Sohanlal dwivedi biography hindi song
Home / General Biography Information / Sohanlal dwivedi biography hindi song
ए., एल.
की डिग्री ली और आजीविका के लिए जमींदारी और बैंकिंग का काम करते रहे । 1938 से 1942 तक वे राष्ट्रीय पत्र 'दैनिक अधिकार' के संपादक थे । कुछ वर्षों तक आपने अवैतनिक रूप से बाल पत्रिका 'बाल-सखा' का संपादन भी किया ।
साहित्यिक कृतियां:
देश प्रेम के भावों से युक्त आपकी प्रथम रचना 'भैरवी' 1941 में प्रकाशित हुई । आपकी अन्य प्रकाशित कृतियां हैं- 'वासवदत्ता', 'कुणाल 'पूजागीत', 'विषपान, 'युगाधार और 'जय गांधी' । इनमें आपकी गांधीवादी विचारधारा और खादी-प्रेम की मार्मिक और हृदयग्राही अभिव्यक्ति के दर्शन होते हैं । आपने प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य की भी रचना की । उनमें प्रमुख हैं- 'बांसुरी', 'झरना', 'बिगुल', 'बच्चों के बापू, 'चेतना', 'दूध बताशा, 'बाल भारती, 'शिशु भारती', 'नेहरू चाचा' 'सुजाता', 'प्रभाती' आदि ।
द्विवेदी जी का साहित्य वर्तमान और अतीत के प्रति गौरव की भावना जगाता
है ।
1969 में भारत सरकार ने आपको पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया।
1 मार्च 1988 को राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का देहांत हो गया।
सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi का साहित्य संकलन
.
सतत प्रणाम !जो निर्धन के धन, निर्बल के बल अविराम!
उन नेताओं के चरणों में कोटि प्रणाम
मातृभूमि का जगा जिन्हें ऐसा अनुराग!
यौवन में ही लिया जिन्होंने है वैराग,
नगर-नगर की, ग्राम-ग्राम की छानी धूल
समझे जिससे सोई जनता अपनी भूल!
जिनको रोटी-नमक न होता कभी नसीब,
जिनको युग ने बना रखा है सदा गरीब,
उन मूों को विद्वानों को जो दिन रात,
इन्हें जगाने को फेरी देते हैं प्रातः
जगा रहे जो सोए गौरव को अभिराम!
उस स्वदेश के स्वाभिमान को कोटि प्रणाम!
जंजीरों में कसे हुए सिकचों के पार
जन्मभूमि जननी की करते जय-जयकार
सही कठिन, हथकड़ियों की, बेतों की मार
आजादी की कभी न छोड़ी टेक पुकार!
स्वार्थ, लोभ, यश कभी सका है जिन्हें न जीत
जो अपनी धुन के मतवाले मन के मीत
ढाने को साम्राज्यवाद की दृढ़ दीवार
बार-बार बलिदान चढ़े प्राणों को वार!
बंद सीकचों में जो हैं अपने सरनाम
धीर, वीर उन सत्पुरुषों को कोटि प्रणाम!
उन्हीं कर्मठों, धुव धीरों को है प्रतियाम!
कोटि प्रणाम!
जो फाँसी के तख्तों पर जाते हैं झूम,
जो हँसते-हँसते शूली को लेते चूम,
दीवारों में चुन जाते हैं जो मासूम,
टेक न तजते, पी जाते हैं विष का धूम!
उस आगत को जो कि अनागत दिव्य भविष्य
जिनकी पावन ज्वाला में सब पाप हविष्य!
सब स्वतन्त्र, सब सुखी जहाँ पर सुख विश्राम
नवयुग के उस नव प्रभात की किरण ललाम!
उस मंगलमय दिन को मेरे कोटि प्रणाम!
सर्वोदय हँस रहा जहाँ, सुख शान्ति प्रकाम!
– ‘जय भारत जय’ से (सोहनलाल द्विवेदी)
निर्धन के धन, निर्बल के बल, त्यागी, स्वाभिमानी, धीर, फाँसी के फन्दों को चूमने वाले तथा शोषक साम्राज्यवाद की दीवारें ढहाने वाले नेताओं के चरणों में कवि का प्रणाम इन पंक्तियों में प्रस्तुत है।
उन्हें प्रणाम कविता में प्रयुक्त कठिन शब्द और उनके अर्थ
| क्रम | शब्द | अर्थ |
|---|---|---|
| 1. | दीन-अश्रु | गरीब के आँसू। |
| 2. | मर्म | हृदय। |
| 3. | कोटि | करोड़ों। |
| 4. | उन्नत माय | ऊँचा माथा। |
| 5. | कर | हाथ। |
| 6. | थाम | पकड़कर। |
| 7. | प्रकाम | पर्याप्त। |
| 8. | टेकों | संकल्पों, आश्रयों। |
| 9. | वितान | मंडप। |
| 10. | उच्छ्वसित | उच्छ्वास रूप में बाहर आया हुआ, विकसित। |
| 11. | मधुकरियाँ | भिक्षा, पक्वान्न की भिक्षा। |
| 12. | शोध | खोज। |
| 13. | बोध | ज्ञान। |
| 14. | प्रतिशोध | बदला। |
| 15. | सरनाम | प्रसिद्ध। |
| 16. | प्रतियाम | प्रति प्रहर। |
| 17. | मासूम | भोले-भाले। |
| 18. | धम | धूआँ। |
| 19. | आगत | वर्तमान। |
| 20. | अनागत | भविष्य। |
| 21. | दिव्य | अलौकिक। |
| 22. | हविष्य | हव्य, हवन सामग्री। |
| 23. | ललाम | सुन्दर। |
| 24. | सर्वोदय | सभी का विकास। |
| 25. | प्रकाम | यथेष्ठ, जितना आवश्यक हो। |
सोहन लाल द्विवेदी की रचनाएं एवं कृतियाँ
सोहन लाल द्विवेदी का काव्य संग्रह– मुक्तिगंधा, कुणाल, युगाधार, दूध बताशा, चित्रा, वासवदत्ता, भैरवी, पूजा गीत, कुणाल, प्रभाती, वासंती (प्रेमगीत संग्रह), विषपान (आख्यान प्रधान काव्य संग्रह), शिशु भारतीय, बाल भारती (बालगीत संग्रह), जय गांधी, बांसुरी, झरना, बिगुल, सुजाता, पूजा के स्वर, मोदक।
हिन्दी साहित्य के अन्य जीवन परिचय- हिन्दी के अन्य जीवन परिचय देखने के लिए मुख्य प्रष्ठ ‘Jivan Parichay‘ पर जाएँ। जहां पर सभी जीवन परिचय एवं कवि परिचय तथा साहित्यिक परिचय आदि सभी दिये हुए हैं।
साहित्य शलाका : सोहनलाल द्विवेदी : राष्ट्रकाव्य के अमर गायक
प्रो.
दयानंद तिवारी
(राज्य अध्यक्ष, हिंदी साहित्य भारती, महाराष्ट्र)
`जो पड़ गए रण में, उन्हें रण में ही रहना चाहिए।
जीवन मिले या मृत्यु, रण-धर्म नित्य निभाना चाहिए।’
यही वो स्वर है, जो सोहनलाल द्विवेदी को स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली काव्यनायकों की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
सोहनलाल द्विवेदी का जन्म २२ फरवरी १९०६ को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के फतेहपुर गांव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही उनके भीतर देशभक्ति और साहित्य के बीज अंकुरित होने लगे थे। उन्होंने हिंदी और संस्कृत में गहन अध्ययन किया तथा राष्ट्रवादी आंदोलनों से प्रेरणा ली।
उनकी शिक्षा-दीक्षा लखनऊ और प्रयाग (अब प्रयागराज) में हुई। विद्यार्थी जीवन में ही उनका झुकाव महात्मा गांधी के विचारों और स्वतंत्रता संग्राम की ओर हो गया। उनका जीवन संयम, अनुशासन, और गांधीवादी आदर्शों से ओत-प्रोत रहा।
काव्य-धारा : राष्ट्रवाद और जनचेतना
सोहनलाल द्विवेदी की रचनाएं मूलत: राष्ट्रवादी चेतना, गांधीवाद, जनजागरण और बलिदान की भावना से सराबोर हैं। उन्होंने कविता को केवल कलात्मकता की अभिव्यक्ति नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण का शस्त्र बनाया। उनकी कविता जनमानस को आंदोलित करती थी, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी रचनाएं हजारों युवाओं को देश के लिए प्रेरित करती थीं।
उनका स्वर न तो चापलूस था, न निराशावादी-बल्कि आक्रोश, आशा, आत्मबल और संकल्प का स्वर था।
प्रमुख काव्यसंग्रह और रचनाएं
`भू पर स्वर्ग उतारेंगे’, जय हिंद’, चलो भारत’, विजय पताका’
वंदे मातरम’ (गीत संग्रह) मंगल प्रभात’ आदि।
इन काव्यसंग्रहों में राष्ट्र के प्रति प्रेम, मातृभूमि के लिए बलिदान और गांधीजी के विचारों की महक साफ महसूस की जा सकती है।
गांधीजी से निकट संबंध
सोहनलाल द्विवेदी को महात्मा गांधी के अत्यंत निकट माना जाता था। उनकी कविताओं में गांधीजी के विचारों का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने गांधी जी को `युगपुरुष’ और `मानवता का प्रतिनिधि’ माना। उनकी प्रसिद्ध कविता की पंक्तियां-
`चल पड़े जिधर दो डगमग में,
चल पड़े कोटि पग उसी ओर।’
गांधी के नेतृत्व की प्रभावशीलता का अद्भुत चित्रण करती है। इस कविता ने स्वतंत्रता संग्राम में लाखों युवाओं के मन में प्रेरणा का संचार किया।
शैली और भाषा
सोहनलाल द्विवेदी की भाषा सरल, ओजस्वी और प्रभावशाली थी। उन्होंने काव्यशास्त्रीय बंधनों से स्वयं को मुक्त रखते हुए कविता को जनकंठ बनाया। उनकी रचनाएं वीर रस, राष्ट्र रस और करुण रस की त्रिवेणी हैं। उनका काव्य पाठ्यपुस्तकों में स्थान पा गया और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक मंचों और आंदोलनों का स्वर बन गया।
वे कवियों की उस परंपरा से थे जो कविता को आंदोलनों का स्वर बनाते हैं, न कि केवल पुरस्कारों का माध्यम।
राष्ट्रीय चेतना का कवि
उनकी कविताएं युद्ध, शांति, बलिदान, और सेवा जैसे राष्ट्रधर्म के मूल्यों की प्रतिष्ठा करती हैं। उनके द्वारा रचित ‘विजय पताका’, ‘चलो भारत’, ‘जय हिंद’ जैसी रचनाएं आज भी स्कूलों, रैलियों और सार्वजनिक समारोहों में गूंजती हैं।
उनकी रचनाओं ने यह प्रमाणित किया कि कविता केवल मंच पर गूंजने के लिए नहीं होती, वह मन, मस्तिष्क और देश की आत्मा को झकझोरने वाली शक्ति भी होती है।
मृत्यु और साहित्यिक विरासत
सोहनलाल द्विवेदी का निधन १ मार्च १९८८ को हुआ, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी राष्ट्र के हर जज्बे में जीवित हैं। उनकी कविता ‘चलो भारत’ आज भी नई पीढ़ी को आवाज देती है कि वे केवल करियर नहीं, राष्ट्र के कर्मयोगी बनें।
सोहनलाल द्विवेदी उन विरले कवियों में हैं, जिनकी लेखनी ने स्वतंत्रता आंदोलन को शब्दों का शस्त्र दिया। वे साहित्यकार नहीं, साहित्य-सेनानी थे। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जब कलम जागती है, तो क्रांति की मशालें जल उठती हैं।
उनकी कविताएं आज भी प्रासंगिक हैं, विशेषकर तब जब राष्ट्र को वैचारिक एकता और प्रेरणा की आवश्यकता होती है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, द्विवेदी जी ने कविता को जनक्रांति का माध्यम बनाया।
उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियां
ऊंचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है
नीचे पखार पग तल, नित सिंधु झूमता है,
गंगा पवित्र यमुना, नदियां लहर रही हैं
पल-पल नई छटाएं, पग पग छहर रही हैं।
वह पुण्यभूमि मेरी
वह जन्मभूमि मेरी,
वह स्वर्णभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।
झरने अनेक झरते, जिसकी पहाड़ियों में
चिड़ियां चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में,
अमराइयां घनी हैं, कोयल पुकारती है
बहती मलय पवन है, तन मन संवारती है।
वह धर्मभूमि मेरी
वह कर्मभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी
जन्में जहां थे रघुपति, जन्मी जहां थीं सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई वंशी पुनीत गीता,
गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया
जग को दया दिखाई, जग को दिया दिखाया।
वह युद्धभूमि मेरी
वह बुद्धभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी!
`तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ!
सोहनलाल द्विवेदी (Sohan Lal Dwivedi) का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, कवि परिचय एवं भाषा शैली और उनकी प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ। सोहनलाल द्विवेदी का जीवन परिचय एवं साहित्यिक परिचय नीचे दिया गया है।
Sohan Lal Dwivedi Biography in Hindi / Sohan Lal Dwivedi Jeevan Parichay / Sohan Lal Dwivedi Jivan Parichay/ सोहन लाल द्विवेदी :
| नाम | सोहनलाल द्विवेदी |
| जन्म | 22 फरवरी, 1906 |
| जन्मस्थान | सिजौली ग्राम, बिन्दकी, फतेहपुर, उ.
बी. एल. कर शपथ! प्र. |
| मृत्यु | 1 मार्च, 1988 |
| माता का नाम | सार्वित द्विवेदी |
| पिता का नाम | बिन्दाप्रसाद द्विवेदी |
| पेशा | कवि, लेखक, स्वतंत्रता सेनानी |
| प्रमुख रचनाएँ | भैरवी, पूजागीत सेवाग्राम, प्रभाती, युगाधार, कुणाल, चेतना, बाँसुरी, दूधबतासा। |
| भाषा | सरस, बोधगम्य, सीधी-सादी और स्वाभाविक ‘हिन्दी भाषा‘ |
| साहित्य काल | आधुनिक काल |
| विधाएं | कविता, काव्य |
| सम्पादन | अधिकार, बालसखा |
सोहनलाल द्विवेदी का जीवन परिचय
सोहनलाल द्विवेदी का जन्म सन् 1906 ई० में फतेहपुर जिले के बिन्दकी नामक कस्बे में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता पं० बिन्दाप्रसाद द्विवेदी एक कर्मनिष्ठ कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे।
द्विवेदी जी की हाई स्कूल तक की शिक्षा फतेहपुर में तथा उच्च शिक्षा हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई। वहाँ के पवित्र राष्ट्रीय वातावरण में महामना मालवीय जी के सम्पर्क से उनके हृदय में राष्ट्रीयता की भावना जगी और उन्होंने राष्ट्रीय भावना-प्रधान कविताएँ लिखना आरम्भ किया।
सन् 1938 से सन् 1942 तक दैनिक राष्ट्रीय पत्र ‘अधिकार‘ का लखनऊ से सम्पादन कार्य किया। कई वर्षों तक वे ‘बालसखा‘ के अवैतनिक सम्पादक भी रहे। 29 फरवरी, 1988 को श्री द्विवेदी जी का असामयिक देहावसान हो गया।
साहित्यिक परिचय
काव्य रचना के साथ ‘स्वाधीनता आन्दोलन‘ में भी उन्होंने सक्रिय भाग लिया। द्विवेदी जी गांधीवादी कवि थे। उन्होंने राष्ट्रीय कविताओं के अतिरिक्त लोकप्रिय बाल-कविताएँ भी लिखी हैं। 1941 में उनका प्रथम काव्य-संग्रह ‘भैरवी‘ प्रकाशित हुआ।
सोहनलाल द्विवेदी की बहुमुखी प्रतिभा उस समय सामने आई जब उन्होंने 1937 में लखनऊ से दैनिक पत्र ‘अधिकार‘ का सम्पादन कार्य शूरू किया था। इस सफलता के चार वर्ष बाद उन्होंने अवैतनिक सम्पादक के रूप में ‘बालसखा’ का सम्पादन भी किया था। भारत देश में बाल साहित्य के सोहनलाल जी श्रेष्ठ आचार्य थे।
रचनाएँ एवं कृतियाँ
उनकी राष्ट्रीय कविताओं के प्रमुख संग्रह इस प्रकार हैं- ‘भैरवी’, ‘पूजागीत’, ‘प्रभाती’ और ‘चेतना’, ‘वासन्ती’ उनके प्रेम-गीतों का संग्रह है। ‘दूध बताशा’, ‘शिशु भारती’, ‘बाल भारती’, ‘बिगुल’, ‘बाँसुरी’, आदि बाल-कविता-संग्रह हैं। ‘कुणाल’, ‘वासवदत्ता’ और ‘विषपान’ आख्यान-काव्य हैं। उन्होंने ‘गांधी अभिनन्दन ग्रन्थ’ का भी सम्पादन किया।
- प्रेम गीतों का संग्रह: भैरवी, पूजागीत, प्रभाती और चेतना, वासन्ती।
- बाल कविता संग्रह: दूध बताशा, शिशु भारती, बाल भारती, बिगुल, बाँसुरी।
- आख्यान काव्य: कुणाल, वासवदत्ता, विषपान।
- ग्रंथ: गांधी अभिनन्दन ग्रन्थ।
सोहनलाल द्विवेदी जी की कविताओं का मुख्य विषय राष्ट्रीय उद्बोधन है। उनमें जागरण का सन्देश है। खादी-प्रचार, ग्राम-सुधार, देशभक्ति, सत्य, अहिंसा और प्रेम उनकी कविता के मुख्य विषय हैं। बालोपयोगी रचनाएँ सरस और मधुर हैं।
भाषा शैली
द्विवेदी जी की भाषा सरस, बोधगम्य, सीधी-सादी और स्वाभाविक हैं। कविता में व्यर्थ का अलंकार-प्रदर्शन नहीं है। शैली में प्रवाह और रोचकता है। शैलियों में उन्होंने गीति, प्रबन्ध तथा मुक्तक आदि शैलियों का प्रयोग कुशलतापूर्वक किया है। इनके साथ ही उन्होंने इतिवृत्तात्मक, अलंकारपूर्ण एवं प्रतीकात्मक शैलियाँ भी अपनाई हैं। इनकी राष्ट्रीय कविताएँ ओजपूर्ण हैं।
सोहनलाल द्विवेदी गांधीवादी राष्ट्रीय भावनाओं के सफल कवि के रूप में विख्यात हैं। हिन्दी-साहित्य के बालकाव्यकारों में वे अपना अद्वितीय स्थान रखते हैं।
उन्हें प्रणाम “कविता” – सोहनलाल द्विवेदी
भेद गया है दीन अश्रु से जिनके मर्म,
मुहताजों के साथ न जिनको आती शर्म,
किसी देश में किसी वेश में करते कर्म,
मानवता का संस्थापन ही है जिनका धर्म!
ज्ञात नहीं हैं जिनके नाम!
उन्हें प्रणाम!
कर शपथ!’
इस प्रकार की ओजपूर्ण कविता आज भी देशभक्तों की चेतना को ऊर्जा देती है।
सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
सोहन लाल द्विवेदी (22 फरवरी 1906 - 1 मार्च 1988) हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए देश-भक्ति व ऊर्जा से ओतप्रोत आपकी रचनाओं की विशेष सराहना हुई और आपको राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया।
आप महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित हुए । द्विवेदी जी ने बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं ।
आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.
सतत प्रणाम!
कोटि-कोटि नंगों, भिखमंगों के जो साथ,
खड़े हुए हैं कंधा जोड़े, उन्नत माथ,
शोषित जन के, पीड़ित जन के, कर को थाम,
बढ़े जा रहे उधर, जिधर है मुक्ति प्रकाम!
ज्ञात और अज्ञात मात्र ही जिनके नाम!
वन्दनीय उन सत्पुरुषों को सतत प्रणाम!
जिनके गीतों को पढ़ने से मिलती शान्ति,
जिनकी तानों को सुनने से मिटती भ्रान्ति,
छा जाती मुखमण्डल पर यौवन की कान्ति,
जिनकी टेकों पर टिकने से टिकती क्रान्ति।
मरण मधुर बन जाता है जैसे वरदान,
अधरों पर खिल जाती है मादक मुस्कान,
नहीं देख सकते जग में अन्याय वितान,
प्राण उच्छ्वसित होते, होने को बलिदान !
जो घावों पर मरहम का कर देते काम!
उन सहृदय हृदयों को मेरे कोटि प्रणाम !
उन्हें जिन्हें है नहीं जगत में अपना काम,
राजा से बन गए भिखारी तज आराम,
दर-दर भीख माँगते सहते वर्षा धाम,
दो सूखी मधुकरियाँ दे देतीं विश्राम!
जिनकी आत्मा सदा सत्य का करती शोध,
जिनको है अपनी गौरव-गरिमा का बोध,
जिन्हें दुखी पर दया, कूर पर आता क्रोध
अत्याचारों का अभीष्ट जिनको प्रतिशोध !
उन्हें प्रणाम!