Biography of kalidasa in hindi

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सच-सच बतलाना।  

पर पीड़ा से पूर-पूर हो।  

थक-थक कर और चूर-चूर हो।  

अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, 

प्रियवर! मेघदूतम्:

यह कालिदास की सर्वाधिक मार्मिक कृति मानी जाती है।
कथा एक यक्ष की है, जो अपनी पत्नी से बिछुड़ जाता है और एक मेघ को संदेशवाहक बनाकर अपने प्रेम की व्यथा सुनाता है।
काव्य में प्रकृति के विविध रंगों का अद्भुत चित्रण मिलता है।
मेघ के माध्यम से यक्ष की व्याकुलता और प्रेम की तीव्रता का अत्यंत संवेदनशील वर्णन है।

कालिदास की काव्य विशेषताएँ

कालिदास के काव्य में कई विशेषताएँ हैं जो उन्हें अन्य कवियों से अलग करती हैं:

प्रकृति चित्रण:

कालिदास को प्रकृति का चितेरा कहा जाता है।
उनकी कविताओं में वर्षा, वसंत, मेघ, पुष्प, और पर्वतों का अत्यंत सुंदर वर्णन है।

श्रृंगार रस की प्रधानता:

कालिदास के काव्य में प्रेम और सौंदर्य का अद्भुत समावेश है।
उनके नायक-नायिकाएँ शालीन और आदर्श प्रेम का परिचय देते हैं।

भाषा और शैली:

उनकी भाषा सरल, सरस, और प्रवाहमयी है।
उपमाओं और अलंकारों का सुंदर प्रयोग करते हुए भी अर्थ की स्पष्टता बनी रहती है।

मानव जीवन का गहरा चित्रण:

कालिदास ने अपने काव्य में न केवल प्रेम और सौंदर्य, बल्कि राजनीति, धर्म, और मानव मूल्यों का भी चित्रण किया।
उनके पात्र जीवन के विभिन्न संघर्षों और भावनाओं को जीवंत करते हैं।

कालिदास का प्रभाव और महत्व:

कालिदास की कृतियाँ न केवल संस्कृत साहित्य में बल्कि विश्व साहित्य में भी अत्यधिक प्रशंसित हैं।
उनकी रचनाएँ भारतीय संस्कृति, दर्शन और जीवन मूल्यों का दर्पण हैं।
उनकी प्रसिद्धि इतनी व्यापक है कि उन्हें भारतीय साहित्य का शेक्सपियर कहा जाता है।
आज भी उनके नाटकों का मंचन होता है और उनकी कविताएँ साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

निष्कर्ष:

कालिदास केवल एक कवि या नाटककार नहीं थे, वे मानव हृदय के चितेरे और प्रकृति के मर्मज्ञ थे। उनके साहित्य में भावनाओं की गहराई, भाषा की मधुरता, और विचारों की ऊँचाई देखने को मिलती है। उनकी रचनाएँ न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि जीवन के उच्च आदर्शों की ओर भी प्रेरित करती हैं। भारतीय साहित्य में कालिदास का स्थान अमर और अद्वितीय है।

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मेहमान तो दो ही हैं – धन और यौवन, जो ज्यादा देर ठहरते नहीं।”
कालिदास बोले – “तो मैं सहनशील हूं।”
वृद्धा ने कहा – “सहनशील भी दो ही हैं – धरती और पेड़, जो सबका भार सहते हैं और बदले में उपकार करते हैं। तुम सहनशील नहीं।”

थक-हारकर कालिदास बोले – “तो मैं हठी हूं।”
वृद्धा ने उत्तर दिया – “हठी तो केवल नख और केश हैं, जिन्हें जितना भी काटो, वे फिर से उग आते हैं।”
आखिरकार कालिदास ने कहा – “तो मैं मूर्ख हूं।”
वृद्धा हंसी – “मूर्ख दो ही हैं – एक राजा, जो बिना योग्यता के शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित, जो गलत को भी सही साबित करता है।”

अब कालिदास पूरी तरह निरुत्तर और विनम्र हो चुके थे। वे वृद्धा के चरणों में गिर पड़े और पानी की याचना करने लगे। उसी क्षण वृद्धा का स्वर बदल गया और सामने मां सरस्वती प्रकट हो गईं।

माता ने कहा – “विद्या से ज्ञान आता है, अहंकार नहीं। तूने मान-प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और घमंड कर बैठा, इसलिए तुम्हें सबक सिखाने के लिए यह रूप धारण करना पड़ा।”

कालिदास ने अपनी भूल स्वीकार की, मां सरस्वती को प्रणाम किया और पानी पीकर आगे की यात्रा पर निकल पड़े।

यहां पढ़ें ऐसे ही महान लोगो की जीवन की कहानियां जो हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

निष्कर्ष

कालिदास भारतीय साहित्य के एक अमूल्य रत्न हैं। कालिदास के जीवन परिचय(Kalidas ka jivan parichay) , कालिदास की रचनाएं से हमें यह सीख मिलती है कि कला और साहित्य की अमरता केवल उसकी समृद्ध और आध्यात्मिक आधार पर ही निर्मित होती है। उनकी काव्य शैली ने बाद के सभी कवियों के साथ-साथ बीसवीं सदी के वर्तमान कवियों को भी प्रभावित किया। कालिदास के कार्यों को मान्यता देते हुए भारत सरकार मध्य प्रदेश में शास्त्रीय नृत्य, कविता, शास्त्रीय संगीत, प्लास्टिक कला और कला में अच्छा प्रदर्शन करने वाले को कालिदास सम्मान देती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

कालिदास जी का जन्म कब और कहां हुआ था?

साहित्यकारों का मानना है कि कालिदास का जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। उन्होंने वहीं अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और मेघदूत, कुमारसंभव, और रघुवंश जैसे महाकाव्यों की रचना की।

कालिदास की शादी कैसे हुई थी?

राजकुमारी विद्योत्तमा को अपनी विद्वत्ता पर बड़ा गर्व था। उसने स्वयंवर की शर्त रखी कि जो उसे शास्त्रार्थ में हराएगा, वही उसका पति बनेगा। इस प्रकार, कालिदास का विवाह विद्योत्तमा से हुआ और वे महाकवि बन गए।

कालिदास क्यों प्रसिद्ध है?

कालिदास न केवल एक महान कवि और नाटककार थे, बल्कि संस्कृत भाषा के विद्वान भी थे। वे भारत के श्रेष्ठ कवियों में से एक थे। उन्होंने सुंदर, सरल और अलंकार युक्त भाषा में रचनाएँ कीं और अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत को नई दिशा देने का प्रयास किया। कालिदास अपने साहित्य में अद्वितीय थे।

कालिदास को ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?

महाकवि कालिदास ने उज्जैन में मां गढ़कालिका की आराधना की, जिससे उन्हें असीम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने मेघदूत और शकुंतलम जैसे महाकाव्यों की रचना की।

कालिदास की प्रेमिका कौन थी?

कालिदास की प्रेमिका के बारे में इतिहास या साहित्य में स्पष्ट जानकारी नहीं है। कालिदास प्राचीन भारत के महान संस्कृत कवि और नाटककार थे, जिनके जीवन से जुड़ी कई बातें मिथकीय और अप्रमाणित मानी जाती हैं।
हालांकि, उनकी रचनाओं जैसे मेघदूत और अभिज्ञानशाकुन्तलम् में प्रेम और भावनाओं का सुंदर चित्रण मिलता है, लेकिन उनकी वास्तविक प्रेमिका का कोई निश्चित नाम या विवरण उपलब्ध नहीं है।

कालिदास के माता-पिता का नाम क्या था?

कालिदास के माता पिता का नाम के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनके जीवन से जुड़ी अधिकांश बातें किंवदंतियों और लोककथाओं पर आधारित हैं।

कालिदास द्वारा लिखित दो नाटकों के नाम बताएं?

कालिदास द्वारा लिखित दो प्रसिद्ध नाटकों के नाम हैं
अभिज्ञान शाकुंतलम्
विक्रमोर्वशीयम्

कालिदास के काव्य में वसंत ऋतु का वर्णन मिलता है?

कालिदास के काव्य में ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत — सभी छह ऋतुओं का सुंदर और भावनात्मक वर्णन मिलता है।
विशेष रूप से वसंत ऋतु का वर्णन सबसे अधिक मिलता है, क्योंकि इस ऋतु को उन्होंने प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति की शोभा का प्रतीक माना है।

हिंदी साहित्य के इतिहास में महाकवि कालिदास का नाम महान साहित्यकारों में लिया जाता है क्योंकि कालिदास अपनी रचनाओं में प्रकृति का सजीव चित्रण करते थे। तीसरी-चौथी शताब्दी के मध्य कालिदास की रचनाओं की तूती हर जगह बोलती थी।

कालिदास ने पौराणिक रचनाओ और दर्शन को आधार मानकर ही अपनी रचनाएं की थी। ‌समग्र राष्ट्र में राष्ट्रीय चेतना का विकास करने में कालिदास का महत्वपूर्ण योगदान था क्योंकि वह अपनी रचनाओं से जनमानस को प्रेरित करते थे।

बहुत से महान साहित्यकार कालिदास को राष्ट्रकवि की संज्ञा देते हैं। महाकवि कालिदास जिन्होंने मेघदूत जैसी महान कृति की रचना की है उनके बारे में जानने के लिए इस लेख को पढ़ें।

महाकवि कालीदास की जीवनी

महाकवि कालिदास की गिनती सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में की जाती है। इनके द्वारा लिखा गया अभिज्ञान शाकुंतलम् इनकी बहुत ही फेमस रचना थी, जिसका ट्रांसलेशन दुनिया की कई भाषाओं में किया गया है।

महाकवि कालिदास के गुणों को देखते हुए राजा विक्रमादित्य ने महाकवि कालिदास को अपने दरबार में नवरत्न में शामिल किया था। महाकवि कालिदास श्रृंगार रस की रचनाओं के लिए जाने जाते थे। यह अपनी रचनाओं में मधुर और सरल भाषा का इस्तेमाल करते थे।

महाकवि कालिदास बचपन में अनपढ़ थे, परंतु जब इनकी पत्नी ने इन्हें ज्ञान प्राप्त करने के लिए घर से निकाल दिया, तब इन्होंने परिश्रम करके ज्ञान अर्जित किया और इस प्रकार कवि कालिदास, महाकवि कालिदास बन गए।

महाकवि कालिदास का व्यक्तिगत परिचय

पूरा नामकालिदास
जन्मपहली से तीसरी शताब्दी ईस पूर्व के बीच
जन्मस्थानविवाद पूर्ण
विवाह (Wife Name)राजकुमारी विद्योत्तमा से।
निधनज्ञात नहीं

महाकवि कालिदास का प्रारंभिक जीवन

ऐसा माना जाता है कि महाकवि कालिदास का जन्म एक से लेकर तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व हुआ था। हालांकि यह एक मान्यता है। इसके बारे में किसी भी व्यक्ति के पास या फिर किसी भी ग्रंथ अथवा किताब में कोई भी ठोस प्रमाण नहीं है।

इसीलिए यह स्पष्ट तौर पर नहीं कह सकते कि महाकवि कालिदास का जन्म कब हुआ था। महाकवि कालिदास के पैदा होने को लेकर अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग मान्यता और विचार हैं। कई विद्वानों का ऐसा मानना है कि महाकवि कालिदास का जन्म 150 ईसा पूर्व से लेकर 450 ईसवी के बीच हुआ होगा।

यह भी एक अनुमान ही है। कई रिसर्च के अनुसार ऐसा माना जाता है कि महाकवि कालिदास गुप्त काल में पैदा हुए होंगे, इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि महाकवि कालिदास ने “मालविकाग्निमित्रम्” नाम के नाटक को अग्नि मित्र के आधार पर लिखा था और 170 ईसा पूर्व में अग्निमित्र ने शासन किया था।

महाकवि कालिदास का उल्लेख ‘हर्षचरितम” नाम के ग्रंथ में छठी शताब्दी में बाणभट्ट ने किया है। इस प्रकार अनुमान के मुताबिक महाकवि कालिदास का जन्म पहली शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ माना जा सकता है।

कालिदास के जन्म स्थान पर भी संदेश

जिस प्रकार किसी भी ग्रंथ या फिर किताब में महाकवि कालिदास के पैदा होने की तिथि के बारे में कोई भी स्पष्ट जानकारी या फिर सूचकांक नहीं मिलता है, उसी प्रकार महाकवि कालिदास कहां पैदा हुए थे, इसके बारे में भी पक्के तौर पर किसी भी ग्रंथ में कोई भी जानकारी नहीं है, ना ही किसी भी किताब में अथवा शिलालेख में इस बात का उल्लेख है कि महाकवि कालिदास कहां पर पैदा हुए थे।

कई इतिहासकारों के अनुसार ऐसा माना जा सकता है कि महाकवि कालिदास का जन्म देश के मध्य प्रदेश राज्य के उज्जैन शहर में हुआ होगा, क्योंकि कालिदास ने अपने खंडकाव्य मेघदूत में उज्जैन शहर का बहुत बार वर्णन किया है।

जिस प्रकार महाकवि कालिदास के पैदा होने की तिथि को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है अथवा असमंजस की स्थिति है, उसी प्रकार महाकवि कालिदास कौन सी जगह पर या फिर किस राज्य में पैदा हुए थे, इसे लेकर भी विद्वानों के बीच काफी ज्यादा कंफ्यूजन है।

कई इतिहासकार ऐसा कहते हैं कि, महाकवि कालिदास का जन्म देश के कविल्ठा गांव में हुआ था, जो कि उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में पड़ता है। इस गांव में महाकवि कालिदास की एक मूर्ति स्थापित की गई है, साथ ही उनके नाम पर एक सभागार भी बनाया गया है।

आपकी इंफॉर्मेशन के लिए यह भी बता दें कि, इस सभागार में जून के महीने में हर साल टोटल 3 दिन की एक साहित्य की मीटिंग भी रखी जाती है, जिसमें पार्टिसिपेट करने के लिए इंडिया के कोने-कोने से लोग आते हैं।

महाकवि कालिदास बहुत ही विद्वान व्यक्ति थे और अपने ज्ञान के बल पर यह हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हो जाते थे। अपने ज्ञान के कारण ही राजा विक्रमादित्य ने महाकवि कालिदास को अपने दरबार में नवरत्न में जगह दी थी।

कई लोक मान्यताओं के अनुसार ऐसा भी कहा जाता है कि, जब महाकवि कालिदास छोटे थे़ तब यह अनपढ़ थे, परंतु आगे चलकर इन्हें शिक्षा में रुचि हुई और उन्होंने साहित्य की शिक्षा हासिल की, जिसके कारण इन्हें हिंदी साहित्य का महान कवि कहा गया।

राजकुमारी विद्योत्मा से महाकवि कालिदास का विवाह

महाकवि कालिदास ने अपनी जीवनसंगिनी के तौर पर राजकुमारी विद्योत्मा को चुना और महाकवि कालिदास ने राजकुमारी विद्योत्मा से शादी की। महाकवि कालिदास की राजकुमारी विद्योत्मा से शादी होने के पीछे भी एक जबरदस्त कहानी है।

उस कहानी के अनुसार एक बार राजकुमारी विद्योत्मा ने यह प्रतिज्ञा ली कि वह ऐसे ही व्यक्ति से शादी करेंगी, जो उनके साथ शास्त्रार्थ पर चर्चा करेगा और शास्त्रार्थ में उन्हें हरा देगा।

इसके बाद कई लोगों ने राजकुमारी विद्योत्मा के चैलेंज को स्वीकार किया और उनके साथ शास्त्रार्थ किया परंतु राजकुमारी विद्योत्मा ने सभी व्यक्तियों को हरा दिया। इसके बाद कुछ लोगों ने छल कपट करके कवि कालिदास से राजकुमारी विद्योत्तमा की शादी करवा दी।

कालिदास जब राजकुमारी विद्योत्मा की धिक्कार के बाद बने महान कवि

राजकुमारी ने जब कालिदास से शादी की तो कुछ समय तो इनकी शादीशुदा जिंदगी ठीक चली, परंतु जब राजकुमारी को यह पता चला कि कवि कालिदास अनपढ़ है और उन्हें शास्त्रार्थ का उतना ज्ञान नहीं है जितना कि उन्हें बताया गया था़।

तब राजकुमारी को काफी ज्यादा दुख पहुंचा और उन्होंने कालिदास को यह कहकर घर से निकाल दिया कि जब तक आप सच्चे पंडित नहीं बन जाते या फिर आपके पास ज्ञान का भंडार नहीं हो जाता तब तक आपको वापस घर की तरफ देखना भी नहीं है ना ही आपको घर आना है।

अपनी पत्नी की यह बातें कालिदास को बहुत ही ज्यादा चुभ गई और उन्होंने मन ही मन शिक्षा प्राप्त करने का निर्णय कर लिया और ज्ञानवान बनने का प्रण किया। इसके बाद वह अपने घर से निकल पड़े और घर से जाने के बाद एक जगह पर महाकवि कालिदास माता काली की सच्चे मन से साधना और प्रार्थना करने लगे।

माता काली की साधना करते करते माता कवि कालिदास पर बहुत ज्यादा खुश हुई और माता काली का आशीर्वाद प्राप्त करने के कारण कवि कालिदास के पास बहुत सारा ज्ञान आ गया और वह साहित्य के विद्वान बन गए।

ज्ञान प्राप्ति के बाद महाकवि कालिदास ने वापस अपने घर जाने की ठानी और अपने घर जाने के लिए यात्रा पर निकल पड़े। घर आने पर जब वह अपने घर के द्वार पर पहुंचे, तब उन्होंने घर के बाहर से ही खड़े होकर अपनी पत्नी को आवाज दी। आवाज सुनते ही राजकुमारी यह समझ गई कि दरवाजे पर जरूर कोई ज्ञानवान व्यक्ति आया है।

इसके बाद वह दरवाजे पर आई और राजकुमारी को जब यह पता चला कि महाकवि कालिदास ज्ञान प्राप्ति करके वापस आए है, तब वह बहुत ही ज्यादा खुश हुई।

इस प्रकार अपनी पत्नी के द्वारा घर से निकाले जाने के बाद और धिक्कारने के बाद महाकवि कालिदास ने ज्ञानवान बनने का अपना सफर तय किया और कालिदास महाकवि कालिदास बन गए।

वर्तमान में महाकवि कालिदास की गिनती दुनिया के सबसे बेस्ट कवियों में की जाती है। इसके अलावा आपको बता दें कि, संस्कृत साहित्य में दूसरा कोई भी कवि कालिदास के जैसा आज तक नहीं हुआ है।

दुनिया के सबसे बेस्ट साहित्यकार कालिदास

इंडिया ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बेस्ट और सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों की गिनती में महाकवि कालिदास का नाम शामिल किया जाता है।महाकवि कालिदास ने महाकाव्य, नाट्य और गीतिकाव्य की फील्ड में अपनी क्रिएटिविटी के कारण अलग पहचान बनाई थी।

महाकवि कालिदास की रचनाएं

महाकवि कालिदास ने अपनी बुद्धि और अपने ज्ञान का इस्तेमाल करके जो रचनाएं की थी, उन्हीं रचनाओं की बदौलत वर्तमान के टाइम में दुनिया के सबसे बेस्ट कवियों की लिस्ट में महाकवि कालिदास का नाम लिया जाता है।

इसके अलावा सर्वश्रेष्ठ नाटककार की लिस्ट में भी महाकवि कालिदास का नाम शामिल है। महाकवि कालिदास ने ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ अपनी रचनाओं में साहित्य के महत्व को भी शामिल किया था। महाकवि कालिदास की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं निम्नानुसार है।

  • रघुवंश
  • कुमारसंभव
  • मेघदूत
  • सेतुकाव्यम्
  • श्रुतबोधम्
  • ऋतुसंहार
  • अभिज्ञान शाकुंतलम्
  • श्यामा दंडकम्
  • ज्योतिर्विद्याभरणम्
  • श्रृंगार रसाशतम्
  • श्रृंगार तिलकम्
  • कर्पूरमंजरी
  • पुष्पबाण विलासम्
  • मालविकाग्निमित्र
  • विक्रमोर्वशीय

महाकवि कालिदास की रचनाओं की महत्वपूर्ण बातें

महाकवि कालिदास जब कोई भी रचना करते थे तो वह अपनी रचनाओं में अधिकतर मधुर, अलंकार युक्त और सिंपल भाषा का इस्तेमाल करते थे।

महाकवि कालिदास अपनी रचना में श्रृंगार रस का भी काफी शिद्दत के साथ वर्णन करते थे। महाकवि कालिदास ने अपनी रचनाओं में मौसम की भी व्याख्या की है। महाकवि कालिदास रचना बनाते समय नैतिक मूल्यो और परंपरा का भी विशेष तौर पर ध्यान रखते थे।

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कवि कालिदास का जीवन परिचय – मूर्ख से बने महा पंडित प्रमुख काव्य, नाटक व साहित्यिक योगदान | Kalidas Biography in Hindi

Kalidas Biography in Hindi संस्कृत साहित्य के आकाश में कालिदास एक ऐसे सूर्य के समान हैं, जिनकी रचनाएँ आज भी ज्ञान, कला और सौंदर्य का प्रकाश फैलाती हैं। माना जाता है कि एक समय वे पूर्णतः अनपढ़ और अज्ञानी थे, जिन्हें लोग “महामूर्ख” कहकर अपमानित करते थे। लेकिन अपनी लगन, साधना और माँ काली की कृपा से वे भारत के सबसे महान विद्वान और कवियों में से एक बन गए।
यह लेख आपको कालिदास के जीवन की रोचक यात्रा से लेकर उनके अद्भुत साहित्यिक योगदान तक की समस्त जानकारी प्रदान करेगा। साथ ही, उनके द्वारा रचित कालजयी ग्रंथों का विश्लेषण भी किया जाएगा, जो आज भी संस्कृत प्रेमियों और विद्वानों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

महामूर्ख से महा पण्डित कवि कालिदास

कालिदास का विस्तृत जीवन परिचय और साहित्यिक योगदान
कालिदास भारतीय साहित्य के एक अमर स्तंभ हैं, जिनकी रचनाएँ न केवल संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, बल्कि विश्व साहित्य में भी उनका विशिष्ट स्थान है।

इसलिए कहा जाता है –

“पुष्पेषु जाति नगरेषु काञ्चि
नदीषु गंगा कवि कालिदास।”

भावार्थ:
जैसे फूलों में जाती पुष्प (मल्लिका) को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, नगरों में कांचीपुरम को श्रेष्ठ माना जाता है, और नदियों में गंगा सर्वोपरि है, उसी प्रकार कवियों में कालिदास की गणना सबसे महान कवि के रूप में होती है।

उनकी कविताएँ और नाटक जीवन के विविध पहलुओं – प्रकृति, प्रेम, भक्ति, राजनीति, और दर्शन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हैं।उनके जीवन के बारे में ऐतिहासिक विवरण बहुत कम उपलब्ध हैं, लेकिन ऐसा माना जाता है कि वे गुप्त वंश के सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (380-415 ई.) के दरबारी कवि थे।

कालिदास का जीवन परिचय

कालिदास के जीवन के ऐतिहासिक तथ्य बहुत सीमित हैं क्योंकि उनके जीवन पर लिखित प्रमाण बहुत कम हैं। उनके जीवन की अधिकांश कथाएँ लोक परंपराओं और किंवदंतियों पर आधारित हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

जन्म स्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान उन्हें उज्जैन (मध्यप्रदेश) से जोड़ते हैं, तो कुछ कश्मीर, कालिंजर (उत्तर प्रदेश) या विदर्भ (महाराष्ट्र) का मानते हैं।
उनकी शिक्षा के बारे में एक प्रसिद्ध किंवदंती है कि वे प्रारंभ में निरक्षर और सरल स्वभाव के थे, लेकिन एक विशेष घटना के बाद माँ सरस्वती की कृपा से अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ।

विद्या प्राप्ति की कथा

एक कथा के अनुसार, कालिदास वाल्यवस्था में वहत वड़ा मूर्ख थे। वो जिस टेहनिय में चढ़ते थे उसी टेहनिय के मूल से काटते थे। उसि समय में एक राजकुमारी जिनके नाम विद्युन्माला है वो बहुत वडी बिद्वानी थे। उनको यो शास्त्र में परास्त करेगा उन्होंने उसको विवाह करेंगे। उसके लिए सारा भारत में से बड़े बड़े विद्वान आके राजकुमारी से शास्त्र आलोचना में हारते थे। इस अपमान को सहन नहीं कर सकते हैं। उसके कारण वे सब मिलकर एक चक्रान्त किए कि वो एक निपट मूर्ख से राजकुमारी के विवाह करवायेंगे।उसि समय में वो सब दिखते हैं कि एक व्यक्ति पेड़ पर चढ़ कर जिस डाल पर बैठा था उसी डाल को तोडरहा था। उसि समय में वे सब स्थिर किये के राजकुमारी को इसि मूर्ख से विवाह करेंगे। उसके लिए वे उसको वुलाकर कहते है कि हम ने तुमको एक राजकुमारी से विवाह करवायेंगे इसके लिए तुम्हें एक सर्त्त मानना पड़ेगा। सर्त्त है कि तुम वात मत करना। कारण –

“तावत् शोभते मूर्ख: यावत् किञ्चित् न भाषते “

अर्थात् – मूर्ख व्यक्ति तब तक ही शोभा पाता है जब तक वह कुछ बोलता नहीं है।”

इसका भाव यह है कि जब कोई अज्ञानी या मूर्ख व्यक्ति चुप रहता है, तब तक लोग उसे बुद्धिमान समझ सकते हैं, परंतु जैसे ही वह बोलता है, उसकी मूर्खता प्रकट हो जाती है। विद्वान लोग के वात को सुनकर उन्होंने अपना सहमति जताई। विद्वान लोग ने उसको राजकुमारी के पास ले गये। सब ने आलोचना के कक्षा में बैठते हैं। विद्वानियोंने पहले ही वताचुके है कि आगन्तुक व्यक्ति उनके गुरु है और वे मौन व्रत के कारण वातचित नहीं करेंगे। सिर्फ इङ्गित से ही आलोचना करेङ्गे। उसके बाद राजकुमारी ने अपनी एक उंगली दिखाई जिसके अर्थ ईश्वर एक है। परन्तु मूर्ख व्यक्ति ने सोचा कि क्या राजकुमारी मेरे एक आंख को फुटाने के लिए वता रहे हैं। मूर्ख व्यक्ति ने अपना दो उंगलियां दिखाया। जिसका अर्थ वो राजकुमारी के दोनों आंखों को फुटादेगी। परन्तु राजकुमारी ने स्वचा कि वे दो ईश्वर नहीं है एसा वोला। इसके बाद राजकुमारी ने अपने विवाह मूर्ख के साथ किया।

“सुहागरात को राजकुमारी ने अपने पति से पूछा कि वे क्या कह रहे हैं। तभी उनके पति ‘उष्ट्र’ शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाए और उन्होंने ‘उट्र’ बोल दिया।
राजकुमारी ने वोला –
“उष्ट्रे लुम्पति रंग वा षं वा तस्मै दत्ता विपुल नितम्बा”

ऊँट के लिए ‘र’ (रं) या ‘ष’ (षं) का क्या महत्व है, जब उसे (अर्थात् उसकी पीठ पर) विशाल कूबड़ (उभरे हुए कंधे) पहले से ही प्राप्त हैं?” राजकुमारी आपने पति एक मूर्ख है यह जानकर उनको धिक्कार दे कर वोले की जिस दिन आप एक विद्वान बनेङ्गे तव आना वरना मत आना। उनको इस वात का वुरा लगा कि आपने पत्नी ने उनको हि गालि दिया। तो वह स्थिर किये की आपने प्राण त्याग कर देंगे। जब उन्होंने अपने जीवन त्याग के पूर्व मा सरस्वती को स्मरण करते हुए जीवन त्याग कर रहथे तभि मा सरस्वती उनको वोले की तुम्हारे ७ जन्मोतक विद्या नहीं है, परन्तु में तुम्हारा भक्ति में प्रसन्नता हुई और तुम्हें आशीर्वाद दिया कि तुम नदी में ७ वार डुवकी लगाकर जब उठेगे तव तुम एक विद्वान वन सकोगे पर याद रखना सभि स्थान में तुम जियोंगे पर कभी विद्यानगरी मत याना। उसके बाद कालिदास ने डुवकि लगा कर उठे और सरस्वती के प्रशंसा करते हुए उनके शिरसे आरम्भ किया उसमें देवी क्रोधित होकर वोले की एक व्यक्ति के प्रशंसा उनके शिरसे नहीं वल्कि पैरों से करायाता है, ओर वो अभिशाप दिये की तुम्हारे मूत्यु एक नारी के कारण होगी। उसके बाद कालिदास अपने घर लौट आए और वाहर रहकर संस्कृत में वोले की –

“अनावृत कपाटं द्वारं देहि “
“अवरोध रहित (खुला हुआ) द्वार दो।” या “खुला हुआ द्वार प्रदान करो।”
उनके पत्नी ने पुच्छा –“अस्ति कश्चित् वाग् विशेष:”
क्या कोई विशेष वाणी (भाषण/कथन) है?
उसके बाद कालिदास ने “अस्ति ” से “कुमार सम्भव” “कश्चित्” से “मेघदूत” “वाग् ” से”रघुवंशम्” “विशेष” से “रुतुसंहार”।

कुमार सम्भव –

“आस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥” (कुमारसम्भवः 1.1)

अर्थ–उत्तर दिशा में देवताओं के समान पवित्र आत्मा वाला हिमालय नामक पर्वतराज स्थित है, जो पूर्व और पश्चिम के दोनों समुद्रों में अपनी सीमा फैलाए हुए है और मानो पृथ्वी के लिए एक मानदंड (सीमा रेखा) के समान खड़ा है।”

मेघदूतम् –

कश्चित् कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः
शापेनास्तंगमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।
यक्षश्चक्रे जनकतनया स्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु॥ (मेघदूतम् – 1)

अर्थ–”कोई एक यक्ष, जो अपनी प्रिय पत्नी के विरह से अत्यंत व्याकुल होकर अपने स्वामी (कुबेर) के अधिकार क्षेत्र से विमुख हो गया था, शापवश अपनी महिमा खो बैठा। उसने वर्षभर के दंड काल में रामगिरि पर्वत के आश्रमों में, जो पवित्र स्नान जलों से युक्त और घने छायादार वृक्षों से आच्छादित थे, निवास किया।”

रघुवंशम्–

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ (रघुवंशम् 1.1)

अर्थ–जैसे शब्द और अर्थ अभिन्न होते हैं, वैसे ही मैं वाणी और अर्थ की यथार्थ सिद्धि के लिए संसार के माता-पिता माता पार्वती और भगवान शिव की वंदना करता हूँ।

रुतुसंहार –

विशेष सूर्य स्पृरणिय चन्द्रमा सदावगाहक्षतवारिसंचय:।
दिनान्त रम्योभ्युपशान्तमन्मथो निदाघकालेयामुपागत: प्रिये।

अर्थ–”हे प्रिये!

सच-सच बतलाना। 

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

  • अभिज्ञान शाकुंतलम, कालिदास का सबसे प्रसिद्द नाटक है। हालाँकि इस उनके इस नाटक की कहानी मौलिक न होकर महाभारत से लिए गए है लेकिन उन्होंने जिस तरह से अपनी कल्पना शक्ति और प्रतिभा से इस नाटक को लिखा है, वो मंत्र-मुग्ध करता है। 
  • अभिज्ञान शाकुंतलम में भगवान राम के पूर्वज और रघुकुल के प्रतापी राजा, दुष्यंत और ऋषि विश्वामित्र की बेटी है। इन्हीं दुष्यंत और शकुंतला की संतान का नाम भरत था, जो अपने बचपन में ही शेर के दाँत की गिनती लगा लिया करते थे और इन्ही के नाम पर इस देश का नाम भारत रखा गया। 
  • अभिज्ञान शाकुंतलम दरअसल एक राजा और ऋषि पुत्री के प्रेम, मिलन, विरह और पुनर्मिलन की कहानी है। इस नाटक में कालिदास ने श्रृंगार के दोनों रूप, मिलन और विरह को जिस तरह से प्रस्तुत किया है, वो अद्भुत है। 

लघु कृतियाँ

  • कालिदास ने प्रमुख रचनाओं के साथ-साथ कुछ खंडकाव्य भी लिखे। खंडकाव्य छोटी कविताएँ होती हैं। उन्होंने ऋतुसंहार पर एक खंडकाव्य लिखा जिसमें छह ऋतुओं का वर्णन है।
  • कालिदास कवि की एक और उल्लेखनीय कृति मेघदूत है जो एक खंडकाव्य भी है।
  • प्राचीन काल के सबसे लोकप्रिय नाटक कालिदास द्वारा लिखे गए नाटक हैं। 

कालिदास का जीवन परिचय: कालिदास की अमरता

कालिदास अपनी उत्कृष्ट रचनाओं, ज्ञान, प्रतिभा और अपनी सरल भाषा के लिए विश्व-साहित्य में आज भी अमर है और रहेंगे। उनकी रचनाओं में उन्होंने जिस तरह से इंसान के जीवन के अलग-अलग भावों का वर्णन करते हैं, उसकी वजह से वे अपने पाठक को अपनी रचनाओं से बहुत जल्दी कनेक्ट करते हैं। आज दुनिया की अलग-अलग भाषाओं में उनके नाटक और महाकाव्यों का ट्रांसलेशन हो चुका है और वे दुनिया भर में आज भी प्रासंगिक है। 

कालिदास के साहित्यिक योगदान का सारांश

कालिदास का भारतीय और विश्व साहित्य में योगदान का अंदाज़ा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संस्कृत अब आम बोलचाल की भाषा नहीं होने के बाद भी कालिदास की रचनाएं आज भी दुनिया भर की यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ाई जाती है। उनकी रचनाओं में श्रृंगार रस की प्रधानता होने के बाद भी भारतीय दर्शन और स्प्रिचुएलिटी की झलक दिखाई देती है। कालिदास की रचनाओं की लोकप्रियता और पॉपुलैरिटी का अंदाज़ा सिर्फ़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2500 साल बाद आज भी दुनिया भर के कवि उनसे इंस्पीरेशन लेकर राइटिंग करते हैं। 

कालिदास की रचनाओं का अद्वितीय महत्व

कालिदास की रचनाएं में संयोग और विरह, ये दो गुण ज्यादा देखने को मिलते हैं और हर एक इंसान की लाइफ में यही दो बातें ज़्यादातर रिपीट होती है। इसलिए हर एक इंसान कालिदास की राइटिंग से अपने आप को बहुत जल्दी कनेक्ट कर पाता है और इसीलिए उनका साहित्य आज भी रेलेवेंट है। उनकी सरल भाषा, उपमाएँ, मिलन और विरह का अद्भुत वर्णन, प्रकृति वर्णन, भारतीय दर्शन और उनकी प्रतिभा, ये कुछ ऐसे कारण है जो उनके साहित्य को अमर कर देते हैं। 

कालिदास जी के बारे में रोचक तथ्य क्या हैं ?

जब मां सरस्वती ने तोड़ा कालिदास का घमंड

महाकवि कालिदास के कंठ में मानो स्वयं मां सरस्वती का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें पराजित करना किसी के बस की बात नहीं थी। अपार यश, सम्मान और प्रतिष्ठा पाकर धीरे-धीरे उनके मन में अपनी विद्वत्ता का घमंड घर करने लगा। उन्हें लगा कि अब उन्होंने संसार का सारा ज्ञान अर्जित कर लिया है और उनसे बड़ा ज्ञानी कोई दूसरा नहीं।

एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण आया। विक्रमादित्य से अनुमति लेकर वे घोड़े पर सवार होकर रवाना हुए। गर्मी के मौसम में तेज धूप और लंबी यात्रा के कारण उन्हें प्यास लग गई। रास्ते में एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की उम्मीद में वे वहां पहुंचे। झोपड़ी के सामने एक कुआं था और उसी समय एक छोटी बालिका मटका लेकर पानी भरने आई।

कालिदास ने विनम्रता से कहा – “बालिके, मुझे बहुत प्यास लगी है, कृपया पानी पिला दो।”
बालिका ने पूछा – “आप कौन हैं?”
कालिदास को यह प्रश्न अटपटा लगा, लेकिन प्यास से व्याकुल होकर बोले – “तुम मुझे नहीं जानती, कोई बड़ा हो तो बुला दो, वह मुझे अवश्य पहचान लेगा। मेरा नाम और सम्मान दूर-दूर तक फैला है।”

बालिका ने शांत स्वर में कहा – “आप असत्य बोल रहे हैं। संसार में केवल दो ही सबसे बलवान हैं – अन्न और जल। भूख और प्यास इतनी शक्तिशाली हैं कि बड़े से बड़े व्यक्ति को भी झुका देती हैं। देखिए, प्यास ने आपकी कैसी दशा कर दी है।” कालिदास निरुत्तर हो गए।

उसने फिर पूछा – “आप कौन हैं?”
कालिदास ने उत्तर दिया – “मैं बटोही हूं।”
बालिका मुस्कुराई – “सच्चे बटोही तो दो ही हैं – चंद्रमा और सूर्य, जो बिना थके चलते रहते हैं। आप थक चुके हैं, इसलिए आप बटोही नहीं हो सकते।” यह कहकर वह झोपड़ी में चली गई।

कुछ देर बाद झोपड़ी से एक वृद्धा बाहर आई और कुएं से पानी भरने लगी। कालिदास ने निवेदन किया – “माते, कृपया पानी पिला दीजिए।”
वृद्धा बोली – “तुम मेहमान कैसे हो सकते हो?

तुम कब तक सोये थे? 

रोया यक्ष या तुम रोये थे?

कालिदास! कुमारसंभवम्:

यह महाकाव्य शिव और पार्वती के विवाह तथा उनके पुत्र कुमार (कार्तिकेय) के जन्म पर आधारित है।
इसमें प्रकृति का अद्भुत चित्रण और शिव-पार्वती के तप एवं प्रेम का मार्मिक वर्णन मिलता है।
प्रारंभिक आठ सर्गों में सुंदरता और श्रृंगार का वर्णन है, जबकि अंतिम सर्गों में वीर रस प्रमुख है।

2.

विक्रमोर्वशीयम्

यह नाटक राजा पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी के प्रेम को दर्शाता है।
नाटक में मानव प्रेम और दिव्य प्रेम का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

3. अभिज्ञानशाकुन्तलम्

महर्षि कण्व की पुत्री शकुंतला और राजा दुष्यंत की प्रेम कथा पर आधारित यह नाटक कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना है।
इसका विशेष आकर्षण प्रकृति चित्रण, नायिका की मनोवृत्ति, और श्रृंगार रस है।
यह नाटक इतना प्रभावशाली था कि प्रसिद्ध जर्मन कवि गोएथे ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

2.

अतएव यज्ञों का अनुष्ठान सर्वदा श्रेयस्कर है; परन्तु उसके हिंसापरक होने पर भी याज्ञिक ब्राह्मणों का हृदय कोमल होता है-

सहजं किल यद् विनिन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयकम् । 

पशुमारण-कर्मदारूण: अनुकम्पामृदुरेव श्रोत्रियः ॥

  • यहाँ कवि ने बौद्ध धर्म के कारण यज्ञों के विषय में होने वाली निन्दा या अश्रद्धा को दूर करने का उद्योग किया है। अतः कालिदास का जन्म उस समय में हुआ था, जब बौद्ध धर्म के प्रति अश्रद्धा बढ़ती जा रही थी तथा ब्राह्मण धर्म का अभ्युदय हो रहा था। यह समय ब्राह्मणवंशी शुंगनरेशो (द्वितीय शतक विक्रम पूर्व) के कुछ ही पीछे होना चाहिये । 
  • अत: विक्रम संवत् के प्रथम शतक में कालिदास को मानना सर्वथा न्यायसंगत प्रतीत होता है। 

(घ) कालिदास को प्रथम शताब्दी में रखने के लिए अन्य भी प्रमाण उपस्थित किये जा सकते हैं-

(1) कालिदास ने रघुवंश के षष्ठ सर्ग (श्लोक 36 ) में 'अवन्तिनाथ' का वर्णन करते समय 'विक्रमादित्य' विरूद का संकेत किया है। कथासरित्सागर के अनुसार विक्रमादित्य मालवगण के संस्थापक, काव्यकला के प्रेमी, शैव थे। कालिदास के ग्रन्थों से भी उनके शैव होने का संकेत मिलता है। फलतः उनके विक्रमादित्य के सभापण्डितहोने की अधिक सम्भावना है, न कि वैष्णव मतावलम्बी परमभागवत गुप्तनरेशों की सभा में ।

(2) रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर के प्रसड़ग में पांडय नरेश का वर्णन किया गया है (श्लोक 59-64)। चतुर्थ शती में पाण्डवों का राज्य समाप्त हो गया था, परन्तु प्रथम शती में उनका राज्य विद्यमान था । कालिदास ने पाण्डव नरेश की 'उरगपुर राजधानी बतलाया है, जो 'उरियाउर' का संस्कृत नाम है। पाण्डव नरेशों की यही राजधानी थी।

कालिदास का जीवन परिचय | Kalidas Biography in Hindi

Kalidas

कालिदास का जीवन परिचय | Kalidas Ji ka Jivan Parichay

संस्कृत के महान कवि कालिदास का जीवन परिचय (Kalidas ka jivan parichay) में उनकी प्रतिभा और प्रसिद्धि के बारे में हम जितना लिखेंगे और आप जितना पड़ेंगे, उतना ही कम रहेगा क्योंकि उनका नाम और उनकी प्रसिद्धि भी उनकी रचना “अभिज्ञान शाकुंतलम” की तरह ही विश्व-प्रसिद्द है। लेकिन बाद में अपनी विद्वान पत्नी के अपमान की वजह और माँ काली के आशीर्वाद से संस्कृत का ज्ञान लिया और ऐसा साहित्य लिखा कि आज उनका नाम दुनिया के सबसे श्रेष्ट कवियों में शुमार किया जाता है। 

इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि किस तरह कालिदास एक मुर्ख इंसान से संस्कृत के सबसे प्रसिद्ध कवि बनते हैं और उनके विश्व-प्रसिद्ध साहित्य लिखते हैं। साथ ही हम उनके प्रसिद्ध साहित्य के साथ ही साथ कालिदास कौन थे इस बात को भी समझने की कोशिश करेंगे। 

विषयविवरण
पूरा नाममहाकवि कालिदास
कालिदास काजन्म और स्थानअनिश्चित; संभवतः 150 ईसा पूर्व से 450 ईसवी के बीच
माता-पिताअज्ञात
पत्नीराजकुमारी विद्योत्तमा
पेशाकवि, नाटककार, संस्कृत विद्वान
कालिदास की रचनाएंऋतूसंहारम्, कुमारसंभवम्, रघुवंशम्, मालविका-अग्निमित्रम्, अभिज्ञान शाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्
सांस्कृतिक प्रभावभारतीय जीवन, दर्शन और पौराणिक कथाओं का चित्रण
भाषासंस्कृत
विशेषताएँसुंदर और सरल भाषा, अनोखे रूपक, और प्रकृति का वर्णन
मृत्युअनिश्चित

कालिदास का प्रारंभिक जीवन | Mahakavi kalidas jivan parichay

कालिदास संस्कृत साहित्य के महान कवि और नाटककार थे। उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, पर माना जाता है कि उनका जन्म चौथी-पाँचवीं शताब्दी में उज्जैन के आसपास हुआ। उनके माता-पिता और परिवार के बारे में निश्चित तथ्य नहीं मिलते। लोककथाओं के अनुसार वे आरंभ में अशिक्षित और सरल स्वभाव के थे, लेकिन विद्या की देवी सरस्वती की कृपा और स्वाध्याय से वे महान साहित्यकार बने।

कालिदास कौन थे? | Kalidas Kaun The

कालिदास प्राचीन भारत के महान संस्कृत कवि और नाटककार थे। उन्हें संस्कृत साहित्य का शेक्सपियर कहा जाता है। वे गुप्त काल (चौथी से पाँचवीं शताब्दी ईस्वी) के समय के माने जाते हैं, जो भारतीय संस्कृति और कला का स्वर्ण युग माना जाता है।

कालिदास ने अपने लेखन में प्रकृति, प्रेम और मानव भावनाओं का सुंदर चित्रण किया है। उनकी रचनाएँ भाषा, भाव, और सौंदर्य की दृष्टि से अद्वितीय हैं।

कालिदास की प्रमुख रचनाएँ:

  1. काव्य:
    • मेघदूत
    • रघुवंशम्
    • कुमारसंभवम्
  2. नाटक:
    • अभिज्ञान शाकुंतलम्
    • विक्रमोर्वशीयम्
    • मालविकाग्निमित्रम्

कालिदास का जन्म और मृत्यु | Kalidas ka janm kab hua tha

संस्कृत के इस महान कवि कालिदास का जन्म और मृत्यु कहाँ और कब हुआ था, इस बात को निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके जन्म स्थान और समय को लेकर इतिहास में  एक तय जानकारी नहीं है। कालिदास के जन्म स्थान और समय को लेकर इतिहासकार और साहित्यकार कभी भी एकमत नहीं हुए है क्योंकि कालिदास ने शुंग शासक अग्निमित्र को नायक बनाकर मालविकाग्निमित्रम् नाटक लिखा और अग्निमित्र ने 170 ईसापू्र्व में शासन किया था, इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि कालिदास इससे पहले नहीं हुए होंगे। 

कुछ जानकारों का मानना है कि कालिदास, अवन्ति (उज्जैन) में पैदा हुए थे, वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि कालिदास का जन्म उत्तराखंड में हुआ था और इसी वजह से उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के कविल्का गांव में कालिदास की एक स्टैच्यू लगाई गई है। तो वहीं कुछ लोग कालिदास का जन्म भारत के दक्षिण में बताते है।कालिदास के जन्म और मृत्यु का ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया है, कुछ पुस्तकों में कहा गया है कि वह कश्मीर में रहते थे और फिर दक्षिण की ओर चले गए।  

प्रचलित कहानियों और लिखित जानकारी के अनुसार उनके बारे में कहा जाता है कि वे देखने में बहुत सुन्दर थे लेकिन इतने ही मुर्ख भी हुआ करते थे। उनके बारे में एक कहानी बहुत मशहूर है कि वे पेड़ की जिस डाली पर बैठे थे, उसी को कुल्हाड़ी से काट रहे थे। इसी तरह 6th ईसवी में संस्कृत के एक और कवि बाणभट्ट ने अपनी रचना हर्षचरितम् में कालिदास का ज़िक्र  किया है इसलिए माना जाता है कि उनका जन्म पहली शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईसवी के बीच में हुआ होगा। लेकिन उनके माता-पिता और परिवार के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं मिलती हैं। 

कालिदास का जीवन परिचय: शिक्षा | Kalidas kaun the

कालिदास का जीवन परिचय(mahakavi Kalidas ka jivan parichay) की यह जानकारी हमें चौंका देती है कि उन्होंने अपनी बचपन में किसी तरह की कोई भी शिक्षा नहीं ली थी।  

कालिदास और विद्योत्तमा की कहानी | Kalidas Ji ka Jivan Parichay

कालिदास पहले एक गंवार और अशिक्षित चरवाहे थे। एक बार एक राजकुमारी (कहीं-कहीं उन्हें ‘विद्योत्तमा’ कहा गया है।) ने यह शर्त रखी कि वह केवल उसी पुरुष से विवाह करेगी जो ज्ञान में उससे श्रेष्ठ हो। कुछ पंडितों ने बदला लेने के लिए मूर्ख कालिदास को सजाकर राजकुमारी से विवाह करवा दिया।

उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उस राजकुमारी से शादी का लालच देकर नीचे उतारा और कहा- “राजकुमारी के सामने चुप रहना और जो हम कहेंगे बस वही करना”। उन लोगों ने राजकुमारी के सामने पहुंचकर कहाँ कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है लेकिन उन्होंने अभी मौनव्रत लिया हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम आपको उसका उत्तर देंगे। शास्त्रार्थ प्रारम्भ  हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे।

विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में कैसे जीते कालिदास?

विद्योत्तमा ने संकेत से एक उंगली दिखाई कि ब्रह्म एक है लेकिन कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है और ग़ुस्से में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत इस भाव से किया कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों आंखें फोड़ दूंगा। लेकिन विद्वानों ने उनके संकेत को कुछ इस तरह समझाया कि आप कह रही हैं कि ब्रह्म एक है लेकिन हमारे गुरु कहना चाह रहे हैं कि उस एक ब्रह्म को सिद्ध करने के लिए दूसरे (जगत्) की सहायता लेनी होती है। अकेला ब्रह्म स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकता। 

राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। विद्वानों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग है पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि लेकिन ये सभी तत्व अलग-अलग होकर कोई काम नहीं कर सकते और आपस में मिलकर एक होकर मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। 

इस प्रकार विद्योत्तमा अपनी हार स्वीकार कर लेती है। फिर शर्त के अनुसार कालिदास और विद्योत्तमा का विवाह होता है। विवाह के बाद कालिदास विद्योत्तमा को लेकर अपनी कुटिया में आ जाते हैं लेकिन रात को ऊंट की आवाज़  सुनाई देती है। विद्योत्तमा संस्कृत में पूछती है “किमेतत्” लेकिन कालिदास संस्कृत जानते नहीं थे, इसीलिए उनके मुंह से निकल गया “ऊट्र“। उस समय विद्योत्तमा को पता चल जाता है कि कालिदास अनपढ़ हैं। उसने कालिदास को धिक्कारा और यह कह कर घर से निकाल दिया कि सच्चे विद्वान् बने बिना घर वापिस नहीं आना। 

इसके बाद कालिदास घर से निकल जाते है और सच्चे मन से काली देवी की आराधना करने लगते है। उनके आशीर्वाद से वे ज्ञानी और धनवान बन गए। वो विद्या अर्जित करने के लिए एक लंबी यात्रा पर निकल गए.

खंडकाव्य:

1. रघुवंशम्:

यह महाकाव्य सूर्य वंश के महान राजा रघु और उनके वंशजों की गाथा है।
इसमें राजा दिलीप, रघु, अजातशत्रु, दशरथ, और श्रीराम के चरित्रों का वर्णन मिलता है।
काव्य में राजधर्म, पितृभक्ति और राजनीति के सिद्धांत का सुंदर समन्वय है।

2.

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कालिदास का जीवन परिचय | Kalidas Biography in Hindi


  • महाकवि कालिदास संस्कृत साहित्य के कविकुलगुरू के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ये नाटक महाकाव्य तथा ज्योतिष परम्परा में भी निष्णात माने गयें है। इन्होंने कुल सात ग्रन्थों की रचना की है,जिनमें तीन महाकाव्य, तीन नाटक और एक ऋतुसंहार नाम का ग्रन्थ रचा था। इसके अतिरिक्त ज्योतिष शास्त्र से सम्बन्धित ज्योतिविदाभरणम् नाम का इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इन रचनाओं में जो वैशिष्ट्य है उसी के कारण वर्तमान में भी कालिदास की उतनी ही प्रतिष्ठा है जितनी पूर्व में थी ।

  • इस आर्टिकल में कालिदास रचित ग्रन्थों के संक्षिप्त वर्णन के आधार पर उनकी नाटकीय तथा अन्य साहित्यिक समस्त शैलियों, वर्णन प्रकारों का समुचित प्रयोजन बता सकेंगे। साथ ही यह भी समझा सकेंगे कि मूल रूप से कालिदास किस रीति के समर्थक कवि थे। 

कालिदास का जीवन परिचय  (Kalidas Biography in Hindi)

  • कालिदास भारतीय तथा पश्चात्य दृष्टियों में संस्कृत के सर्वमान्य कवि माने जाते हैं। नाट्यकला की सुन्दरता निरखिये, काव्य की वर्णनछटा देखिये, गीतिकाव्य के सरस हृदयोद्गारों को पढिये, कालिदास की प्रतिभा सर्वातिशायिनी है। उनके काव्यों की जितनी ख्याति निश्चित है, उनकी जीवनी तथा काल-निरूपण उतना ही अनिश्चित है। कालिदास की जन्मभूमि के विषय में बंगाल तथा कश्मीर के नाम लिये जाते है परन्तु यह अभी तक अनिर्णीत ही है । 
  • कवि ने उज्जयिनी के लिए विशेष पक्षपात दिखलाया है, जिससे यही इनकी जन्मभूमि प्रतीत होती है । मेघदूत (1/29) में यक्ष रास्ता टेढा होने पर भी 'श्रीविशाला' विशाला (उज्जयिनी) को देखने के लिये मेघ से आग्रह करता है। उज्जयिनी के विशाल महलों और रमणियों के कुटिल-कटाक्षों को देखने से यदि वह वन्चित रह गया तो उसका जीवन ही निष्फल है। 
  • कालिदास ने अवन्ती प्रदेश की भौगोलिक स्थिति का सूक्ष्म वर्णन मेघदूत में किया है वहाँ की छोटी-छोटी नदियों का भी नाम निर्देश किया है तथा वर्णन दिया है। उज्जयिनी के प्रति उनके विशेष पक्षपात तथा सूक्ष्म भौगोलिक परिचय के आधार पर यही कहा जा सकता है कि कालिदास वहीं के रहने वाले थे।

  • कालिदास नि:सन्देह शैव थे। मेरी दृष्टि में वे उज्जयिनी के विख्यात ज्योतिर्लिङ्ग ‘महाकाल' के उपासक थे। मेघदूत में महाकाल की उपासना के प्रति उनका आग्रह इसका आधार माना जा सकता है। महाकाल की शोभा का वर्णन कर यक्ष मेघ से कहता है कि उज्जयिनी में तुम किसी समय चहुँचों, परन्तु सूर्य के अस्त होने तक तुम्हें वहाँ ठहराना होगा। प्रदोष-पूजा के अवसर पर तुम अपना स्निग्ध गम्भीर घोष करना जो महाकाल की पूजा में नगाड़े का काम  तुम्हें अशेष पुण्यों का भाजन बना देगा (मेघ) श्लोक 35 ) । इतना ही नहीं, कालिदास मन्दिर में पूजार्थ नियत की गई देवदासियों से परिचय रखते हैं। यह प्रथा दक्षिण के मन्दिरों में आज भी प्रचलित है, यद्यपि उत्तर भारत के मन्दिरों में यह विशेष रूप से नहीं दीख पड़ती। उज्जयिनी उदयन तथा वासवदत्ता के उदात्त प्रेम की क्रीडास्थली थी। फलतः कालिदास ने इस कथा से सम्बद्ध छोटी-छोटी घटनाओं तथा उनके नियत स्थानों का भी उल्लेख कर नगरी के प्रति पूर्ण पक्षपातप्रदर्शित क्रिया है, जो उसे कवि की जन्मभूमि होने का गौरव प्रदान करने में सचेष्ट है।

राजा विक्रमादित्य के नव-रत्नों के मुखिया 

  • भारतीय जन-श्रुति के आधार पर कालिदास राजा विक्रमादित्य के नव-रत्नों के मुखिया थे । कालिदास के ग्रन्थों से भी विक्रम के साथ रहने की बात सूचित होती है। विश्वविख्यात शकुन्तला का अभिनय किसी राजा की सम्भवतः विक्रम कि - ‘अभिरूपभुयिष्ठा’ परिषद् में ही हुआ था। 
  • 'विक्रमोर्वशीय' में पुरूरवा के नामक होने पर भी विक्रम का नामोल्लेख नाटक के नाम में है तथा 'अनुत्सेकः खलु विक्रमालड्कार' आदि वाक्य इस सिद्धान्त की पुष्टिकर रहे है कि कालिदास का विक्रम से सम्बन्ध अवश्य था। 
  • 'रामचरित' महाकाव्य के 'ख्यातिकामपि कालिदासकवयो नीताः शकारतिना' आदि पद्यो से भी इसी सम्बन्ध की पुष्टि हो रही है। अतः एव जब तक इसके विरूद्ध कोई प्रमाण न मिले , तब तक यह मानना अनुचित नहीं होगा कि कालिदास राजा विक्रम की सभा के रत्न थे । 
  • कालिदास ने शुगवंशीय राजा अग्निमित्र को अपने 'मालविकाग्निमित्र' नाटक का नायक बनाया है। अतः वे उसके (विक्रम-पूर्व द्वितीय शतक के) अनन्तर होगे। इधर सप्तम् शताब्दी में हर्षवर्धन के सभा कवि बाणभट्ट ने हर्षचरित में कालिदास की कविता की प्रशस्त प्रशंसाकी है। अतः कवि का समय विक्रमपूर्व द्वितीय शतक से लेकर विक्रम की सप्तम् शतक के बीच में कहीं होना चाहिए ।

कालिदास के समय विषय में प्रधानतया तीन मत है -

  • पहला मत कालिदास को षष्ठ शतक का बतलाता है। 
  • दूसरा मत गुप्तकाल में कालिदास की स्थिति मानता है । 
  • तीसरा मत- विक्रम सं0 के आरम्भ में इनका समय बतलाता है। 

षष्ठशतक में कालिदास 

  • भारतीय इतिहास में विक्रम उपाधि वाले चार राजाओं का उल्लेख पाया जाता है, जिनके समसामयिक होने से कालिदास का भी समय भिन्न-भिन्न सदियों में माना गया है। डॉक्टर हार्नली का मत है कि यशोधर्मन् ने, जिसने कहरूर की लड़ाई में हूणवंश के प्रतापी राजा मिहिरकुल को बालादित्य नरसिंह गुप्त की सहायता से परास्त किया था, 'विक्रमादित्य' की उपाधि भी ग्रहण की थी। अपनी इस महत्वपूर्ण विजय के उपलक्ष्य में उसने नवीन संवत् चलाया, जो विक्रम के नाम से व्यवहृत हुआ, परन्तु इसे 600 वर्ष पूर्व, अर्थात् 58 ईस्वी की विजय घटना की यादगार में उसने अपने नवीन संवत् के 600 वर्ष अर्थात् 58 ईस्वी पूर्व से स्थापित होने की बात प्रचारित की विक्रम संवत् की यह नवीन कल्पना डॉक्टर फर्गुसन ने की थी । हार्नली ने इसका उपयोग कालिदास के समय-निरूपण के लिए किया। उसने दिखलाया है कि रघु का दिग्विजय यशोधर्मन् की राज्यसीमा से बिल्कुल मिलता-जुलता है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ' ने अनेक कौतुकपूर्ण प्रमाणों से सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि कालिदास भारवि के अनन्तर छठी सदी में विद्यमान थे।

इस मत का खण्डन - 

  • परन्तु कालिदास को इतना पीछे मानना उचित नहीं प्रतीत होता है । हूणों को पराजित करने पर भी यशोधर्मन् ‘शकाराति' - शकों का शत्रु नहीं कहा जा सकता। न उसके शिलालेखों से नवीन संवत् के स्थापना की घटना सच्ची प्रतीत होती है। विक्रम संवत् की स्थापना छठी सदी में यशोधर्मन् के द्वारा मानना ज्ञात इतिहास पर घोर अत्याचार करना है; क्योंकि 'मालव संवत के नाम से यह संवत् अति प्राचीन काल में भी प्रसिद्ध था । 473 ई0 के कुमारगुप्त की प्रशस्ति के कर्ता वत्सभट्टि कि रचना में ऋतुसंहार के कितने ही पद्यों की झलक दीख पड़ती है। ऐसी दशा में कालिदास को पाँचवीं सदी के अनन्तर मानना अनुचित है। अत: इस मत को प्रामाणिक मानकर कितने ही भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने गुप्त नरेशों के उन्नत समय में कालिदास की स्थिति बतलाई है।

गुप्तकाल में कालिदास 

  • गुप्तकाल में कालिदास की स्थिति माननेवाले विद्वानों में भी कुछ – कुछ भेद दीख पड़ता है। पूना के प्रोफेसर के0बी0 पाठक की सम्मति में कालिदास स्कन्दगुप्त 'विक्रमादित्य' के समकालीन थे, परन्तु डॉक्टर रामकृष्ण भण्डारक, साहित्याचार्य पं0 रामावतार शर्मा तथा अधिकांश पश्चिमीविद्वान् गुप्तों में सबसे अधिक प्रभावशाली चन्द्रगुप्त द्वितीय को कालिदासका आश्रयदाता मानते हैं। 

(क) पाठक ने काश्मीरी टीकाकार वल्लभदेव के निम्नलिखित श्लोक के पाठ को प्रामाणिक मानकर पूर्वोक्त सिद्धान्त निश्चित किया (रघु0 4/67) 

विनीताध्वश्रमास्तस्य सिन्धुतीरविचेश्टनैः । 

दुधुवुर्वाजिनः स्कन्थॉल्लग्नकुड्कमकेसनान्।।

  • इस पद्य के 'सिन्धु' शब्द के स्थान पर वल्लभदेव ने 'वंक्षू पाठ माना है। 'वंक्षू' शब्द पाठक की सम्मति में OXUS (आक्सस) शब्द का संस्कृतीकरण है। अतः इस पाठ को प्रामाणिक मानने से यह कहना पड़ता है कि रघु ने हूंणो को आक्सस नदी (जो पामीर निकलकर अरब सागर में गिरती है) के किनारे उनके भारत आगमन के पहले ही हराया था। यह घटना 455 ई0 के पूर्व की हो सकती है; क्योंकि उस वर्ष स्कन्दगुप्त के प्रबल प्रताप के सामने हार मान भग्न-मनोरथ होकर हूंणों को लौटना पड़ा था। अतः रघुवंश को कालिदास की प्रथम रचना मानकर पाठक ने उन्हें स्कन्दगुप्त का समकालीन माना है विजयचन्द्र मजुमदार ने कुछ अन्य प्रमाण देकर इन्हें कुमारगुप्त तथा स्कन्दगुप्त दोनों के समय में माना है।

(ख) पश्चिमी विद्वान् शकों को भारत से निकाल बाहर करने वाले, विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले, चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्यकाल में (जब भारत में चारों ओर शान्ति विराजमान थी और जो भारतीय कलाकौशल के पुनरून्नति का काल माना जाता है) कालिदास को मानते हैं। 

  • रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में वर्णित रघु का दिग्विजय समुद्रगुप्त की विजय से सर्वथा मिलता-जुलता है। रघुवंश में वर्णित शान्ति का समुचित काल चन्द्रगुप्त का ही समय था। इसके सिवाय इन्दुमती – स्वयंवर में उपस्थित मगध राजा के लिए जो उपमा या विशेषण प्रयुक्त किये गये है उनसे भी 'चन्द्रगुप्त' नाम की ध्वनि निकलती है, परन्तु गुप्तकाल में कालिदास की स्थिति बताना ठीक नहीं, क्योंकि चन्द्रगुप्त द्वितीय ही प्रथम विक्रमादित्य नहीं थे। जब इनसे भी प्राचीन मालवा में राज्य करने वाले विक्रम का पता इतिहास से चलता है, तब कालिदास गुप्तकाल में कैसे माने जा सकते है ?

प्रथम शती में कालिदास- 

(क) ऐतिहासिक खोज से ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में शकों को परास्त करने वाले, विद्वानों को विपुल दान देने वाले उज्जयिनी- नरेश राजा विक्रमादित्य के अस्तित्व का पता चलता है। 

  • राजा हाल की 'गाथासप्तशती में (रचनाकाल प्रथम शताब्दी) 'विक्रमादित्य' नामक एक प्रतापी तथा उदार शासक का निर्देश है, जिसने शत्रुओं पर विजय पाने के उपलक्ष्य में भृत्यों को लाखों का उपहार दिया था। 
  • जैन ग्रन्थों से में इस बात की पर्याप्त पुष्टि होती है। मेरूतुड्गाचार्य विरचित 'पद्यावली' से पता चलता है कि उज्जयिनी के राजा गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने शकों से उज्जयिनी का राज्य लौटा लिया था। यह घटना महावीर-निर्वाणके 470 वें वर्ष में (527-470=57 ई0 पूर्व ) हुई थी। इसकी पुष्टि प्रबन्धकोश तथा शत्रुन्जयमहात्म्य से भी होती है।

  • प्राचीन काल में 'मालव' नामक गणों का विशेष प्रभुत्व था। ईस्वी पूर्व तृतीय शतक में इसने ‘क्षुद्रक’ गण के साथ सिकन्दर का सामना कियाथा, पर विशेष सहायता न मिलने से पराजित हो गया था । यही मालव जाति ग्रीक लोगों के सतत आक्रमण से पीडित होकर राजपूताने की ओर आई और मालवा में ईस्वी पूर्व प्रथम द्वितीय शताब्दी में अपना प्रभुत्व जमाया। यह गणराज्य था और विक्रमादित्य इसी गणतन्त्र के मुखिया थे । 
  • शकों के आक्रमण को विफल बनाकर विक्रम ने ‘शकारि' की उपाधि धारण की और अपने मालवगण को प्रतिष्ठित किया। इसलिए इस संवत् का 'मालवगण - स्थिति' नाम पड़ा था । गणराज्य में व्यक्ति की अपेक्षा समाज का विशेष महत्व होता है।
  • अतः यह संवत् गणमुख्य के नाम पर ही अभिहित न होकर गण के नाम पर 'मालव-संवत्' कहलाता था। अत: ईo पू० प्रथम शतक में विक्रम नाम-धारी राजा या गणमुखिया का परिचय इतिहास से भली-भाँति लगता है। इन्हीं की सभा में कालिदास की स्थिति मानना सर्वथा न्यायसंगत है।

कालिदास का जीवन परिचय का निष्कर्ष - 

  • अपने आश्रयदाता 'विक्रम' की सूचना कालिदास ने अपने ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर दी है। विक्रमोर्वशीय त्रोटक के अभिधान में नायक के स्थान पर 'विक्रम' शब्द का प्रयोग विक्रम के साथ कालिदास का घनिष्ठ सम्बन्ध सूचित करता है। 
  • अभिज्ञानप्रस्तावना में रसभाव- विशेष - दीक्षा- गुरू विक्रमादित्य साहसाड्क नाम्ना निर्दिष्ट किये गये है तथा भरत वाक्य में ‘गणशतपरिवर्तेरेवमन्योन्यकृत्यैः' में राजनीतिक अर्थ में व्यवहृत 'गण' शब्द - गणराष्ट्र' का सूचक स्वीकृत किया गया है। प्रायः अभी तक विक्रमादित्य एकतान्त्रिक राजा ही समझे जाते रहे हैं, परन्तु ऊपर निर्दिष्ट हस्तलेख के प्रामाण्य पर वे गणराष्ट्र (मालव गणराष्ट्र) के गणमुख्य प्रतीत होते हैं । 
  • विक्रमादित्य उनका व्यक्तिगत अभिधान था (कथासरित्सागर का पोषक साक्ष्य है) तथा 'साहसाड्क' उनकी उपाधि थी। उन्होने शकों को उनके प्रथम बढ़ाव में पराजित कर इस क्रान्तिकारी घटनाके उपलक्ष्य में 'मालवगण-स्थिति' नामक संवत् का प्रवर्तन किया, जो आगे चलकर 'विक्रमसंवत्' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 
  • गणराष्ट्र में व्यक्तिविशेष का प्राधान्य नहीं रहता। इसीलिए यह गण के नाम से प्रसिद्ध था। चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा समस्त गणराष्ट्र उच्छिन्न कर दिये गये; फलतः अष्टम नवम शती में सारे देश में निरंकुश एकतन्त्र की स्थापना हो जाने पर गणराष्ट्र की कल्पना ही विलीन हो गई। तभी गणमुख्य का नाम इससे सम्बद्ध कर दिया गया है और यह संवत् 'विक्रम' के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

विक्रमादित्य के गुप्त सम्राट् होने के विरूद्ध निम्नलिखित कठोर आपत्तियाँ हैं 

(1) गुप्त सम्राटों का अपना वंशगत संवत् है, उनके किसी उत्कीर्ण लेख में मालव अथवा विक्रम संवत् का उल्लेख नहीं है। जब उन्होने ही विक्रम संवत् का प्रयोग नहीं किया, तब जनता उनके गौरव के अस्त होने पर उनके नाम से इसे विक्रम संवत् ' क्यों कहने लगेगी ? 

(2) गुप्त सम्राट पाटलिपुत्रनाथ थे, किन्तु विक्रमादित्य उज्जयिनीनाथ थे, अनुश्रुतियों के आधार पर ही नहीं प्रत्युत रघुवंश (6/26) के आधार पर भी । यहाँ इन्दुमती - स्वयंवर में अवन्तिनाथ को 'विक्रमादित्य' होने का गूढ संकेत विद्यमान है।

(3) उज्जयिनी के विक्रम का व्यक्तिगत अभिधान ही 'विक्रमादित्य था, उपाधि नहीं कथासरित्सागर में लिखा है कि उनके पिता ने जन्म दिन को ही शिवजी के आदेशानुसार उनका नाम 'विक्रमादित्य' रखा, अभिषेक के समय की यह उपाधि नहीं है। इसके विरूद्ध किसी गुप्त सम्राट् का नाम विक्रमादित्य नहीं था। चन्द्रगुप्त द्वितीय और स्कन्दगुप्त के विरूद्ध क्रमश: ‘विक्रमादित्य' तथा 'क्रमादित्य' ( कहीं-कहीं विक्रमादित्य भी) थे। समुद्रगुप्त की यह उपाधि नहीं थी। कुमारगुप्त की उपाधि थी महेन्द्रादित्य', कोई नाम नहीं था । उपाधि होने से पहिले यह आवश्यक है कि उस नाम का कोई पराक्रमी लोकप्रसिद्ध व्यक्ति रहा हो जिसके नाम का अनुकरण पिछले युग के लोग करते है। गुप्त राजाओं की 'विक्रमादित्य' उपाधि अपनी पूर्व किसी लोकख्यात व्यक्ति की सत्ता की परिचायिका है अतः विक्रमादित्य की स्थिति प्रथम शती में गुप्तों से पूर्व मानना नितान्त समुचित है। इसी विक्रम की सभा के रत्न कालिदास थे।

(ख) बौद्ध कवि अश्वघोष का समय निश्चित है। कुषाण नरेश कनिष्क के समकालीन होने से उनका समय ई० सन् प्रथम शताब्दी का उत्तरार्ध है। इनके तथा कालिदास के काव्यों में अत्यधिक साम्य है। 

  • कथानक की सृष्टि, वर्णन की शैली, अलंकारों का प्रयोग, छन्दों का चुनाव – आदि अनेक विषयों में कालिदास का प्रभाव अश्वघोष पर पड़ा है। अश्वघोष प्रधानतः सर्वास्तिवादी दार्शनिक थे। काव्य की ओर उनकी अभिरूचि का होना तथा उसे धर्म प्रचार का साधन मानना काव्यकला के उत्कर्ष का द्योतक है (सौन्दर्यनन्द 18/63) | और यह उत्कर्ष कालिदास के प्रभाव का ही फल है। 
  • बुद्ध चरित में अश्वघोष में कालिदास के बहुत से श्लोकों का अनुकरण किया है। रघुवंश के सातवें सर्ग में (श्लोक 5-15 ) कालिदास ने स्वयंवर से लौटने पर अज को देखने के लिए आने वाली उत्सुक स्त्रियोंका बड़ा ही अभिराम वर्णन किया है। अश्वघोष ने बुद्धचरित ( तृतीय सर्ग, 13-24 पद्य) में ठीक ऐसे ही प्रसंग का वर्णन किया है। कुमारसम्भव मे भी ये ही पद्य मिलते हैं। 
  • यदि कालिदास ने इसे अश्वघोष के अनुकरण पर लिखा होता, तो वे दो बार इसका प्रदर्शन कर अपना ऋण नितान्त अभिव्यक्त नहीं करते, उसे छिपाने का प्रयत्न करते कालिदास की भाव-सुन्दरता अश्वघोष के द्वारा सुरक्षित न रह सकी । तुलना करने से कालिदास का समय अश्वघोष से प्राचीन प्रतीत होता है। अतः कालिदास का समय ईस्वी पूर्व प्रथम शतक में ही मानना युक्तियुक्त है।

(ग)शाकुन्तल में सूचित सामाजिक तथा आर्थिक दशा का अनुशीलन सूचित करता है कि कालिदास बौद्ध धर्म से प्रभावित उस युग के कवि थे जब हिन्दू देवी देवताओं के विषय में श्रद्धाविहीन विचार प्रचलित थे। 

  • कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् की नान्दी में भगवान् शिव की अष्टमूर्तियों का वर्णन किया है। इस नान्दी में 'प्रात्यक्षभिः' शब्द का प्रयोग कर कवि ने तत्कालिन देवता विषयक अविश्वास को दूर करने का प्रयत्न किया है। जिस शिव की अष्टमूर्तियों का हमें प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा है जिनका साक्षात्कार हमें अपनी आँखों से हो रहा है, उन देवता के विषय में अश्रद्धा कैसे टिक सकती है?

    इसी प्रकार षष्ठ अंक में कालिदास ने कर्तव्य-कर्म होने के कारण यज्ञयागादि का विधान ब्राह्मण के लिए आवश्यक बतलाया है। 

  • बौद्धों ने हिंसापरक होने के कारण यज्ञो की भरपेट निन्दा की, परन्तु शकुन्तला में एक पात्र कहता है कि क्या यज्ञों में पशु मारने वाले क्षेत्रिय का हृदय दयालु नहीं होता ?

    अविश्वास कैसे रह सकता है? महाकाव्य:

    कालिदास के दो प्रसिद्ध महाकाव्य हैं:

    1. मालविकाग्निमित्रम्

    यह नाटक राजा अग्निमित्र और राजकुमारी मालविका के प्रेम पर आधारित है।
    इसमें दरबार की राजनीति और प्रेम के बीच संतुलन को दर्शाया गया है।

    3.

    यह विशेष दिन अत्यंत रमणीय है। सूर्य का तेज कुछ मृदु हो गया है, चंद्रमा की शीतल किरणें मन को शांति प्रदान कर रही हैं। जलाशयों में जल का संचय शीतलता का अनुभव करा रहा है। दिन का अंत अत्यंत मनोहारी है और ग्रीष्म ऋतु का उष्ण ताप अब शांत हो गया है। इस शांत वातावरण में मेरा प्रेम भी शांत होकर एक सुखद अनुभूति में बदल गया है।”

    विद्या प्राप्ति के पश्चात वे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के आश्रित बने और उनके दरबार के “नवरत्नों” में से एक माने गए।

    कालिदास का साहित्यिक योगदान

    कालिदास की रचनाएँ संस्कृत साहित्य में उत्कृष्ट मानी जाती हैं। उनकी कृतियाँ मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित हैं: महाकाव्य, नाटक, और खंडकाव्य।

    1.

    कुल परम्परागत धर्म का परित्याग क्या कभी श्लाघनीय है? प्रचलित है कि कालिदास महामूर्ख से महा ज्ञानी इसी मंदिर के कारण बने।   

    कालिदास का जीवन परिचय: साहित्यिक यात्रा | Kalidas Ka Janm Kahan Hua Tha

    कालिदास का जीवन परिचय हिंदी में, पता चलता हैकिसंस्कृत का ज्ञान और माँ काली का आशीर्वाद लेने के बाद कालिदास अब संस्कृत के विद्वान हो चुके थे। इसके बाद उन्होंने संस्कृत में कई ऐसी रचनाएँ की जो पढ़ने वालों को मंत्र-मुग्ध कर देती है और यही कारण है कि कालिदास की रचनाएं इतने समय बाद भी आज विश्व प्रसिद्द है। अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम, मेघदूतम, रघुवंशपुरमजैसी लगभग जैसी 40 ऐसी छोटी-बड़ी रचनाएँ है जिनको कालिदास द्वारा रचित माना जाता है। 

    कालिदास केनाटक और महाकाव्यों की रचना

    मालविकाग्निमित्रम् कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। और अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगत प्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हो चुका है।

    विक्रमोर्वशीयम्एक रहस्यों भरा नाटक है। कुमारसंभवम् और रघुवंशम उनके महाकाव्यों के नाम है। रघुवंशम् में सम्पूर्ण रघुवंश के राजाओं की गाथाएँ हैं, तो कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेम कथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

    कालिदास के लेखन की विशेषता

    1. महाकवि कालिदास और उनकी रचनाओं का वर्णन असीमित है।
    2. कालिदास ने अपनी कविताओं और नाटकों में मानव जीवन और संस्कृति को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है।
    3. कालिदास की रचनाएं सुंदरता, साहसिक घटनाओं और त्याग के दृश्यों में मानव मन की बदलती स्थितियों को दर्शाती हैं।
    4. कालिदास की रचनाएं मानव जीवन के अनोखे चित्रण के लिए जानी जाती हैं।
    5. उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में विकसित संस्कृति को दुनिया की संस्कृतियों के लिए उदाहरण माना है।
    6. कालिदास का मानना था कि संस्कृति ज्यादातर आध्यात्मिक है।
    7. उनका मानना था कि मानव जाति का कल्याण प्रलोभनों से छुटकारा पाने और चेतना की सच्चाई को हासिल करने में है।
    8. कालिदास सभी धर्मों के प्रति सहानुभूति रखते थे।
    9. उनका मानना था कि कोई भी व्यक्ति उस मार्ग को चुन सकता है जो उसे अच्छा लगता है।
    10. कालिदास ने अपने जीवन में लोक, चित्रों और फूलों का आनंद लिया।
    11. उन्होंने मानव को सृष्टि और धर्म की शक्तियों जैसा ही समझा।

    कालिदास की रचनाएं: साहित्यिक योगदान | Kalidas ki Rachnaen

    कालिदास विश्व के उन गिने-चुने कवियों में शुमार है जो सर्व-श्रेष्ट है। ऐसा कहाँ जाता है कि अगर कालिदास ने  मेघदूतम और अभिज्ञान शाकुंतलम, सिर्फ ये दो कालिदास की रचनाएं की होती, फिर भी वे संस्कृत के महान कवि कहे जाते। उनकी रचनाओं पर कई देशी-विदेशी विद्वानों ने अनेक टिप्पणियां की है। आज भी अनेक कवियों के लिए वे एक इंस्पीरेशन बने हुए है।

    क्रमपुस्तक का नामप्रकारमुख्य विषय / कहानीविशेषताएँ
    1अभिज्ञानशाकुंतलम्नाटक (Drama)शकुंतला और राजा दुष्यंत की प्रेमगाथाविश्वप्रसिद्ध नाटक, संस्कृत साहित्य की श्रेष्ठ रचना
    2मेघदूतम्खंडकाव्य (Lyric Poem)यक्ष का बादल के माध्यम से अपनी पत्नी को संदेश भेजनाप्रकृति और विरह का अद्भुत चित्रण
    3कुमारसंभवम्महाकाव्य (Epic)शिव–पार्वती के विवाह और कुमार (कार्तिकेय) के जन्म की कथाश्रृंगार रस की उच्चतम प्रस्तुति
    4रघुवंशम्महाकाव्य (Epic)रघुवंश (भगवान राम का वंश) की राजाओं की वंशगाथानीति, धर्म और शौर्य का सुंदर समन्वय
    5मालविकाग्निमित्रम्नाटक (Drama)राजा अग्निमित्र और मालविका की प्रेम कथाहास्य-प्रेम मिश्रित कथानक
    6विक्रमोर्वशीयम्नाटक (Drama)राजा पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की दिव्य प्रेम कथास्वर्गिक प्रेम और वियोग का मार्मिक चित्रण

     मेघदूत

    मेघदूतम में उन्होंने एक यक्ष की कहानी को जिस तरह से कहाँ है, उससे ऐसा लगता है मानों वे यक्ष के माध्यम से खुद अपनी ही पीड़ा बता रहे हो। मेघदूतम में उन्होंने अलग-अलग शहरों का जिस तरह से विस्तृत वर्णन किया है, उससे हर किसी को आश्चर्य होता है कि आज से 2500 साल पहले जब इतने तेज़ वाहन नहीं होते थे, उस टाइम पर उन्होंने इतने शहरों का इतना विस्तृत वर्णन कैसे किया होगा। 

    कालिदास की रचनाएं, मेघदूत में वे एक बारिश के समय में आषाढ़ महीने में एक बादल को दूत बनाकर यक्ष की प्रेमिका के पास एक प्रेम संदेश लेकर भेजते हैं। इस बात से ही उनकी कल्पना शक्ति का पता लगता है कि आज के टाइम के सेटेलाइट सिग्नल की तरह सन्देश भेजने के लिए कालिदास ने भी बादल का सहारा लिया था। 

    मेघदूत की जिस तरह से उन्होंने यक्ष की परेशानी को बताया है, उससे हर व्यक्ति अपने आप को जोड़ता है, शायद इसीलिए मेघदूत उनकी विश्व-प्रसिद्द और अमर रचना है। उनकी इस रचना के लिए हिंदी एक महाकवि नागार्जुन कहते हैं कि,

    वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,

    प्रथम दिवस आषाढ़ मास का। 

    देख गगन में श्याम घन-घटा। 

    विधुर यक्ष का मन जब उचटा।

    खड़े-खड़े जब हाथ जोड़कर, 

    चित्रकूट के सुभग शिखर पर,

    उस बेचारे ने भेजा था जिनके द्वारा ही संदेशा।  

    उन पुष्करावर्त मेघों का, साथी बनकर उड़ने वाले, 

    कालिदास!

    इस यात्रा के दौरान कालिदास का बिहार के एक देवी मंदिर से गहरा संबंध जुड़ गया. प्रचलित कथा के अनुसार, उच्चैठ के इस मंदिर में छिन्नमस्तिका मां दुर्गा स्वयं प्रकट हुई  हैं और यहां जो भी आता है उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है. नाटक:

    कालिदास ने तीन प्रमुख नाटक लिखे जो संस्कृत नाट्य साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

    1.