Autobiography of kabir das in hindi language
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| 11 June, 2025, Kabirdas Jayanti
क्या आप जानते हैं कि एक जुलाहे के घर जन्मे कबीर दास ने अपने शब्दों से पूरे समाज की सोच को हिला दिया था? कबीर न तो पंडित थे, न ही मुल्ला, लेकिन उनके दोहों ने धर्म, जात-पात और अंधविश्वास की जड़ों को सीधा चुनौती दी। उनकी वाणी में वो शक्ति थी जो सदियों बाद भी लोगों के दिलों को छूती है। इस Biography of Sant Kabirdas में आप जानेंगे कैसे एक साधारण जीवन जीने वाले कबीर ने समाज को प्रेम, समानता और ईश्वर के निराकार रूप की ओर मोड़ा। कबीर की जीवनी केवल इतिहास नहीं है, बल्कि एक जीवन दर्शन है—जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 15वीं सदी में था। तो चलिए, इस रोचक यात्रा की शुरुआत करते हैं और जानते हैं उस संत के जीवन को, जिनके शब्द आज भी अमर हैं।
Biography of Sant Kabirdas in Hindi: प्रस्तावना!
संत कबीरदास, भारतीय इतिहास के सबसे सम्मानित रहस्यवादी कवियों, दार्शनिकों और संतों में से एक हैं। उनकी गहन आध्यात्मिक शिक्षाएँ और कालजयी कविताएँ आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती हैं। कबीर ने धर्मों के बीच की खाई को पाटा और हिंदू, मुस्लिम, सिख सहित विभिन्न समुदायों से सम्मान अर्जित किया। 15वीं शताब्दी में वाराणसी में जन्मे कबीर की शिक्षाएँ एक निराकार ईश्वर के प्रति भक्ति, सभी मनुष्यों की समानता और कठोर धार्मिक रीति-रिवाजों के विरोध पर आधारित थीं। उनके दोहे (dohe), साखी (sakhi) और शब्द (shabda) अपनी सादगी, गहराई और प्रासंगिकता के लिए प्रसिद्ध हैं। यह जीवनी कबीर के प्रारंभिक जीवन, आध्यात्मिक यात्रा, साहित्यिक योगदान, सामाजिक प्रभाव और स्थायी विरासत को विस्तार से प्रस्तुत करती है, जिसमें ऐतिहासिक विवरण, किंवदंतियाँ और अतिरिक्त जानकारी शामिल है।
प्रारंभिक जीवन: एक साधारण शुरुआत
कबीरदास का जन्म रहस्य और कहानियों से घिरा हुआ है। लोकप्रिय कथा के अनुसार, उन्हें वाराणसी के लहरतारा झील के पास एक नि:संतान मुस्लिम बुनकर दंपति, नीरू और नीमा ने पाया और गोद लिया। कुछ स्रोतों के अनुसार, उनका जन्म 1398 में हुआ, जबकि अन्य 1440 का उल्लेख करते हैं। 1398 की तारीख इस विश्वास से जुड़ी है कि वे 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे, हालांकि यह विवादास्पद है। एक किंवदंती कहती है कि उनकी माँ एक ब्राह्मण विधवा थी, जिसने सामाजिक कलंक के कारण तीर्थयात्रा के दौरान उन्हें त्याग दिया था। उनके मूल की सच्चाई जो भी हो, कबीर का पालन-पोषण एक मुस्लिम बुनकर (जुलाहा) परिवार में हुआ, जो उस समय की जाति व्यवस्था में निम्न माना जाता था।
कबीर का बचपन सादगी भरा था। वे एक बुनकर के रूप में घरेलू जिम्मेदारियों में लगे रहे। उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की और लगभग पूरी तरह अनपढ़ थे, केवल “आल्हा” शब्द लिखना सीखा। फिर भी, उनकी अशिक्षितता ने उनकी बौद्धिक और आध्यात्मिक प्रगति को नहीं रोका। कम उम्र से ही कबीर ने जीवन और आध्यात्मिकता के प्रति गहरी जिज्ञासा दिखाई। वाराणसी, जो धार्मिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र था, ने उनके समावेशी दृष्टिकोण को आकार दिया। हिंदू और मुस्लिम परंपराओं के बीच रहते हुए, उन्होंने एक ऐसी सोच विकसित की जो धार्मिक सीमाओं से परे थी।
आध्यात्मिक यात्रा: गुरु रामानंद का प्रभाव
कबीर की आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत स्वामी रामानंद, एक प्रमुख वैष्णव संत, के मार्गदर्शन में हुई। मुस्लिम परिवार में पले-बढ़े होने के बावजूद, कबीर रामानंद की भक्ति शिक्षाओं से गहरे प्रभावित हुए। एक किंवदंती के अनुसार, कबीर उनकी निम्न जाति के कारण रामानंद के शिष्य बनने में असफल रहे। फिर भी, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने एक चतुर योजना बनाई: वे उस घाट की सीढ़ियों पर लेट गए जहाँ रामानंद रोज़ स्नान करते थे। जब रामानंद ने अनजाने में कबीर पर पैर रखा और “राम, राम” उच्चारा, तो कबीर ने इसे अपनी दीक्षा माना और रामानंद को अपना गुरु स्वीकार किया। यह घटना, चाहे वास्तविक हो या प्रतीकात्मक, कबीर की सामाजिक बाधाओं को पार करने की दृढ़ता को दर्शाती है।
रामानंद के मार्गदर्शन में, कबीर एक सम्मानित रहस्यवादी और कवि बन गए। उन्होंने वैष्णव भक्ति को अपनाया और इसे सूफी रहस्यवाद के साथ जोड़ा, जिससे एक अनूठा दर्शन विकसित हुआ। कबीर ने निराकार ईश्वर की भक्ति पर जोर दिया, जिसे वे “राम,” “अल्लाह” या सर्वोच्च सत्ता के रूप में संबोधित करते थे। उन्होंने रस्मी प्रथाओं और जातिगत भेदभाव को खारिज किया, जो उन्हें उस समय का क्रांतिकारी विचारक बनाता है। कुछ स्रोतों के अनुसार, सूफी संत शेख तक़ी का भी उन पर प्रभाव था, जिनकी एकेश्वरवाद (तौहीद) की शिक्षा उनके दर्शन से मेल खाती थी। हिंदू भक्ति और इस्लामी सूफीवाद का यह मिश्रण कबीर को दो परंपराओं के बीच एक सेतु बनाता है।
कबीर की कविता: सादगी और बुद्धिमत्ता की आवाज़
कबीर की सबसे बड़ी विरासत उनकी कविता है, जो अपनी स्पष्टता, गहराई और सार्वभौमिकता के लिए जानी जाती है। उनकी रचनाएँ साधारण हिंदी में लिखी गईं, जिसमें अवधी, भोजपुरी और ब्रज जैसी बोलियाँ शामिल थीं। यह उस समय की संस्कृत या फ़ारसी रचनाओं से अलग थी, जो कुलीन वर्ग तक सीमित थीं। अनपढ़ होने के बावजूद, कबीर की मौखिक रचनाएँ उनके शिष्यों द्वारा संकलित की गईं और बीजक, साखी ग्रंथ, अनुराग सागर और कबीर ग्रंथावली जैसे ग्रंथों में संरक्षित हुईं। उनकी कविताएँ दोहे (तुकबंदी युक्त दो पंक्तियाँ), शब्द (गीत) और साखी (साक्ष्य) के रूप में थीं, जो आध्यात्मिकता, मानव समानता और धार्मिक कर्मकांडों की निरर्थकता जैसे विषयों पर केंद्रित थीं।
कबीर के दोहे अपनी संक्षिप्तता और गहन अंतर्दृष्टि के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उदाहरण के लिए:
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन देखा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
(मैं बुराई की खोज में निकला, पर कोई बुरा नहीं मिला। जब मैंने अपने मन को देखा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं था।)
यह दोहा आत्मनिरीक्षण पर जोर देता है, जिसमें व्यक्ति को दूसरों को दोष देने से पहले अपनी कमियों को देखना चाहिए। एक और प्रसिद्ध दोहा है:
“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।”
(साधु की जाति न पूछो, उसका ज्ञान पूछो। तलवार का मूल्य करो, म्यान को रहने दो।)
यहाँ कबीर जाति व्यवस्था की आलोचना करते हैं और ज्ञान व चरित्र को महत्व देते हैं। उनकी कविताएँ अक्सर बुनाई जैसे रोज़मर्रा के रूपकों का उपयोग करती थीं, जैसे आत्मा को धागा और ईश्वर को करघा मानकर जीवन और ईश्वर की एकता को दर्शाना।
कबीर की रचनाएँ किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थीं। उनकी कविताएँ सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं, जिसे गुरु अर्जन देव ने संकलित किया था। उनकी बोलचाल की शैली और व्याकरणिक बंधनों से मुक्ति ने उनकी कविताओं को आम लोगों तक पहुँचाया और पीढ़ियों तक संरक्षित किया।
सामाजिक सुधार: समानता के प्रणेता
कबीर की शिक्षाएँ उस समय की कठोर जाति व्यवस्था और धार्मिक विभाजनों के लिए क्रांतिकारी थीं। उन्होंने हिंदू ब्राह्मणों और मुस्लिम क़ाजियों की पाखंडपूर्ण रस्मों की आलोचना की। कबीर का मानना था कि सच्ची भक्ति हृदय में होती है, न कि मूर्ति पूजा, पवित्र धागे या खतने जैसे बाहरी कर्मकांडों में। उन्होंने कहा:
“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मंका डार दे, मन का मंका फेर।”
(युगों तक माला फेरी, पर मन की बेचैनी नहीं गई। हाथ की माला छोड़ दो, मन के मोती फेरो।)
कबीर का कर्मकांडों का विरोध निम्न वर्गों, विशेष रूप से दलितों, के बीच गूंजा। एक जुलाहा होने के नाते, वे मेहनतकश वर्ग की कठिनाइयों को समझते थे और समानता के लिए आवाज़ उठाई। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर की नज़र में सभी मनुष्य समान हैं, चाहे उनकी जाति, धर्म या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो। उनके अनुयायी समाज के विभिन्न वर्गों से थे, जिनमें वेश्याएँ और मज़दूर शामिल थे।
कबीर की सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोही आवाज़ ने उन्हें प्रशंसा और आलोचना दोनों दिलाई। ब्राह्मणों ने उनके उपदेशों का मज़ाक उड़ाया, लेकिन कबीर ने कभी क्रोध से जवाब नहीं दिया। उनकी सहनशीलता और बुद्धिमत्ता ने आम लोगों का दिल जीता। उनके दोहों ने लोगों की आँखें खोलीं और मानवता, नैतिकता और आध्यात्मिकता का सही अर्थ सिखाया।
दर्शन और शिक्षाएँ: एक सार्वभौमिक मार्ग
कबीर के दर्शन का आधार एक निराकार, सर्वव्यापी ईश्वर में विश्वास था, जो प्रत्येक हृदय में निवास करता है। उन्होंने धार्मिक विशिष्टता को खारिज किया और एक सार्वभौमिक मार्ग (सहज मार्ग) की वकालत की, जिसे सभी अनुसरण कर सकते थे। उनकी शिक्षाएँ हिंदू अवधारणाओं जैसे जीवात्मा और परमात्मा को सूफी एकेश्वरवाद के साथ जोड़ती थीं। कबीर के लिए मोक्ष (मोक्ष) का अर्थ था प्रेम और भक्ति के माध्यम से व्यक्तिगत आत्मा को ईश्वर के साथ एक करना, न कि रस्मों या तपस्या के द्वारा।
उनके दोहों में भौतिकवाद और अहंकार की निंदा स्पष्ट है, जैसे:
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लगे अति दूर।”
(बड़ा होने से क्या फायदा, जैसे खजूर का पेड़?
में क्यूंकि एक मिथ था लोगो के जेहन में , जो काशी में मरेगा वो स्वर्ग में जायेगा , और जो मगर में मरेगा वो नरक में जयेगा।
Kabir Das Biography in Hindi पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQs
कबीर दास जी का जन्म कब हुआ था ?
कबीर दास जी १३९८ ई.
Categories कबीर जी के बारे मेंTags Biography of Kabir Das, Biography Of Kabir Saheb, kabir das biography, Kabir Das Biography In Hindi, Kabir Das ji Biography, कबीर दास, कबीर दास जी का जीवन परिचय 2023Kabir Das Biography in Hindi- कबीर दास जी एक बहुत ही सिद्ध पुरुष संत थे। जिनकी गाथा चारो युगो में प्रसिद्ध है , जिसका प्रमाण अनुराग सागर , कबीर सागर ,इत्यादि , इन सभी ग्रंथों में मिला है।
Kabir Das Biography in Hindi
कबीर दास जी १३ वीं सदी के अंत में १३९८ (1398 ) ई .
में करीब 120 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश के मगहर में आज उस जिले को कबीर नगर के नाम से जाना जाता है
कबीरदास भारतीय संत परंपरा के उन अद्वितीय व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त धार्मिक पाखंड, जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उनके विचार आज भी भक्ति, समाज सुधार और मानवतावाद के आधार स्तंभ हैं। तथा उनकी काव्य रचनाएँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।
उनके जीवन के कई पहलू हैं जो उन्हें विशिष्ट बनाते हैं, और उनमें से एक उनका पारिवारिक जीवन है। यह जानना रोचक है कि भक्ति आंदोलन के इस महान संत ने एक गृहस्थ जीवन जीया, जो कि उनके विचारों और सिद्धांतों के साथ सामंजस्य में था।
कबीरदास का जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
कबीरदास का जन्म 1398 ईस्वी में वाराणसी के पास लहरतारा नामक स्थान में हुआ था। उनके जन्म से जुड़ी कई किंवदंतियाँ हैं। कहा जाता है कि कबीरदास का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और उनका पालन पोषण नीरू और नीमा नामक मुस्लिम जुलाहा दंपत्ति ने किया था। उनका परिवार साधारण था, और जुलाहे का कार्य उनकी आजीविका का मुख्य साधन था।
कबीरदास ने इस पेशे को अपनाकर यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता है। उन्होंने अपने कार्य में निपुणता के साथ-साथ आध्यात्मिक साधना भी जारी रखी। कबीर का पालन-पोषण एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन वे प्रारंभ से ही जिज्ञासु और विचारशील थे। कबीर का अर्थ होता है ‘महान’ और उनके जीवन ने इस नाम को सार्थक भी किया।
शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति
कबीरदास ने औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन उनके ज्ञान और अनुभव ने उन्हें एक महान विचारक और कवि बना दिया। वे एक जुलाहा के रूप में कार्य करते हुए अपने विचारों को रचते और प्रचारित करते थे। कबीरदास का मानना था कि सच्चा ज्ञान अनुभव और आत्मचिंतन से प्राप्त होता है।
कबीरदास के आध्यात्मिक गुरू
कबीरदास संत रामानंद के शिष्य माने जाते हैं। रामानंद ने कबीर को भक्ति का मार्ग दिखाया। कबीर ने अपने गुरू से यह सीखा कि ईश्वर को पाने का मार्ग किसी विशेष धर्म से नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति से प्राप्त होता है। उन्होंने जाति, धर्म और पाखंड के विरुद्ध कड़ी आलोचना की।
कबीरदास की रचनाएँ और विचार
कबीरदास ने अपने विचारों को दोहों, साखियों और पदों के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी भाषा सरल, जनसामान्य की भाषा थी, जिसे समझना बहुत ही आसान था। कबीरदास जी के दोहे आज भी भारत में अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। उनके प्रमुख संदेश इस प्रकार थे:
- ईश्वरएकहै: कबीरदास ने हिंदू-मुस्लिम विवादों को समाप्त करने का प्रयास किया और कहा कि ईश्वर केवल एक है।
- आडंबरऔरपाखंडकाविरोध: उन्होंने धार्मिक कर्मकांडों और बाहरी आडंबरों का कड़ा विरोध किया।
- प्रेमऔरभक्तिकासंदेश: कबीरदास जी के अनुसार, प्रेम ही ईश्वर की प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।
- सामाजिकसमानता: कबीरदास ने जातिवाद और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया। उनके विचारों में समानता और भाईचारे का संदेश था।
कबीरदास की प्रमुख रचनाएँ
कबीरदास की प्रमुख रचनाओं का संकलन “बीजक” के नाम से जाना जाता है। इसमें उनकी तीन मुख्य रचनाएँ हैं:
- रमैनी
- सबद
- साखी
इसके अलावा, उनकी कविताएँ “कबीर ग्रंथावली” और “कबीर सागर” में भी संकलित हैं।
सामाज सुधारक की भूमिका
कबीरदास ने समाज में व्याप्त बुराइयों, जैसे जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास के खिलाफ आवाज उठाई। वे कहते थे कि सभी मनुष्य समान हैं, और जाति-धर्म के नाम पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
कबीर के दोहे
कबीर के दोहे उनके विचारों और जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करते हैं। वे सरल, सटीक और प्रभावी होते हैं। उनके कुछ प्रसिद्ध दोहे निम्नलिखित हैं:
- बुराजोदेखनमैंचला, बुरानमिलियाकोय।
जोदिलखोजाआपना, मुझसेबुरानकोय।
अर्थ:- जब मैंने संसार में बुराई खोजने की कोशिश की, तो कोई बुरा नहीं मिला। लेकिन जब मैंने अपने भीतर झाँक कर देखा, तो पाया कि मुझसे बड़ा बुरा कोई नहीं।- पोथीपढ़िपढ़िजगमुआ, पंडितभयानकोय।
ढाईआखरप्रेमका, पढ़ेसोपंडितहोय।
अर्थ:- किताबें पढ़ते-पढ़ते लोग मर गए, लेकिन सच्चा पंडित कोई नहीं बना। जो प्रेम के ढाई अक्षर को समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है।- दुखमेंसुमिरनसबकरें, सुखमेंकरेनकोय।
जोसुखमेंसुमिरनकरे, तोदुखकाहेकोहोय।
अर्थ:- दुःख के समय हर कोई भगवान को याद करता है, लेकिन सुख में नहीं। यदि सुख में भी भगवान को याद किया जाए, तो दुःख कभी नहीं आएगा।- कस्तूरीकुंडलबसे, मृगढूंढेबनमाहि।
ऐसेघटघटरामहैं, दुनियादेखेनाहि।
अर्थ:- हिरण के नाभि में कस्तूरी होती है, लेकिन वह उसे जंगल में खोजता है। उसी तरह, ईश्वर हर जीव के हृदय में मौजूद है, लेकिन लोग उसे बाहर ढूँढ़ते हैं।- साईंइतनादीजिए, जामेंकुटुमसमाय।
मैंभीभूखानरहूँ, साधुनभूखाजाय।
अर्थ:- हे भगवान, मुझे इतनी ही संपत्ति दें कि मेरा परिवार संतोषपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके और कोई सज्जन मेरे दरवाजे से भूखा न जाए।कबीरदास का विवाह और उनकी पत्नी लोई
कबीरदास का विवाह लोई नामक महिला से हुआ था। लोई एक धार्मिक और सादगीपूर्ण व्यक्तित्व की धनी थीं। वे कबीरदास के कार्यों और विचारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। उनके नाम से जुड़ी एक कहानी यह है कि एक बार कबीरदास ने अपनी पत्नी से कहा था:-
“लोई, तूहीमेरीसच्चीसाथीहै।“लोई ने कबीर के आध्यात्मिक कार्यों में सहयोग दिया था। उनके नाम पर कबीर साहित्य में कई संदर्भ मिलते हैं। उनकी निष्ठा और परिश्रम ने परिवार के साथ-साथ कबीर की समाज सेवा और भक्ति को भी सहारा दिया है।
संतानों का जीवन
कबीरदास और लोई के दो संतानें थीं- पुत्र कमाल और पुत्री कमाली।
- कमाल: कमाल कबीरदास के नक्शेकदम पर चले। वे एक महान कवि और समाज सुधारक बने। उन्होंने कबीरपंथ को आगे बढ़ाया और कबीर के विचारों का प्रचार-प्रसार किया।
- कमाली: कमाली के बारे में जानकारी कम उपलब्ध है, लेकिन कहा जाता है कि उन्होंने भी अपने परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को बखूबी निभाया।
कबीरदास का गृहस्थ जीवन: एक आदर्श संतुलन
कबीरदास का जीवन इस बात का प्रतीक था कि गृहस्थ जीवन और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने यह साबित किया कि एक गृहस्थ व्यक्ति भी ईश्वर की भक्ति और समाज सुधार के कार्य कर सकता है।
कबीरदास ने अपने परिवार को एकता और प्रेम का उदाहरण बनाया। उन्होंने अपने दोहों में गृहस्थ जीवन को एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में प्रस्तुत किया। एक प्रसिद्ध दोहा है:
“मालाफेरतजुगभया, फिरानमनकाफेर।
करकामनकाडारदे, मनकामनकाफेर।“इस दोहे के द्वारा उन्होंने सन्देश दिया कि सच्ची भक्ति केवल दिखावे में नहीं, बल्कि मन के सच्चे परिवर्तन में है।
कबीरदास के दोहों में पारिवारिक जीवन
कबीरदास ने अपने दोहों में गृहस्थ जीवन के महत्व को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने यह संदेश दिया कि एक व्यक्ति को अपने परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ अपने आध्यात्मिक विकास की ओर भी ध्यान देना चाहिए। उनके लिए पारिवारिक कर्तव्य और भक्ति एक-दूसरे के पूरक थे।
कबीर का एक और प्रसिद्ध दोहा है:
“कबीरातेनरअंधहै, गुरुकोकहतेऔर।
हरिरूठेगुरुठौरहै, गुरुरूठेनहींठौर।“यह दोहा पारिवारिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच सही मार्गदर्शन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
लोई का योगदान: गृहस्थी से परे
लोई ने कबीरदास के जीवन में केवल पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्ची साथी के रूप में भूमिका निभाई है। उन्होंने घर की जिम्मेदारियों को संभालने के साथ-साथ कबीर के सामाजिक कार्यों में भी सहयोग दिया। लोई ने कबीर की शिक्षाओं को आत्मसात किया और उन्हें अपने दैनिक जीवन में लागू किया।
पारिवारिक जीवन का समाज पर प्रभाव
कबीरदास के परिवार का समाज पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सामाजिक परिवर्तन परिवार से ही शुरू होता है। उनके परिवार ने एकता, सहिष्णुता और समानता का आदर्श प्रस्तुत किया।
कबीर के विचारों ने उनके परिवार के माध्यम से समाज को यह दिखाया कि कैसे एक साधारण परिवार भी समाज में बदलाव ला सकता है।
कबीरदास की मृत्यु
कबीरदास ने अपने जीवन का अधिकांश समय काशी और मगहर में बिताया। कहा जाता है कि अपने जीवन के अंतिम समय में वे मगहर चले गए थे, क्योंकि उस समय लोगों की मान्यता थी कि काशी में मरने से मोक्ष प्राप्त होता है और मगहर में मरने से नरक मिलता है। कबीर ने इन मान्यताओं का खंडन करने के लिए मगहर में अपने प्राण त्यागे थे।
कबीरदास की समकालीनता और प्रभाव
कबीरदास ने न केवल अपने समय के समाज को, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी गहराई से प्रभावित किया। उनके विचार संत रविदास, गुरु नानक और तुलसीदास जैसे अनेक संतों और कवियों पर प्रभावशाली रहे।
निष्कर्ष
कबीरदास जी ने अपने दोहों, पदों और उपदेशों के माध्यम से समाज में एक नई चेतना का संचार किया है। उनका जीवन और दर्शन आज भी प्रासंगिक है। कबीर के विचार हमें मानवता, प्रेम और सच्चाई की राह पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि सच्ची भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने में है।
कबीरदास की शिक्षा और पारिवारिक जीवन का संतुलन आज के समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है। उनका जीवन यह बताता है कि कैसे सादगी, कर्तव्यपरायणता और भक्ति के माध्यम से हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
कबीरदासकेसंदेशआजभीउतनेहीमहत्वपूर्णहैं, जितनेउनकेसमयमेंथे।
Kabir –कबीर एक ऐसी शख्शियत जिसने कभी शास्त्र नही पढा फिर भी ज्ञानियों की श्रेणीं में सबसे उपर थे। उन्होंने कविता जैसे माध्यम का प्रयोग, समाज सुधार के कार्य तथा समाज में फैले पाखण्ड तथा भ्रान्तियों को दूर करने के उद्देश्य से किया। वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है।
संत कबीर का परिचय – Poet Kabir Das Biography
नाम संत कबीरदास (Kabir Das) जन्म दिनांक सन 1398 (लगभग) जन्म स्थान लहरतारा ताल, काशी मृत्यु सन 1518 (मगहर, उत्तर प्रदेश) पिता का नाम नीरु माता का नाम नीमा पत्नी लोई संतान कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री) कर्म-क्षेत्र समाज सुधारक कवि भाषा अवधी, सधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी मुख्य रचनाएँ साखी, सबद और रमैनी संत कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व – प्रेमी का अनुभव था। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी।
प्रारंभिक जीवन –
कबीर के जन्म सम्बंधित अनेक कथाये प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। बहुत से लोग आजमगढ़ ज़िले के बेलहरा गाँव को कबीर साहब का जन्मस्थान मानते हैं। भारतीय परंपरा के मुताबिक, वह 1398 से लेकर 1518 तक जिए थे। कहा जाता है कि गुरु नानक और सिकंदर लोदी भी उनके समकालीन थे।
कबीर के माता- पिता के विषय में भी एक राय निश्चित नहीं है। कबीर “नीमा’ और “नीरु’ की वास्तविक संतान थे या नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था। एक जनश्रुति के मुताबिक कबीर का जन्म काशी के लहरतारा नाम की जगह पर हुआ था। वह एक ब्राम्हण विधवा के बेटे थे। समाज में अपयश के भय से कबीर की विधवा मां ने उन्हें त्याग दिया था। इसके बाद कबीर को एक गरीब मुस्लिम जुलाहे परिवार लहरतारा तालाब पर पड़ा पाया, जिसे वह अपने घर ले आया और उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया।
कशी के घाट पर रामानंद जी के चरण-स्पर्श हो जाने से कबीर ने अपने को धन्य माना और उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया। अपनी जीविकोपार्जन के लिए कबीर जुलाहे का काम करते थे। जनश्रुति के अनुसार कबीर के एक पुत्र कमल तथा पुत्री कमाली थी। उनकी पत्नी का नाम लोई था।
कबीरदास के जन्म के समय में भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा शोचनीय थी। एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांन्धता से जनता परेशान थी और दूसरी तरफ हिन्दू धर्म के कर्मकांड, विधान और पाखंड से धर्म का ह्रास हो रहा था। जनता में भक्ति- भावनाओं का सर्वथा अभाव था। पंडितों के पाखंडपूर्ण वचन समाज में फैले थे। ऐसे संघर्ष के समय में, कबीरदास का प्रार्दुभाव हुआ।
साहित्यिक परिचय –
कहते हैं कि, उन्हें अक्षर ज्ञान भी नहीं था। फिर भी उनकी कविता का भाव इतना सशक्त बन पड़ा जिसके दृष्टिगत भाषा अथवा शैली का दोष अपदार्थ हो जाता है। यद्यपि कबीर जी पर कई विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा तो भी कबीर जी का अपना मौलिक दर्शन है। परिणामस्वरूप रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिष्ठित रचना गीतांजलि पर कबीर की रचना बीजक की गहरी छाप मिलती है। वे निराकार ब्रह्म के उपासक थे।
संत कबीर स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। उनके समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे। उन्होने हिन्दू-मुस्लीम दोनों जातियों को एक सुत्र में बांधने का प्रयास किया और धर्म के झूठे आडंबर-पूर्ण कर्मकांडों पर जमकर प्रहार किये।
अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। वे निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और जाति-व्यवस्था के घोर विरोधी। उन्होंने भारतीय समाज को दकियानसी एवं तंगदिली से बाहर निकालकर एक नयी राह पर डालने का प्रयास किया। भारतीयों की रूढ़िवादित एवं आडंबरों पर करारी चोट करने वाले महात्मा कबीर की वाणी आज भी घर-घर में गूँजती है। वे भक्ति-काल के प्रखर साहित्यकार थे और समाज-सुधारक भी।
कबीर का सबसे महान ग्रन्थ बीजक है। इसमें कबीर के दोहों का संकलन है। उनकी शब्दावली हिंदू अध्यात्म से भरपूर है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और सारवी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। उनकी उलटबांसियां भी बहुत प्रसिध्द हैं।
संत कबीर दास जी मृत्यु –
एक अंधविश्वास के अनुसार काशी में मृत्यु होने से स्वर्ग और मगहर नामक स्थान में मृत्यु होने से नर्क मिलता है। इस अंधविश्वास को समाप्त करने के उद्देश्य से कबीरदास जी मृत्यु से पहले मगहर चले गए और वहीं उनका देहान्त हो गया।
ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहां फूलों का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहां से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है।
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Categories बायोग्राफीसंत कबीर दास की अद्भुत जीवन यात्रा: जानिए उनके जीवन, दोहे और शिक्षाओं के रहस्य!
यह न तो राहगीरों को छाया देता है, न ही इसके फल आसानी से मिलते हैं।)
कबीर ने विनम्रता, करुणा और क्षमा को सच्चे गुणों के रूप में बताया। उनके अनुसार, दयालु हृदय में असली शक्ति होती है, और क्षमा करने वाला व्यक्ति सच्चा अस्तित्व रखता है। उनकी शिक्षाएँ आत्म-बोध और दुनिया के साथ सामंजस्य पर केंद्रित थीं। उन्होंने हिंदू और इस्लाम दोनों की कमियों की आलोचना की, जैसे कि वेदों या कुरान की व्याख्या करने वाले विद्वानों का अहंकार। उनकी निडरता ने उन्हें विवादास्पद बनाया, फिर भी उनकी सार्वभौमिक अपील ने सभी वर्गों को आकर्षित किया। उनकी शिक्षाओं ने भक्ति आंदोलन को प्रभावित किया और सिख धर्म व सूफीवाद पर गहरा प्रभाव डाला।
Biography of Sant Kabirdas in Hindi: यात्राएँ और अंतिम दिन
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, कबीर ने भारत के विभिन्न हिस्सों में यात्राएँ कीं और एकता व भक्ति का संदेश फैलाया। उनके अंतिम दिन मगहर (उत्तर प्रदेश) में बीते, जो लखनऊ से लगभग 240 किलोमीटर दूर है। किंवदंती के अनुसार, कबीर ने मगहर को अपनी मृत्यु का स्थान चुना ताकि उस समय की एक अंधविश्वास को तोड़ा जा सके: माना जाता था कि मगहर में मरने वाला स्वर्ग में नहीं जाता और अगले जन्म में गधा बनता है, जबकि वाराणसी में मृत्यु मोक्ष देती है। 1518 में (विक्रम संवत 1575, माघ शुक्ल एकादशी) मगहर में उनकी मृत्यु ने इस विश्वास को चुनौती दी, यह साबित करते हुए कि सच्चा मोक्ष व्यक्ति के आंतरिक अवस्था पर निर्भर करता है, न कि मृत्यु के स्थान पर।
कबीर की मृत्यु से जुड़ी एक चमत्कारी कहानी है। उनके देहांत के बाद, हिंदू उनके शरीर का दाह संस्कार करना चाहते थे, जबकि मुस्लिम उसे दफनाना चाहते थे। किंवदंती है कि जब उनका कफन हटाया गया, तो वहाँ फूलों का ढेर मिला। आधे फूलों का वाराणसी में दाह संस्कार हुआ और आधे मगहर में दफनाए गए। यह चमत्कार कबीर की एकता की शक्ति को दर्शाता है। आज, मगहर में उनकी स्मृति में एक हिंदू मंदिर और एक मुस्लिम मकबरा है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने हाल ही में मगहर को तीर्थस्थल के रूप में बढ़ावा देना शुरू किया है।
Biography of Sant Kabirdas in Hindi: विरासत और प्रभाव
कबीर की विरासत समय, धर्म और भूगोल की सीमाओं को पार करती है। उनकी शिक्षाओं ने भक्ति आंदोलन को आकार दिया और मध्यकालीन भारत के आध्यात्मिक परिदृश्य को बदल दिया। उनकी रचनाएँ, जो गुरु ग्रंथ साहिब और बीजक जैसे ग्रंथों में संरक्षित हैं, अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती हैं। कबीर पंथ, जो विशेष रूप से दलितों के बीच प्रचलित है, उनकी समानता और भक्ति की शिक्षाओं को आगे बढ़ाता है।
कबीर की कविताएँ विश्व स्तर पर कई भाषाओं में अनुवादित हुई हैं और उनके दार्शनिक गहराई के लिए अध्ययन की जाती हैं। उनकी आंतरिक आध्यात्मिकता, जाति विरोध और सार्वभौमिक प्रेम की वकालत सामाजिक न्याय और अंतरधार्मिक सद्भाव की आधुनिक चर्चाओं में गूंजती है। समकालीन भारत में, कबीर की विरासत को उत्सवों, संगीत और साहित्य के माध्यम से जीवित रखा जाता है। उनके दोहे स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं, भाषणों में उद्धृत किए जाते हैं और भक्ति समारोहों में गाए जाते हैं। एक बुनकर, कवि और रहस्यवादी के रूप में उनका जीवन इस बात की याद दिलाता है कि सच्ची महानता विनम्रता, करुणा और सत्य की खोज में निहित है।
कबीर के प्रसिद्ध दोहे: ज्ञान के मोती
कबीर के दोहे उनकी सबसे स्थायी देन हैं, जो संक्षिप्त और शक्तिशाली ढंग से उनके दर्शन को व्यक्त करते हैं। कुछ और उदाहरण:
“माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।”
(माली सौ घड़े पानी से सींचता है, पर फल ऋतु आने पर ही लगता है।)
यह समय और ईश्वरीय इच्छा के महत्व को दर्शाता है।“गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।”
(गुरु कुम्हार है, शिष्य कुम्भर है, वह गढ़कर खोट निकालता है।)
यह गुरु की शिष्य के चरित्र को संवारने में भूमिका को रेखांकित करता है।“कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहि।”
(यह प्रेम का घर है, कोई मौसी का घर नहीं।)
उनके निर्गुण दोहे, जो निराकार ईश्वर पर केंद्रित हैं, उनकी आध्यात्मिक गहराई को दर्शाते हैं।
निष्कर्ष: Biography of Sant Kabirdas in Hindi
Biography of Sant Kabirdas in Hindi: संत कबीरदास केवल एक कवि या संत नहीं थे; वे एक क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपने समय की सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दी। साधारण परिस्थितियों में जन्मे, उन्होंने जाति और धर्म की सीमाओं को पार कर मानवता, समानता और ईश्वरीय प्रेम की आवाज़ बुलंद की। उनकी साधारण भाषा में लिखी कविताएँ आज भी लोगों को आत्म-बोध और करुणा की ओर मार्गदर्शन करती हैं। कबीर का जीवन और शिक्षाएँ हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता हृदय में होती है, न कि रस्मों या विभाजनों में। उनकी विरासत उन लोगों के दिलों में जीवित है जो सत्य की खोज करते हैं, जो उन्हें ज्ञान और एकता का शाश्वत प्रतीक बनाती है।
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नहीं , कबीर दास जी माया से परे पूर्ण ब्रह्म थे
ऐसा कहा जाता है उनके एक पुत्र और एक पुत्री थी ?
वो इस प्रकार – नदी में एक बहते हुए शव को कबीर जी जीवित किये , उस वक़्त सिकंदर बादशाह था उसके सलाहकार काजी के शर्त रखने पर कबीर जी ने उन शवों को जीवित किये जिसे सिकंदर ने कहा ये तो कमाल हो गया इसलिए। उसका नाम कमाल पड़ा , एक दिन उस काजी की लड़की का मृत्यु हो गया। तो कबीर जी ने उसे जीवित किये इसलिये लड़की का नाम कमाली पड़ा
कबीर दास जी क्यों प्रसिद्ध है ?
कबीर दास जी समाज में भेद-भाव और जात-पात को अलग रख कर भक्ति भजन को सर्वो पारी बताये सत्य पर चलना और सत्य का महत्व बताये
कबीर दास जी की मृत्यु कब हुयी थी ?
कबीर दास जी की शरीर का त्याग किये 1518 ई.
में काशी के लहरतारा तालाब में कमल के पुष्प पर प्रगट हुए थे
कबीर दास जी की रचनाए कौन कौन सी है ?
कबीर दास जी की रचनाए – अनुराग सागर , कबीर मंसूर , शब्दावली , बीजक , इत्यादि
क्या कबीर दास जी विवाहित थे ? में काशी के लहरतारा तालाब में ज्येष्ठ के पूर्णिमा को प्रगट हुवे थे। निरु और नीमा नामक दम्पति अपने घर ले गए। कबीर बचपन से ही बहुत ज्ञान ध्यान की बाते करते थे। इन बातो को सुनकर लोग बोलते थे। तुम्हारा गुरु कौन है, कबीर बोलते की मैंने अभी तक गुरु नहीं किया है।
तो लोग बोलते , गुरु बिना तुम्हारे ज्ञान का कोई अर्थ नहीं है। तो कबीर इस बात को लेकर गुरु करने का विचाए किये। उस समय रामानंद स्वामी हिन्दुओ के प्रख्यात गुरु थे। जब कबीर रामानंद स्वामी से गुरु दीक्षा की बात किये तो रामानंद स्वामी अपना शिष्य बनाने से माना कर दिए।
Kabir Das Biography in Hindi कबीर का अबोध बालक बनना
कबीर ने एक अबोध बालक का रूप धारण कर , भोर में उस तालाब के सीढ़ियों पर जा कर लेट गए जहा पर स्वामी रामानंद स्नान करने जाया करते थे। जब स्वामी जी स्नान करने आये तो अँधेरे के कारन सीढ़ी पर लेटा बालक कबीर दिखा नहीं और स्वामी जी के खड़ाऊ से बालक कबीर को चोट लग गया।
कबीर जोर-जोर से रोने लगे तभी स्वामी जी बोले , राम , राम बोल बच्चा , सब दुःख दूर हो जायेगा। कबीर राम-राम कहने लगे।
Kabir Das Biography in Hindi वार्ता कबीर और स्वामी जी की
अब कबीर किसी से सत्संग करते ज्ञान की बात करते तो कोई बोलता तुम्हारे गुरु कौन है , तो कबीर बोलते स्वामी रामानंद मेरे गुरु है। अब ये बात धीरे-धीरे स्वामी जी के कानो में पड़ी , तो स्वामी जी बोलेन के मैंने तो कबीर को अपना शिष्य नहीं बनाया है।
Kabir Das Biography in Hindi
स्वामी जी बोले कबीर को बुला लाओ , स्वामी जी के शिष्य लोग कबीर को बुला लाए।
स्वामी जी कबीर से पूछे तुमको कब मै शिष्य बनाया , तो कबीर बोले उस दिन जब तालाब के सीढ़ियों पर आपके खड़ाऊ से एक बालक को चोट लगा , और आप ने राम राम बोलने को कहा तो वो बालक मै ही था।
आप जब राम नाम मुझे दिए तो आप तभी से मेरा गुरु बन गए और मै आपका शिष्य। स्वामी जी बोले वो एक छोटा बच्चा था और तुम बड़े हो , इस बात पर कबीर जी ने उसी वक़्त एक कला दिखाई और वही रूप धरकर बोले गुरु जी यही बच्चा था। स्वामी जी सबकुछ समझ गए
Kabir Das Biography in Hindi – वाणी है
कबीर हमेशा सभी को समझाते थे सभी को मिलजुल कर रहना चाहिए, जात – पात का भेद नहीं रखना चाहिए। वो हमेशा पाखंड को छोड़ कर सत्य क्या है इस बारे में हमेशा बात किया करते थे और समझाया करते थे।
कबीर जी की एक वाणी है – पत्थर पूजे तो हरी मिले , तो मै पुजू पहाड़ , पत्थर से चक्की भली पीस संसार खाए , ऐसी बहुत सारी कबीर जी की वाणी है। जो अपने आप में एक पूरा सच होता है ,
Kabir Das Biography in Hindi तुलसी दास जी की वाणी
गोस्वामी तुलसी दास जी रामायण में लिखें है – बिन गुरु भौ-निधि तरे न कोई , जो विरंच शंकर सम होइ, अर्थ अगर कोई ब्रह्मा के सामान भी है , या सूर्य के सामान भी है तो भी उसका गुरु के बिना उधार नहीं होगा। विरंच , ब्रह्मा को कहा गया है , और शंकर सूर्य को कहा गया है।
कबीर जी करीब 120 वर्षे के बाद इस शरीर का मगर में परित्याग किये करीब 1518 ई.