक्की भली पीस संसार खाए  ,  ऐसी बहुत सारी कबीर जी की वाणी है।  जो अपने आप में एक पूरा सच होता है ,

Kabir Das Biography in Hindi तुलसी दास जी की वाणी 

गोस्वामी तुलसी दास  जी रामायण में लिखें हैबिन गुरु भौ-निधि तरे न कोई , जो विरंच शंकर सम  होइ, अर्थ  अगर कोई ब्रह्मा के सामान भी है , या सूर्य के सामान भी है तो भी उसका गुरु के बिना उधार नहीं होगा।  विरंच , ब्रह्मा को कहा गया है , और शंकर सूर्य को कहा गया है।

कबीर जी करीब 120 वर्षे के बाद इस शरीर का मगर में परित्याग किये करीब 1518 ई.

कबीर दासे के गुरु का नाम रामानंद था। रामानंद एक हिंदू भक्ति नेता थे।

Q.कबीर दास द्वारा कौन कौन सी विभिन्न साहित्यिक कृतियाँ लिखी गई हैं?

Ans.

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संत कबीर दास के कमल नाम का एक बेटा और कमली नाम की एक बेटी थी।

Q.संत कबीर दास की कविताओं को क्या कहा जाता है?

Ans. कबीर ने कितने दोहे लिखे ?

Ans. संत कबीर दास के कमल नाम का एक बेटा और कमली नाम की एक बेटी थी।

Q.संत कबीर दास की कविताओं को क्या कहा जाता है?

Ans.

Kabir Das Biography in Hindi- कबीर दास जी एक बहुत ही सिद्ध पुरुष संत थे।  जिनकी गाथा चारो युगो में प्रसिद्ध है , जिसका प्रमाण अनुराग सागर , कबीर सागर ,इत्यादि , इन सभी ग्रंथों में मिला है।

Kabir Das Biography in Hindi

कबीर दास  जी १३ वीं सदी के अंत में  १३९८ (1398 ) ई .

कबीर दास ने मुख्य रूप से ‘सधुक्कड़ी’ भाषा में रचना की थी। 

आशा है कि आपको संत कबीर दास का जीवन परिचय पर हमारा यह ब्लॉग पसंद आया होगा। ऐसे ही अन्य प्रसिद्ध कवियों और महान व्यक्तियों के जीवन परिचय को पढ़ने के लिए Leverage Edu के साथ बने रहें।

नीरज

नीरज वर्तमान में Leverage Edu के स्टडी अब्रॉड प्लेटफॉर्म में एसोसिएट कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें स्टडी अब्रॉड, करंट अफेयर्स, NEET परीक्षा, ट्रेंडिंग इवेंट्स, स्टोरी राइटिंग और साहित्यिक विषयों पर लेखन का तीन वर्षों से अधिक का अनुभव है। इससे पहले वे upGrad Campus, Neend App और ThisDay App में कंटेंट राइटर और कंटेंट डेवलपर रह चुके हैं। उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से हिंदी में और दिल्ली विश्वविद्यालय से बौद्ध अध्ययन में मास्टर डिग्रियाँ प्राप्त की हैं। उनसे [email protected] या LinkedIn प्रोफाइल के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।

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नमस्कार दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम भारत के महान लेखक और संत कबीर दास के जीवन के बारे में जानकारी विस्तार से बताएंगे.

में काशी  के  लहरतारा तालाब में कमल के पुष्प पर प्रगट हुए थे

कबीर दास  जी की रचनाए कौन कौन सी है ?

कबीर दास  जी की रचनाए – अनुराग सागर , कबीर मंसूर , शब्दावली , बीजक ,  इत्यादि

क्या कबीर दास  जी विवाहित थे ? दर्शन

कबीर दास पहले भारतीय संत हैं जिन्होंने हिंदू और इस्लाम दोनों को एक सार्वभौमिक मार्ग देकर हिंदू और इस्लाम का समन्वय किया है, जिसका पालन हिंदू और मुस्लिम दोनों कर सकते हैं। 

उनके अनुसार, प्रत्येक जीवन का दो आध्यात्मिक सिद्धांतों (जीवात्मा और परमात्मा) से संबंध है। मोक्ष के बारे में उनका विचार था कि यह इन दो दैवीय सिद्धांतों को एकजुट करने की प्रक्रिया है।

उनकी महान कृति बीजक में कविताओं का एक विशाल संग्रह है जो कबीर के आध्यात्मिकता के सामान्य दृष्टिकोण को दर्शाता है। कबीर की हिन्दी एक बोली थी, उनके दर्शनों की तरह सरल। उन्होंने बस भगवान में एकता का पालन किया। उन्होंने हमेशा हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा को खारिज किया है और भक्ति और सूफी विचारों में स्पष्ट विश्वास दिखाया है।

3. उनकी कविता

उन्होंने एक वास्तविक गुरु की प्रशंसा के अनुरूप कविताओं की रचना एक संक्षिप्त और सरल शैली में की थी। अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने अवधी, ब्रज और भोजपुरी जैसी कुछ अन्य भाषाओं को मिलाकर हिंदी में अपनी कविताएँ लिखी थीं। हालाँकि कई लोगों ने उनका अपमान किया लेकिन उन्होंने कभी दूसरों पर ध्यान नहीं दिया।

4.

कबीर दास की मुख्य रचनाएँ ‘साखी’, ‘सबद’ और ‘रमैनी’ हैं।

कबीर दास ने किस भाषा में रचना की थी? संत कबीर दास के गुरु स्वामी रामानन्द थे।

Q.संत कबीर दास के कितने बच्चे थे ?

Ans. विरासत

संत कबीर को श्रेय दी गई सभी कविताएँ और गीत कई भाषाओं में मौजूद हैं। कबीर और उनके अनुयायियों का नाम उनकी काव्य प्रतिक्रिया जैसे कि बनियों और कथनों के अनुसार रखा गया है। कविताओं को दोहे, श्लोक और सखी कहा जाता है। सखी का अर्थ है याद किया जाना और उच्चतम सत्य को याद दिलाना। इन कथनों को याद करना, प्रदर्शन करना और उन पर विचार करना कबीर और उनके सभी अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक जागृति का मार्ग है।

5.समाधि मंदिर

समाधि मंदिर का निर्माण उसी स्थान पर किया गया है जहाँ कबीर अपनी साधना करने के आदी थे। साधना से समाधि तक की यात्रा तब मानी जाती है जब कोई संत इस स्थान पर जाता है। आज भी यह वह स्थान है जहां संतों को अपार सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। यह जगह शांति और ऊर्जा के लिए दुनिया भर में मशहूर है। 

ऐसा माना जाता है कि, उनकी मृत्यु के बाद, लोग उनके शरीर को अंतिम संस्कार के लिए लेने को लेकर झगड़ रहे थे। लेकिन, जब उनके समाधि कक्ष का दरवाजा खोला गया, तो केवल दो फूल थे, जो उनके हिंदू मुस्लिम शिष्यों के बीच अंतिम संस्कार के लिए वितरित किए गए थे। समाधि मंदिर का निर्माण मिर्जापुर की मजबूत ईंटों से किया गया है।

6.कबीर चबूतरा में बीजक मंदिर

यह स्थान कबीर दास का कार्यस्थल होने के साथ-साथ साधनास्थल भी था। यहीं पर उन्होंने अपने शिष्यों को भक्ति, ज्ञान, कर्म और मानवता का ज्ञान दिया था। इस जगह का नाम कबीर चबूतरा रखा गया। बीजक कबीर दास की महान कृति थी, इसलिए कबीर चबूतरा का नाम बीजक मंदिर पड़ा।

निष्कर्ष

तू आशा है दोस्तों की आपको “कबीरदास का जीवन परिचय | Kabir Das Biography in Hindi, Dohe arth sahit, quotes” यह पोस्ट जानकारी पूर्ण लगा होगा और अगर यह पोस्ट आपको पसंद आए तो यह अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करिए एक महान कबीर दास, भारत के प्रमुख आध्यात्मिक कवियों में से एक हैं जिन्होंने लोगों के जीवन को बढ़ावा देने के लिए अपने दार्शनिक विचार दिए हैं।

ईश्वर में एकता के उनके दर्शन और वास्तविक धर्म के रूप में कर्म ने लोगों के मन को अच्छाई की ओर बदल दिया है। ईश्वर के प्रति उनका प्रेम और भक्ति हिंदू भक्ति और मुस्लिम सूफी दोनों की अवधारणा को पूरा करती है। इस पोस्ट में आपको कोई भी जानकारी गलत लगे तो तुरंत हमें कांटेक्ट करके बताइए धन्यवाद !

FAQ

Q.कबीर दास का पूरा नाम क्या है?

Ans.कबीर दास का पूरा नाम “संत कबीर दास” था।

Q.

कबीर दास के गुरु कौन थे ?

Ans.