Biography of imam ali in hindi
Home / Religious & Spiritual Figures / Biography of imam ali in hindi
का जन्म 17 मार्च 600 में इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 13 रज्जब 24 हिजरी पूर्व मुसलमानों के तीर्थ स्थल काबा के अन्दर हुआ था। हजरत अली मुसलमानों के खलीफा भी थे।
HAZRAT ALI BIOGRAPHY IN HINDI
यहाँ पर हिंदी में लिखा हुआ पढ़े हजरत अली बायोग्राफी HAZRAT ALI BIOGRAPHY IN HINDI –
- BIOGRAPHY Full Name In English – Hazrat Ali IBN ABI Talib
- Name In Urdu – علي ابن أبي طالب
- Hazrat Ali Tribe – Kuresh (Banu Hasim)
- Date Of Brith – 15 Sep 601 – 13 रजब 21 हिजरी पूर्व
- हजरत अली की मृत्यु – 29 Jan 661 – 21 रमज़ान AH 40) (आयु 59 वर्ष
- Father Name – Abu Talib IBN Abdul Mutallib
- Mother Name – Fatima Bint Asad
- Religion – Islam | Muslim
- Hazrat Ali Sons Name – अल-हसन, अल-हुसैन, ज़ैनब, उम्म कुलसुम, मोहसिन, मुहम्मद, अब्बास, अब्दुल्ला, हिलाल, मुहम्मद, इब्न अबी बक्र(दत्त पुत्र)
- Hazrat Ali Grave – Imam Ali Masjid, Nazaf, Iraq
- Wife Name (Hazrat Ali) – फ़ातिमा, उम्मह बिन्त ज़ैनब, उम्म उल-बनीन, लैला बिन्त मसऊद, Asma bint Umays, Khawlah bint Ja’far, Al Sahba’ bint Rabi’ah
हजरत अली बायोग्राफी
इस्लाम धर्म में हजरत अली बायोग्राफी की बात आए तो हजरत अली की तलवार की चर्चा जरुर होनी चाहिए –
हजरत अली की तलवार
हजरत अली की तलवार का नाम जुल्फिकार है। जल्फिकार तलवार से हजरत अली ने कई सारे जंगे की एंव सभी में जीत प्राप्त किया। हजरत अली की ताकत और तलवार दोनों का ही कोई जवाब नहीं।
HAZRAT ALI के पास जो तलवार जुल्फिकार थी। वह अपने समय की सबसे अलग तलवार थी क्योकि जुल्फिकार तलवार पर दो नोक थी जिसमे जबरजस्त धार थी।
Hazrat Ali ki Talwar ka Naam
हजरत अली की तलवार का नाम जुल्फिकार है। कहा जाता है (रिवायत) – हजरत मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने जंग के दौरान जुल्फिकार हजरत अली को दिया था।
जुल्फिकार तलवार के बारे में दूसरी रिवायत यह की अल्लाह के हुक्म से जिब्राइल (अल्लाह के फ़रिश्ते) ने प्यारे नबी मोहम्मद (स.अ.व.) को ये तलवार दी और उसके बाद आप ने हजरत अली को ये तलवार दी।
हजरत अली की शहादत के बाद भी जुल्फिकार तलवार आपके परिवार में ही थी इसके बाद हजरते इमाम हुसैन ने जुल्फिकार तलवार से कर्बला की जंग भी लड़ी एंव शहादत मिली।
कर्बला की जंग हजरते इमाम हुसैन, हजरत अली की तलवार जुल्फिकार से ही किया था। जिसमे हजरते इमाम हुसैन की शहादत हुई। इसके बाद से हजरत अली की तलवार का कोई पता नहीं है, लेकिन रसूल अल्लाह की 9 में से 8 तलवारें, तोप कापी संग्रहालय में रखी हुई हैं और एक काहिरा मिस्र में है। हजरत अली की मजार अफगानिस्तान की इमाम अली मस्जिद में है, जोकि नजफ़, इराक़ में स्थित है।
READ THIS
Post navigation
इस्लाम के चौथे खलीफा हज़रत अली (र.अ.)
हज़रत अली (र.अ.) इस्लाम की महान हस्तियों में से एक हैं। वे पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) के चचेरे भाई, दामाद और चौथे खलीफा थे। "हज़रत अली (र.अ.) का जीवन परिचय" न केवल मुसलमानों के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए इज्जत, बहादुरी और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। इस लेख में हम "हज़रत अली (र.अ.) की जीवनी", उनकी शिक्षाएं, युद्धों में भूमिका और उनकी विरासत पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यदि आप "हज़रत अली (र.अ.) के अनमोल वचन" या "हज़रत अली (र.अ.) का इतिहास" हज़रत अली के किस्से" खोज रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए उपयोगी होगा। Read also: Hazrat Usman R.a Ka Waqia in Hindi | हज़रत उस्मान ग़नी (र.अ.) का वाकिया हिंदी में।
हज़रत अली (र.अ.) का प्रारंभिक जीवन: जन्म और परिवार
हज़रत अली (र.अ.) का जन्म सन 600 ईस्वी के आसपास मक्का में हुआ। उनका पूरा नाम अली इब्न अबी तालिब था। उनके पिता अबू तालिब कुरैश कबीले के प्रमुख और पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) के चाचा थे। "हज़रत अली (र.अ.) का परिवार" इस्लाम के शुरुआती इतिहास से गहराई से जुड़ा था। बचपन में अली (र.अ.) को पैगंबर के घर में पाला गया, क्योंकि उनके पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। इससे "हज़रत अली (र.अ.) और पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) का रिश्ता" बहुत मजबूत हो गया।
हज़रत अली (र.अ.) बचपन से ही बुद्धिमान और बहादुर थे। उन्होंने कभी मूर्तिपूजा नहीं की और सत्य की खोज में रहते थे। "हज़रत अली (र.अ.) का बचपन" इस बात का सबूत है कि कैसे एक बालक ने इस्लाम के प्रचार में बड़ी भूमिका निभाई। जब पैगंबर को नुबूवत मिली, तो हज़रत अली (र.अ.) सबसे पहले इस्लाम कबूल करने वालों में से थे। वे उस समय केवल 10 साल के थे। यह घटना "हज़रत अली (र.अ.) का इस्लाम कबूल करना" के नाम से मशहूर है।
हज़रत अली (र.अ.) और पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.): गहरा बंधन
"हज़रत अली (र.अ.) और पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) का रिश्ता" इस्लाम की नींव का हिस्सा है। अली (र.अ.) पैगंबर के चचेरे भाई होने के साथ-साथ उनके दामाद भी बने। पैगंबर की बेटी फातिमा (र.अ.) से उनका विवाह हुआ, जिससे हसन (र.अ.) और हुसैन (र.अ.) जैसे पुत्र हुए, जो बाद में इस्लाम के इतिहास में अहम बने।
पैगंबर ने अली (र.अ.) की कई बार तारीफ की। घदीर खुम की घटना में पैगंबर ने कहा, "जिसका मैं मौला हूं, उसका अली मौला है।" यह वचन "हज़रत अली (र.अ.) की मौलावत" के रूप में शिया मुसलमानों में बहुत अहम है। सुन्नी परंपरा में भी अली (र.अ.) को राशिदून खलीफाओं में गिना जाता है। "हज़रत अली (र.अ.) का पैगंबर से रिश्ता" न केवल पारिवारिक था, बल्कि आध्यात्मिक और राजनीतिक भी था।
हज़रत अली (र.अ.) की युद्धों में भूमिका: बहादुरी की मिसाल
इस्लाम के शुरुआती दिनों में कई युद्ध हुए, और "हज़रत अली (र.अ.) की युद्धों में भूमिका" बेजोड़ थी। बद्र की जंग में हज़रत अली (र.अ.) ने कई दुश्मनों को हराया। उहुद की जंग में, जब मुसलमानों की स्थिति कमजोर हो गई, तब हज़रत अली (र.अ.) ने पैगंबर की जान बचाई और कई घाव सहे। "हज़रत अली (र.अ.) बद्र की जंग" और "हज़रत अली (र.अ.) उहुद की जंग" उनकी शौर्य गाथा को दर्शाते हैं।
खंदक की जंग में हज़रत अली (र.अ.) ने अम्र इब्न अब्द वुद जैसे ताकतवर योद्धा को हराया। खैबर की जंग में उन्होंने किले का दरवाजा उखाड़ फेंका, जो उनकी शारीरिक शक्ति का प्रतीक है। "हज़रत अली (र.अ.) खैबर की जंग" की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। इन युद्धों में अली (र.अ.) ने न केवल तलवार चलाई, बल्कि रणनीति भी बनाई। पैगंबर ने उन्हें "असदुल्लाह" (अल्लाह का शेर) का खिताब दिया।
हज़रत अली (र.अ.) का खलीफाकाल: इज्जत और चुनौतियां
पैगंबर के बाद अबू बक्र, उमर और उस्मान (र.अ.) खलीफा बने। सन 656 ईस्वी में अली (र.अ.) चौथे खलीफा बने। "हज़रत अली (र.अ.) का खलीफाकाल" इज्जत और निष्पक्षता से भरा था, लेकिन कई चुनौतियों से भी जूझना पड़ा। जमल की जंग में उन्हें आयशा (र.अ.) के नेतृत्व वाली सेना से लड़ना पड़ा। सिफ्फीन की जंग में मुआविया के साथ संघर्ष हुआ, जो बाद में उमयyad खलीफा बना।
अली (र.अ.) ने इज्जत की मिसाल कायम की। उन्होंने कहा, "लोग दो तरह के होते हैं: या तो तुम्हारे धर्म भाई या तुम्हारे जैसे इंसान।" "हज़रत अली (र.अ.) का इज्जत भरा शासन" मशहूर है। उन्होंने गरीबों की मदद की और भ्रष्टाचार का डटकर मुकाबला किया। उनके शासन में कूफा राजधानी बनी। "हज़रत अली (र.अ.) की खलीफा बनने की कहानी" राजनीतिक उथल-पुथल से भरी है।
हज़रत अली (र.अ.) की शिक्षाएं: नहजुल बलागा की अमर बातें
"हज़रत अली (र.अ.) की शिक्षाएं" पूरी दुनिया में मशहूर हैं। उनकी किताब "नहजुल बलागा" में उनके भाषण, पत्र और वचन संग्रहित हैं। इसमें जीवन, इज्जत और नैतिकता पर गहरे विचार हैं। उदाहरण के लिए, "ज्ञान सबसे बड़ी दौलत है" जैसे वचन "हज़रत अली (र.अ.) के अनमोल वचन" में शामिल हैं।
अली (र.अ.) ने कहा, "धैर्य दो तरह का होता है: मुसीबत पर धैर्य और ख्वाहिश पर धैर्य।" उनकी शिक्षाएं आध्यात्मिकता पर जोर देती हैं। "हज़रत अली (र.अ.) की हदीसें" और "हज़रत अली (र.अ.) के कथन" मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं। शिया और सुन्नी दोनों में उनकी शिक्षाओं की इज्जत की जाती हैं। नहजुल बलागा को अरबी साहित्य की उत्कृष्ट रचना माना जाता है।
हज़रत अली (र.अ.) की शहादत: अंतिम पल
सन 661 ईस्वी में कूफा की मस्जिद में नमाज पढ़ते समय इब्न मुलजम नामक खारिजी ने अली (र.अ.) पर हमला किया। "हज़रत अली (र.अ.) की शहादत" 21 रमजान को हुई। उन्होंने अपने हत्यारे को भी इज्जत दी और कहा, "उसे एक ही वार से मारना।" उनकी शहादत "हज़रत अली (र.अ.) की मौत" के नाम से जानी जाती है। उनका मकबरा नजफ, इराक में है, जो शिया मुसलमानों का प्रमुख तीर्थस्थल है।
हज़रत अली (र.अ.) की विरासत: इस्लाम में योगदान
"हज़रत अली (र.अ.) की विरासत" इस्लाम के बंटवारे का आधार बनी। शिया मुसलमान उन्हें पहला इमाम मानते हैं, जबकि सुन्नी उन्हें चौथा खलीफा। उनके पुत्र हसन और हुसैन से इमामों की श्रृंखला चली। "हज़रत अली (र.अ.) का इस्लाम में योगदान" इज्जत, बहादुरी और ज्ञान से जुड़ा है।
आज दुनिया भर में "हज़रत अली (र.अ.) का जन्मदिन" और शहादत मनाई जाती है। उनकी कहानियां किताबों, फिल्मों और कविताओं में बयां की जाती हैं। सूफी परंपरा में उन्हें आध्यात्मिक गुरु माना जाता है। "हज़रत अली (र.अ.) की कहानियां" बच्चों को सिखाई जाती हैं।
हज़रत अली (र.अ.) के बारे में रोचक तथ्य
- अली (र.अ.) को "अबू तुराब" (धूल का पिता) कहा जाता था, जो पैगंबर का दिया हुआ नाम है।
- वे कवि भी थे और उनकी कविताएं मशहूर हैं।
- "हज़रत अली (र.अ.) की तलवार" जुल्फिकार दो धार वाली थी, जो एक प्रतीक बन गई।
- उन्होंने विज्ञान और दर्शन में गहरी रुचि दिखाई।
Conclusion: हज़रत अली (र.अ.) से प्रेरणा
हज़रत अली (र.अ.) का जीवन इज्जत, बहादुरी और आस्था का प्रतीक है। "हज़रत अली (र.अ.) की जीवनी" हमें सिखाती है कि मुश्किलों में भी सत्य पर डटे रहना चाहिए। यदि आप "हज़रत अली (र.अ.) के बारे में जानकारी" या "हज़रत अली (र.अ.) की पूरी कहानी" जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है। उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। अल्लाह हमें उनके रास्ते पर चलने की ताकत दे।
islamic-waqiastories-of-companionsइस्लाम के चौथे खलीफाहज़रत अली (र.अ.)
आपका शजरए नसब यह है अली इब्न अबी तालिब बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्द मोनाफ् बिन कसा बिन कलाब बिन मर्रा बिन कअब बिन लुई बिन ग़ालिब बिन फहरा इब्न मालिक बिन नज़र इब्न कनाना।
अबुल हसन व अबू तोराब कुनीयत हैं जो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का अता करदा है। माँ का नाम फातमा बिन्त असद बिन हाशिम है। आप बच्चों में सबसे पहले ईमान लाये।
अशरए मोबश्शिरा में से एक हैं। सैयदतुन निसा अलआलमीन सैय्यदा फातिमा रजियल्लाहु अन्हा के शौहर मोहतरम, रसूलल्लाह के दामाद, साबिकीन अव्वलीन में से एक। आपने अपने बचपन में भी बुत परस्ती न की। हिजरत की रात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी जगह लिटा दिया कि लोगों की अमानतें वगैरह उनके हवाले कर के फिर हिजरत करना।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के साथ तमाम ग़ज़वात में शरीक हुए। सिवाए तबूक के क्योंकि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इस मौके पर उन्हें मदीना का ख़लीफा बना दिया था।
तमाम गज़वात में नुमायाँ खिदमात अन्जाम दीं। मुख्तलिफ मौकों पर लवाए इस्लाम उन्हीं को दिया गया।
आपकी फज़ीलत अहादीस की रौशनी में :-
हज़रात शेखैन ने सऊद इब्ने अबी वकास से रिवायत किया कि जब रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने ग़ज़वए तबूक में आपको मदीना का खलीफा बना दिया तो अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया। “तख्लपनी फिन्निसाये वस्सिबयान”। मुझे बच्चों और औरतों में आप छोड़ रहे हैं।
क्या तुम इस बात पर राजी नही कि जिस तरह मूसा अलैहिस्सलाम के बाद हारून अलैहिस्सलाम ने मर्तबा लिया। ऐसे तुम रहो। सिवाए इसके कि मेरे बाद कोई नबी नहीं। और बुखारी व मुस्लिम ने तखरीज की सहल इब्न सअद से कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने खैबर के दिन फरमाया कि कल ऐसे को झण्डा दूंगा जिसके हाथ पर अल्लाह फतह देगा। बरकत वाली सीनी। Barkat wali sini.
अल्लाह व रसूल उससे मुहब्बत करते हैं वह अल्लाह व रसूल से मुहब्बत करता है। रात भर लोग इस फिक्र में रहे कि सुबह झण्डा किसको दिया जाता है और सब के सब उसकी उम्मीद रखते थे तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अइना अली। अली कहाँ हैं। कहा गया कि उनकी आँखें दुख रही हैं तो वह तशरीफ़ लाये तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने लोआबे दहन उनकी आँखों में डाला और उनके लिए दुआ की तो उन्हें शिफा मिल गयी।
गोया उन्हें कोई तकलीफ़ न थीं चुनान्चे आपको झण्डा दिया गया और फतह हुई।
मुस्लिम ने सअद बिन वकास से तखरीज की। जब आयत मुबाहिला नाज़िल हुई तो नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने अली, फातिमा, हसन व हुसैन को बुलाया। “फकाला अल्लाहुम्मा हाऊलाये अहली”।
तिर्मिजी ने अबू सरहहा व जैद इब्न अरकम से रिवायत की है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया “मन कुन्तो मौलाहो फअली मौलाहो। जिसका मैं मौला हूँ अली उसके मौला हैं। और तिबरानी ने यूँ रिवायत की ऐ अल्लाह जो उन से मोहब्बत रखे तू उस से मोहब्बत कर और जो उनसे दुश्मनी करे उसको दुश्मन रख।
तिर्मिज़ी ने इब्न उमर से रिवायत की। यानी तुम दुनिया व आखिरत में मेरे भाई हो।
मुस्लिम ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से तखरीज की। यानी मुझसे मोमिन मोहब्बत रखेगा और मुनाफिक बोग्ज़ रखेगा। यह ही नबी उम्मी ने मुझसे फरमाया।
तिर्मिजी व हाकिम ने अली से रिवायत की। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया मैं इल्म का शहर हूँ। अली उसके दरवाज़े हैं।
अबू यअला और बज़ार ने सअद बिन वकास से तख़रीज जिस ने अली को अज़ियत दी उसने मुझे तकलीफ पहुँचाया।
दूसरी हदीस में यूँ भी आया है कि दो जमाअतें अली की मोहब्बत में हलाक होंगी। एक हद से ज़्यादा मोहब्बत करने की वजह से और एक अदावत रखने की वजह से।
तिबरानी औसत ने उम्मे सलमा से तखरीज की। कालत समेअता रसूलल्लाहे सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बकौले अली.
अली कुरआन के साथ हैं और कुरआन अली के साथ। दोनों एक दूसरे से अलग न होंगे यहाँ तक कि हौज़ पर मुलाकात करेंगे। (तारीखुल खोलफा)
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त हमे कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक दे, हमे एक और नेक बनाए, सिरते मुस्तक़ीम पर चलाये, हम तमाम को नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत और इताअत की तौफीक़ आता फरमाए, खात्मा हमारा ईमान पर हो। जब तक हमे ज़िन्दा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे, आमीन ।
इस बयान को अपने दोस्तों और जानने वालों को शेयर करें। ताकि दूसरों को भी आपकी जात व माल से फायदा हो और यह आपके लिये सदका-ए-जारिया भी हो जाये।
क्या पता अल्लाह ताला को हमारी ये अदा पसंद आ जाए और जन्नत में जाने वालों में शुमार कर दे। अल्लाह तआला हमें इल्म सीखने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की तौफीक अता फरमाए । आमीन ।
खुदा हाफिज…
🤲 Support Sunnat-e-Islam
Agar aapko hamara Islamic content pasand aata hai aur aap is khidmat ko support karna chahte hain, to aap apni marzi se donation kar sakte hain.
Aameen.
💙 Donate via PayPal 💚 Donate via UPI
हज़रत अली (رضي الله عنه) का जीवन | Hazrat Ali History in Hindi
हजरत अली इब्न अबी तालिब (رضي الله عنه) इस्लाम के चौथे खलीफा और पैगंबर मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) के एक प्रमुख साथी थे। उनका जन्म 599 ईस्वी में मक्का में हुआ था।
अली का परिवार
अली के पिता का नाम अबी तालिब और माता का नाम फातिमा बिन्त असद था। उनकी पत्नी फातिमा (رضي الله عنها) थीं, जो पैगंबर मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) की बेटी थीं।
इस्लाम में दीक्षा
अली ने इस्लाम की शुरुआती दिनों में इसे स्वीकार किया। वे सबसे पहले इस्लाम लाने वाले किशोर माने जाते हैं और पैगंबर ﷺ के प्रिय साथी रहे।
खिलाफत
हज़रत उस्मान ग़नी (رضي الله عنه) की शहादत के बाद अली को इस्लाम का चौथा खलीफा नियुक्त किया गया। उनके शासनकाल में इस्लाम कई आंतरिक संघर्षों से गुज़रा, लेकिन उन्होंने न्याय, संयम और नेतृत्व की मिसाल कायम की।
अली की उपलब्धियाँ
- इस्लामी सीमाओं की रक्षा और विस्तार।
- न्यायपूर्ण प्रशासनिक नीतियों की स्थापना।
- मौलिक इस्लामी ज्ञान का प्रसार।
अली की मृत्यु
661 ईस्वी में कूफा में एक विद्रोही द्वारा मस्जिद में हमला कर दिया गया जिसमें अली (رضي الله عنه) शहीद हो गए।
अली की विरासत
हज़रत अली (رضي الله عنه) को इस्लामी न्याय, बहादुरी और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है। वह ज्ञान के द्वार और “शेर-ए-ख़ुदा” के नाम से प्रसिद्ध थे।
अली की विशेषताएं
- न्यायप्रियता: अली हमेशा निष्पक्ष और सच्चे निर्णय लेते थे।
- दया और करुणा: गरीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा में तत्पर रहते थे।
- सादगी: बहुत सादा जीवन जीते थे।
प्रमुख प्रशासनिक सुधार
- इस्लाम का प्रसार
- सुदृढ़ न्याय प्रणाली
- आर्थिक सुधार और व्यापार को बढ़ावा
अली की मृत्यु के बाद
- उत्तराधिकारी: उनके पुत्र हसन इब्न अली (رضي الله عنه) को अगला खलीफा चुना गया।
- विरासत: अली की शिक्षाएं आज भी मुसलमानों को मार्गदर्शन देती हैं।
कुरआन और हदीस में हज़रत अली (رضي الله عنه) की महानता
हदीस: नबी ﷺ ने अली (RA) के बारे में फ़रमाया:
"मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा है।" — (तIRMIZI, हदीस 3723)
"अली से सिर्फ़ मोमिन ही मोहब्बत करेगा और अली से सिर्फ़ मुनाफिक ही नफ़रत करेगा।" — (सही मुस्लिम, हदीस 78)
कुरआन: सूरह अल-इंसान (76:8-9) में अली (RA) और फातिमा (RA) की प्रशंसा करते हुए कहा गया: “वे अल्लाह की रज़ा के लिए गरीब, यतीम और बंदी को खाना खिलाते हैं, जबकि स्वयं उसे पसंद करते हैं।”
शहादत: नबी ﷺ ने फ़रमाया: "अली मेरे बाद हर मोमिन के लिए वही हैं जो मैं उनके लिए हूँ।" — (सही तिर्मिज़ी)
सहाबा में स्थान
हज़रत अली (RA) को 'अशरह मुबश्शरा' में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उनका जन्नत की बशारत अलग और अनेक बार हुई। वे 'शेर-ए-ख़ुदा' और 'बाब-उल-इल्म' के नाम से प्रसिद्ध थे।
इस्लामी लेख और PDF पढ़ें:
इस इस्लामी पोस्ट को ज़रूर शेयर करें
प्यारे इस्लामी भाइयों और बहनों, कृपया इस पोस्ट को जरूर शेयर करें, ताकि लोगों में दीन की जागरूकता बढ़े।
हो सकता है आपके एक शेयर से कोई मुस्लिम भाई या बहन कुछ दीन का इल्म सीख जाए — और यही आपके लिए सदक़ा-ए-जरिया बन जाए।
अगर आप प्यारे नबी ﷺ से सच्ची मोहब्बत करते हैं, तो इस पोस्ट को शेयर ज़रूर करें,
ताकि हमारे मुस्लिम भाई-बहन इस्लाम सीखें और अमल करें।
HAZRAT ALI BIOGRAPHY IN HINDI हजरत अली बायोग्राफी हजरत अली का जीवन परिचय hazrat ali bio for instagram Hazrat Ali captions for instagram
हजरत अली पैगम्बर मुहम्मद ﷺ के चचाजाद भाई और दामाद थे। हजरत अली राजी.
Allah Ta‘ala aapko iska ajr ata farmaye.