Horse biography in hindi of swami vivekananda

Home / Religious & Spiritual Figures / Horse biography in hindi of swami vivekananda

स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सम्मेलन शिकागों में पहला भाषण कब दिया ?

Ans.  11 सितंबर 1893 में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सम्मेलन शिकागों में पहला भाषण दिया 

Q.

horse biography in hindi of swami vivekananda

Swami Vivekananda Biography in Hindi-स्वामी विवेकानन्द एक ऐसा नाम है जिसे किसी भी प्रकार के परिचय की आवश्यकता नहीं है। वह एक प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं जिन्होने पश्चिमी दुनिया को हिंदू धर्म के बारे में व्यापक जानकारी उपलब्ध करवाई थी। उन्होंने 1893 में शिकागो की धर्म संसद में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया जहां पर उनके द्वारा दिया गया भाषण विश्व प्रसिद्ध हुआ था।स्वामी विवेकानन्द की जयंती के उपलक्ष्य में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने विश्व के कल्याण के लिए 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन स्थापना की थी, जिसकी शाखाएं दुनिया के कई देशों में हैं। स्वामी विवेकानंद के बारे में गुरुदेव रविंद्र ठाकुर ने कहा था यदि भारत को आप करीब से जाना चाहते हैं’ तो आप विवेकानंद के जीवन को पढ़िए। उनमें आपको सभी चीज केवल सकारात्मक ही मिलेंगे नकात्मक कुछ भी नहीं मिलेगा।

ऐसे में विवेकानंद के जीवन परिचय के बारे में जानने की  जिज्ञासा हर एक व्यक्ति  के मन में आ रही है इसलिए आज के लेख में स्वामी विवेकानन्द विकिपीडिया हिंदी में,स्वामी विवेकानन्द हिंदी में | Swami vivekananda in Hindi, स्वामी विवेकानन्द का परिचय | introduction of swami vivekananda, स्वामी विवेकानन्द का जीवन | life of swami Vivekananda, स्वामी विवेकानन्द का बचपन | Childhood of Swami Vivekananda, स्वामी विवेकानन्द शिक्षा | Swami Vivekanandaeducation,स्वामी विवेकानन्द इतिहास | Swami Vivekananda History, स्वामी विवेकानन्द पत्नी | Swami vivekananda Wife, स्वामी विवेकानन्द संगठनों की स्थापना | vivekananda organizations founded,books written by swami Vivekananda, स्वामी विवेकानन्द की मृत्यु संबंधित जानकारी प्रदान करेंगे इसलिए आप लोग इस आर्टिकल को अंत तक पढ़े।                    

स्वामी विवेकानंद का जन्म (Swami Vivekanand Birth)

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था । उनके पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था। उनके पिता हाईकोर्ट (High Court) के एक प्रसिध्द वकील (Lawyer) थे। नरेंद्र के पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता (western) के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। नरेंद्र की माता भुवनेश्वरी देवी जी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका ज्यादातर समय भगवान शिवजी की आराधना में ही बीतता था। नरेंद्र बचपन से ही तीव्र बुध्दि के थे और उनके अंदर परमात्मा को पाने की लालसा काफी प्रबल थी। इसी वजह से वे पहले ‘ब्रह्रा समाज’ (Brahmo Samaj) में गए, लेकिन वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ। वे वेदांत और योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिए जरूरी योगदान देना चाहते थे। 

स्वामी विवेकानन्द विकिपीडिया हिंदी में | Swami Vivekananda wikipedia in Hindi

नामस्वामी विवेकानन्द 
जन्म का नामनरेंद्रनाथ दत्त
जन्म12 जनवरी 1863
जन्म स्थानपश्चिम बंगाल, कोलकाता
गृहनगरपश्चिम बंगाल, कोलकाता
राष्ट्रीयताभारतीय
धर्महिंदू
विद्यालयवेदान्त योग
गुरुरामकृष्ण परमहंस
शिष्यस्वामी सदानंद
किसके लिए जाने जाते हैंशिकागो में धर्म संसद में भाषण
मृत्यु तिथि4 जुलाई 1902
मृत्यु स्थानकोलकाता के पास बेलूर मठ
संस्थापकरामकृष्ण मिशन, रामकृष्ण मठ
मृत्यु की आयु39 वर्ष

दैवयोग से विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर आ गया। घर की स्थिति बहुत खराब थी। बहुत गरीब होने के बाबजूद भी नरेंद्र बड़े ही अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते थे और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते थे। स्वामी विवेकानंद अपना जीवन गुरुदेव श्रीरामकृष्ण को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की चिंता किए बिना, खुद भोजन की बिना चिंता के गुरू की सेवा में सतत संलग्न रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था।

Also Read: राष्ट्रीय युवा दिवस कब मनाया जाता है, कारण, थीम जाने

स्वामी विवेकानंद की जीवनी | Swami Vivekananda Jivani

विवेकानंद बड़े स्वप्न द्रष्टा थे। उन्होंने एक नए समाज की कल्पना की थी। ऐसा समाज जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं रहे। विवेकानंद जी को युवकों से बड़ी आशा थी। आज के युवकों के लिए ही इस ओजस्वी सन्यासी का यह जीवन वृत्त लेखक उनके समकालीन समाज एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में उपस्थित करने का प्रयत्न किया है यह भी प्रयास रहा है कि इसमें विवेकानंद के सामाजिक दर्शन एवं उनके मानवीय रूप का प्रकाश पड़े। 

बचपन से ही नरेंद्र अत्यंत कुशाग्र बुध्दि के और नटखट थे। परिवार में आध्यात्मिक माहौल होने से उनके अंदर बचपन से ही आध्यात्म (spiritual) का बीज पड़ चुका था। उनके मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखाई देने लगी थी। वे कभी-कभी ऐसे प्रश्न पूछते कि माता-पिता और कथावाचक पंडित जी भी चक्कर में पड़ जाते थे। 

Also Read: स्वामी विवेकानंद का भाषण

स्वामी विवेकानन्द हिंदी में | Swami Vivekananda in Hindi

स्वामी विवेकानन्द हमारे देश के एक महान धार्मिक सुधारक थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्ता था। उनके पिता बिस्वनाथ दत्ता एक प्रसिद्ध वकील थे और उनकी माँ भुवनेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं। वह बहुत बुद्धिमान और असाधारण थे। आध्यात्मिक विचारों में उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन से प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की। 1884 में  स्वामी विवेकानंद ने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में ऑनर्स के साथ बीए की पढ़ाई को पूरा किया था। श्री रामकृष्ण परमहंस से मिलना उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ वह रामकृष्ण के शिष्य बन गए और पैदल ही पूरे भारत का भ्रमण किया था।  स्वामी विवेकानंद पश्चिमी देशों में भारतीय हिंदू धर्म दर्शन का प्रचार और प्रसार भी किया था।

उन्होंने जाति व्यवस्था और छुआछूत का डटकर विरोध किया। 1893 में शिकागो में धार्मिक सम्मेलन में भाग लिया और दुनिया भर में मानवता का संदेश दिया। गरीबों को सामाजिक सेवा प्रदान करने के लिए उन्होंने 1897 में बेलूर मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। उन्होंने भारत में विभिन्न स्थानों पर कई अस्पताल, पुस्तकालय, स्कूल भी स्थापित किए। स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं ने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के युवाओं को प्रेरित किया। स्वामी विवेकानन्द की जयंती भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है।  स्वामीजी ने 4 जुलाई 1902 को 39 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।  आज स्वामी विवेकानंद वाले इस संसार में नहीं है लेकिन उनकी स्मृति सदैव हमारे दिलों में जीवंत रहेगी

स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम

स्वामी जी के गुरू का नाम रामकृष्ण परमहंस (Ramkrishna Paramhans) था । एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में निष्क्रियता दिखायी और घृणा से नाक-भौं सिकोड़ी। यह देखकर स्वामी जी क्रोधित हो गए थे। उस गुरू भाई को पाठ पढाते हुए स्वामी जी गुरू की प्रत्येक वस्तु से प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे। गुरू के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे स्वयं के अस्तित्व को गुरूदेव के स्वरूप में विलीन कर सके।   

 स्वामी विवेकानंद क्यों प्रसिद्ध है?

25 वर्ष की आयु में नरेंद्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए। इसके बाद उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की । सन् 1893 में शिकागो में विश्व धर्म परिषद हो रही थी। स्वामी विवेकानंद उसमें भारत के प्रतिनिधि बनकर पहुंचे। यूरोप और अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत कोशिश की कि स्वामी को परिषद में बोलने का मौका नहीं मिले। 

एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला, किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चौंक गए। अमेरिका में उनका बहुत स्वागत सत्कार हुआ। वहां स्वामी जी के भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। वे अमेरिका में तीन साल तक रहे और लोगों को तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे। उनकी बोलने की शैली और ज्ञान को देखते हुए वहां के मीडिया ने उन्हें ‘साइक्लॉनिक हिंदू नाम’ दिया। 

स्वामी विवेकानंद इतने घंटे करते थे ध्यान (Meditation)

स्वामी जी रोज ब्रम्ह मुहूर्त में उठकर तीन घंटे ध्यान करते थे। इसके बाद वे अन्य रोजना के काम में व्यस्त होते और यात्रा पर निकलते । इसके बाद वे दोपहर और शाम को भी घंटों तक ध्यान में रहते थे। रात के वक्त उन्होंने तीन-चार घंटे तक ध्यान किया है। “आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बगैर विश्व अनाथ हो जाएगा।” वे वेदांत के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरू थे। 

स्वामी विवेकानंद के सिध्दांत

स्वामी जी ने भारत में ब्रम्हा समाज, रामकृष्ण मिशन और मठों की स्थापना करके लोगों को आध्यात्म से जोड़ा। उनका एक ही सिध्दांत था कि भारत देश के युवा इस देश को काफी आगे ले जाएं। उन्होंने कहा था कि अगर मुझे सौ युवा मिल जाएं, जो पूरी तरह समर्पित हों तो वे भारत की तस्वीर बदल देंगे। शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास हो सके। शिक्षा से बच्चे के चरित्र का निर्माण और वह आत्मनिर्भर बने। उन्होंने कहा था कि धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा ना देकर आचरण और संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द का बचपन | Childhood of Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानंद जी का इच्छा ताकि वह भगवान को जाने और उनके पास चले जाए। स्वामी विवेकानंद जी जानते थे कि इनमें से वह कुछ भी नहीं बन सकते हैं। इसलिए उन्होंने साधु का रूप धारण कर लिया।

Also Read: स्वामी विवेकानंद के विचार

स्वामी विवेकानन्द शिक्षा | Swami Vivekananda Education

  • स्वामी विवेकानन्द  को 1871 में ईश्वर चंद विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूट में भर्ती कराया गया था।
  • 1877 में जब स्वामी विवेकानन्द तीसरी कक्षा में थे तभी उनकी पढ़ाई बाधित हो गयी, दरअसल उनके परिवार को किसी कारणवश अचानक रायपुर जाना पड़ा।
  • 1879 में, अपने परिवार के कलकत्ता लौटने के बाद, वह प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले पहले छात्र बने।
  • वह दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य जैसे विभिन्न विषयों के जिज्ञासु पाठक थे। उन्हें वेद, उपनिषद, भगवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराण जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में भी गहरी रुचि थी। नरेंद्र भारतीय पारंपरिक संगीत के विशेषज्ञ थे और हमेशा शारीरिक योग, खेल और सभी गतिविधियों में भाग लेते थे।
  • 1881 में उन्होंने ललित कला परीक्षा उत्तीर्ण की;1884 में उन्होंने कला से स्नातक की डिग्री पूरी की।
  • इसके बाद उन्होंने 1884 में अच्छी योग्यता के साथ बीए की परीक्षा पास की और फिर उन्होंने कानून की पढ़ाई की।
  • 1884 का समय, जो स्वामी विवेकानन्द के लिए बेहद दुखद था, क्योंकि इसी समय उन्होंने अपने पिता को खोया था। पिता की मृत्यु के बाद उनके ऊपर अपने 9 भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गयी, लेकिन वे घबराये नहीं और अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहने वाले विवेकानन्द ने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
  • 1889 में नरेंद्र का परिवार कोलकाता लौट आया। बचपन से ही विवेकानन्द कुशाग्र बुद्धि के थे, जिसके कारण उन्हें एक बार फिर स्कूल में प्रवेश मिल गया। दूरदर्शी समझ और कठोरता के कारण उन्होंने 3 साल का कोर्स एक साल में पूरा कर लिया।

स्वामी विवेकानन्द पत्नी | Swami Vivekananda Wife

स्वामी विवेकानन्द एक ब्रह्मचारी सन्यासी थे। क्योंकि जब यह  विदेश दौरे पर थे और भिन्न-भिन्न जगहों पर अपना व्‍याख्‍यान देने का कार्य करते थे इसी बीच के भाषण को सुनकर एक महिला काफी प्रभावित हुई और महिला उनके आप पास आकर उनसे बोली की मैं आपसे शादी करना चाहती हूं ताकि उसे भी उनकी तरह प्रतिभाशाली पुत्र प्राप्त हो। तब स्वामी विवेकानंद जी इनके बातों को सुनकर उन्हें कहा कि मैं एक संन्यासी हूं इस वजह से मैं शादी के बंधन में बंध नहीं सकता हूं। लेकिन मैं आपका पुत्र बनना स्वीकार कर सकता हूं ऐसा करने से नहीं मेरा सन्यास टूटेगा और आपको पुत्र की प्राप्ति हो जाएगा। महिला इनके बातों को सुनकर स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ी और बोली आप महान है। आप ईश्वर के ही एक रूप है जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते हैं।

स्वामी विवेकानन्द संगठनों की स्थापना | Swami vivekananda Organizations Founded

मई 1897 को स्वामी विवेकानन्द कलकत्ता लौट आए और उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य नए भारत का निर्माण करने के लिए अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और स्वच्छता की ओर बढ़ना था।

साहित्य, दर्शन और इतिहास के रचयिता स्वामी विवेकानन्द ने अपनी प्रतिभा का लोहा सभी को मनवाया और अब वे युवाओं के लिए आदर्श बन गये।

1898 में स्वामी जी ने बेलूर मठ की स्थापना की – Belur Math जिसने भारतीय जीवन दर्शन को एक नया आयाम दिया।

इसके अलावा स्वामी विवेकानन्द जी ने दो अन्य मठों की स्थापना एवं स्थापना की।

स्वामी विवेकानन्द संगठनों की स्थापना | Books Written by Swami Vivekananda

पवित्र और दिव्य आत्मा स्वामी विवेकानन्द को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। वैश्विक गांव उन्हें एक हिंदू संत, एक योग गुरु, एक दार्शनिक, एक शिक्षक, एक लेखक और एक असाधारण वक्ता के रूप में जानता है। स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकों की सूची नीचे दी गई है:-

  1. ज्ञान योग: ज्ञान का योग 
  2. कर्म योग: क्रिया का योग 
  3. राजयोग: आंतरिक प्रकृति पर विजय 
  4. माई मास्टर 
  5. स्वामी विवेकानन्द स्वयं पर कोई उत्पाद नहीं मिला।
  6. स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाएँ 
  7. ध्यान और उसकी विधियाँ 
  8. द मास्टर एज़ आई सॉ हिम: द लाइफ़ ऑफ़ द स्वामी विवेकानन्द
  9. विवेकानन्द 

स्वामी विवेकानन्द इतिहास | Swami Vivekananda History

महापुरुष स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 को हुआ था। असाधारण प्रतिभा के धनी व्यक्ति का जन्म कोलकाता में हुआ था और उन्होंने अपनी जन्मभूमि को पवित्र बनाया था। उनका असली नाम नरेंद्रनाथ दत्त था, लेकिन बचपन में वे सभी को नरेंद्र के नाम से ही बुलाते थे।स्वामी विवेकानन्द के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था, जो उस समय कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित और सफल वकील थे जिनकी वकालत के साथ-साथ अंग्रेजी और फ़ारसी भाषाओं पर भी उनकी अच्छी पकड़ के चर्चे खूब होते थे।

विवेकानन्द की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था, जो धार्मिक विचारों वाली महिला थीं, वह भी बहुत प्रतिभाशाली महिला थीं, जिन्होंने रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों का महान ज्ञान प्राप्त किया था। साथ ही वह एक प्रतिभाशाली और बुद्धिमान महिला थीं जिन्हें अंग्रेजी भाषा की भी अच्छी समझ थी।वहीं स्वामी विवेकानन्द पर उनकी माँ का इतना गहरा प्रभाव था कि वह घर में ही ध्यान में लीन रहते थे और इसके साथ ही उन्होंने अपनी माँ से ही शिक्षा भी प्राप्त की थी। इसके साथ ही स्वामी विवेकानन्द पर उनके माता-पिता के गुणों का गहरा प्रभाव पड़ा और उन्हें अपने जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा अपने घर से ही मिली।

स्वामी विवेकानन्द के माता और पिता के अच्छे संस्कारों और अच्छी परवरिश के कारण स्वामीजी के जीवन को एक अच्छा आकार और उच्च स्तर की सोच मिली।ऐसा कहा जाता है कि नरेंद्रनाथ बचपन से ही बहुत बुद्धिमान और बुद्धिमान व्यक्ति थे, वह अपनी प्रतिभा के इतने धनी थे कि एक बार जो व्यक्ति उनकी आंखों के सामने से गुजर जाता था वह उन्हें कभी नहीं भूलता था और दोबारा उन्हें वह काम नहीं करना पड़ता था। दोबारा। मुझे पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ी

युवा दिनों से ही उनकी रुचि अध्यात्म के क्षेत्र में थी, वे हमेशा शिव, राम और सीता जैसे भगवान के चित्रों के सामने ध्यान का अभ्यास करते थे। ऋषि-मुनियों और सन्यासियों की कहानियाँ उन्हें सदैव प्रेरणा देती हैं। आगे चलकर यही नरेन्द्र नाथ पूरे विश्व में ध्यान, अध्यात्म, राष्ट्रवाद, हिन्दू धर्म और संस्कृति के वाहक बने और स्वामी विवेकानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए।

स्वामी विवेकानन्द का परिचय | introduction of Swami Vivekananda

स्वामी विवेकानन्द का परिचय निम्न वाक्य द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे आप लोग ध्यानपूर्वक पढ़े:-

  • स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म कोलकाता के कायस्‍थ परिवार में हुआ था। इनका बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था।
  • इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्ता जो एक पेशे से कोलकाता हाई कोर्ट के वकील थे और उनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था जो धार्मिक विचारधारा वाली महिला थी।
  • स्वामी विवेकानन्द जी 1871 में 8 साल के उम्र में स्कूल गए थे। 1879 में प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किए थे।
  • स्वामी विवेकानंद जी केवल 25 साल की उम्र में सांसारिक मोह माया को त्याग कर संयासी बन गए।
  • स्वामी विवेकानंद जी का मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से 1881 में कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर में हुआ था।
  • स्वामी विवेकानन्द जब रामकृष्ण परमहंस मिले तो एक सवाल किया था जो कई लोगों से कर चुके थे, क्या आपने भगवान को देखा है रामकृष्ण परमहंस ने जवाब दिया कि हमने देखा है ‘मैं भगवान को उतना ही साफ देख रहा हूं जितना तुम्हें’फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें में तुमसे ज्यादा गहराई से महसूस कर सकता हूं।
  • अमेरिका में हुई धर्म संसद में जब स्वामी विवेकानन्द जी अमेरिका के भाइयों और बहनों संबोधन से भाषण शुरू किया तो 2 मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां बजती रही।
  • स्वामी विवेकानन्द 1 मई 1897 में कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना किए थे। और गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना 9 दिसंबर 1898 में किए थे।
  • स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन के तारीख यानी 12 जनवरी को भारत में प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है।
  • स्वामी विवेकानन्द केवल 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्‍ण मठ में ध्‍यानमग्‍न अवस्‍था में महासमाध‍ि धारण कर प्राण त्‍याग द‍िए।

स्वामी विवेकानन्द का जीवन | Life of Swami Vivekananda

 स्वामी विवेकानंद के 9 अनमोल वचन

  • जब तक तुम अपने आप में विश्वास नहीं करोगे, तब तक भगवान में विश्वास नहीं कर सकते। 
  •  हम जो भी हैं हमारी सोच हमें बनाती है, इसलिए सावधानी से सोचें, शब्द व्दितीय हैं पर सोच                          रहती है और दूर तक यात्रा करती है। 
  • उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त ना कर सको। 
  •  हम जितना बाहर आते हैं और जितना दूसरों का भला करते हैं, हमारा दिल उतना ही शुध्द होता है और उसमें उतना ही भगवान का निवास होता है। 
  • सच हजारों तरीके से कहा जा सकता है, तब भी उसका हर एक रूप सच ही है। 
  • संसार एक बहुत बड़ी व्यायामशाला है, जहां हम खुद को शक्तिशाली बनाने आते हैं।
  • बाहरी स्वभाव आंतरिक स्वभाव का बड़ा रूप है।
  • भगवान को अपने प्रिय की तरह पूजना चाहिए। 
  • ब्रम्हांड की सारी शक्तियां हमारी हैं। हम ही अपनी आंखों पर हाथ रखकर रोते हैं कि अंधकार है।

स्वामी विवेकानन्द की मृत्यु | Swami Vivekananda Death

4 जुलाई 1902 को, स्वामी विवेकानन्द की मृत्यु उस समय हो गई जब वे अन्य दिनों की तरह अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे, अपने अनुयायियों को शिक्षा दे रहे थे और वैदिक विद्वानों के साथ शिक्षाओं पर चर्चा कर रहे थे। ध्यान करने और अंतिम सांस लेने के लिए रामकृष्ण मठ में अपने कमरे में गए, यह मठ उन्होंने अपने गुरु के सम्मान में बनाया था। उनके अनुयायियों का मानना ​​था कि मृत्यु का कारण उनके मस्तिष्क में रक्त वाहिका का टूटना था, जो तब होता है जब कोई व्यक्ति निर्वाण प्राप्त करता है, जो आध्यात्मिक ज्ञान का उच्चतम रूप है जब 7 वां चक्र यानी मुकुट चक्र जो सिर पर स्थित होता है, खुलता है और फिर लाभ प्राप्त करता है। ध्यान करते समय महा समाधि। उनकी मृत्यु का समय रात्रि 9:20 बजे था। उनका अंतिम संस्कार उनके गुरु के सामने गंगा के तट पर चंदन की चिता पर किया गया।

Conclusion:

उम्मीद करता हूं कि हमारे द्वारा लिखा गया आर्टिकल Swami Vivekanand ka Jivan Parichay आप लोगों को काफी पसंद आया होगा ऐसे में आप हमारे आर्टिकल संबंधित कोई प्रश्न एवं सुझाव है तो आप तो हमारे कमेंट बॉक्स में आकर अपने प्रश्नों को पूछ सकते हैं हम आपके प्रश्नों का जवाब जरूर देंगे।

FAQ’s Swami Vivekananda Biography in Hindi

Q.

स्वामी विवेकानंद के माता-पिता का नाम क्या था ?

Ans.  माता का नाम भुवनेश्वरी देवी और पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था।

Q.स्वामी विवेकानन्द किस लिये प्रसिद्ध थे?

Ans.स्वामी विवेकानन्द (1863-1902) द्वारा 1893 विश्व धर्म संसद के दौरान दिया गया सबसे प्रसिद्ध भाषण, जिसमें उन्होंने अमेरिका में हिंदू धर्म का परिचय दिया और धार्मिक सहिष्णुता और उग्रवाद को समाप्त करने की अपील की, यही बात उन्हें  प्रसिद्ध बनती हैं।

Q.विवेकानन्द ने भारत के लिए क्या किया?

Ans.विवेकानन्द ने धर्मार्थ, सामाजिक और शैक्षिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए भारत में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, साथ ही रामकृष्ण मठ की स्थापना की, जो भिक्षुओं और आम भक्तों को आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करता है।

Q विवेकानंद का नारा क्या है?

Ans.

स्वामी विवेकानन्द का एक नारा है ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।

Q. बाशम ने विवेकानन्द को इतिहास का पहला व्यक्ति बताया, जिन्होंने पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति के मित्रतापूर्ण प्रत्युत्तर का आरंभ किया और उन्हें आधुनिक विश्व को आकार देने वाला घोषित किया।

स्वामी विवेकानन्द (अंग्रेज़ी: Swami Vivekananda, जन्म: 12 जनवरी, 1863, कलकत्ता; मृत्यु: 4 जुलाई, 1902बेलूर) एक युवा संन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगन्ध विदेशों में बिखेरने वाले साहित्य, दर्शन और इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान् थे। विवेकानन्द जी का मूल नाम 'नरेंद्रनाथ दत्त' था, जो कि आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द के नाम से विख्यात हुए। युगांतरकारी आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने हिन्दू धर्म को गतिशील तथा व्यावहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से पश्चिमी विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने का आग्रह किया। कलकत्ता के एक कुलीन परिवार में जन्मे नरेंद्रनाथ चिंतन, भक्ति व तार्किकता, भौतिक एवं बौद्धिक श्रेष्ठता के साथ-साथ संगीत की प्रतिभा का एक विलक्षण संयोग थे। भारत में स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

जीवन परिचय

विश्वनाथदत्त पाश्चात्य सभ्यता में आस्था रखने वाले व्यक्ति थे। विश्वनाथदत्त के घर में उत्पन्न होने वाला उनका पुत्र नरेन्द्रदत्त पाश्चात्य जगत् को भारतीय तत्वज्ञान का सन्देश सुनाने वाला महान् विश्व-गुरु बना। स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), भारत में हुआ। रोमा रोलाँ ने नरेन्द्रदत्त (भावी विवेकानन्द) के सम्बन्ध में ठीक कहा है- "उनका बचपन और युवावस्था के बीच का काल योरोप के पुनरुज्जीवन-युग के किसी कलाकार राजपूत्र के जीवन-प्रभात का स्मरण दिलाता है।" बचपन से ही नरेन्द्र में आध्यात्मिक पिपासा थी। सन् 1884 में पिता की मृत्यु के पश्चात् परिवार के भरण-पोषण का भार भी उन्हीं पर पड़ा। स्वामी विवेकानन्द ग़रीब परिवार के थे। नरेन्द्र का विवाह नहीं हुआ था। दुर्बल आर्थिक स्थिति में स्वयं भूखे रहकर अतिथियों के सत्कार की गौरव-गाथा उनके जीवन का उज्ज्वल अध्याय है। नरेन्द्र की प्रतिभा अपूर्व थी। उन्होंने बचपन में ही दर्शनों का अध्ययन कर लिया। ब्रह्मसमाज में भी वे गये, पर वहाँ उनकी जिज्ञासा शान्त न हुई। प्रखर बुद्धि साधना में समाधान न पाकर नास्तिक हो चली।

शिक्षा

1879 में 16 वर्ष की आयु में उन्होंने कलकत्ता से प्रवेश परीक्षा पास की। अपने शिक्षा काल में वे सर्वाधिक लोकप्रिय और एक जिज्ञासु छात्र थे। किन्तु हरबर्ट स्पेन्सर[1] के नास्तिकवाद का उन पर पूरा प्रभाव था। स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद वे ब्रह्म समाज में शामिल हुए, जो हिन्दू धर्म में सुधार लाने तथा उसे आधुनिक बनाने का प्रयास कर रहा था।

रामकृष्ण से भेंट

युवावस्था में उन्हें पाश्चात्य दार्शनिकों के निरीश्वर भौतिकवाद तथा ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ भारतीय विश्वास के कारण गहरे द्वंद्व से गुज़रना पड़ा। परमहंस जी जैसे जौहरी ने रत्न को परखा। उन दिव्य महापुरुष के स्पर्श ने नरेन्द्र को बदल दिया। इसी समय उनकी भेंट अपने गुरु रामकृष्ण से हुई, जिन्होंने पहले उन्हें विश्वास दिलाया कि ईश्वर वास्तव में है और मनुष्य ईश्वर को पा सकता है। रामकृष्ण ने सर्वव्यापी परमसत्य के रूप में ईश्वर की सर्वोच्च अनुभूति पाने में नरेंद्र का मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए। यह उपदेश विवेकानंद के जीवन का प्रमुख दर्शन बन गया। कहा जाता है कि उस शक्तिपात के कारण कुछ दिनों तक नरेन्द्र उन्मत्त-से रहे। उन्हें गुरु ने आत्मदर्शन करा दिया था। पचीस वर्ष की अवस्था में नरेन्द्रदत्त ने काषायवस्त्र धारण किये। अपने गुरु से प्रेरित होकर नरेंद्रनाथ ने संन्यासी जीवन बिताने की दीक्षा ली और स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए। जीवन के आलोक को जगत के अन्धकार में भटकते प्राणियों के समक्ष उन्हें उपस्थित करना था। स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की।

देश का पुनर्निर्माण

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उन्होंने स्वयं को हिमालय में चिंतनरूपी आनंद सागर में डुबाने की चेष्टा की, लेकिन जल्दी ही वह इसे त्यागकर भारत की कारुणिक निर्धनता से साक्षात्कार करने और देश के पुनर्निर्माण के लिए समूचे भारत में भ्रमण पर निकल पड़े। इस दौरान उन्हें कई दिनों तक भूखे भी रहना पड़ा। इन छ्ह वर्षों के भ्रमण काल में वह राजाओं और दलितों, दोनों के अतिथि रहे। उनकी यह महान् यात्रा कन्याकुमारी में समाप्त हुई, जहाँ ध्यानमग्न विवेकानंद को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की ओर रुझान वाले नए भारतीय वैरागियों और सभी आत्माओं, विशेषकर जनसाधारण की सुप्त दिव्यता के जागरण से ही इस मृतप्राय देश में प्राणों का संचार किया जा सकता है। भारत के पुनर्निर्माण के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें अंततः 1893 में शिकागो धर्म संसद में जाने के लिए प्रेरित किया, जहाँ वह बिना आमंत्रण के गए थे, परिषद में उनके प्रवेश की अनुमति मिलनी ही कठिन हो गयी। उनको समय न मिले, इसका भरपूर प्रयत्न किया गया। भला, पराधीन भारत क्या सन्देश देगा- योरोपीय वर्ग को तो भारत के नाम से ही घृणा थी। एक अमेरिकन प्रोफेसर के उद्योग से किसी प्रकार समय मिला और 11 सितंबर सन् 1893 के उस दिन उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चौंका दिया। अमेरिका ने स्वीकार कर लिया कि वस्तुत: भारत ही जगद्गुरु था और रहेगा। स्वामी विवेकानन्द ने वहाँ भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित करके ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा। 'सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका' (अमेरिकी बहनों और भाइयो) के संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते ही 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया। विवेकानंद ने वहाँ एकत्र लोगों को सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांतिक संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया। सन् 1896 तक वे अमेरिका रहे। उन्हीं का व्यक्तित्व था, जिसने भारत एवं हिन्दू-धर्म के गौरव को प्रथम बार विदेशों में जागृत किया।

धर्म एवं तत्वज्ञान के समान भारतीय स्वतन्त्रता की प्रेरणा का भी उन्होंने नेतृत्व किया। स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे- 'मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूँ। न तो संत या दार्शनिक ही हूँ। मैं तो ग़रीब हूँ और ग़रीबों का अनन्य भक्त हूँ। मैं तो सच्चा महात्मा उसे ही कहूँगा, जिसका हृदय ग़रीबों के लिये तड़पता हो।'

शिष्यों का समूह

पाँच वर्षों से अधिक समय तक उन्होंने अमेरिका के विभिन्न नगरों, लंदन और पेरिस में व्यापक व्याख्यान दिए। उन्होंने जर्मनी, रूस और पूर्वी यूरोप की भी यात्राएं कीं। हर जगह उन्होंने वेदांत के संदेश का प्रचार किया। कुछ अवसरों पर वह चरम अवस्था में पहुँच जाते थे, यहाँ तक कि पश्चिम के भीड़ भरे सभागारों में भी। यहाँ उन्होंने समर्पित शिष्यों का समूह बनाया और उनमें से कुछ को अमेरिका के 'थाउज़ेंड आइलैंड पार्क' में आध्यात्मिक जीवन में प्रशिक्षित किया। उनके कुछ शिष्यों ने उनका भारत तक अनुसरण किया। स्वामी विवेकानन्द ने विश्व भ्रमण के साथ उत्तराखण्ड के अनेक क्षेत्रों में भी भ्रमण किया जिनमें अल्मोड़ा तथा चम्पावत में उनकी विश्राम स्थली को धरोहर के रूप में सुरक्षित किया गया है।

वेदांत धर्म

1897 में जब विवेकानंद भारत लौटे, तो राष्ट्र ने अभूतपूर्व उत्साह के साथ उनका स्वागत किया और उनके द्वारा दिए गए वेदांत के मानवतावादी, गतिशील तथा प्रायोगिक संदेश ने हज़ारों लोगों को प्रभावित किया। स्वामी विवेकानन्द ने सदियों के आलस्य को त्यागने के लिए भारतीयों को प्रेरित किया और उन्हें विश्व नेता के रूप में नए आत्मविश्वास के साथ उठ खड़े होने तथा दलितों व महिलाओं को शिक्षित करने तथा उनके उत्थान के माध्यम से देश को ऊपर उठाने का संदेश दिया। स्वामी विवेकानन्द ने घोषणा की कि सभी कार्यों और सेवाओं को मानव में पूर्णतः व्याप्त ईश्वर की परम आराधना बनाकर वेदांत धर्म को व्यावहारिक बनाया जाना ज़रूरी है। वह चाहते हैं कि भारत पश्चिमी देशों में भी आध्यात्मिकता का प्रसार करे। स्वामी विवेकानन्द ने घोषणा की कि सिर्फ़ अद्वैत वेदांत के आधार पर ही विज्ञान और धर्म साथ-साथ चल सकते हैं, क्योंकि इसके मूल में अवैयक्तिक ईश्वर की आधारभूत धारणा, सीमा के अंदर निहित अनंत और ब्रह्मांड में उपस्थित सभी वस्तुओं के पारस्परिक मौलिक संबंध की दृष्टि है। उन्होंने सभ्यता को मनुष्य में दिव्यता के प्रतिरूप के तौर पर परिभाषित किया और यह भविष्यवाणी भी की कि एक दिन पश्चिम जीवन की अनिवार्य दिव्यता के वेदांतिक सिद्धान्त की ओर आकर्षित होगा। विवेकानंद के संदेश ने पश्चिम के विशिष्ट बौद्धिकों, जैसे विलियम जेम्स, निकोलस टेसला, अभिनेत्री सारा बर्नहार्ड और मादाम एम्मा काल्व, एंग्लिकन चर्च, लंदन के धार्मिक चिंतन रेवरेंड कैनन विल्वरफ़ोर्स, और रेवरेंड होवीस तथा सर पैट्रिक गेडेस, हाइसिंथ लॉयसन, सर हाइरैम नैक्सिम, नेल्सन रॉकफ़ेलर, लिओ टॉल्स्टॉय व रोम्यां रोलां को भी प्रभावित किया। अंग्रेज़ भारतविद ए.

एल. स्वामी विवेकानंद ने प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान कहां दिया था ?

Ans.  सिकंदराबाद में स्वामी विवेकानंद ने प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान दिया था । 

Q. स्वामी विवेकानंद की उनके गुरू से पहली भेंट कब हुई थी ?

Ans.  नवंबर 1881 में स्वामी विवेकानंद की उनके गुरू से पहली भेंट हुई थी

Q. विवेकानन्द की मृत्यु किससे हुई?

Ans.4 जुलाई, 1902 को स्वामी विवेकानन्द का अचानक निधन हो गया, जब वे ध्यान में थे।  उनके मस्तिष्क में रक्त वाहिका का टूटना मृत्यु का संभावित कारण बताया गया था।

Q.स्वामी विवेकानन्द के गुरु कौन थे?

Ans.

एल बाशम ने विवेकानंद को इतिहास का पहला व्यक्ति बताया, जिन्होंने पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति के मित्रतापूर्ण प्रत्युत्तर का आरंभ किया और उन्हें आधुनिक विश्व को आकार देने वाला घोषित किया।

मसीहा के रूप में

अरबिंदो घोष, सुभाषचंद्र बोस, सर जमशेदजी टाटा, रबींद्रनाथ टैगोर तथा महात्मा गांधी जैसे महान् व्यक्तियों ने स्वामी विवेकानन्द को भारत की आत्मा को जागृत करने वाला और भारतीय राष्ट्रवाद के मसीहा के रूप में देखा। विवेकानंद 'सार्वभौमिकता' के मसीहा के रूप में उभरे। स्वामी विवेकानन्द पहले अंतरराष्ट्रवादी थे, जिन्होंने 'लीग ऑफ़ नेशन्स' के जन्म से भी पहले वर्ष 1897 में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों,

गठबंधनों और क़ानूनों का आह्वान किया, जिससे राष्ट्रों के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके।

अतीत के झरोखे से

पश्चिम को योग और ध्यान से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद के बारे में वहां कम ही लोग जानते हैं लेकिन भारत में इस बंगाली बुद्धिजीवी का अब भी बहुत सम्मान किया जाता है। न्यूयॉर्क में जहां कभी स्वामी विवेकानंद रहते थे, वो बीबीसी संवाददाता ऐमिली ब्युकानन का ही घर था। बजरी पर कार के टायरों की चरमराहट, आने वाले तूफान की आशंका और हवाओं के साथ झूमते पेड़। 1970 के दशक में ऐमिली ब्युकानन के लिए इन बातों के कोई मायने नहीं थे। उनका नज़रिया हाल में उस वक्त बदला जब इन्हें पता चला कि वह स्वामी भारत के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक शिक्षकों में से एक थे। स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम को पूरब के दर्शन से परिचित कराया था। ऐमिली ब्युकानन के परिवार ने उस जमाने में उन्हें अपने घर में रहने के लिए आमंत्रित किया था और स्वामी जी के काम के प्रकाशन में उनकी सहायता की थी। शिकागो में हुए धर्मों के विश्व संसद से उन्हें दुनिया भर में ख्याति मिली। इस धर्म संसद में विवेकानंद ने सहिष्णुता के पक्ष में और धार्मिक हठधर्मिता को खत्म करने का आह्वान किया। अजीब इत्तफ़ाक़ था कि वह तारीख 11 सितंबर की थी। ‘अमेरिका के भाईयों और बहनों’ कहकर उन्होंने अपनी बात शुरू की थी। प्रवाहपूर्ण अंग्रेज़ी में असरदार आवाज़ के साथ भाषण दे रहे उस संन्यासी ने गेरूए रंग का चोगा पहन रखा था। पगड़ी पहने हुए स्वामी की एक झलक देखने के लिए वहां मौजूद लोग बहुत उत्साह से खड़े हो गए थे। इस भाषण से स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता बढ़ गई और उनके व्याख्यानों में भीड़ उमड़ने लगी। ईश्वर के बारे में यहूदीवाद और ईसाईयत के विचारों के आदी हो चुके लोगों के लिए योग और ध्यान का विचार नया और रोमांचक था। रामकृष्ण परमहंस की अनुयायी कैलिफोर्नियाई नन को वहां 'प्रव्राजिका गीताप्रणा' के नाम से जाना जाता है। वहाँ रिट्रीट सेंटर चला रहीं प्रव्राजिका गीताप्रणा ने ऐमिली ब्युकानन को पूरी जगह दिखाई। घर में साथ टहलते हुए प्रवराजिका ने बताया कि उनका बिस्तर भारत भेज दिया गया है लेकिन यह वही कमरा है जहाँ वो सोया करते थे, इस भोजन कक्ष में वह खाना खाया करते थे। स्वामी विवेकानंद बीबीसी संवाददाता ऐमिली ब्युकानन की परदादी को 'जोई-जोई' कहा करते थे। वह उम्र भर उनकी दोस्त और अनुयायी रहीं। उन दिनों कम ही देखा जाता था कि श्वेत महिलाएं और भारतीय एक साथ यात्राएं करते हों।[2]

स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित

विवेकानंद ने 1 मई, 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर, 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। उनके अंग्रेज़ अनुयायी कैप्टन सर्वियर और उनकी पत्नी ने हिमालय में 1899 में 'मायावती अद्वैत आश्रम' खोला। इसे सार्वभौमिक चेतना के अद्वैत दृष्टिकोण के एक अद्वितीय संस्थान के रूप में शुरू किया गया और विवेकानंद की इच्छानुसार, इसे उनके पूर्वी और पश्चिमी अनुयायियों का सम्मिलन केंद्र बनाया गया। विवेकानंद ने बेलूर में एक दृश्य प्रतीक के रूप में सभी प्रमुख धर्मों के वास्तुशास्त्र के समन्वय पर आधारित रामकृष्ण मंदिर के भावी आकार की रूपरेखा भी बनाई, जिसे 1937 में उनके साथी शिष्यों ने पूरा किया। इन्हें भी देखें: स्वामी विवेकानंद के प्रेरक प्रसंग

ग्रन्थों की रचना

'योग', 'राजयोग' तथा 'ज्ञानयोग' जैसे ग्रंथों की रचना करके विवेकानन्द ने युवा जगत को एक नई राह दिखाई है, जिसका प्रभाव जनमानस पर युगों-युगों तक छाया रहेगा। कन्याकुमारी में निर्मित उनका स्मारक आज भी उनकी महानता की कहानी कह रहा है।

मृत्यु

स्वामी विवेकानन्द के ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्वभर में है। जीवन के अंतिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा "एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।" प्रत्यदर्शियों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन भी उन्होंने अपने 'ध्यान' करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घंटे ध्यान किया। उन्हें दमा और शर्करा के अतिरिक्त अन्य शारीरिक व्याधियों ने घेर रखा था। उन्होंने कहा भी था, 'ये बीमारियाँ मुझे 40 वर्ष के आयु भी पार नहीं करने देंगी।' 4 जुलाई, 1902 को बेलूर में रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानंद तथा उनके गुरु रामकृष्ण के संदेशों के प्रचार के लिए 130 से अधिक केंद्रों की स्थापना की।


इन्हें भी देखें: स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन, रामकृष्ण मिशन एवं विवेकानन्द रॉक मेमोरियल

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

Summary: जानिए स्वामी विवेकानंद की कहानी (swami vivekananda story), उनके बारे में हिंदी में (swami vivekananda about in hindi), जीवनी (swami vivekananda biography), आत्मकथा (swami vivekananda autobiography), शिक्षा (swami vivekananda about education), और उनके विचार (swami vivekananda thoughts in hindi)। साथ ही उनके जन्म स्थान, मृत्यु का कारण, और अद्वितीय दर्शन (swami vivekananda philosophy) को भी समझें।

Swami Vivekananda Story

स्वामी विवेकानंद के बारे में हिंदी में (Swami Vivekananda About in Hindi)

स्वामी विवेकानंद का नाम न केवल भारत

बल्कि पूरे विश्व में आध्यात्मिकता और मानवता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है।

उन्होंने भारत के प्राचीन वेदांत और योग की शिक्षाओं को

विश्व मंच पर प्रस्तुत किया और भारतीय संस्कृति को गौरवपूर्ण स्थान दिलाया।

उनके प्रेरणादायक विचार आज भी लाखों लोगों को जीवन में सही दिशा दिखाते हैं।


स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekananda Biography)

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था।

उनका वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में भारतीय संस्कृति,

धर्म और दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया। उन्होंने 1893 के शिकागो विश्व धर्म महासभा में अपने अद्वितीय भाषण से विश्व को भारतीय ज्ञान

और अध्यात्म की गहराई से परिचित कराया।


स्वामी विवेकानंद आत्मकथा (Swami Vivekananda Autobiography)

स्वामी विवेकानंद की आत्मकथा उनके जीवन के संघर्ष, साधना, और उपलब्धियों का सजीव चित्रण है। इसमें उनके आरंभिक जीवन, आध्यात्मिक यात्रा, और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ उनके संबंधों का उल्लेख मिलता है। उनके कार्यों और विचारों ने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया।


स्वामी विवेकानंद की शिक्षा (Swami Vivekananda about education)

स्वामी विवेकानंद की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूशन में हुई। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी और जिज्ञासु थे। उन्होंने कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र (Philosophy) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उनकी शिक्षा ने उन्हें भारतीय और पश्चिमी दर्शन का गहन ज्ञान प्रदान किया।


स्वामी विवेकानंद का असली नाम (Swami Vivekananda real name)

स्वामी विवेकानंद का असली नाम नरेन्द्रनाथ दत्त (Narendranath Datta) था। विवेकानंद नाम उन्हें उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस द्वारा दिया गया।


स्वामी विवेकानंद का जन्म स्थान और जन्म तिथि (swami vivekananda born place and date of birth)

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हुआ था। उनका घर कोलकाता के सिमला क्षेत्र में स्थित था।


स्वामी विवेकानंद का बचपन (swami vivekananda childhood)

स्वामी विवेकानंद का बचपन अत्यंत चंचल और जिज्ञासु प्रवृत्ति का था। वे धार्मिक कहानियों और भक्ति में रुचि रखते थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी ने उन्हें धार्मिक और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी। बचपन में ही वे वेद, उपनिषद, और अन्य धार्मिक ग्रंथों के प्रति आकर्षित हो गए थे।


स्वामी विवेकानंद की मृत्यु का कारण (Swami Vivekananda cause of death and death reason)

स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई 1902 को हुआ। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले यह भविष्यवाणी की थी कि वे 40 वर्ष की आयु से अधिक नहीं जीएंगे। उनकी मृत्यु का कारण आधिकारिक रूप से दिल का दौरा (Heart Attack) माना जाता है।


स्वामी विवेकानंद की मृत्यु तिथि और पुण्यतिथि (Swami Vivekananda Death Anniversary)

स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में हुआ। उनकी पुण्यतिथि पर हर साल लाखों लोग उनकी शिक्षाओं को याद करते हैं।


स्वामी विवेकानंद के विचार हिंदी में (swami vivekananda thoughts in hindi)

स्वामी विवेकानंद के विचार प्रेरणादायक और व्यावहारिक हैं। उनके कुछ प्रमुख विचार:

  • “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
  • “एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो।”
  • “शक्ति ही जीवन है, निर्बलता मृत्यु है।”
  • “खुद पर विश्वास करो, और दुनिया आपके कदमों में होगी।”

स्वामी विवेकानंद का दर्शन (Swami Vivekananda Philosophy)

स्वामी विवेकानंद का दर्शन अद्वैत वेदांत पर आधारित था। वे मानते थे कि हर इंसान के भीतर परमात्मा का वास है। उन्होंने कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, और राज योग के महत्व को समझाया। उनका दर्शन आत्मविश्वास, मानव सेवा, और विश्व बंधुत्व पर आधारित था।


स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ (swami vivekananda teachings)

स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ:

  1. आत्मनिर्भरता: अपने ऊपर विश्वास रखना।
  2. सेवा: मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
  3. शिक्षा का उद्देश्य: शिक्षा का लक्ष्य चरित्र निर्माण और मानसिक बल प्रदान करना होना चाहिए।
  4. धर्म: हर धर्म समान है और सभी धर्मों का उद्देश्य एक ही है।

स्वामी विवेकानंद की संपूर्ण रचनाएँ (Swami Vivekananda complete works)

स्वामी विवेकानंद की संपूर्ण रचनाएँ उनके व्याख्यान, पत्र, और लेखों का संग्रह है। यह 9 खंडों में प्रकाशित हुआ है और इसे “The Complete Works of Swami Vivekananda” के नाम से जाना जाता है।


स्वामी विवेकानंद का इतिहास हिंदी में (Swami Vivekananda history in hindi)

स्वामी विवेकानंद का जीवन भारतीय संस्कृति, धर्म, और वेदांत के प्रचार का प्रतीक है। 1893 में उन्होंने शिकागो धर्म महासभा में ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और भारतीय समाज के उत्थान के लिए जीवनभर कार्य किया। उनके जीवन का हर पहलू प्रेरणा से भरा हुआ है।


निष्कर्ष: Swami Vivekananda Story

स्वामी विवेकानंद की कहानी एक साधारण इंसान के असाधारण बनने की यात्रा है। उनके विचार, शिक्षाएँ, और कार्य हमें यह सिखाते हैं कि आत्मविश्वास, सेवा, और कड़ी मेहनत से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को महान बना सकता है। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं। उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन आज भी उनके सपनों को साकार करने में लगा हुआ है।

उत्तरापथ

स्वामी विवेकानन्द की विज्ञान दृष्टि


आज विज्ञान भी किसी सम्प्रदाय से कम नहीं रहा है। वैज्ञानिक अपनी अधूरी मान्यताओं को भी किसी साम्प्रदायिक विश्वास के समान ही सब पर थोपते रहते है। सभी प्रकार के अतीन्द्रिय अनुभव को पूर्णतः नकारनेवाले भौतिक विज्ञान को अपने सूक्ष्मतम सिध्दान्तों में ‘निरीक्षक पूर्वाग्रह’ (Observer Bias) जैसे विचारों को आज स्थान देना पड़ा है। जब परमाणू से भी सूक्ष्म कणों की स्थिति व गति को लेकर प्रयोग करना प्रारम्भ हुआ तब वैज्ञानिकों को एक अलौकिक अनुभूति हुई। निरीक्षण करनेवाले व्यक्ति के मन के विचार प्रयोग को प्रभावित करते दिखाई दिए। इसे निरीक्षक पूर्वाग्रह का सिद्धान्त कहा गया। वस्तुनिष्ठ कहलानेवाले भौतिक विज्ञान को मानवीय विषयनिष्ठा का आश्रय लेना पड़ा फिर भी आधुनिक विज्ञान अपनी उद्दण्डता को नहीं छोड़ पाया है।

स्वामी विवेकानन्द ने 1895 में अमेरिका में बोलते हुए इस बात पर टिप्पणी की थी। स्वामीजी के अनुसार विज्ञान का उद्देश बाहय दृश्यमान विविधता के मध्य विद्यमान एकत्व की खोज ही है। रसायनशास्त्र का अंतिम लक्ष्य ऐसे एक मूलतत्व की खोज है जिससे सभी पदार्थों के रहस्य का पता चल सके। भौतिक विज्ञान एकत्व ऊर्जा की खोज में रत है। यह आध्यात्मिक लगनेवाली बात पूर्णतः वैज्ञानिक है। यह भारतीय वैज्ञानिक जीवनदृष्टि है। इसी का प्रयोग जितना भौतिक विज्ञान में हुआ उतना ही धर्म में हुआ। अतः भारत का धर्म वैज्ञानिक है और विज्ञान धार्मिक। इनमें आपस में कोई विरोधाभास नहीं है। इसी कारण 19 वी शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केवल उन्नत ही नहीं सर्वव्यापक थी। अंग्रेजों की नीतिओं इस समृध्द वैज्ञानिक परम्परा को नष्ट किया।

स्वामीजी ने भारत में पुनः विज्ञान अनुसंधान की नीव ड़ालने की प्रेरणा दी। मुम्बई से शिकागो जाते समय पहला पाड़ाव जापान था। इस यात्रा में जहाज पर जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। प्रतिदिन कई घण्टो दोनों के मध्य चर्चा होती थी। टाटा का जापान दौरा इस्पात निर्माण की तकनिक प्राप्त करने के लिए था। स्वामीजी ने टाटा कों जानकारी दी कि मिश्र धातु को ढालने की सर्वोत्तम तकनिक भारत में ही विकसित की गई थी। लौह असस्क से फौलाद निर्माण की अनेक भट्टियाँ भारत में थी। इस चर्चा में से टाटा को दो प्रेरणायें मिली। एक उन्होंने अपने ईस्पात उद्योग को जापान में ले जाने की जगह भारत में ही रखा। दूसरा कार्य था भारत में विज्ञान अनुसंधान हेतु प्रगत संस्थान का निर्माण। स्वामीजी के शिकागो लौटने के बाद टाटा ने स्वामीजी को पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरू की स्थापना की जानकारी प्रदान की तथा निवेदन किया कि स्वामीजी निदेशक का दायित्व ग्रहण करें। आज भी संस्थान के स्वागत कक्ष में इस पत्र की प्रतिलिपी सुशोभित है।

आइनस्टाईन द्वारा E = mc2 के सिध्दान्त का प्रतिपादन करने से लगभग दो दशक पूर्व स्वामीजी ने जड़-चेतन सम्बन्ध पर व्याख्यान देते समय प्रतिपादित किया था कि जड़ को उर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। उपनिषदों के सन्दर्भ देते हुए स्वामीजी ने बताया कि किसी भी भौतिक वस्तु को प्रकाश की गति से प्रक्षेपित किया जाए तो वह उर्जा में परिवर्तित हो जाती है। जब स्वामीजी ने रामकृष्ण मठ की स्थापना की तब सन्यासियों का आहवान किया कि ‘एक हाथ में पृथ्वि का गोल व दूसरे हाथ में टार्च लेकर गाँव गाँव में जाओ और हमारे भोले जनसामान्य को शिक्षा दो कि ग्रहण कैसे होता है।’

स्वामीजी कि यह विज्ञानदृष्टि आज भी भारत को प्रेरणा दे रही है। अंतरीक्ष विज्ञान में भारत को विश्व में उच्च स्थान प्रदान करनेवाले डा माधवन् नायर, डा ए.पी.जे अब्दुल कलाम, डा ब्रह्मभट जैसे वैज्ञानिकों ने विभिन्न अवसरों पर स्वामी विवेकानन्द को अपना प्रेरणास्त्रोत बताया है। परम महासंगणक प्रकल्प के द्रष्टा संयोजक डा विजय भटकर की प्रेरणा भी स्वामीजी ही है।

पसंद करेंलोड हो रहा है...

Related

जून 1, 2013 - Posted by uttarapath | चरित्र | विज्ञानं, विवेकानंद, स्वामी विवेकानंद, स्वामीजी, Einstein, observer bias, Science, Swami Vivekananda


« पिछला | अगला »

रामकृष्ण परमहंस स्वामी विवेकानन्द के गुरु थे।

स्वामी विवेकानन्द

पूरा नामस्वामी विवेकानन्द
अन्य नामनरेंद्रनाथ दत्त (मूल नाम)
जन्म12 जनवरी, 1863
जन्म भूमिकलकत्ता (वर्तमान कोलकाता)
मृत्यु4 जुलाई, 1902
मृत्यु स्थानरामकृष्ण मठ, बेलूर
अभिभावकविश्वनाथदत्त (पिता)
गुरुरामकृष्ण परमहंस
कर्म भूमिभारत
कर्म-क्षेत्रदार्शनिक, धर्म प्रवर्तक और संत
मुख्य रचनाएँयोग, राजयोग, ज्ञानयोग
विषयसाहित्य, दर्शन और इतिहास
शिक्षास्नातक
विद्यालयकलकत्ता विश्वविद्यालय
प्रसिद्धिआध्यात्मिक गुरु
नागरिकताभारतीय
संबंधित लेखराष्ट्रीय युवा दिवस, विवेकानन्द रॉक मेमोरियल, स्वामी विवेकानन्द के अनमोल वचन
अन्य जानकारीअंग्रेज़ भारतविद ए.