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में हो गयी थी। बाद में खुद रहीम को 1627 ई.

Rahimdas Biography in Hindi : रहीमदास का जीवन परिचय

बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रहीमदास अपने साहित्यिक योगदान, विशेषकर फ़ारसी और हिंदवी भाषाओं में नीतिपरक दोहे लिखने के लिए जाने जाते है, जो हिंदी में रहीम के दोहे के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अलावा रहीमदास में कवि, सेनापति, दानवीर, बहुभाषाविद तथा दानीशीलता जैसे कई गुण थे। वे ज्योतिषशास्त्र के भी ज्ञाता एवं विद्वान थे।

इस आर्टिकल के माध्यम से हम रहिमदास के जीवन, उनका युग एवं व्यक्तित्व तथा कवि रूप की चर्चा करेंगे-

रहीमदास का जीवन परिचय (Rahimdas Biography in Hindi )

  • पूरा नाम – अब्दुल रहिम दास
  • जन्म – 17 दिसंबर, 1556
  • जमस्थान -लाहौर 
  • निधन-1 अक्टूबर 1627, 70 वर्ष की आयु में 
  • पिता का नाम – बैरम खान 
  • माता – सुलताना बेगम 
  • धर्म – इस्लाम
  • कार्यस्थल – दिल्ली, मुगल साम्राज्य
  • समाधि – अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का मकबरा, दिल्ली
  • पत्नी का नाम – महबानू बेगम
  • संतान- 5, तीन पुत्र एवं दो पुत्रियाँ – 
  • उपाधि – अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना, मीर अर्ज
  • रचनाएँ – दोहावली, भक्तिपरक बरवै, नायिका भेद, शृंगार सोरठा, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा आदि 
  • अज्ञात एवं अनुपल्ब्ध रचनाएँ – फारसी दीवान, वाकयात बाबरी 
  • रचनाओं की भाषा- ब्रजभाषा, अवधि, संस्कृत, उर्दू, अरबी, फारसी एवं तुर्की

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे कवि रहिमदास 

रहिमदास जी का जीवन काल 1556 से 1627 के बीच ठहरता है जो कि मुगल सम्राट अकबर के समय का है। उनके पिता बैरम खान उस समय मुगल सल्तनत के सेनापति एवं योद्धा थे। रहिमदास की प्रतिभा को देखते हुए अकबर ने उन्हें अपने नौ रत्नों में शामिल किया था। बाद में उन्हें खान-ए-खाना की उपाधि से भी नवाजा गया।

रहीमदास हिन्दी, संस्कृत, अरबी, फारसी एवं तुर्की सहित कई भाषाओं के ज्ञाता थे एवं यह भी कहा जाता है कि वे विश्व के कई भाषाओं में बात कर सकते थे। रहीमदास मुगल सल्तनत के सेनापति एवं सम्राट अकबर के वफादार एवं विश्वासपात्र थे। हिन्दी में रहीम दास के नीतिपरक दोहे की बराबर चर्चा होती रहती है। हिन्दी साहित्य में वे नीति काव्य परंपरा में अग्रणी माने जाते है।  मनुष्यों को सीख देता हुआ रहिमदास का नीति संबंधी एक दोहा द्रष्टव्य है- 

“जो रहीम उतम प्रकृति का कर सकत कुसंग। 

चन्दन विष व्याप्त नहीं लिपटे रहत भुजंग। ” 

अर्थात् जिस प्रकार चन्दन के वृक्ष में साँप लिपटे रहते है, पर चन्दन अपनी खुशबू नहीं छोड़ता उसी प्रकार अच्छे स्वभाव वाले मनुष्य पर बुरी संगति का असर नहीं पड़ता है।

रहीमदास के जीवन का संक्षिप्त परिचय 

रहिमदास का जन्म.

सन् 1556 में दिल्ली, लाहौर में हुआ था। इनके पिता का नाम मुगल सम्राट बालक अकबर के संरक्षक बैरम खान था जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है एवं माता का नाम सुलताना बेगम था। बैरम खान ने ही रहिमदास का नाम अब्दुल रहीम रखा था जो हिन्दी में धीरे-धीरे रहिमदास/रहिमन/रहीम के नाम से जाना जाने लगा। रहिमदास का लालन – पालन बड़े ही प्रेम एवं आदर से किया जाने लगा। 

इस दौरान हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात अकबर के देखरेख की ज़िम्मेदारी बैरम खाँ के पास आई। उस समय अकबर लगभग 13-14 वर्ष के थे। 

रहिमदास के पिता बैरम खाँ को धोखे से मार दिया गया 

हुमायूँ ने बालक अकबर के देखरेख की ज़िम्मेदारी बैरम खाँ को दिया था। बैरम खाँ मुगल सम्राट अकबर के वफादार, सलाहकार, संरक्षक एवं शासक के रूप में कार्य करते थे। बैरम खाँ ने मुगल साम्राज्य को स्थिर करने और विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बालक अकबर के समय उठे कई विद्रोह को बैरम खान ने कुशलता से दबा दिया। बैरम खान की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता अद्भुत थी। बैरम खान के ये गुण रहीम दास में भी आया।

चूंकि अकबर धीरे धीरे बड़े हो रहे थे एवं शासन की बागडोर अपने हाथों में लेना चाहते थे। इस प्रकार बैरम खाँ और अकबर के बीच मतभेद पैदा होने लगा। परिणाम स्वरूप बैरम खान हज की यात्रा पर चले गए। जहां लगभग 1560 में हज को जाते हुए गुजरात में अफगान सरदार मुबारक खाँ ने धोखे से बैरम खाँ की हत्या कर दी। उस समय रहीम लगभग 4 वर्ष के थे। 

मुग़ल सम्राट अकबर ने की रहीमदास की शिक्षा की व्यवस्था

बैरम खाँ की मौत की खबर सुनकर अकबर अत्यंत दुखी हुए एवं 4 वर्षीय बालक रहीम का पालन-पोषण अकबर ने आपने हाथों ले लिया। रहिमदास की शिक्षा-दीक्षा शाही घराने की परंपरा के अनुसार होने लगा। इस तरह रहीम उस समय की प्रचलित भाषाओं जैसे अरबी, फारसी, तुर्की एवं जनभाषाओं का ज्ञान भी हासिल किया। 

‘मीरअर्ज’ ‘वकील-मुत्तलक’, ‘खान-ए-खाना’ की उपाधि से नवाजे गए थे कवि रहिमदास 

रहिमदास कई लड़ाइयों में मुगलों को विजय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके फलस्वरूप मुगलिया दरबार का महत्वपूर्ण पद ‘मीरअर्ज’ से रहीम को नवाजा गया। मुगलिया युग में ‘मीरअर्ज’ एक महत्वपूर्ण पद था, इस पद को धारण करने वाला व्यक्ति को आम जनता एवं सम्राट के बीच संदेशवाहक के रूप में एक कड़ी माना जाता था जो सम्राट के निर्णयों से जनता को अवगत कराता था एवं जनता की शिकायत को सम्राट तक पहुंचाता था। 

सन 1584 में अकबर ने रहीम को खान-ए-खाना की उपाधि से भी नवाजा। 

इसके अलावा रहीमदास को मुगल शासन का सबसे प्रसिद्ध पद वकील-मुत्तलक का पद दिया गया। 

रहिमदास का वैवाहिक जीवन 

रहीमदास का विवाह बैरम खाँ के विरोधी मिर्जा अजीज कोका की बहन माहबानों से हुआ ताकि आपसी तनाव व पुरानी से पुरानी कटुता समाप्त हो जाए। रहीम के विवाह से बैरम खाँ और मिर्जा के बीच चली आ रही पुरानी रंजिश खत्म हो गयी। रहीम का विवाह लगभग तेरह साल की उम्र में कर दिया गया था। रहीम की कुल 5 संताने थी कहीं-कहीं इससे अधिक का भी जिक्र मिलता है। 

रहीम दास के दोहे (Abdul Rahim khan-i-khana poems)

रहीम की रचनाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनके नीतिपरक दोहे है। यहाँ नीति का अर्थ समझना आवश्यक है। नीति का अर्थ ऐसा आचरण या कार्य है जिससे किसी का बुरा या अहित न हो। नीतिपरक मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति किसी का बुरा नहीं करता एवं सफलता हासिल कर लेता है। 

देखा जाए तो नीति की यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है जिसमें वैदिक युग से लेकर वर्तमान युग तक विधमान है। रहीमदास के दोहे का अध्ययन करने पर हमें उनके दोहे में जीवन के विविधता एवं अनुभव दिखाई देता है। 

यहाँ रहीमदास के नीतिपरक दोहों का अर्थ सहित कुछ उदाहरण दिए गए हैं –

“तरुवर फल नाहि खात है, सरवर पिर्याहं न पान।

कहि रहीम परकाज हित, संपत्ति संचहि सुजान।। “

रहीम दास जी कहते हैं कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते उसी प्रकार सज्जन लोग भी हित के लिए सम्पत्ति संचित करते हैं। 

“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय,

टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय”

अर्थात् प्रेम रूपी धागा नाज़ुक होता है। इसे संभालकर रखना पड़ता है।  प्रेम रूपी धागा एक बार टूट जाने से दोबारा नहीं जुड़ता  है और जुड़ जाने पर भी इसमें गाँठे आ जाती है। एक और दोहे का उदाहरण –

“चोथे बादर क्वार के जो रहीम घहरात

धनी पुरुष निर्धन भये, करें पाछिली बात”

इस दोहे का भाव यह है कि क्वार माह के बादल से बरसा नहीं होती है, ऐसे बादल केवल गर्जना कर चले जाते हैं उसी प्रकार धनी पुरुष भी निर्धन हो जाने पर निराधार बातें करते हैं। 

“दोनों रहिमन एक से, जी लौं बोलत नाहि। 

जान परत हैं काक पिक, ऋतु वसन्त के माँहि।”

इसी प्रकार रहीम जी कहते हैं कि बसन्त ऋतु के समय कोयल और कौवे देखने में समान होते हैं एवं दोनों एक स ही दिखते हैं परंतु जब ये पक्षी बोलते हैं तब पता चलता है कि कोयल कौन है और कौवे कौन है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी भेद होता है, कर्म से ही उनकी पहचान होती है। 

“रहिमन देखिसन को, लघु न गेर डारि।

जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारी।”

 हमें अपने जीवन में छोटी से छोटी वस्तु को महत्व देना चाहिए। जहां छोटी सी सुई काम आती है, वहां तलवार का कोई काम नहीं?

“रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।

एकता इथलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय।। “

आगे रहीम कहते हैं कि मनुष्यों को अपने मन की बात को मन के भीतर ही रखना चाहिए। अपनी बात दूसरों को नहीं बतानी चाहिए।  इससे लोग भले ही साथ दिखाने का ढोंग करते हो पर मन की व्यथा को कोई दूर नहीं कर सकता।

“रहिमन विपदा होय भली, जो थोरे दिन होय।

हित अनहित या जगत् में, जन परत सब कोय।।”

दोहे का अर्थ यह है कि कठिन समय का जीवन में आना एक तरफ से अच्छा होता है क्योंकि इस समय अपने – पराये, भला-बुरा, हित-अहित से हम परिचित हो जाते है। 

“समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात।

सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात।।

रहीमदास जी कहते हैं कि समय की महिमा अपरमपार है। समय के अनुसार ही पेड़ों में फल लगता है। हमेशा परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं रहती। 

“बड़े ना बोलो, बड़े ना बोलो, 

रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल।।

इस दोहे का भाव यह है कि मनुष्य को हमेशा खुद को बड़ा नहीं कहना चाहिए। इसमें वे एक उदाहरण देते हुए कहते है कि हीरा संसार एक सबसे मूल्यवान वस्तु है, पर हीरा कभी अपने मूल्य की बखान खुद नहीं करता है। उसी प्रकार गुणी एवं विद्वान व्यक्ति कभी भी अपने को बड़ा नहीं कहता। 

रहिमदास की प्रमुख साहित्यिक रचनाएं-

रहिमदास की रचनाएँ इस प्रकार है- रहीम दोहावली, बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा, भक्तिपरक बरवै, वाकयात-बाबरी, फारसी, दीवान, खेत कौतुक जातकम आदि। उनकी प्रमुख रचनाओं का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया गया है-

  • रहीम दोहावली– इसमें लगभग 300 नीतिपरक दोहे छ्ंद हैं। रहीम के दोहे की प्रसिद्धि इन्हीं दोहे में से हैं और इसमें ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। 
  • नगर शोभा – इसमें शृंगार संबंधी 144 दोहे है। इसमें ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। विभिन्न जातियों के स्त्रियॉं का वर्णन इसमें किया गया है। 
  • बरवै नायिका भेद– रहीमदास बरवै छ्ंद के जनक माने जाते हैं। इसमें नायिका भेद का वर्णन किया गया है और साथ ही साथ अवधि का प्रयोग किया गया है।
  • भक्तिपरक बरवै – इसमें हिन्दू देवी देवताओं की स्तुति की गयी है इसके अलावा इसमें भक्ति संबंध दोहे, ऋतु के बारे में जानकारी, भ्रमरगीत का भी जिक्र मिलता है। कुल 105 छन्द की रचना है। 
  • मदनाष्टक: इसमें कृष्ण एवं गोपियों का मार्मिक चित्रण किया गया है। इसमें मिश्रित जनभाषा खड़ीबोली (रेख़ता एवं उर्दू) का उपयोग किया गया है। यह कुल 8 मालिनी छंदों में रचित है। 
  • खेत कौतुक जातकम– फुटकर पद, फारसी एवं संस्कृत श्लोक पर आधारित हैं। यह एक ज्योतिष ग्रंथ है। 
  • शृंगार सोरठा– शृंगार का वर्णन। इसमें ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। यह 6 छ्ंद में रचित है।   

‘तुज्क ए बाबरी’ अर्थात ‘बाबरनामा’ अनुवाद कार्य-बाबरनामा का फारसी में अनुवाद किसने किया/बाबरनामा कौन सी भाषा में लिखी गई थी

बाबरनामा मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर की आत्मकथा थी जिसे बाबर ने चगताई तुर्की भाषा में लिखा था। 

रहीम ने बाबर की आत्मकथा ‘तुज्क ए बाबरी’ अर्थात् ‘बाबरनामा’ का चगताई तुरी भाषा से फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया। 

रहीम की रचनाओं की भाषा शैली

रहीम की रचनाओं की भाषा शैली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है – सरलता एवं स्वाभाविकता। सरलता एवं स्वाभाविकता रहीम के व्यक्तित्व का भी विशेष गुण है जिसे रहीम की रचनाओं में देखा जा सकता है। इन दोहों की सहजता देखिए – 

“देनहार कोई और है, भेजा जो दिन रैन

लोग भरम हम पर करे, तासो नीचे नैन”

“रहीम दास जी कहते हैं देने वाला तो कोई और है जो दिन-रात देता है। लेकिन लोग मुझ पर ही भ्रम कर रहें है कि मैं ही दान दे रहा हूँ, इसलिए मैं अपनी आँखें झुकाकर उनसे यही कहता हूँ कि यह प्रभु का ही दिया हुआ है।

रहीम ने अपनी रचनाओं की भाषा अवधी, ब्रजभाषा, फारसी, जनभाषा हिन्दी एवं उर्दू को बनाया। इसके अलावा 

मलिनी, दोहा, सोरठा, बरवै, कवित्त और सवैया आदि छ्ंद में रचनाएँ की है। उनकी रचनाओं का प्रमुख विषय नीति संबंधी दोहे है – इसके अलावा भक्ति, श्रृंगार, नायिका भेद संबंधी रचनाएँ भी है। रहीमदास ने अपने दोहों में अधिकतर दृश्य या उपदेशात्मक शैली का प्रयोग किया है। 

रहिमदास का  मकबरा – Tomb of Abdul Rahim khankhana

रहीम का मकबरा मथुरा रोड, निज़ामुद्दीन पूर्व, नई दिल्ली में स्थित है। रहीम ने इसे 1598 में अपनी पत्नी की याद में बनवाया था रहीम ने स्वयं ही अपने जीवनकाल में इसका निर्माण करवाया था। वर्ष 1627 में 70 वर्ष की आयु में रहीमदास की मृत्यु के बाद रहीम को उनकी इच्छा के अनुसार उनकी पत्नी के मकबरे के पास ही दफना दिया गया । 

यह मकबरा निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह और हुमायूँ के मकबरे के नजदीक है। निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह अत्यंत पवित्र माना जाता है इसीलिए रहिमदास ने अपने मकबरे को इसके नजदीक बनाने का निर्णय लिया होगा।

 निष्कर्ष 

निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि रहीमदास का व्यक्तित्व हमारे समक्ष कवि, योद्धा, भाषा ज्ञानी एवं कूटनितिज्ञ जैसे बहुमुखी प्रतिभा के रूप में प्रकट होता हैं। जहां एक ओर रहीमदास को अपने पिता से बहादुरी, प्रशासनिक कौशल, सेना को नेतृत्व करने का गुण मिला वहीं दूसरी ओर उन्होंने अपनी कलात्मक प्रतिभा को निखारा।

भारतीय जीवन पर नीति एवं अनीति संबंधी उनकी उपदेशात्मक बातें आज भी दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में भारत की संस्कृति का पूरा उदाहरण रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता पर आधारित देवी-देवताओं, पर्वों, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का ज़िक्र मिलता है जिसे रहीमदास जी ने बखूबी उभारा है।

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के लगभग लाहौर नगर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। ये अकबर के संरक्षक बैरमखाँ के पुत्र थे। अकबर ने बैरमखाँ को हज पर भेज दिया। मार्ग में उनके शत्रु ने उनका वध कर दिया। अकबर ने रहीम एवं उनकी माँ सुल्ताना बेगम को अपने पास बुला लिया तथा दोनों की स्वयं देखभाल की तथा उनके भरण-पोषण का प्रबन्ध भी किया। अकबर ने ही रहीम की शिक्षा की समुचित व्यवस्था की। रहीम दास के संस्कृत के गुरु बदाऊनी थे।

रहीम दास का विवाह मह बानू बेगम (माहबानों) से हुआ था। रहीम अकबर के दरबार के नवरत्नों में से थे। वे अकबर के प्रधान सेनापति और मंत्री भी थे। वे वीर योद्धा थे और बड़े कौशल से सेना का संचालन करते थे। उनकी दानशीलता की अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। सन् 1627 ई० में उनकी मृत्यु हो गयी।

साहित्यिक परिचय

रहीम दास हिन्दी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि थे, जिनकी रचनाएँ जन-जन में अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनके नीति संबंधी दोहे आज भी सर्वसाधारण की जिह्वा पर रहते हैं। रहीम के दोहे कोरी नीति की नीरसता से मुक्त हैं और उनमें गहरी मार्मिकता व संवेदनशीलता है। उनके कवि-हृदय की सच्ची संवेदना दैनिक जीवन की अनुभूतियों को दृष्टांतों के माध्यम से प्रकट करती है, जिससे उनका कथन सीधे हृदय पर गहरा प्रभाव डालता है। उनकी रचनाओं में केवल नीति ही नहीं, बल्कि भक्ति और शृंगार की भी सुंदर व्यंजना हुई है। इन विविध भावनाओं के कुशल संयोजन ने उन्हें कालजयी कवि बना दिया है। (रहीम दास के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित)

भाषा

रहीम दास कई भाषाओं के ज्ञाता थे-विशेष रूप से अरबी, तुर्की, फारसी तथा संस्कृत के तो वे पंडित थे। ब्रजभाषा एवं अवधी दोनों भाषाओं पर रहीम का समान अधिकार था। हिन्दी-काव्य के वे मर्मज्ञ थे और हिन्दी-कवियों का बड़ा सम्मान करते थे। गोस्वामी तुलसीदास से भी इनका परिचय तथा स्नेह-सम्बन्ध था।

शैली

रहीम जन-साधारण में अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं, पर उन्होंने कवित्त, सवैया, सोरठा, छप्पय तथा बरवै छंदों में भी सफल काव्य-रचना की है। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट तथा प्रभावपूर्ण है। उनकी समस्त रचनाएँ मुक्तक शैली में हैं। उनकी शैली में सरसता, मधुरता, सरलता तथा बोधगम्यता है। रहीम की रचनाओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास तथा दृष्टान्त आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है तथा उनमें शृंगार रस, शान्त रस तथा हास्य रस भी उपलब्ध हैं। उनमें शृंगार के संयोग एवं वियोग दोनों ही रूपों का सम्यक् चित्रण हुआ है। हिन्दी के मुसलमान कवियों में रहीम का विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण स्थान है।

रचनाएं

रहीम दास की प्रमुख रचनाओं में ‘रहीम-सतसई’, ‘शृंगार-सतसई’, ‘मदनाष्टक’, ‘रासपंचाध्यायी’, ‘रहीम-रत्नावली’ तथा ‘बरवै नायिका-भेद’ आदि रचनाएँ हैं। उन्होंने फारसी भाषा में भी ग्रंथों की रचना की है। उनकी रचनाओं का पूर्ण संग्रह ‘रहीम-रत्नावली’ के नाम से प्रकाशित हुआ है।

रहीम दास की प्रमुख रचनाओं की सूची:

  • बरवै नायिका-भेद
  • मदनाष्टक
  • रहिमन चंद्रिका
  • रहिमन विनोद
  • रहिमन शतक
  • रहीम कवितावली
  • रहीम रत्नावली
  • रहीम विलास
  • रहीम सतसई
  • रास पंचाध्यायी
  • श्रृंगार सतसई

राजनैतिक जीवन परिचय

रहीम दास के जीवन में राजनीति का गहरा प्रभाव था। उनके पिता बैरम खाँ अकबर के संरक्षक थे, लेकिन अकबर से मतभेद के चलते बैरम खाँ ने हज जाने का निश्चय किया। हज की यात्रा के दौरान वे गुजरात के पाटन में रुके और सहस्रलिंग सरोवर में नौका-विहार के बाद तट पर विश्राम कर रहे थे। इसी दौरान अफगान सरदार मुबारक खाँ धोखे से भेंट करने के बहाने आया और बैरम खाँ की हत्या कर दी। इस घटना ने रहीम के जीवन को गहराई से प्रभावित किया, क्योंकि केवल पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता को खो दिया।

बैरम खां की मृत्यु के बाद बैरम खां की पत्नी सलीमा सुल्तान बेगम और उसके पुत्र रहीम को अपने संरक्षण में लिया, और अकबर ने बैरम खां की पत्नी से विवाह कर लिया। सलीमा सुल्तान बेगम हरियाणा प्रांत के मेवाती राजपूत जमाल खाँ की सुंदर एवं गुणवती पुत्री थीं।

इसी कारण सलीमा ने अपने पुत्र अब्दुल रहीम ‘खान-ए-खाना’ को जालसाजी राजनीति से दूर रखा और एक विद्वान बनाया, जिससे वे एक कुशल प्रशासक और कवि बने। और आगे चलकर सलीम (जहांगीर) का अतालिक (शिक्षक) नियुक्त हुए।

रहीम ने बाबा जंबूर की देख-रेख में गहन अध्ययन किया। शिक्षा समाप्त होने पर अकबर ने अपनी धाय “महाम अंका” की बेटी माहबानो से रहीम का विवाह करा दिया। जो अकबर के विरोधी मिर्जा अजीज कोका की बहन थीं। क्यूंकि 1566 के एक पारिवारिक कलह में अकबर ने “महाम अंका” को कैद कर दिया था, जहां उनकी मृत्यु हो गई थी। इस विवाह से आपसी तनाव व पुरानी से पुरानी कटुता से छुटकारा मिला।

इसके बाद रहीम ने गुजरात, कुम्भलनेर, उदयपुर आदि युद्धों में विजय प्राप्त की। इस पर अकबर ने अपने समय की सर्वोच्च उपाधि ‘मीरअर्ज‘ से रहीम को विभूषित किया। सन 1584 में अकबर ने रहीम को “खान-ए-खाना” की उपाधि से सम्मानित किया।

रहीम का देहांत 71 वर्ष की आयु में सन 1627 में हुआ। रहीम को उनकी इच्छा के अनुसार दिल्ली में ही उनकी पत्नी के मकबरे के पास ही दफना दिया गया। यह मज़ार आज भी दिल्ली में मौजूद हैं। रहीम ने स्वयं ही अपने जीवनकाल में इसका निर्माण करवाया था।

पद और सम्मान

  1. मिर्जा खाँ : राजपारिवारिक खिताब।
  2. मीरअर्ज : गुजरात, कुम्भलनेर, उदयपुर आदि युद्धों में विजय प्राप्त करने पर अकबर ने अपने समय की सर्वोच्च उपाधि ‘मीरअर्ज’ से रहीम को विभूषित किया।
  3. खान-ए-खाना : सन 1584 में अकबर ने रहीम को खान-ए-खाना की उपाधि से सम्मानित किया।

दोहा, रहीमदास के कुछ दोहे

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥

अर्थ: रहीमदास जी कहते हैं कि अच्छे स्वभाव वाले मनुष्य बुरी संगति में भी अपनी अच्छाई बनाए रखते हैं। जैसे ज़हरीले सांप चंदन के पेड़ से लिपटे रहने पर भी उसकी सुगंध और गुणों को नहीं बिगाड़ सकते।

रहिमन प्रीति सराहिए, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि घड़े और रस्सी का उदाहरण सराहनीय है। वे अपने टूटने या फूटने की चिंता किए बिना पानी खींचने का कार्य करते हैं। यदि मनुष्य भी इनकी तरह निस्वार्थ होकर दूसरों की भलाई में लगे रहें, तो समाज का कल्याण सुनिश्चित हो सकता है।

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार ॥

सज्जन लोग यदि नाराज़ हो जाएँ तो उन्हें बार-बार मनाना चाहिए, क्योंकि उनके रिश्ते मूल्यवान होते हैं। जैसे टूटी माला के मोतियों को फेंकने के बजाय उन्हें फिर से पिरो लिया जाता है, वैसे ही अच्छे संबंधों को सहेजना चाहिए।

रहिमन अँसुआ नैन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥4॥

रहीम बताते हैं कि जैसे आँसू आँखों से बहकर दिल का दर्द जाहिर कर देते हैं, वैसे ही जिसे घर से बाहर कर दिया जाता है, वह घर के रहस्य दूसरों के सामने प्रकट कर ही देता है। दुःख और उपेक्षा इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं।

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति।
बिपति-कसौटी जे कसे, तेही साँचे मीत ॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि धन-सम्पत्ति होने पर कई लोग अपने सगे-संबंधी या मित्र बन जाते हैं, लेकिन असली मित्र की पहचान संकट के समय होती है। जिस प्रकार सोने की परख कसौटी पर घिसकर की जाती है, उसी तरह विपत्ति की कसौटी पर जो मित्र हर हाल में साथ निभाए, वही सच्चा मित्र कहलाता है। इसलिए, सच्चे मित्रों की पहचान उनके कठिन समय में साथ देने के गुण से होती है।

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
रहिमन मछरी नीर कौ, तऊँ न छाँड़त छोह ॥

अर्थ: इस दोहे में रहीम दास जी ने मछली और जल के गहरे प्रेम को दर्शाया है। जब मछली को पकड़ने के लिए जाल डाला जाता है, जल तुरंत जाल से छूट जाता है, लेकिन मछली जल से अलग होते ही तड़पकर अपने प्राण त्याग देती है। यह उदाहरण गहरे प्रेम और बिछोह की वेदना को समझाने के लिए दिया गया है।

दीन सबन को लखत हैं, दीनहि लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होय ॥

रहीम कहते हैं कि ग़रीब व्यक्ति सहायता की उम्मीद से सबकी ओर देखता है, लेकिन उसे कोई नहीं देखता। जो व्यक्ति ग़रीब की ओर प्रेम और सहानुभूति से देखता है और उसकी मदद करता है, वह भगवान के समान दयालु माना जाता है।

प्रीतम छबि नैनन बसी, पर-छबि कहां समाय।
भरी सराय ‘रहीम’ लखि, पथिक आप फिर जाय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि जिन आँखों में प्रियतम की सुंदर छवि बस गई हो, वहां किसी और छवि के लिए स्थान नहीं बचता। जैसे कोई सराय पहले से भरी हो, तो नया पथिक वहां से खुद-ब-खुद लौट जाता है। इसी प्रकार, सच्चा प्रेम जब मन में बस जाता है, तो अन्य कोई आकर्षण या मोह वहां टिक नहीं सकता।

रहिमन धागा प्रेम कौ, मत तोरेउ चटकाय।
टूटे ते फिरि ना जुरै, जुरै गाँठ परि जाय॥

रहीम कहते हैं कि प्रेम के धागे को कभी झटके से मत तोड़ो क्योंकि टूटने के बाद वह दोबारा जुड़ नहीं पाता। अगर जोड़ भी दिया जाए, तो उसमें गांठ पड़ जाती है, जिससे पहले जैसी मधुरता नहीं रहती।

कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन॥

अर्थात– स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें जब केले पर पड़ती हैं तो कपूर, सीप में पड़ती हैं तो मोती तथा साँप के मुख में पड़ती हैं तो विष बन जाती हैं, ऐसी कवि की मान्यता है।

तरुवर फल नहीं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।।
कहि रहीम परकाज हित, संपति सँचहिं सुजान ॥

अर्थ: रहीमदास जी कहते हैं कि जैसे वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और तालाब अपना पानी स्वयं नहीं पीता, उसी तरह सज्जन व्यक्ति भी अपने अर्जित धन और संसाधनों का उपयोग सदैव दूसरों के हित में करते हैं। उनका जीवन परोपकार के लिए ही होता है।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजै डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि ॥

रहीम समझाते हैं कि किसी वस्तु की कीमत उसकी उपयोगिता पर निर्भर करती है, न कि उसकी कीमत या आकार पर। जिस कार्य में सूई की ज़रूरत हो, वहाँ तलवार काम नहीं आ सकती। हर वस्तु का अपना विशिष्ट महत्त्व है।

यों रहीम सुख होत है, बढ़त देख निज गोत।
ज्यों बड़री अँखियाँ निरखि, ऑखिन को सुख होत॥

अर्थ: रहीम जी इस दोहे में कहते हैं कि जब मनुष्य अपने वंश को बढ़ते हुए देखता है, तो उसे अत्यधिक हर्ष और आनंद की अनुभूति होती है। यह सुख वैसा ही होता है जैसे बड़ी और सुंदर आंखों को देखकर नेत्रों को अत्यंत प्रसन्नता मिलती है। इसका तात्पर्य यह है कि अपने वंश या संतानों की उन्नति देखकर मनुष्य को गर्व और आत्मिक सुख की अनुभूति होती है।

रहिमन ओछे नरन ते, तजौ बैर अरु प्रीत।
काटे-चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति विपरीत॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि गिरे हुए या नीच स्वभाव के लोगों से न मित्रता अच्छी होती है और न ही शत्रुता। यह वैसे ही है जैसे कुत्ता चाहे काटे या चाटे, दोनों ही परिस्थितियाँ हानिकारक और अनुचित होती हैं।

अवश्य पढ़ें: रहीम दास के दोहे अर्थ सहित।

उपर्युक्त दोहों में प्रयुक्त कठिन शब्द अर्थ (शब्दार्थ)

  • प्रकृति – स्वभाव
  • व्यापत – प्रभावित
  • भुजंग – साँप
  • सराहिए – प्रशंसा
  • दून – दो गुना
  • जरदी – पीलापन
  • हरदी – हल्दी
  • चून – चूना
  • टूटे सुजन – सज्जन का नाराज होना
  • पोइए – पिरोइए, पिरोना चाहिए
  • मुक्ताहार – मोतियों का हार
  • असुआ – आँसू
  • ढरि – ढुलक कर
  • गेह – घर
  • भेद – रहस्य
  • सगे – सम्बन्धी
  • बिपति-कसौटी – विपत्ति रूपी कसौटी
  • मीत – मित्र
  • मीनन को – मछलियों का
  • मछरी – मछली
  • छोह – प्रेम
  • दीनहि – दरिद्र को
  • लखै – देखे
  • कोय – कोई
  • दीनबन्धु – भगवान्
  • पर छबि – पराया सौन्दर्य
  • पथिक – राही
  • आपु – स्वयं (ही)
  • फिरि जाय – लौट जाता है
  • धागा – डोर
  • ना जुरै – जुड़ता नहीं है
  • जुरै – जुड़ने पर
  • सरवर – श्रेष्ठ, तालाब, सरोवर
  • पान – जल
  • सँचहिं – संचय करता है
  • लघु – छोटा
  • डारि – डालना, फेंकना
  • तरवारि – तलवार
  • गोत – (गोत्र) कुल
  • बड़री – बड़ी
  • निरखि – देखकर
  • ओछे – नीच, बुरी आदत वाले
  • स्वान – (श्वान) कुत्ता
  • विपरीत – विरुद्ध, हानिकारक

हिन्दी के अन्य जीवन परिचय

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FAQs

Q1.

रहीम दास कौन थे?

अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना या रहीम, एक मध्यकालीन कवि, सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, एवं विद्वान थे। वे भारतीय सामासिक संस्कृति के अनन्य आराधक तथा सभी संप्रदायों के प्रति समादर भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। इसके साथ साथ वे कवि, सेनापति, प्रशासक भी थे।

Q2.

रहीम का जन्म कहां हुआ था?

अब्दुर्रहीम खानखाना का जन्म सन् 1556 में लाहौर में हुआ था। संयोग से उस समय हुमायूँ , सिकंदर , सूरी का आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए सैन्य के साथ लाहौर में मौजूद थे।

Q3.

रहीम की शिक्षा क्या थी?

रहीम दास की शिक्षा-दीक्षा अकबर की उदार धर्म-निरपेक्ष नीति के अनुकूल हुई। इसी शिक्षा-दीक्षा के कारण रहीम का काव्य आज भी हिंदूओं के गले का कण्ठहार बना हुआ है। दिनकर जी के कथनानुसार अकबर ने अपने दीन-इलाही में हिंदूत्व को जो स्थान दिया होगा, उससे कई गुणा ज्यादा स्थान रहीम ने अपनी कविताओं में दिया। रहीम के बारे में यह कहा जाता है कि वह धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे। अकबर के दरबार में हिंदी कवियों में रहीम का महत्वपूर्ण स्थान था।

Q4.

रहीम का विवाह किससे हुआ था?

रहीम दास का विवाह मह बानू बेगम (माहबानों) से हुआ था। रहीम की शिक्षा समाप्त होने के पश्चात सम्राट अकबर ने अपने पिता हुमायूँ की परंपरा का निर्वाह करते हुए, रहीम का विवाह बैरम खाँ के विरोधी मिर्जा अजीज कोका की बहन माहबानों से करवा दिया। इस विवाह में भी अकबर ने वही किया, जो पहले करता रहा था कि विवाह के संबंधों के बदौलत आपसी तनाव व पुरानी से पुरानी कटुता को समाप्त कर दिया करता था। रहीम के विवाह से बैरम खाँ और मिर्जा के बीच चली आ रही पुरानी रंजिश खत्म हो गयी। रहीम का विवाह लगभग तेरह साल की उम्र में कर दिया गया था। इनकी दस संताने थी।

Q5.

रहीम दास की स्थिति कैसी थी?

रहीम दास अकबर के  दरबार में उनके नवरत्नों में से एक थे। इसके साथ साथ रहीम एक कुशल कवि, सेनापति, प्रशासक भी थे।

Q6.

रहीम की मृत्यु कब हुई?

रहीम दास का देहांत 71 वर्ष की आयु में सन 1627 में हुआ। रहीम को उनकी इच्छा के अनुसार दिल्ली में ही उनकी पत्नी के मकबरे के पास ही दफना दिया गया। यह मज़ार आज भी दिल्ली में मौजूद हैं। रहीम ने स्वयं ही अपने जीवनकाल में इसका निर्माण करवाया था।

Poet Rahim – रहीम मध्यकालीन सामंतवादी संस्कृति के कवि थे। वे कवि के साथ-साथ एक अच्छा सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, ज्योतिष, व विद्वान थे। रहीम सांप्रदायिक सदभाव तथा सभी धर्मो के प्रति समादर भाव के सत्यनिष्ठ साधक थे। रहीम कलम और तलवार के धनी थे और मानव प्रेम के सूत्रधार थे।

मुस्लिम धर्म के अनुयायी होते हुए भी रहीम ने अपनी काव्य रचना द्वारा हिन्दी साहित्य की जो सेवा की वह अद्भुत है। रहीम की कई रचनाएँ प्रसिद्ध हैं जिन्हें उन्होंने दोहों के रूप में लिखा। रहीम के बारे में यह कहा जाता है कि वह धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे। तो चलिए जाने rahim das ka jivan parichay..

रहीम का जीवन परिचय – Rahim Das Biography in Hindi

पूरा नामअब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना, (रहीम दास) – Rahim Das – Abdul Rahim Khan-I-Khana
जन्म दिनांक17 दिसम्बर 1556 ई.
जन्म स्थानलाहौर (अब पाकिस्तान)
मृत्यु1627 ई.

रहीम की जीवनी,

 Rahim das एक प्रसिद्ध कवि और मुगल सम्राट अकबर के प्रसिद्ध शिष्यों में से एक थे। उनका जन्म 1556 में लाहौर में हुआ था, जो उस समय मुगल साम्राज्य का एक हिस्सा था। रहीम दास न केवल अपनी कविता के लिए बल्कि अपने प्रशासन कौशल के लिए भी जाने जाते थे क्योंकि उन्होंने मुगल दरबार में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया था। वह अकबर के दरबार के नवरत्नों या नौ रत्नों में से एक था। यह जीवनी भारत के महानतम कवियों में से एक, रहीम दास के जीवन और उपलब्धियों को कवर करेगी।

रहीम दास जी के बारे में संक्षेप में जानकारी

नाम रहीम दास 
जन्म1556
जन्म स्थानजन्म स्थान लाहौर, मुगल साम्राज्य (वर्तमान पाकिस्तान)
पिता जी का नामबैरम खान
माता जी का नामसलीमा सुल्तान बेगम
भाषाअवधी, ब्रज भाषा
रचनायेरहीम सतसई, रहीम कवितावली, श्रृंगार सतसई, रहीम चन्द्रिका
मृत्यु1627
पूरा नामअब्दुल रहीम-ए-खान खाना

प्रारंभिक जीवन काल और शिक्षा

रहीम दास का जन्म 17 दिसंबर सन 1956 में लाहौर (जो की वर्तमान में पाकिस्तान में है) मुग़ल साम्राज्य में हुआ था | इनके पिता का नाम  बैरम खान और माता जी का नाम सलीमा सुल्तान बेगम था, जो की मुग़ल दरबार में रहा करते थे । उनके पिता एक प्रसिद्ध सेनापति थे जिन्होंने अपने प्रारंभिक वर्षों के दौरान अकबर के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया था। Rahim das ने अपनी शिक्षा मुगल दरबार में प्राप्त की, जहाँ उन्होंने विभिन्न भाषाओं और साहित्य का अध्ययन किया। उन्हें हिंदी और उर्दू में विशेष रुचि थी और जल्द ही वे दोनों भाषाओं में पारंगत हो गए।

Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay {कबीर की जीवनी }

साहित्यिक परिचय

रहीम दास ने मुगल सेना में एक सैनिक के रूप में अपना करियर शुरू किया, जहां उन्होंने एक बहादुर और कुशल योद्धा के रूप में अपनी ताकत साबित की। हालाँकि, उन्होंने जल्द ही महसूस किया कि उनकी सच्ची पुकार कविता और साहित्य में थी। उन्होंने हिंदी में कविताएँ रचना शुरू कीं, जिन्हें बाद में “रहीम चालीसा” नामक पुस्तक में संकलित किया गया। पुस्तक को अभी भी हिंदी साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक माना जाता है।

रहीम दास की मातृभाषा हिंदी थी, इसलिए वे हिंदी साहित्य के ज्ञान में बहुत ही विशारद थे।रहीम दास के साहित्यिक कार्यों में “रहीम चालीसा” सबसे महत्वपूर्ण है। इस ग्रंथ में 40 छंदों में लिखे गए दोहे होते हैं। इन दोहों में रहीम दास ने विभिन्न विषयों पर बहुत ही सरल भाषा में संदेश दिए हैं। उनकी शैली बहुत ही सरल थी और उन्होंने अपने दोहों में व्यंग्य, प्रेरणा, नैतिकता, धर्म, स्वाभाविकता आदि के विषयों पर बहुत ही सरलता से चर्चा की है। रहीम दास की कविताएँ अपनी सादगी और नैतिक शिक्षाओं के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने अक्सर अपनी कविता में लोक कथाओं और आम मुहावरों का इस्तेमाल किया, जिससे लोगों को समझने और उनसे जुड़ने में आसानी हुई। उनकी कविताओं में एक मजबूत धार्मिक और आध्यात्मिक स्वर भी था, जो उनकी अपनी मान्यताओं और मूल्यों को दर्शाता था।

रहीम दास की उपलब्धिया

रहीम दास अपनी कविता के अलावा अपने प्रशासनिक कौशल के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने काबुल के गवर्नर सहित मुगल दरबार में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वह अकबर का एक विश्वसनीय सलाहकार भी था, जो अक्सर शासन और शासन कला के मामलों पर उसकी सलाह लेता था। रहीम दास से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में से एक ‘तानसेन समारोह’ की कहानी है। तानसेन एक प्रसिद्ध संगीतकार और अकबर के दरबार के दरबारी थे। वह अपने असाधारण गायन कौशल के लिए जाने जाते थे, और अकबर अक्सर उनके सम्मान में संगीत प्रतियोगिताओं का आयोजन करते थे। हालांकि, एक साल तानसेन बीमार पड़ गए और प्रतियोगिता को स्थगित करना पड़ा। रहीम दास ने सुझाव दिया कि प्रतियोगिता रद्द करने के बजाय उन्हें एक साहित्यिक प्रतियोगिता आयोजित करनी चाहिए। यह विचार अच्छी तरह से प्राप्त हुआ था, और साहित्यिक प्रतियोगिता एक बड़ी सफलता थी, जिसने ‘तानसेन समरोह’ की परंपरा को जन्म दिया।

व्यक्तिगत जीवन

Rahim das का विवाह मुग़ल बादशाह हुमायूँ की बेटी माहबानू बेगम से हुआ था। इनके कई बच्चे हुए, जिनमें दो बेटे, अब्दुर रहीम खान-ए-खाना और दौलत अफज़ा शामिल थे, जो दोनों ही अपने आप में प्रसिद्ध कवि थे।

रहीम दास का 1627 में 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने कविता और साहित्य की एक ऐसी विरासत छोड़ी जो लेखकों और कवियों की पीढ़ियों को प्रेरित और प्रभावित करती रही है। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है, और उनकी कविता जनता के बीच लोकप्रिय है।

भाषा शैली

Rahim das ने अपनी कविताओं में सरल भाषा का उपयोग किया है | इसलिए वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय है | उनकी कविताएं सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों पर आधारित होती थीं। उन्होंने अपनी कविताओं में भावुकता व प्रेम को संवाद के जरिए व्यक्त किया। वे जीवन के विभिन्न पहलुओं को अपनी कविताओं में व्यक्त करते थे। उन्होंने अपनी कविताओं में बाल मजदूरी, महिला सशक्तिकरण, समाज में समानता आदि विषयों पर व्यंग्य भी किया था।

उनकी शैली सरल, सुगम और स्पष्ट थी। उन्होंने अपनी कविताओं में सामान्य जनता के भावों को संवाद के जरिए व्यक्त किया था। उनकी कविताएं आसान भाषा में लिखी जाती थीं जो जनता के बीच बहुत ही लोकप्रिय थीं।

रहीम दास एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे जिन्होंने कई क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वह न केवल एक महान कवि थे बल्कि एक कुशल प्रशासक और अकबर के विश्वसनीय सलाहकार भी थे। उनकी कविता, जो उनके अपने विश्वासों और मूल्यों को दर्शाती है, आज भी लोगों को प्रेरित और प्रभावित करती है। रहीम दास को हमेशा भारत के महानतम कवियों में से एक और अकबर के सच्चे शिष्य के रूप में याद किया जाएगा।

आवश्यक जानकारी-

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Categories Hindi
में उनके मृत्यु के बाद इसी मक़बरे में दफनाया गया।

एक नज़र रहीम के ग्रंथो पर – Rahim das books and poems 

रहीम के ग्रंथो में रहीम दोहावली या सतसई, बरवै, मदनाष्ठ्क, राग पंचाध्यायी, नगर शोभा, नायिका भेद, श्रृंगार, सोरठा, फुटकर बरवै, फुटकर छंद तथा पद, फुटकर कवितव, सवैये, संस्कृत काव्य प्रसिद्ध हैं।

रहीम ने तुर्की भाषा में लिखी बाबर की आत्मकथा “तुजके बाबरी” का फारसी में अनुवाद किया। “मआसिरे रहीमी” और “आइने अकबरी” में इन्होंने “खानखाना” व रहीम नाम से कविता की है।

रहीम व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। वे मुसलमान होकर भी कृष्ण भक्त थे। रहीम ने अपने काव्य में रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को लिया है।

आपने स्वयं को को “रहिमन” कहकर भी सम्बोधित किया है। इनके काव्य में नीति, भक्ति, प्रेम और श्रृंगार का सुन्दर समावेश मिलता है।

रहीम ने अपने अनुभवों को लिस सरल शैली में अभिव्यक्त किया है वह वास्तव में अदभुत है। आपकी कविताओं, छंदों, दोहों में पूर्वी अवधी, ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। रहीम ने तदभव शब्दों का अधिक प्रयोग किया है।


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रहीम दास के संबंध में अक्सर पुछे जाने वाले प्रश्न

Q- रहीम के दोहे की भाषा कौन सी है?

A- ब्रजभाषा, खड़ी बोली, अवधि। 

Q- रहीम की प्रमुख रचनाएं कौन-कौन सी हैं?

A- “रहीम दोहावली, बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा, भक्तिपरक बरवै, वाकयात-बाबरी, फारसी, दीवान, खेत कौतुक जातकम ” आदि।

Q- रहीम के कौन से दोहे अधिक प्रसिद्ध है?

A- नीति संबंधी दोहे 

Q- रहीम दास का जन्म कब एवं कहाँ हुआ था?

A- रहीम दास जी का जन्म सन् 1556 में दिल्ली, लाहौर में हुआ।

Q- रहीम दास जी किसके उपासक थे?

A- कृष्ण के 

Q- रहीम का पूरा नाम हिंदी में

A- अब्दुल रहिम दास

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रहीम दास (रहीमदास- Rahim Das) का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, कवि परिचय एवं भाषा शैली और उनकी प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ। रहीम दास (Rahimdas) का जीवन परिचय एवं साहित्यिक परिचय नीचे दिया गया है।

Rahim Das Biography in Hindi / Rahim Das Jeevan Parichay / Rahim Das Jivan Parichay/ रहीम दास :

नामरहीम दास
पूरा नामअब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना
जन्म17 दिसम्बर, 1556
जन्मस्थानलाहौर,  पाकिस्तान
मृत्यु1 अक्टूबर, 1627 (उम्र 70)
मृत्यु स्थानचित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत
समाधिअब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का मकबरा, दिल्ली
पेशाकवि, सेनापति, प्रशासक
स्थितिअकबर के नवरत्नों में से एक
मातासुल्ताना बेगम
पिताबैरम खाँ
पत्नीमह बानू बेगम (माहबानों)
धर्मइस्लाम (मुसलमान)
प्रमुख रचनाएँरहीम दोहावली, बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा
विधादोहा, कविता
भाषाअवधी, ब्रजभाषा (सरल, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण)
साहित्य कालभक्ति काल

अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना या रहीम को एक कवि, सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, एवं विद्वान के रूप में जाना जाता है।

रहीम दास का जीवन परिचय

रहीम दास का पूरा नाम ‘अब्दुलरहीम ख़ान-ए-ख़ाना‘ था। उनका जन्म सन् 1556 ई.

में 70 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु हो गयी। दिल्ली में स्थित ख़ान ए ख़ाना के नाम से प्रसिद्ध यह मक़बरा अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना का है। इस मक़बरे का निर्माण रहीम के द्वारा अपनी बेगम की याद में करवाया गया था, जिनकी मृत्यु 1598 ई. (उम्र- 70)

कर्म भूमिदिल्ली (भारत)
पिता का नामबैरम खान
माता का नामसुल्ताना बेगम
उपलब्धिकवि
मुख्य रचनाएरहीम रत्नावली, रहीम विलास, रहिमन विनोद, रहीम ‘कवितावली, रहिमन चंद्रिका, रहिमन शतक,

प्रारंभिक जीवन – Early Life of Rahim Das 

रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम (अब्दुर्रहीम) ख़ानख़ाना था। आपका जन्म 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर (अब पाकिस्तान) में हुआ। रहीम के पिता का नाम बैरम खान तथा माता का नाम सुल्ताना बेगम था, जो एक कवियित्री थी। उनके पिता बैरम ख़ाँ मुगल बादशाह अकबर के संरक्षक थे। कहा जाता है कि रहीम का नामकरण अकबर ने ही किया था।

रहीम को वीरता, राजनीति, राज्य-संचालन, दानशीलता तथा काव्य जैसे अदभुत गुण अपने माता-पिता से विरासत में मिले थे। बचपन से ही रहीम साहित्य प्रेमी और बुद्धिमान थे।

उनके पिता बैरम खान बादशाह अकबर के बेहद करीबी थे। उन्होने अपनी कुशल नीति से अकबर के राज्य को मजबूत बनाने में पूरा सहयोग दिया। किसी कारणवश बैरम खाँ और अकबर के बीच मतभेद हो गया। अकबर ने बैरम खाँ के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया और अपने उस्ताद की मान एवं लाज रखते हुए उसे हज पर जाने की इच्छा जताई। परिणामस्वरुप बैरम खाँ हज के लिए रवाना हो गये।

रहीम के पिता की मृत्यु –

बैरम खाँ हज के लिए जाते हुए गुजरात के पाटन में ठहरे और पाटन के प्रसिद्ध सहस्रलिंग तालाब में नौका विहार या नहाकर जैसे ही निकले, तभी उनके एक पुराने विरोधी – अफ़ग़ान सरदार मुबारक ख़ाँ ने धोखे से उनकी पीठ में छुरा भोंककर उनका वध कर डाला। यह मुबारक खाँ ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए किया था।

बैरम खाँ की पत्नी सुल्ताना बेगम अपने कुछ सेवकों सहित बचकर अहमदाबाद आ गई। अकबर को घटना के बारे में जैसे ही मालूम हुआ, उन्होंने सुल्ताना बेगम को दरबार वापस आने का संदेश भेज दिया। रास्ते में संदेश पाकर बेगम अकबर के दरबार में आ गई। ऐसे समय में अकबर ने अपने महानता का सबूत देते हुए इनको बड़ी उदारता से शरण दिया और रहीम के लिए कहा “इसे सब प्रकार से खुश रखो। इसे यह पता न चले कि इनके पिता खान खानाँ का साया सर से उठ गया है। बाबा जम्बूर को कहा यह हमारा बेटा है। इसे हमारी आँखो के सामने रखा करो। इस प्रकार अकबर ने रहीम का पालन- पोषण एकदम अपने बेटे जैसा किया।

कुछ दिनों के बाद अकबर ने विधवा सुल्ताना बेगम से विवाह कर लिया। अकबर ने रहीम को शाही खानदान के अनुरुप “मिर्जा खाँ’ की उपाधि से सम्मानित किया।

शिक्षा- दीक्षा –

रहीम की शिक्षा- दीक्षा अकबर की उदार धर्म- निरपेक्ष नीति के अनुकूल हुई। मुल्ला मुहम्मद अमीन रहीम के शिक्षक थे। इन्होने रहीम को तुर्की, अरबी व फारसी भाषा की शिक्षा व ज्ञान दिया। इन्होनें ही रहीम को छंद रचना, कविता, गणित, तर्कशास्त्र तथा फारसी व्याकरण का ज्ञान भी करवाया। इसके बदाऊनी रहीम के संस्कृत के शिक्षक थे। इसी शिक्षा- दिक्षा के कारण रहीम का काव्य आज भी हिंदूओं के गले का कण्ठहार बना हुआ है।

सम्राट अकबर के दरबार मे –

अकबर के दरबार को प्रमुख पदों में से एक मीर अर्ज का पद था। यह पद पाकर कोई भी व्यक्ति रातों रात अमीर हो जाता था, क्योंकि यह पद ऐसा था, जिससे पहुँचकर ही जनता की फरियाद सम्राट तक पहुँचती थी और सम्राट के द्वारा लिए गए फैसले भी इसी पद के जरिये जनता तक पहुँचाए जाते थे। इस पद पर हर दो- तीन दिनों में नए लोगों को नियुक्त किया जाता था। सम्राट अकबर ने इस पद का काम-काज सुचारु रुप से चलाने के लिए अपने सच्चे तथा विश्वास पात्र अमीर रहीम को मुस्तकिल मीर अर्ज नियुक्त किया। यह निर्णय सुनकर सारा दरबार सन्न रह गया था। इस पद पर आसीन होने का मतलब था कि वह व्यक्ति जनता एवं सम्राट दोनों में सामान्य रुप से विश्वसनीय है।

28 वर्ष की उम्र में अकबर ने रहीम को खानाखाना की उपाधि से नवाज़ा था। इससे पहले यह सम्मान केवल उनके पिता बैरम खान को प्राप्त हुआ था। उन्होंने बाबर की आत्मकथा का तुर्की से फारसी में अनुवाद किया था। उन्हें अकबर के नवरत्नों में शामिल किया गया था। वे एक अच्छे सेनापति भी थे। इसके साथ रहीम बादशाह अकबर के पुत्र सलीम का अतालीक (गुरु) रहे थे।

रहीम की शादी –

रहीम दास का विवाह मात्र 16 वर्ष की वायु में जीजा कोका की बहन माहबानों से हुवा था। माहबानो से अब्दुल रहीम को दो बेटियां और तीन बेटे थे। इसके बाद रहीम ने दो और विवाह किये थे।

रहीम की मृत्यु और कब्र –

1626 ई.